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दीपक तिवारी पर बोले पत्रकार राकेश अचल: राजनीतिक नियुक्तियों में काम नहीं आते ये पैमाने

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर पत्रकार दीपक तिवारी की नियुक्ति पर...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago

राकेश अचल
वरिष्ठ पत्रकार।।

दीपक से मत जलिये

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर पत्रकार दीपक तिवारी की नियुक्ति पर विवाद तो नहीं हुआ, लेकिन चौतरफा असंतोष जरूर उभरकर सामने आया है, जो स्वाभाविक ही है। ऐसे लोगों से मेरा कहना है कि उन्हें दीपक से जलना नहीं चाहिए, उलटे उसे बुझने से बचाने के लिए फानूस बनकर उसकी हिफाजत करनी चाहिए।

दीपक को मैं तब से जानता हूं, जब वे पत्रकारिता के छात्र थे। उनकी नियुक्ति पर असंतोष होने के अनेक कारण हैं, लेकिन विवाद का एक भी कारण नजर नहीं आता। दीपक कनिष्ठ हैं और अनुभव में भी दूसरों से उन्नीस बैठते हैं, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों में ये पैमाने कभी काम नहीं आते। यहां सब चलता है। दीपक के पास एक अनुभव को छोड़कर वे सभी पात्रताएं हैं, जो एक कुलपति में होनी चाहिए, लेकिन कुछ साथियों को उनका चयन रास नहीं आया। हमारे एक वरिष्ठ साथी ने तो यहां तक कह दिया,'सरकार ने जूते में रखकर दाल बांटी है।'

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि प्रदेश में और देश में दीपक से अधिक अनुभवी पत्रकार कुलपति पद के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन सवाल ये है कि क्या उनमें से अधिकांश ने इस पद के लिए चयन समिति के सामने अपना आवेदन रखा? शायद नहीं। क्योंकि अधिकांश चाहते थे कि ये पद उन्हें घर बुलाकर दिया जाये, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा होता भी नहीं है। दीपक से पहले भी भाजपा शासन में माखनलाल विवि को जितने भी कुलपति मिले, वे किसी चयन समिति की खोज नहीं थे, बल्कि उनमें से अधिकांश को संघाज्ञा पर नियुक्तियां दी गयीं थीं।

माखनलाल पत्रकारिता विवि को एक स्वतंत्र पहचान की जरूरत है। दुर्भाग्य से उस पर बीते डेढ़ दशक में संघ पोषित होने के आरोप लगे। भर्तियों में संघ मित्रों को प्राथमिकता ही नहीं दी गयी, बल्कि उनके लिए नियमों की अनदेखी भी की गयी। मुझे पता है कि जिन लोगों को सही इबारत लिखनी तक नहीं आती, वे इस विवि के कर्मचारी हैं। बहरहाल बात दीपक की हो रही है। दीपक तिवारी ने अपने ढाई दशक के पत्रकारिता जीवन में सत्ता प्रतिष्ठान से निकटता बनाये रखने के साथ ही अपने पत्रकारिता के धर्म को भी अक्षुण्ण बनाये रखा है। आज कुछ अति असंतुष्ट लोग उन पर सत्ता का दलाल होने का आरोप लगाकर अपना क्षोभ सोशल मीडिया पर प्रकट कर रहे हैं, लेकिन किसी एक में इतना साहस नहीं है कि वो सप्रमाण अपनी बात सार्वजनिक रूप से कह सके।

दुनिया जानती है कि निजाम बदलने के साथ बहुत कुछ बदलता है,चयन के पैमाने भी। तीन महीने पहले आपने सियासत में भी यही देखा होगा। जहां किसी और के नाम पर वोट मांगे गए, वहीं जीत के बाद किसी और को सेहरा बांध दिया गया। कहने का तात्पर्य ये है कि चुनाव के पैमानों पर सामूहिक सहमति सम्भव नहीं है। मैंने तो इस पद के लिए बनी चयन समिति पर भी सवाल किया था, लेकिन उससे क्या होता है? सरकार सर्वशक्तिमान होती है,उसका फैसला शिरोधार्य करना पड़ता है अन्यथा विरोध के असंख्य रास्ते हैं। आप उन पर चलते रहिये, लेकिन किसी की जाती अवमानना मत कीजिये।

आप सोच सकते हैं कि सजातीय होने के नाते मैं दीपक की वकालत कर रहा हूं, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है। मुझे जातिवाद से उतनी ही घृणा है, जितनी किसी और को होती होगी। मेरा तो कहना है कि यदि दीपक को नया दायित्व मिला है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए,उसे काम करने का अवसर मिलना चाहिए। कामयाब न हो तो कान पकड़कर बाहर करने का अधिकार भी उसी सरकार के पास है, जो उसे चुन रही है। दीपक ने जब अपनी पहली किताब लिखी थी, तब मैंने उसमें अनेक संशोधन सुझाये थे। दीपक ने उन्हें स्वीकार किया, सुधारा भी। इसका मतलब दीपक के पास सुधार की तमाम गुंजाइश है।

दीपक पर कुलपति जैसा भारी-भरकम शब्द चस्पा होने के बाद सहज लगने में तनिक वक्त लगेगा, क्योंकि अभी तक महामहिम, कुलपति जैसे शब्द उम्रदराज लोगों पर ही फबते आये हैं। ये पहला प्रयोग है, उम्मीद की जानी चाहिए कि दीपक अपने अनुभव और व्यववहार से इस पद की लाज रखने में कामयाब होंगे, साथ ही वे उन तमाम शंकाओं और कुशंकाओं को भी निर्मूल साबित कर सकेंगे, जो उनकी नियुक्ति को लेकर प्रकट की गई हैं। दीपक आयातित कुलपति नहीं हैं, इसलिए कहीं भागकर जाने वाले नहीं हैं। उन्हें घेरा जा सकता है, सुधारा जा सकता है और बेहतर बनाया जा सकता है।

माखनलाल विवि के नए कुलपति दीपक के पास भले ही अंग्रेजी में लिखने, सोचने और समझने का अनुभव है, किन्तु वो जमीन से जुड़े पत्रकार हैं। सरोकारों को समझते हैं। उन्होंने घाट-घाट का पानी पिया है, अर्थात अंग्रेजी के दैनिकों, पत्रिकाओं, संवाद एजेंसियों और आकाशवाणी में काम किया है। अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सलाहकार के रूप में काम करने का अनुभव उन्हें है। यानी निपट अनाड़ी नहीं हैं वो। केवल उम्र और अनुभव के वर्षों से उनका मूल्यांकन मत कीजिये। इस पैमाने पर तो प्रदेश में मुझ समेत अनेक सूरमा बैठे हैं। मै दीपक के लिए अपनी शुभकामनाएं देते हुए अपनी जमात से पुन: आग्रह करता हूं कि दीपक से जलिये मत, उसे जलने में मदद कीजिये।


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