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जानें, कैसे वॉशिंगटन पोस्ट की मालकिन पर भारी पड़ा भारत का ये हीरा...

‘इवेलिन वाल्श मैकलीन नाम की महिला इस हीरे की आखिरी प्राइवेट मालकिन थी, वो तो इस हीरे को अपने कुत्ते के पट्टे में बांधने लगी थी। इवेलिन दुनिया भर में मशहूर अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की मालकिन थी। इस हीरे के जिंदगी मे आते ही उसकी खुशियां काफूर हो गईं। पहले सास की मौत हुई, 9 साल की उम्र में उसका बेटा कार एक्सीडेंट में मारा ग

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘इवेलिन वाल्श मैकलीन नाम की महिला इस हीरे की आखिरी प्राइवेट मालकिन थी, वो तो इस हीरे को अपने कुत्ते के पट्टे में बांधने लगी थी। इवेलिन दुनिया भर में मशहूर अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की मालकिन थी। इस हीरे के जिंदगी मे आते ही उसकी खुशियां काफूर हो गईं। पहले सास की मौत हुई, 9 साल की उम्र में उसका बेटा कार एक्सीडेंट में मारा गया। बेटी ड्रग्स की ओवरडोज का शिकार होकर मर गई। पति ने उसको तलाक देकर दूसरी शादी कर ली और ग्रांडसन वियतनाम युद्ध में मारा गया। उसको अपने फैमिली पेपर वॉशिंगटन पोस्ट को भी बेचने की नौबत आ गई। जबकि उसने ये हीरा आज की कीमत के हिसाब से 46 लाख डॉलर में खरीदा था।’ हिंदी न्यूज पोर्टल inkhabar.com में छपे अपने लेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार विष्णु शर्मा का। शापित हीरे की पूरी कहानी को आप यहां पढ़ सकते हैं:

शिव की तीसरी आंख के इस हीरे ने पूरी दुनिया में ढाया कहर, जिसके पास उसकी मौत

भारत में शुरूआती इतिहास लेखन को लेकर उदासीनता और बाद में आए आक्रमणकारियों के अपने ऐतिहासिक संस्करणों के चलते हजारों घटनाओं की सच्चाई सामने आना अब लगभग नामुमकिन है। भारतीय इतिहास के शोधकर्ता और शिक्षक अब तक यही पढ़ते-पढ़ाते आए हैं कि ट्रेवर्नियर एक फ्रेंच यात्री और रत्न व्यापारी था, जो शाहजहां के जमाने में भारत आया था। उसने कुछ भारत के बारे में लिखा है, लेकिन कोई टेक्स्ट बुक आपको ये नहीं बताएगी कि वो भारत से हजारों हीरे लेकर गया था।

कुछ खरीदकर, कुछ चोरी करके और कुछ लूट कर। खास तौर पर जो हीरा अंग्रेज-फ्रेंच अधिकारियों ने लूट के बाद शाही खजाने में जमा नहीं किए थे, वो भी उसने औने पौने में उनसे खरीद लिए। उन्हीं हीरों में था एक ऐसा हीरा, जिसने पिछले तीन सौ सालों में दुनिया में इतना कहर बरपाया कि जिसके पास गया, उसकी अकाल मौत हो गई। ट्रेवर्नियर ने 25 हीरे फ्रांस के राजा लुई चौदहवें को जाकर दिए। बदले में राजा ने इतना धन दिया जिससे कि 172000 ओंस सोना जोकि 4876 किलो से भी ज्यादा होता है, को खरीदा जा सके। हालांकि कई लोगों ने इस कीमत का केवल दस फीसदी ही लिखा है। यानी अकेले ट्रेवर्नियर ने जब भारत से इतने सोने के बराबर हीरा-जवाहरात को बाहर भेजा तो असली लुटेरों यानी गजनवी, गौरी, तैमूर और अंग्रेजों-फ्रांसीसियों आदि ने क्या-क्या किया होगा।

