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'संपादक का काम अखबार निकालना व सरकार की खामिया गिनाना होता है, सरकार की दावत खाना नहीं'
‘कौन सही और कौन गलत यह तो नहीं पता पर इतना सच है कि जहां अंग्रेजी अखबारों की पहुंच महज तीन फीसदी लोगों तक हैं वहीं हिंदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबारों की पहुंच देश के 97 फीसदी पाठकों तक हैं। यह बात अलग है कि जहां अंग्रेजी का मीडिया दिल्ली के लुटियन जोन व सत्ता के गलियारों में पढ़ा जाता है वहीं हिदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबार गांव में छज्जू के चौबारे से
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘कौन सही और कौन गलत यह तो नहीं पता पर इतना सच है कि जहां अंग्रेजी अखबारों की पहुंच महज तीन फीसदी लोगों तक हैं वहीं हिंदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबारों की पहुंच देश के 97 फीसदी पाठकों तक हैं। यह बात अलग है कि जहां अंग्रेजी का मीडिया दिल्ली के लुटियन जोन व सत्ता के गलियारों में पढ़ा जाता है वहीं हिदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबार गांव में छज्जू के चौबारे से लेकर नाई की दुकान तक में नजर आते हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार ‘नया इंडिया’ में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार विवेक सक्सेना का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
तब और अब की पत्रकारिता
पत्रकारिता में सोच का बहुत बड़ा योगदान होता है। इस सोच को तैयार करने में उन संगठनों की अहम भूमिका होती है जहां से हम इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। संयोग से पहले दिल्ली प्रेस और फिर जनसत्ता में काम करते हुए मेरी यह सोच बनी कि जो हमें नजर आता है या बताया जाता है वो खबर नहीं होती है। खबर तो वो होती है जिसकी ओर लोगों की नजर नहीं जा रही होती है। जब बेंगलुरु में जहरीली शराब पीकर सैकड़ों लोग मरे तो हम लोग यह तय कर रहे थे कि क्या इसे कवर स्टोरी बनाया जाए? परेशनाथ ने हम लोगों की बैठक बुलाई और सबने अपनी बात कही। कोई सरकार और जहरीली शराब तैयार करने वाले गठजोड़ को हाई लाइट करने पर जोर दे रहा था तो कोई मरने वालों के परिवारों की दुर्दशा पर मानवीय एंगल से स्टोरी करने के पक्ष में था। सबसे विचार सुनने के बाद परेशनाथ ने कुछ क्षणों के लिए सोचा और फिर बोले कि यह एंगल कैसा रहेगा कि शराब बेचने वालों को नहीं पीने वालों को सजा दो। शराब इसलिए तैयार की जाती है क्योंकि उसकी मांग है। उसके पीने वाले हैं। पीने वालों को पता है कि अगर पीकर बीमार पड़े तो सरकारी अस्पताल में इलाज होगा। नर्से सेवा करेगी। मर गए तो आश्रितों को लाखों का मुआवजा मिलेगा, चुनाव पास होते तो सरकारी नौकरी भी मिल सकती है। ऐसे में सरकार के यह कदम उसे शराब पीने से रोकेंगे या और ज्यादा प्रेरित करेंगे?
अब सब कुछ शीशे जैसे साफ था। मैंने रिपोर्ट तैयार की जिसका शीर्षक था ‘शराब बेचने वालों को ही नहीं, पीने वालों को भी सजा दो’। यह सब इसलिए लिखना पड़ा क्योंकि जब सुबह ‘अपन तो कहेंगे’ पढ़ा तो उसमें कैराना की घटना पर व्यासजी का विश्लेषण पढ़ने को मिला। इसका लब्बोलुआब यह था कि इस तरह की खबरों पर हिंदी व अंग्रेजी का मीडिया दो धुरो में बंट जाता है। जहां हिंदी का मीडिया सांप्रदायिक आधार पर पैदा होने वाले तनाव या घटनाओं का जोर शोर से प्रचार प्रसार करता है वहीं अंग्रेजी मीडिया इसे राजनीति से जोड़कर देखता है। उस ओर ध्यान नहीं देता और अगर देता भी है तो अपनी धर्मनिरपेक्षता साबित करने के लिए विषय से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास करता है। कौन सही और कौन गलत यह तो नहीं पता पर इतना सच है कि जहां अंग्रेजी अखबारों की पहुंच महज तीन फीसदी लोगों तक हैं वहीं हिंदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबारों की पहुंच देश के 97 फीसदी पाठकों तक हैं।
यह बात अलग है कि जहां अंग्रेजी का मीडिया दिल्ली के लुटियन जोन व सत्ता के गलियारों में पढ़ा जाता है वहीं हिदी व क्षेत्रीय भाषा के अखबार गांव में छज्जू के चौबारे से लेकर नाई की दुकान तक में नजर आते हैं। ये लोग समस्याओं से जूझते हैं और सरकार के कामकाज के भुक्तभोगी होते हैं जबकि अंग्रेजी मीडिया का काम उस सरकार के प्रति ओपिनियन तैयार करने का ठेका लेना सा होता है। सब तो नहीं मगर 97 फीसदी जरूर यही काम करते नजर आते हैं। केंद्र में किसी की भी सरकार हो उसके दरबारी पत्रकार व मीडिया में पुराने ही रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि सरकार या मंत्री बदलने पर ड्राइवर, चपरासी, स्टेनो, अफसरशाही वही रहती है। उनके आका बदल जाते हैं।
