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जिंदगी के रण में काम आया टीवी पत्रकारिता का 'रन डाउन'

आप जो काम करते हैं उसका असर आपके मन-मिजाज पर पड़ता है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 7 years ago

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार ।।

आप जो काम करते हैं उसका असर आपके मन-मिजाज पर पड़ता है। आपकी कार्यशैली कार्यक्षमता आसपास के वातावरण से प्रभावित होती है। चुनौतियां हर किसी के जीवन का हिस्सा होती है, चुनौतियां आगे के लिए रास्ता भी तैयार करती हैं। चुनौतियों को साधने और उसे आगे बढ़ने का हुनर भी एक प्रबंधन क्षमता की तरह होता है और ये हुनर हमने पत्रकारिता के अपने पेशे में सीखा है। टीवी पत्रकार, कुछ हद तक प्रिंट के पत्रकार और आम लोगों में से कुछ लोग टीवी पत्रकारिता की एक विधा रनडाउन के बारे में जानते होंगे। 

रनडाउन यानी खबरों का सिलसिला, कंप्यूटर पर मौजूद वो क्रम जिसके आधार पर बुलेटिन में खबरें दिखाई जाती हैं। एंकर उसकी क्रम से खबरों को पढ़ता है और दर्शक उसे देखते सुनते हैं। दर्शकों के हिसाब से देखें तो ये एक सामान्य प्रक्रिया होगी लेकिन टीवी चैनलों के न्यूज रूम में जहां रनडाउन बनता है वहां अकसर अफरातफरी का माहौल होता है। तमाम तरह की चुनौतियां आती है। हेडलाइन में नई चीज आई तो उसको अपडेट करके लेना। ब्रेकिंग न्यूज की विडियो दिखानी हो, किसी भी खबर को विडियो के साथ दिखाने के लिए पहले विडियो की फीड मंगवाना, फिर उसे एडिट करवाना, उस पर खबर लिखना, चेक करना और फिर रनडाउन में डालकर उसका क्रम बनाना, इन कड़ियों से गुजरना ही होता है। किसी भी वजह से अगर इनमें से कोई भी कड़ी टूटी तो खबर नहीं चल पाने का खतरा रहता है। नेट नहीं चलाना, लीज लाइन में प्रॉब्लम, समय पर विडियो नहीं कट पाना, मैन पावर की कमी या गैर मौजूदगी कुछ भी हो सकता है और आपका काम बाधित हो सकता है। अगर आपने सारी कड़ियों को साथ लिया तो खबर चल जाती है और नहीं साध पाए तो नहीं चल पाती। रनडाउन हैंडल करने वालों को सूरते हाल चाहे कुछ भी अपने आपको सकारात्मक और नकारात्मकर परिस्थितियों में बेहतर आउटपुट देने के इरादे और मनोबल से काम करना होता है। तभी नतीजे दे पाना संभव हो पाता है। लेकिन रनडाउन से आप जब निकल कर आएंगे तो जिंदगी में जूझारूपन आ जाएगा। रोजमर्रे की समस्या और मुश्किलों को भी आप रनडाउन के नजरिए से देखेंगे और उसे हल करने का आपका हुनर भी ऐसा ही होगा।

आपने किसी भी तरीके से अपडेटेड खबरों और विडियो के साथ बुलेटिन को निकाल लिया और आपका रनडाउन यानी खबरों का सिलसिला दमदार, घारदार, असरदार और जानकारी परक था तो दर्शकों को भी ये पसंद आएगा और इसका चैनल से जुड़ने वालों पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। इंडिया टीवी और लाइव इंडिया में तकरीबन 10 साल न्यूज रूम की बाकी जिम्मेदारियों के अलावा मुख्य रूप से रनडाउन पर मेरा रियाज ने मुझे जिंदगी की एक बडी सीख दी है। पहली सीख ये कि किसी भी हाल में हार नहीं माननी है। आशावादी बने रहना है और चुनौतियों का सामना करना है। उपलब्ध परिस्थितियों से होकर जीत की तरफ बढ़ना है। 

