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बेचारी अंग्रेजी! 27 देश अंग्रेजी को बाहर निकालने पर आमादा हैं, बोले वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक

‘यदि अंग्रेजी या कोई और विदेशी भाषा दुनिया की संपर्क भाषा बनी रहे तो इसमें कोई बुराई नहीं है। वह विदेश-व्यापार, कूटनीति, अनुसंधान आदि की भाषा रह सकती है लेकिन यदि वह किसी भी देश पर अगर थोपी जाती है तो उसके परिणाम विनाशकारी होते हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ.

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘यदि अंग्रेजी या कोई और विदेशी भाषा दुनिया की संपर्क भाषा बनी रहे तो इसमें कोई बुराई नहीं है। वह विदेश-व्यापार, कूटनीति, अनुसंधान आदि की भाषा रह सकती है लेकिन यदि वह किसी भी देश पर अगर थोपी जाती है तो उसके परिणाम विनाशकारी होते हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

बेचारी अंग्रेजी!

भारत में अंग्रेजी महारानी है और भारतीय भाषाएं नौकरानी! लेकिन देखिए कि ग्रेट ब्रिटेन की नाक के नीचे अंग्रेजी का हाल क्या है। अभी ब्रिटेन में सिर्फ जनमत-संग्रह हुआ है। अभी वह यूरोपीय संघ से निकला नहीं है लेकिन यूरोपीय संघ के शेष 27 देश उसकी भाषा अंग्रेजी को बाहर निकालने पर आमादा हैं। वे शीघ्र ही एक प्रस्ताव लाने वाले हैं, जिसके द्वारा यूरोपीय संघ अपना काम-काज अंग्रेजी में करना बंद कर देगा।

अभी उसकी तीन आधिकारिक भाषाएं हैं। फ्रांसीसी, जर्मन और अंग्रेजी! अब सिर्फ दो रह जाएंगीं। इसका नतीजा यह होगा कि ब्रिटेन को मजबूर होकर यूरोपीय देशों से फ्रांसीसी और जर्मन में संवाद करना होगा। जब से ब्रिटेन इस संघ में शामिल हुआ, उसने अंग्रेजी की दादागीरी चलानी शुरु कर दी थी। राष्ट्रकुल याने भारत-जैसे पूर्व-गुलाम देशों में अभी भी अंग्रेजी का दबदबा चल रहा है लेकिन देखिए कि ग्रेट ब्रिटेन के तीन राज्यों- वेल्श, उत्तरी आयरलैंड और स्काॅटलैंड- में भी उनकी भाषाएं चलती हैं। दुनिया के मुश्किल से साढ़े-चार देशों की ही भाषा अंग्रेजी है। ब्रिटेन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और आधा केनाडा।

यदि अंग्रेजी या कोई और विदेशी भाषा दुनिया की संपर्क भाषा बनी रहे तो इसमें कोई बुराई नहीं है। वह विदेश-व्यापार, कूटनीति, अनुसंधान आदि की भाषा रह सकती है लेकिन यदि वह किसी भी देश पर अगर थोपी जाती है तो उसके परिणाम विनाशकारी होते हैं। भारत में नौकरियों, बड़े व्यापार और सामाजिक प्रभाव में आज उसका स्थान अनिवार्य और सर्वोच्च है। हमारे नेताओं को यह पता है लेकिन उन्हें वोट और नोट कबाड़ने से फुर्सत नहीं है। अंग्रेजी का वर्चस्व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पलीता लगा रहा है, दलितों और पिछड़ों को पीस रहा है, भारत और इंडिया की खाई को चौड़ा कर रहा है और भारत को नकलची और पिछलग्गू राष्ट्र बना रहा है। उम्मीद है कि भारत-जैसे पूर्व-गुलाम राष्ट्र अब इस बेचारी अंग्रेजी को बचाने की कोशिश नहीं करेंगे।

(साभार: नया इंडिया)

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