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इस सरकार ने शुरू की थी विज्ञापनों पर जनता का पैसा लुटाने की प्रक्रिया...

अजय मलिक ।। सरकारी विज्ञापनों के नाम पर होती जनता के पैसे की बर्बादी 

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अजय मलिक ।।

सरकारी विज्ञापनों के नाम पर होती जनता के पैसे की बर्बादी 

सरकारें अपनी छवि चमकाने में जनता के पैसों को विज्ञापनों पर बर्बाद करती हुईं दिख रही हैं। सरकारें केद्र या राज्य में किसी भी दल की हो, सरकारी योजना और प्रचार के नाम पर जनता का धन बर्बाद करने में कोई भी दल पीछे नहीं। मीडिया के विभिन्न माध्यमों को सरकार की ओर से ऐसे विज्ञापन दिए जाते हैं जिनका असली मकसद सरकारी योजनाओं कार्यक्रमों को जनता तक पहुंचाना है परन्तु सरकारों का अब असली मकसद इन अपनी कल्याणकारी नीतियों को जनता तक पहुंचाना नहीं बल्कि अपनी पार्टी और अपने पार्टी के नेताओं का महिमामंडन करना होता है। ये पैसा जनता से टैक्स लगाकर जुटाया जाता है।

हमारे देश में विज्ञापनों पर जनता का पैसा लुटाने की प्रक्रिया राजग सरकार के समय से हो गई थी। उस समय सत्ता में बीजेपी ने शाइनिंग इंडिया के जरिए जमकर जनता के पैसे से अपनी छवि को चमकाया। आगे चलकर यूपीए भी उसी दिशा में बढ़ी। इस दौरान तो जनता के पैसे से सतारूढ़ पार्टी और उसके नेताओं को फ्री में प्रचार पाने की होड़ लग गई। 2004, 2005 से 2014, 2015 के बीच यूपीए सरकार ने 6000 करोड़ रुपये अपनी छवि चमकाने में लगा दिए।

अपने चुनाव वर्ष के आखिरी 2 से 3 वर्ष में ही कांग्रेस सरकार ने जनता के टैक्स के 2000 करोड़ रुपये अपनी छवि चमकाने में फूंक दिए, जबकि हमारी वर्तमान सरकार ने अपने पहले वर्ष में ही विज्ञापनों पर 1000 करोड़ रुपये फूंक दिए। केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी योजना स्वच्छ भारत के विज्ञापनों पर पहले वर्ष ही 100 करोड़ खर्च कर दिए। देश के अधिकतर जिलों में देखने से ही पता चल जाता है कि वहां के अधिकारी और जनता स्वच्छता के प्रति कितने गंभीर हैं। स्वच्छता के प्रति लोग जागरूक हुए हों या नहीं, अधिकरियों ने इससे पब्लिसिटी का जरिया जरूर बना लिया।

जिस देश में 19 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार हों, जिन्हें दो वक्त की रोटी मिलना भी मुश्किल हो, वहां विज्ञापनों पर इस तरह जनता के पैसे को बहाना कहां तक उचित है।  यह प्रवृत्ति केंद्र सरकार तक सीमित नहीं। राज्य सरकारें भी वही हथकंडे अपनाती हैं राज्य में।  सतारूढ़ पार्टियों द्वारा चलाई जा रही योजनाएं जनता तक पहुंचे न पहुंचे, उनकी पार्टी और नेताओं को पब्लिसिटी जरूर मिलनी चाहिए।

मिसाल के तौर पर अति छोटे राज्य में शुमार दिल्ली का उदाहरण ले लीजिए। यहां पर ईमानदार के तौर पर अपने आप को प्रचारित कर रही आप की सरकार है जिसका जन्म एक आंदोलन के जरिए हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य जनता के धन की बर्बादी रोकना था परन्तु इस सरकार ने आते ही प्रचार का भारी भरकम 540 करोड़ रुपये बजट रखा जो किसी भी बड़े राज्य से अधिक है तथा यह बजट केन्द्र से आधा है, हालांकि इतने भारी भरकम बजट का मुख्य उद्देश्य जनता तक अपनी जन कल्याणकारी नीतियों को पहुंचाना होना चाहिए परन्तु उन्होंने इस पैसे का उपयोग अपनी पार्टी और अपने नेता के प्रचार में खर्च किया। उन्होंने भ्रष्टचार के मामले में पकड़े गए अधिकारियों और कर्मचारियों के बारे में भी बढ़ा चढ़ाकर जानकारी पेश की। जिस राज्य की सरकार के पास अपने कर्मचारी को सैलरी देने के लिए पैसे न हो वह विज्ञापनों पर जनता के धन की भारी बर्बादी कर रही हो तो इसे क्या कहेंगे।

इस काम में हरियाणा भी पीछे नहीं है। हरियाणा में हुड्डा सरकार के समय विज्ञापनों पर धन बर्बादी शुरू हो गई थी। हुड्डा सरकार ने अपने चुनावी वर्ष में चर्चित विज्ञापन हरियाणा नंबर वन पर ही 100 करोड़ फूंक दिए जबकि हरियाणा की वर्तमान सरकार ने मात्र दो सप्ताह 21 अक्टूबर से 5 नवंबर 2015 के बीच ही अपनी उपलब्धियां गिनवाने में 17 करोड़ खर्च कर दिए। देश की संवैधानिक  संस्थाओं ने विज्ञापनों पर हो रहे धन की बर्बादी रोकने की कोशिश की है।

चुनाव आयोग ने सभी दलों की सर्वदलीय बैठक बुलाकर हल निकालने की कोशिश की। सर्वोच्च न्यायालय ने विज्ञापनों पर सरकारी धन के दुरुपयोग रोकने के लिए कमेटियां गठित कीं। सबसे बड़ी अदालत ने सरकारी विज्ञापनों में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को छोड़कर तमाम राज्य के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय और राज्य मत्रियों को विज्ञापन में अपना चेहरा दिखाने पर रोक लगाई। हालांकि इसके कुछ दिनों बाद यह आदेश वापस ले लिया गया।

(लेखक पत्रकारिता में एम.फिल. है और ये उनके निजी विचार हैं)

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