अगस्त 2017 में चैनल वन की एग्जिक्यूटिव एडिटर की नौकरी के बाद अखबारों और चैनलों की नौकरी में जब ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं जैसा दौर नजर आने लगा तो हमने नये रास्ते की तलाश की एक रास्ता जो समानांतर मेरे किरदार का हिस्सा था। उसी रास्ते पर जीवन और रोजी रोटी की गाड़ी आगे बढ़ गई। उस रास्ते का नाम ईवेंट जर्नलिज्म है। ईवेंट जर्नलिज्म यानी पत्रकारिता को वो नया चेहरा जो सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को समेटे हुए है, मास से सीधे-सीधे कम्युनिकेट कर रहा है। ऐसा नहीं है कि इस राह में चुनौतियां नहीं थीं, लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद आगे बढ़ने का हुनर हमें रनाडाउन ने सिखाया है। रनडाउन ने ये विपरीत परिस्थितियों में नतीजा का हुनर सिखाया है और इसी हुनर की वजह से मैं चार टीवी शो समेत ईवेंट जर्नलिज्म के 18 समारोह कर चुका हूं और 12 अगसत को भारत की बात सुनाता हूं अपने 19वें समारोह की तैयारी में लगा हूं। 

खुद की बनाई इस राह को आसान करना बेहद मुश्किल भरा रहा।  ईवेंट मैनेज करने वाले ये जानते हैं कि उनको किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। चुनौतियां फंड से शुरू होती हैं और उसमें जोड़े गए लोगों से शुरू होती हैं। कई दफा ऐसा होता है कि चीजें आपके मन और जमीर के खिलाफ जा रही दिखाई पड़ती हैं, लेकिन फौरन ऐसी चीजों पर काबू पाना होता है। कुछ साथी की शक्ल में, कुछ विघ्न संतोषी या असंतोषी किस्म के वैसे लोग जो सम्मान पाने वाले लोगों पर सवाल खड़े करते हैं और खुद को उनसे बेहतर बताते हुए पेश करते हैं, उनसे भी चुनौतियां होती है।

ईवेंट को ऑर्गनाइज करने से जुड़े कई पहलू होते हैं जिसे इस अंदाज में काम करना होता है कि एक भी बच्चा छूटा तो सुरक्षा चक्र टूटा। किसी भी आयोजन में वैसे लोगों का समायोजन बेहतर होता है, जो उस विषय से, मुद्दे से जुड़ें हो या उसके मुरीद हों और दूसरी बात ये तय की गई जिम्मेदारियों को निभाने के लिए लोग मन से और समय से तैयार हों। अगर आप सबके हिस्से का काम करेंगे तो कुछ न कुछ छूट ही जाएगा, लेकिन अगर जिसे आपने जिम्मेदारी दी है उसके पास समय नहीं है या करने की क्षमता नहीं है तो आप क्या करेंगे, मजबूरी में सबके हिस्से का काम करेंगे और फिर भी बेहतर नतीजे देने की कोशिश करेंगे। यानी विपरीत हालात में बेहतर नतीजों की कोशिश यही हुनर हमें रनडाउन से मिला है और रन डाउन टीवी पत्रकारिता से। वो टीवी पत्रकारिता जहां आठ साल की प्रिंट पत्रकारिता के बाद 2003 मेरा प्रवेश हुआ था, लेकिन टीवी पत्रकारिता का पूरा मैकेनिज्म और रन डाउन इंडिया टीवी में सीखने का मौका मिला, जो लाइव इंडिया में जारी रहा और जीवन में बहुत काम आया। खास तौर से उस दौर में आम लोगों के साथ-साथ पत्रकार भी चुनौतियों को नहीं साध पाने की वजह से खुदकुशी का रास्ता चुन रहे हैं।  

(लेखक कई अखबारों और न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं और फिलहाल ईवेंट जर्नलिज्म की अवाधारणा पर काम कर रहे हैं) 

 


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