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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक ने उठाया सवाल- कौन करेगा, यह बड़ा काम?
‘यदि कानून बनाकर इन सबके बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की पढ़ाई अनिवार्य कर दी जाए तो रातों रात देश में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठ जाए। इन स्कूलों के करोड़ों बच्चों का स्तर गिरा हुआ रहे, इसमें भद्रलोक का फायदा है, क्योंकि तभी तो उनके बच्चे बड़ी—बड़ी नौकरियों पर हाथ साफ कर सकेंगे।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आ
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘यदि कानून बनाकर इन सबके बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की पढ़ाई अनिवार्य कर दी जाए तो रातों रात देश में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठ जाए। इन स्कूलों के करोड़ों बच्चों का स्तर गिरा हुआ रहे, इसमें भद्रलोक का फायदा है, क्योंकि तभी तो उनके बच्चे बड़ी—बड़ी नौकरियों पर हाथ साफ कर सकेंगे।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
कौन करेगा, यह बड़ा काम?
देश में बच्चों की पढ़ाई की कितनी दुर्दशा है, इसका एक नमूना पेश किया है- एक ताजा सरकारी रपट ने! दिल्ली सरकार के स्कूलों में 6ठी कक्षा के दो लाख से भी ज्यादा छात्र-छात्राएं हैं। इन छात्रों में से 74 प्रतिशत ऐसे हैं, जो अपनी पाठ्य-पुस्तक का एक पैराग्राफ भी पढ़कर नहीं सुना सकते। 46 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जो दूसरी कक्षा की पाठ्य-पुस्तक की कोई कहानी भी नहीं पढ़ सकते। 8 प्रतिशत बच्चे तो ऐसे हैं कि जिन्हें ‘ग’, गधे का और ‘ख’ खरगोश का भी पढ़ना नहीं आता। 75 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं कि जिन्हें दूसरी कक्षा की अंग्रेजी की किताब भी पढ़ना नहीं आता।
फिर 67 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें किन्हीं तीन अंकों की संख्या में एक अंक का भाग करना भी नहीं आता। ये बच्चे म्युनिसिपाल्टी स्कूल से पांचवीं पास करके दिल्ली सरकार के स्कूलों में भर्ती होते हैं। आप सोचें कि दिल्ली का यह हाल है तो देश के दूसरे छोटे-मोटे शहरों का क्या हाल होगा?
शहरों की बात जाने दीजिए, गांवों के हाल की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनके स्कूलों में तो अध्यापक ही नहीं होते। पेड़ों के नीचे बच्चों के झुंड जमा हो जाते हैं। उनके बैठने के लिए कमरे नहीं होते, टाटपट्टी तक नहीं होती। पीने का पानी नहीं होता। शौचालय नहीं होते। अगर होते हैं तो उनकी बदबू से पूरा स्कूल महकता रहता है।
मैं पूछता हूं कि ऐसा क्यों होता है? यह इसलिए होता है कि इन स्कूलों में किसी सांसद, विधायक, पार्षद, मंत्री या मुख्यमंत्री का बच्चा नहीं पढ़ता। सरकारी अफसरों, जजों, बड़े फौजियों के बच्चे भी वहां नहीं जाते। यदि कानून बनाकर इन सबके बच्चों के लिए सरकारी स्कूलों की पढ़ाई अनिवार्य कर दी जाए तो रातों रात देश में शिक्षा का स्तर ऊंचा उठ जाए। इन स्कूलों के करोड़ों बच्चों का स्तर गिरा हुआ रहे, इसमें भद्रलोक का फायदा है, क्योंकि तभी तो उनके बच्चे बड़ी—बड़ी नौकरियों पर हाथ साफ कर सकेंगे। वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं, तगड़ी फीसें भरते हैं और उन्हें धड़ल्ले से अंग्रेजी सिखाते हैं।
ऊंची नौकरियों में इन्हीं दादा लोगों ने अंग्रेजी अनिवार्य कर रखी है ताकि गरीबों, ग्रामीणों, पिछड़ों, दलितों के बच्चे वहां घुस ही नहीं पाएं। दूसरे शब्दों में अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई और नौकरी-भर्ती में उसकी अनिवार्यता तत्काल खत्म की जाए। कौन करेगा, यह बड़ा काम? देश में दर्जनों प्रधानमंत्री, सैकड़ों मुख्यमंत्री और हजारों सांसद हो गए हैं लेकिन क्या किसी की हिम्मत है कि शिक्षा की इस तबाही पर वह मुंह भी खोले?
(साभार: नया इंडिया)
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