स्तंभ पढ़ने के बाद अचानक इंदर मल्होत्रा का ध्यान आया। वे बहुत बड़े व चर्चित सपांदक थे। बड़े इसलिए कि उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर उस ‘द स्टेट्समैन’ में संपादकी की जिसका संपादक अंग्रेज हुआ करता था। वे अंग्रेजी अखबार गार्जियन के दिल्ली स्थित संवाददाता भी रहे। सत्ता के गलियारों तक वे चहल कदमी करते थे। वे इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी के काफी करीब थे। इंदिरा गांधी के मरने के पांच साल बाद उन्होंने उन पर पुस्तक लिखी थी जो काफी चर्चित रही। मेरी समझ से उनका सबसे बड़ा योगदान इंडियन एक्सप्रेस में अपना कालम ‘रियर व्यू’ लिखना था जो कि न सिर्फ पाठकों बल्कि मेरे सरीखे पत्रकारों के लिए भी जानकारी का स्रोत होता था। हमें उसके जरिए पता चलता था कि विभिन्न मौकों पर हमारे नेताओं ने क्या किया व कहा? चूंकि वे उन सभी लोगों में उठे बैठे थे इसलिए वे इन घटनाओं के साक्षी भी थे व उनकी लिखी बात पर शक करने की गुंजाइश ही पैदा नहीं होती थी। इंडियन एक्सप्रेस व अंग्रेजी के अखबारों में उनके निधन पर लंबे-चौड़े लेख भी छपे। एक लेख में तो उनके जूनियर रहे, सत्ता के गलियारों में पैठ रखने व पत्रकारिता से ज्यादा राजनीति करने वाले एक बुजुर्ग ने जो कुछ लिखा वह गजब था। उनके लिए बुजुर्ग शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि मैं यह तय नहीं कर पा रहा हूं कि उन्हें नेता मानू या संपादक क्योंकि उन्होंने पत्रकारिता से कहीं ज्यादा प्रधानमंत्रियों की सेवा की। राजनयिक बने, राज्यसभा में गए वगैरह वगैरह। उनकी श्रद्धांजलि पढ़कर मैं दंग रह गया। क्या गजब की शैली थी। दो बार पढ़ा तब जाकर पता चला कि उन्होंने इंदर मल्होत्रा से कहीं ज्यादा अपने बारे में लिखा डाला था कि वे किस तरह से उनके लेखन के मुरीद थे। इसके छपने के बाद उसे सैकड़ों लोगों को मेल किया। खैर जितनी भी श्रंद्धाजलियां छपीं वे सब एक वर्ग विशेष के ही थी। एच के दुआ, श्याम भाटिया, कुलदीप नैयर वगैरह। मानी हुई बात है कि सभी अंग्रेजी अखबारों के संपादक रह चुके थे। फिर ध्यान दिया तो याद आया कि अंग्रेजी पत्रकारिता पर तो अपने पंजाबी भाई छाए रहे। प्राण चोपड़ा, प्रेम भाटिया, कुलदीप नैयर, खुशवंत सिंह, श्याम भाटिया से लेकर अरुण शौरी, प्रभु चावला और शेखर गुप्ता तक सभी पंजाब से ही है। गिरीलाल जैन व श्याम लाल भी पंजाब के ही थे। अविभाजित पंजाब के सोनीपत से थे जबकि शेखर गुप्ता व मनमोहन रोहतक से है। इस पर यह तो सत्य है कि आजादी के बाद अंग्रेजी पत्रकारिता पर पंजाबियों का वर्चस्व रहा। फिर अपने गूगल मनमोहन शर्मा को सर्च किया तो पता चला कि आजादी के समय व उसके कुछ दशकों तक अंग्रेजी पत्रकारिता पर बंगाली व दक्षिण भारतीय छाए हुए थे। ट्रिब्यून के संपादक एक बंगाली काशीदास रे थे। उन्होंने बताया कि यह वो समय था जबकि सिकंदर हयात खान पंजाब के प्रधानमंत्री (अब मुख्यमंत्री) थे। तत्कालीन गर्वनर ने ट्रिब्यून समेत हिंदी व उर्दू के तीन संपादकों को खाने पर आमंत्रित किया। तीनों ने ही निमंत्रण ठुकरा दिया। ट्रिब्यून के संपादक ने गर्वनर को पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि संपादक का काम अखबार निकालना व उसमें सरकार की खामिया गिनाना होता है। उसका काम सरकार की दावत खाना नहीं होता है। और आज के संपादक चलते चलते भी राजनीतिक आकाओं को खुश करते रहते हैं। वे सत्ता और काम को लेकर आम लोगों के बीच इंटरनेट का काम कर रहे हैं।
अगर नेता खाने पर बुला ले तो बचपन की तस्वीर लेकर जाते है ताकि यह साबित कर सके कि वे भी बचपन से ही दरबारी रहे हैं। फिर पंजाबी, अंग्रेजी पत्रकारिता पर हावी हुए और अब बिहार व हिंदी भाषी क्षेत्रों का समय आया है। ट्रिब्यून के संपादक अपने हिंदीभाषी हरीश खरे हैं तो इंडियन एक्सप्रेस में झा ने कमान संभाली हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में दिवाकर जलवे दिखा रहे हैं। हिंदी के अखबारों ने पंजाब तक में दखल दे दी है। उन्होंने पंजाब केसरी व हिंदी ट्रिब्यून के एकाधिकार को ध्वस्त कर दिया है। इस सबके बावजूद अंग्रेजी व भाषायी अखबारों की सोच में इतना अंतर क्यों होता है। इस पर फिर कभी।
(साभार: नया इंडिया)
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