पांच सौ किलो भी मान लें तब भी हैरत की बात है। उन्हीं हीरों में से एक नायाब हीरा भी था, 116 कैरेट का ब्लू डायमंड, जिसे शुरू में ट्रेवर्नियर ब्लू डायमंड कहा गया और अब होप कहा जाता है। ट्रेवर्नियर पर आरोप है कि उसने इस हीरे को भारत के एक मंदिर से चुराया था। इस हीरे के बारे में अलग-अलग कहानियां हैं। 31 दिसंबर 2000 को इंग्लैंड के एक मशहूर अखबार इंडिपेंडेंट में छपी रिपोर्ट में कहा गया कि ये हीरा भगवान विष्णु के सातवें अवतार राम की पत्नी सीता की मूर्ति की आंख में लगा हुआ था, जिसे ट्रेवर्नियर ने चुरा लिया था। उस वक्त वो अकेला था, जो इन हीरों की असली कीमत समझता था।

जबकि न्यूजीलैंड के एक अखबार ने छापा कि ये हीरा एक आंख वाले इंडियन गॉड की आंख में लगा रहा है, उसकी शेप भी इस तरह की थी कि वो अगर लेटी अवस्था में होगा तो आंख जैसा नहीं लगेगा, बल्कि खड़ी शेप में होता तभी वो आंख में फिट आ सकता है और आंख जैसा लगेगा भी। इससे अनुमान लगाया गया कि ये हीरा भगवान शिव की तीसरी आंख में लगा हुआ होगा। बाकी दोनों आंखें ध्यान अवस्था में बंद दिखाई गई होंगी। इतना ही नहीं इस अखबार ने दावा किया कि ये हीरा मूलत: सफेद है। रोशनी पड़ते ही इसमें से ब्लू रेज निकलने लगती हैं। इस हीरे के बारे में ट्रेवर्नियर ने ही लिखा था कि ये गोलकुंडा की खान से निकला था।

लुई पंद्रहवें ने अपने जौहरी से उसको दोबारा से नई शेप दिलवाई। फिर उसे फ्रेंच ब्लू कहा जाने लगा। उसके जौहरी को नई शेप देने में दो साल लगे। उसे अंडाकार शेप देकर एक रिबन से बांध दिया गया और फ्रांस के राजा उस हिंदुस्तानी हीरे को राज्याभिषेक जैसे कार्यक्रमों में गले में पहनने लगे। लेकिन सुई सोलहवें के वक्त फ्रेंच क्रांति के दौरान 1792 में इसे राजमहल से चुरा लिया गया। लुई और उसकी बीवी मैरी को जिस बुरी तरह से मारा गया, उसके बाद से ही इस हीरे के साथ श्राप की कहानी जुड़ गई। दोनों के सर कलम कर दिए गए थे।

इससे पहले ट्रेवर्नियर की मौत पर कार्ल सुकर ने अपनी किताब ‘द अनएक्सप्लेन्ड’ में लिखा है कि उसकी मौत जंगली कुत्तों के अटैक से हो गई थी। ये घटना मास्को में हुई। उससे पहले लुई चौदहवां की मौत गैंगरीन से हुई और एक को छोड़कर उसका कोई भी बच्चा जवान नहीं हो पाया। लुई के एक करीबी निकोलस ने उस हीरे को गले में एक बार पहना तो किसी बात पर लुई से उसके रिश्ते बिगड गए और पंद्रह साल जेल में गुजारने पड़े।

उसके बाद अगले 100 साल तक हीरे की कोई खबर नहीं मिली। 1813 में वो हीरा दोबारा दिखा, लंदन में, एक हीरा व्यापारी डेनियल इलायसन के पास, जिससे इंग्लैंड के राजा किंग जॉर्ज फोर्थ ने खरीद लिया। उसके कुछ सालों के अंदर ही राजा की इतनी बुरी मौत हुई कि श्राप वाली बात लोगों को सच लगने लगी। राजा की शराब पीने की आदत ने उसे बरबाद कर दिया। ना जाने कौन कौन सी बीमारियां राजा को लग गईं। कई महीनों तक वो बिस्तर से उठ ही नहीं पाया और तड़प तड़प कर मर गया। उसके बाद हीरे को कर्ज चुकाने के लिए बेच दिया गया।

