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गंगा की सफाई के लिए एक अलग मंत्रालय हो, बोलीं जानी-मानी एंकर श्वेता सिंह

गंगा सफाई की जिम्मेदारी अकेले किसी को देनी चाहिए। या तो उमा जी को ही ये जिम्मेदारी अकेले दी जाए या फिर किसी और को। या फिर उनका एमओएस (राज्य मंत्री) ऐसा हो जो गंगा की जिम्मेदारी अकेले संभाल ले। गंगा के लिए दिन के 24 घंटे कम पड़ जाते हैं।  हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘चौथी दुनिया’

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

गंगा सफाई की जिम्मेदारी अकेले किसी को देनी चाहिए। या तो उमा जी को ही ये जिम्मेदारी अकेले दी जाए या फिर किसी और को। या फिर उनका एमओएस (राज्य मंत्री) ऐसा हो जो गंगा की जिम्मेदारी अकेले संभाल ले। गंगा के लिए दिन के 24 घंटे कम पड़ जाते हैं।  हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘चौथी दुनिया में छपे अपने आलेख के जरिए कहा आजतक न्यूज चैनल की एंकर श्वेता सिंह ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

गंगा के लिए अलग मंत्रालय हो

गोमुख में इंसानी आबादी नहीं होने के कारण वहां बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ता है। हालांकि क्लाइमेंट चेंज गोमुख को प्रभावित करता है। उसके नीचे हम गंगोत्री की बात करते हैं, जहां पर लोगों की आबादी है। गंगोत्री में मैंने एक बात देखी कि वहां लोगों में गंगा की साफ-सफाई को लेकर जागरूकता है। सभी जगह मरे हुए जानवर या लाशों को सीधे गंगा नदी में डाल दिया जाता है, लेकिन वहां कई साल से इसको वैक्यूम में डालकर नष्ट किया जाता है। वे लोग बिना किसी सरकारी मदद के ऐसा करते हैं।

गंगोत्री मंदिर समिति भी सफाई को लेकर हमेशा प्रयत्नशील रहती है। स्थानीय लोगों को इस बात की चिंता रहती है कि लोग बाहर से आकर यहां बस जाते हैं और अपने पीछे गंदगी का अंबार छोड़ जाते हैं। इन इलाकों में बाहरी लोगों के लिए जो छोटे टेंट लगाए जाते हैं, उनके आस-पास गंदगी का ढेर लगा रहता है। बाहरी लोगों को साफ-सफाई के लिए प्रेरित करना उनकी सबसे बड़ी समस्या है। अभी तक वहां पर उनका नियंत्रण था कि कोई चीजें छूट जाती थी तो उसे वैक्यूम या मिट्टी में डालकर नष्ट कर दिया जाता था। अब उनका कहना है कि लोग बाहर से आकर यहां छोटे-छोटे होटल बना रहे हैं, जिस पर उनका नियंत्रण नहीं है। उनका कहना है कि उमा भारती मंत्री बनने के बाद वहां उतना नहीं गई हैं, जितना पहले जाती थीं। मोदी सरकार से स्थानीय लोग खुश हैं। लेकिन एक शिकायत हर जगह मिली, गंगोत्री से लेकर बनारस तक सफाई कार्य में कहीं भी तेजी नहीं दिख रही है।

जब हमने हाल में उमा भारती का इंटरव्यू लिया तो उन्होंने कहा कि सफाई कार्य में तेजी लाई जा सकती है या हम बेहतर कर सकते हैं। ऋषिकेष से गंगा में प्रदूषण दिखने लगता है। उत्तरकाशी में भी लोग गंगा की सफाई को लेकर सजग हैं। उत्तरकाशी में कॉमर्शियल प्रॉपर्टी पर कोई नियंत्रण नहीं है। यहां के घरों से निकलने वाली गंदगी सीधे गंगा में जाती है। ऋषिकेश में कई आश्रमों की गंदगी गंगा में प्रवाहित हो रही है। गंगा के बीच में शिव की मूर्ति को हमने श्रद्धा की बात मानी, जो बाद में बाढ़ में बह गई। लेकिन शिव जी की मूर्ति का निर्माण ही अवैध था।

