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कश्मीर में अखबार बंद पर वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने उठाए ये सवाल...
‘कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई।’ अपने ब्लॉग ‘कस्बा’ के जरिए ये कहा वरिष्ठ टीवी पत्रकार
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई।’ अपने ब्लॉग ‘कस्बा’ के जरिए ये कहा वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
कश्मीर में अखबार क्यों बंद हैं?
वहां पहले भी हालात के बिगड़ने पर अखबारों के छपने पर रोक लगती रही है। पर पहले के नाम पर कब तक आज वही सब होता रहेगा। क्या वहां आतंकवाद अखबारों के कारण फैला था? क्या बुरहान वहां की मीडिया की देन है? क्या मौजूदा हालात के लिए स्थानीय मीडिया ही जिम्मेदार है? क्या वहां समस्या के कारण को ढूंढ लिया गया है? उन्हीं अखबारों से ही तो खबर आई थी कि अनंतनाग तीर्थयात्रा मार्ग में स्थानीय मुस्लिमों ने कर्फ्यू तोड़ कर यात्रियों की मदद की। यह भी खबर आई कि मुस्लिमों ने अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडित की मां के जनाजे को कंधा दिया है। यह भी खबर आई कि कई कश्मीरी पंडित फिर से भाग आए हैं। सुरक्षाबलों की ज्यादतियों को भी अखबार छाप रहे थे। लोगों और सेना दोनों के पक्ष छप रहे थे। इन खबरों से लोग वहां की विविधता को देख पा रहे थे। अखबारों पर पाबंदी लगाकर कश्मीर और शेष भारत के लोगों से यह मौका छिन लिया गया है।
कश्मीर के अखबारों को कश्मीर के लिए बंद किया गया है या शेष भारत के लिए? पहले भी वहां ऐसा तनावपूर्ण माहौल रहा है लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार लोग कश्मीर की खबरों के बारे में गहराई से रुचि ले रहे थे। कश्मीर की वेबसाइट की खबरें पढ़ी जा रही थीं और साझा हो रही थीं दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन पहली बार लगा कि कश्मीर की मीडिया की खबरें शेष भारत तक पहुंच रही हैं। दिल्ली से चलने वाली कई वेबसाइट पर कश्मीर की मीडिया और दिल्ली की मीडिया के कवरेज का तुलनात्मक अध्ययन हो रहा था। कश्मीर समाचार पत्रों के नाम भारत में जाने जा रहे थे। उनके संपादक तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों में आकर बोलने लगे।
इससे दोनों जगहों के पाठकों के बीच एक बेहतर समझ बन रही थी। संवाद बन रहा था। कश्मीर की जटिलता से भागने वाले मेरे जैसे पाठकों के पास भी तुलनात्मक अध्ययन का जरिया उपलब्ध था। कश्मीर के लोगों को भी लगा होगा कि उनकी बात कही जा रही है। लिखी जा रही है। अखबार बंद करने से यह संदेश जाएगा कि स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर है और सरकार वहां के लोगों से संवाद नहीं करना चाहती है। आखिर सरकार अपना पक्ष किन माध्यमों के जरिये लोगों के बीच रखेगी।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि कश्मीरी मीडिया की खबरों में ऐसा क्या था जो वहां के लोग नहीं जानते हैं और जो वहां से बाहर के लोग नहीं जानते हैं? क्या उबलता कश्मीर लिख देने से हालात में उबाल आ जाता है? अगर ये सही है और ये अतिसंवेदनशील सूचना नहीं है तो इसे छपने में क्या दिक्कत है? अगर कश्मीर मीडिया कथित रूप से प्रोपेगैंडा कर रहा था तो क्या हम आश्वस्त है कि दिल्ली का मीडिया ये काम नहीं कर रहा होगा? क्या यही भाव दिल्ली की मीडिया की खबरों और संपादकीय लेखों में नहीं है? फर्जी खबरों के सहारे कैराना को कश्मीर बताकर कौन किसे उबाल रहा था इस पर भी वक्त निकाल कर सोचना चाहिए।
कश्मीर के कई हलकों से आवाज आई कि दिल्ली का कुछ मीडिया झूठी बातों को प्रचारित कर माहौल बिगाड़ रहा है। युवा आईएएस अधिकारियों से लेकर शेष भारत के तमाम लोग दिल्ली की मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि कुछ एंकर ऐसे बावले हो गए हैं जिनके कारण हालात और खराब हो सकते हैं। आईएएस शाह फैसल ने साफ-साफ नाम लेकर लिखा कि कौन कौन से चैनल हैं जो अफवाह फैला रहे हैं।
एक अधिकारी ने तो बकायदा नाम लेकर लिखा है कि एक चैनल माहौल बिगाड़ रहा है। मैं नहीं कहता कि इस आधार पर चैनल के बारे में कोई फैसला कर ही लेना चाहिए लेकिन इस पर चुप्पी भी बता रही है कि कौन किस तरफ है। अगर सरकार की चिन्ता माहौल न बिगड़ने देने की है तो क्या उसने वहां के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह दिल्ली मीडिया के कुछ तत्वों की भी पड़ताल करेगी। अव्वल तो यह काम सरकार का है नहीं फिर भी उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि उस पर पक्षपात का आरोप न लगे।
बैन का कोई तुक नहीं बनता। न यहां न वहां। एक अंतर और दिखा। कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई। इससे तो हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। ट्रक तो ओवरलोडिंग के जुर्माने से बचने के लिए चुंगी पर रिश्वत देकर निकल जाएगा और हमें दे जाएगा दो टकिया राष्ट्रवाद। जैसे कश्मीर का सवाल दूध भात का सवाल हो।
हर दूसरा विशेषज्ञ लिख रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों को कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए तो फिर वहां के अखबारों को कश्मीर की और कश्मीर से बात करने की सजा क्यों दी गई? वहां के अखबार वहां के लोगों से ही तो बात कर रहे थे। सामान्य पाठक कैसे जानेगा कि वहां क्या हो रहा है। वहां के लोगों में भी भरोसा बनता कि उनकी बातें शेष भारत तक पहुंच रही हैं और लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं। हिंसा के रास्ते से कश्मीर को लौटाने के लिए सब यही तो कहते हैं कि बातचीत होती रहे। थोड़े दिनों बाद सारे डॉक्टर अपनी पर्ची पर यही लिखेंगे कि सरकार बात करे।
इस वक्त सरकार का काम अखबार कर रहे हैं। वहां के लोगों से वहां की बात कर रहे हैं। इससे एक संवाद कायम होता है। सही और विविध सूचनाएं लोगों में आत्मविश्वास पैदा करती हैं। लोकतंत्र के प्रति इस विश्वास को जिंदा रखती हैं कि बोला-सुना जा रहा है। प्रेस पर पाबंदी है और प्रेस चुप है। हम सबको चुप रहना अब सहज लगता है। उस सोशल मीडिया में भी चुप्पी है जो बिना बुलाए लोकतंत्र के बारात में नाचने आ गया है कि हमीं अब इसके अभिभावक हैं। वह भी चुप है। बोलने की पाबंदी के खिलाफ सबको बोलना चाहिए। वाजपेयी जी के शब्दों में यह अच्छी बात नहीं है।
(साभार: ‘कस्बा’ ब्लॉग से)
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