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तो कैसे हिंदी पतन की ओर जा रही है?

सितंबर बड़ा ही खास महीना है। खासकर हिंदी पढ़ने, बोलने, लिखने और समझने वालों के लिए। इस महीने का पहला पखवाड़ा हिंदी विलाप का होता है...

समाचार4मीडिया ब्यूरो 8 years ago

पूजा मेहरोत्रा ।।

सितंबर बड़ा ही खास महीना है। खासकर हिंदी पढ़ने, बोलने, लिखने और समझने वालों के लिए। इस महीने का पहला पखवाड़ा हिंदी विलाप का होता है। मैं पिछले 20 सालों से सितंबर के पहले पखवाड़े में हिंदी पर विलाप होता हुआ देखती आ रही हूं। विलाप क्यों? हिंदी का प्रभाव कितना बढ़ा है, इसके पढ़ने-लिखने वाले कितने बढ़े है, इस पर बात कम होती है, हिंदी का विश्व में कितना विकास हुआ है इस बात पर बात होती ही नहीं है। हिंदी दिवस और पखवाड़े के नाम पर अगर अगर कुछ होता है तो हिंदी के पतन का विलाप। हिंदी का पतन हो रहा है-हिंदी का स्तर गिरता जा रहा है।

क्या‍ सचमुच हिंदी का स्तर गिर रहा है? क्या सचमुच हिंदी पतन की ओर बढ़ रही है? क्या हिंदी को नए तरह से पढ़ने समझने और इसकी विवेचना की जरूरत है? क्या‍ हिंदी के साथ कुछ अंग्रेजी के शब्द जोड़ देना ही हिंदी का पतन है? ऐसे कई सवाल हर किसी के मन में बार उमड़ते-घुमड़ते हैं। मेरे अंदर भी।

मैं जब भी हिंदी के पतन की ओर जाता हुआ देखने की कोशिश करती हूं, मुझे हिंदी हर दिन हंसती-खेलती बढ़ती नजर आती है। हिंदी पतन विलाप महज चंद लोगों का ही विलाप नजर आता है। मुझे एक बार नामी गिरामी लेखक साहित्यकार के साथ मंच पर बैठने का अवसर मिला। उस मंच पर वह सबसे अधिक उम्र के और सबसे नामी गिरामी हिंदी लेखक थे और मैं सबसे कम उम्र की हिंदी पत्रकार। जाहिर तौर पर उन्हें पहले बोलने का मौका मिला और साहित्यकार साहब ने हिंदी के गिरते स्तर का रोना रोया।

हिंदी के गिरते स्तर का सबसे बड़ा कारण हिंदी मीडिया को ही बताया जिसमें एक बड़े मीडिया ग्रुप के हिंदी अखबार का नाम भी लिया। फिर आगे उन्होंने कहा कि बाकी जो बची-कुछी हिंदी की मिट्टी पलीत की वह है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने। खबरिया चैनल और मनोरंजन चैनल दोनो को दोषी बताया। पता नहीं वे कैसी हिंदी चाहते थे या हैं। कुछ देर बाद मुझे बोलने का मौका मिला। मैंने पहले उनसे बोलने की इजाजत मांगी और फिर मैंने कहा सर मुझे तो दिल्ली आकर पता चला कि हिंदी पतन की कगार पर है।

मुझे लगता है कि भारत आज भी गांव में बसता है और वहां हिंदी का बोलबाला है। अगर हिंदी के पतन और उत्थान का थर्मामीटर सिर्फ महानगर हैं तो भले ही यह पतन की कगार पर होगी लेकिन शहरों, कस्बों और गांव में तो आज भी हिंदी ही बोली समझी और पढ़ी जाती है।