हरिद्वार में अवैध खनन पर सरकार कोई रोक नहीं लगा पाई है। गंगोत्री में प्लास्टिक पूरी तरह से बैन है, लेकिन रास्ते में चारों तरफ गंदगी फैली है जैसे चिप्स के पैकेट, पानी के बोतल वगैरह। गौमुख की बात करें, तो वहां पूरे देश से लोग जाते हैं और गोमुख ग्लेशियर के साथ-साथ लोग पूरे रास्ते गंदगी फैलाते हैं। वहां पर लोग प्लास्टिक के साथ-साथ कई चीजें फेंक देते हैं। वहां पर उन्हें गंदगी फैलाने से रोकने वाला कोई नहीं। वहां पर केवल वन विभाग के कुछ अधिकारी तैनात होते हैं। वहां प्रतिदिन लगभग 50, 60, 100 या 150 लोग जाते हैं।

कानपुर में टैनरी पर रोक लगाई थी। लेकिन वहां पर एक लिस्ट तैयार करने की बात कही गई थी कि कौन गंदगी फैला रहा, किसके पास ट्रीटमेंट प्लांट है, किससे के पास नहीं है। लेकिन दो साल में इसका जमीन पर कोई असर नहीं दिखा और न ही कोई बदलाव हुआ। अभी भी गंगा में गंदगी वैसे ही जा रही है। ट्रीटमेंट प्लांट जो बदहाल थे जिनमें पानी जाने का बाद भी साफ नहीं हो रहा था, लेकिन उनको ठीक करने का काम पिछले एक साल में हुआ है। इस एक साल में ट्रीटमेंट प्लान के रख-रखाव का काम सरकार की तरफ से किया जा रहा है।

इलाहाबाद में गंगा की स्थिति बिल्कुल खराब है। गंगा और यमुना के किनारे जो अवैध निर्माण चल रहा है उसे कोई रोकने वाला नहीं है। नमामि गंगे के तहत सरकार दो काम कर रही है। एक तो घाटों की सफाई हो रही है और दूसरी गंगा की सफाई। 2500 किलोमीटर में फैली गंगा को 2018 तक साफ कर पाना तो असंभव है। नमामि गंगे में थोड़ा-थोड़ा ही सही, काम हो हो रहा है। घाटों के किनारे बसे लोगों ने मुझे बताया कि उनकी कोई मजबूरी नहीं है कि वे किसी पार्टी या मंत्री को सपोर्ट करें। लेकिन दो साल बाद भी उनके लिए उम्मीद कायम है, वे कहते हैं कि अपनी आंखों के सामने बदलाव देख रहे हैं।

उमा भारती जब खेल मंत्री थीं तब भी मैंने उनके साथ काम किया था। उन्होंने उस वक्त काम किया था। अभी मुझे लगता है कि बतौर जल संसाधन मंत्री उमा भारती के पास गंगा सफाई का भी जिम्मा है और सूखे से निपटने की चुनौती और जिम्मेदारी भी। उमा जी ने कहा था कि हर हफ्ते मैं गंगा के किसी न किसी किनारे रहा करूंगी, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पा रही हैं। मुझे लगता है कि उनकी मंशा अच्छी है, लेकिन उनके पास पर्याप्त समय नहीं है। गंगा सफाई की जिम्मेदारी अकेले किसी को देनी चाहिए। या तो उमा जी को ही ये जिम्मेदारी अकेले दी जाए या फिर किसी और को। या फिर उनका एमओएस (राज्य मंत्री) ऐसा हो जो गंगा की जिम्मेदारी अकेले संभाल ले। गंगा के लिए दिन के 24 घंटे कम पड़ जाते हैं। एक नदी खत्म होती है तो एक सभ्यता खत्म होती है। अगर हम सभ्यता को खत्म होने से बचाना चाहते हैं, तो हमें गंगा पर विशेष ध्यान देते हुए इसके लिए अलग से एक मंत्रालय बनाना चाहिए।

(साभार: चौथी दुनिया)

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