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कश्मीरियों का साथ चाहते हैं, तो 370 वाली गारंटी पूरी करनी होगी, बोले कमल मोरारका...
कमल मोरारका समाजशास्त्री
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
कमल मोरारका
समाजशास्त्री
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मुद्दा यह है कि कश्मीर के लोगों को कैसे यह विश्वास दिलाया जाए कि हम आपकी स्वायत्तता का सम्मान करेंगे, आपकी पसंद का सम्मान करेंगे। एक बार जब कश्मीरियों ने 1983 में फारूक अब्दुल्ला को अपना नेता चुना, तो केंद्र ने पिछले दरवाजे से उस सरकार को अस्थिर कर दिया। आपने संदेश दिया कि जब तक दिल्ली की पसंद की सरकार नहीं होगी, तब तक आपको शासन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसा संदेश देश के किसी भी भाग के लिए गलत होगा, कश्मीर के लिए तो और अधिक गलत होगा। अब हालात ये हैं कि कश्मीर में जब एक छात्र नेता, जिसके पास बहुत ज्यादा समर्थन नहीं था, मारा गया तो उसके जनाजे में तकरीबन 5 लाख लोग शरीक हुए। मैं नहीं जानता कि महबूबा मुफ्ती क्या सोच रही हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि भाजपा-पीडीपी सरकार अब वास्तव में इस मुद्दे को संभाल सकती है। आपको कश्मीरियों को खुद की सरकार चुनने का मौका देना होगा। अब समय आ गया है कि आपको कश्मीर में 1953 से पहले की स्थिति बहाल करनी होगी, अगर आप कश्मीर की जनता को अपने साथ रखना चाहते हैं। धारा 370 के तहत हमने उन्हें जो भी गारंटी दी है, उसका हमें पूरा-पूरा पालन करना होगा, उसे तब तक मानना होगा, जब तक वे खुद इसे खत्म करने की बात नहीं कहते।
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अब यह काम कैसे किया जाए? कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की बहुमत की सरकार है। यदि वाकई वे इस मसले को हल कर लेते हैं तो यह बहुत अच्छा है। अब समय आ गया है जब आप कश्मीर विधानसभा का चुनाव कांग्रेस और भाजपा की भागीदारी के बिना होने दें। इन दोनों पार्टियों को कश्मीर से बाहर रखना चाहिए। स्थानीय पार्टी चाहे, वह नेशनल कांफ्रेंस हो या पीडीपी या अन्य पार्टी या कोई कश्मीरी व्यक्ति, चुनाव लड़े और निर्वाचित हो। यहां तक कि अगर एक अलगाववादी पार्टी भी चुनाव जीतती है तो इसमें कोई समस्या नहीं है। डीएमके एक अलगाववादी पार्टी थी, जो अलग झंडा, अलग मद्रास, तमिलनाडु चाहती थी। एक बार जब वे चुन लिए गए तो भारतीय संविधान के अनुसार कार्य करने लगे। अब दशकों से वहां द्रमुक या अन्नाद्रमुक की सरकार बन रही है। कश्मीर में भी दो स्थानीय पार्टी की व्यवस्था चल सकती है। वे स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। मुझे लगता है कि समय आ गया है कि एक सर्वदलीय बैठक कर कश्मीर मुद्दे का हल तलाशा जाए। एक दो मंत्री पद के लिए आपको अपने क्षुद्र स्वार्थ दूर रखने होंगे। आदर्श रूप से भाजपा को मुफ्ती सरकार का बाहर से समर्थन करना चाहिए था। सरकार में भागीदारी कर उसने अच्छा नहीं किया है। उनका कहना है कि जम्मू के लोगों की भावनाओं को भी देखना है। लेकिन ये सब सत्ता के लिए बहानेबाजी है। सरकार या मंत्री पद का कोई मतलब नहीं है, देश महत्वपूर्ण है। क्या हम कश्मीर की जमीन चाहते हैं? जमीन सुरक्षित है क्योंकि वहां उसकी रक्षा के लिए सेना है। पाकिस्तान चाहे जितना भी शोर मचा ले, वो हमसे कश्मीर नहीं छीन सकता।
कश्मीरी लोगों का दिल जीतने के लिए हमें उनके मन में विश्वास पैदा करना होगा। संयोग से, कश्मीर का इस्लाम दुनिया के बाकी हिस्सों के इस्लाम से अलग सू़फी इस्लाम है। आतंकी ऐसा नहीं चाहते हैं, इसलिए चरार-ए-शरी़फ को विस्फोट से उड़ा दिया। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक कुशल राजनेता (स्टेट्समैन) की तरह सोचना चाहिए। ऐसी स्थिति पैदा करें कि कश्मीरी स्वेच्छा से भारत के साथ एकीकृत होने की चाहत दिखाएं।
मैं सरकार को चेतावनी देना चाहूंगा। विकास पैकेज, रोजगार सृजन और उद्योग लगाने की बात हो रही है, ये सब जनता की बुद्धिमता का अपमान है। आज का युवा बेशक यह सब चाहता है, लेकिन अपने आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। उन्हें यहां महसूस होना चाहिए कि कश्मीर, श्रीनगर और जम्मू से शासित हो रहा है न कि दिल्ली से। जब तक हम ऐसी परिस्थितियों का निर्माण नहीं करते हैं, तब तक मुझे डर है कि कश्मीर में समस्या और बढ़ेगी, जैसा 1983 के बाद वहां आतंकवाद ने अपना सर उठाया था। सामान्य स्थिति बहाल होने से पहले तक आतंकवाद वहां एक बड़ी समस्या थी। अब, कश्मीर में नई पीढ़ी आ गई है। हमें एक बार फिर वही पुरानी कहानी नहीं दोहरानी चाहिए।
(साभार: चौथी दुनिया)
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