मैंने बचपन से रेडियो वेरितास की हिंदी सेवा को सुना है, रेडियो ईरान का हिंदी प्रसारण, बीबीसी रेडियो, जर्मन रेडियो डायचे वेले के हिंदी प्रसारण को और रेडियो श्रीलंका के हिंदी प्रसारणों को तो कई ने सुना होगा। मुझे पूरा यकीन है कि यह हिंदी विस्तार का महज एक नमूना है। आज 21वीं सदी में हिंदी बिलकुल कमजोर या पतन की कगार पर नहीं है। बल्कि यह ग्लोबल और वैश्विक मंच पर अपनी धमक दिखा रही है। हम हिंदी न केवल कंप्यूपटर पर लिख पढ़ रहे हैं बल्कि इंटरनेट के युग में हिंदी मोबाइल हो गई है। आपको हजारों की संख्या में विदेशी हिंदी बोलते, सुनते, पढ़ते दिखाई दे जाते हैं। ये तो वे हैं जिन्हें हम देख सुन पा रहे हैं ऐसे कई हजार या लाख होंगे जो हिंदी को लिख पढ और सुन रहे होंगे। तो कैसे हिंदी पतन की ओर जा रही है? मेरे सवालों से साहित्यकार साहब ने कुछ नहीं कहा लेकिन मुझसे बात भी नहीं की। मैंने उनसे कहा सर मुझे आपसे सीखना है लेकिन जब बात हिंदी पतन की होती है तो मुझे पतन दिखाई नहीं देता है, इसलिए मैं यह सवाल कर रही हूं।

हिंदी एक समृद्ध भाषा है और इसका विकास दिनों दिन हो रहा है। और इसके प्रशसंक हर दिन इसके प्रचार प्रसार में जुटे हैं और इसे हर दिन आगे और आगे ले जा रहे हैं। हिंदी का विकास 40 की स्पीड से नहीं 220 की स्पीड से हो रहा है।

हिंदी विलाप करने वाले मुझे तो चंद लोग ही नजर आते हैं। जो हिंदी पर अपना वर्चस्व समझते हैं और चाहते हैं कि जैसा वो बोले लिखे और पढने की सलाह दें वैसी ही हिंदी बोली, पढ़ी और समझी जाए। हिंदी प्रकाशकों के पास पहुंचते हैं पता चलता है हिंदी का पाठक कम हो रहा है। क्या सचमुच हिंदी का पाठक कम हो रहा है या उसका पतन हो रहा है। पड़ताल कीजिए आपको पता चलेगा कि हिंदी की ऐसी सामग्री ही बाजार में मौजूद नहीं है जिसे पढ़ा जाए। आप ऐसी सामग्री पाठकों को नहीं दे रहे हैं कि वे हिंदी से जुड़े और पढ़े। आज के लेखक पाठकों को खींचने में नाकामयाब हैं। क्यों? वही हिंदी, जो हिंदी आप लिख रहे हैं वो आज की पीढी नहीं पढ़ना चाहती है। आज की पीढी भी प्रेमचंद, महावीर प्रसाद दि़वेदी, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, अज्ञेय, सुभद्रा कुमारी, फणीश्वतरनाथ रेणु, सआदत हसन मंटो को ही क्यों जानती है पढ़ती है या पढ़ना चाहती है।

अगर हिंदी का इतना ही पतन हो रहा है तो फिर हिंदी के खबरिया चैनल से लेकर मनोरंजन चैनलों को कौन देख रहा है। खबरिया चैनलों पर अंग्रेजी के संपादक क्यों फर्राटेदार हिंदी बोल रहे हैं। क्यों एलकेजी-यूकेजी से बारहवीं तक अंग्रेजी में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां इंटरनेट और टीचर के माध्यंम से हिंदी सीख रहे हैं। मैं जैसे ही हिंदी विलाप होता देखती हूं मेरी आंखों के आगे हिंदी लेखकों और प्रकाशकों का एक गिरोह आ जाता है जो अपने हाथ से हिंदी का अधिकार निकलता देखता है और तिलमिला जाता है और फिर हिंदी हिंदी हिंदी रोने लग जाता है। माफ कीजिएगा। रोइए नहीं खुद को सुधारिए।

इंटरनेट और टेक्नॉलजी के युग में हिंदी हर दिन हर पल बढ़ रही है। इंटरनेट ने हिंदी को सहज और सरल बना दिया है। हिंदी की धमक तो यह है कि अंग्रेजी दां लोग फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस और लिंकडन पर अपना स्टेट्स हिंदी में लिखते हैं।

 

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