हीरा अब आ गया लंदन के एक धनी बैंकर हेनरी फिलिप होप के हाथों में। उसने उसे होप ब्लू डायमंड नाम दे दिया। इस नाम से इसे अभी भी जाना जाता है। उसी साल हेनरी की भी मौत हो गई। फिर दस साल उस हीरे को लेकर होप परिवार में झगड़ा होता रहा। फिर सबसे बडे भतीजे हेनरी थॉमस होप के हिस्से में वो आया। उसके बाद होप परिवार में धोखा, बीमारी, पति-पत्नी के झगडे, अदालती चक्कर और ना जाने क्या क्या मुसीबतों ने सर उठा लिया। 1902 में उस हीरे को बेचने की अनुमति कोर्ट से मिली और उसे आज की कीमत के हिसाब 2.84 मिलियन डॉलर मे बेच दिया गया।

हीरा अमेरिका पहुंच गया, न्यूयॉर्क के डायमंड डीलर सिमोन फ्रेंकेल ने इसे आज की कीमत के हिसाब से उस वक्त 7.2 मिलियन डॉलर में खरीदा, और उसे कई बार बेचा। लेकिन जिस जिस ने उसे खरीदा, उसे व्यक्तिगत जीवन में या फाइनेंशियल फ्रंट पर कुछ ना कुछ बड़ा नुकसान हुआ और वो पहले से भी कम पैंसों में सिमोन को वापस बेच गया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने 1907 में एक रिपोर्ट छापी कि कैसे इस हीरे ने कितने घर बरबाद कर दिए और आखिर में उसका मालिक सिमोन फ्रेंकेल को भी खुद को दीवालिया घोषित करना पड़ा।

फिर भी सिमोन तुर्की के एक धनी डायमंड कलेक्टर सलीम हबीब को उसे आज के 10.66 मिलियन डॉलर मे बेचने में कामयाब हो गया। माना गया कि उसे ऑटोमन एम्पायर के सुल्तान अब्दुल हामिद के कहने पर खरीदा गया है। लेकिन उसी साल से सुल्तान का सिंहासन हिलना शुरू होने लगा, सुल्तान को हीरे के शाप के बारे में पता चला तो उसने फौरन उसे बेचने का आदेश दिया और मुश्किल से चौथाई कीमत में उसे बेच दिया गया।

दुनिया भर के अखबारों में 1800 और 1900 में काफी लेख इस होप डायमंड के बारे में छपने लगे कि हीरा शापित है कि नहीं। हीरे के शापित होने को लेकर तो साफ नहीं हो पाया, लेकिन इतना तय हो गया कि हीरा किसी ना किसी हिंदू देवी या देव की आंख में से ही निकाला गया था। हालांकि शिव की तीसरी आंख को लेकर ज्यादा सहमति बनी, क्योंकि सीता की आंख को लेकर हिंदू मैथोलॉजी में कभी कुछ खास लिखा नहीं गया।

इधर हीरे का श्राप जारी रहा, एक डच हीरा मर्चेंट ने उसे खरीदा तो उसके बेटे ने उसका कत्ल करके खुदकुशी कर ली। इवेलिन वाल्श मैकलीन नाम की महिला इस हीरे की आखिरी प्राइवेट मालकिन थी, वो तो इस हीरे को अपने कुत्ते के पट्टे में बांधने लगी थी। इवेलिन दुनिया भर में मशहूर अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की मालकिन थी। इस हीरे के जिंदगी मे आते ही उसकी खुशियां काफूर हो गईं। पहले सास की मौत हुई, 9 साल की उम्र में उसका बेटा कार एक्सीडेंट में मारा गया। बेटी ड्रग्स की ओवरडोज का शिकार होकर मर गई। पति ने उसको तलाक देकर दूसरी शादी कर ली और  उनता पोता (ग्रांडसन) वियतनाम युद्ध में मारा गया। उसको अपने फैमिली पेपर वॉशिंगटन पोस्ट को भी बेचने की नौबत आ गई। जबकि उसने ये हीरा आज की कीमत के हिसाब से 46 लाख डॉलर में खरीदा था।

अब कोई भी होप को खरीदने के लिए तैयार नहीं था। ज्वैलर हैरी विंसेंट ने इसे नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुलर हिस्ट्री में रखने के लिए दे दिया। अमेरिका का ये म्यूजियम स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के तहत आता है। दिलचस्प बात ये है कि जेम्स टॉड नाम के जिस शख्स ने इसे डिलीवर किया था, उसकी एक्सीडेंट में टांग बुरी तरह कुचल गई। हालांकि तब से वो हीरा उसी म्यूजियम में है, बस उसे एक नए नेकलेस में जड़ दिया गया है। बीच-बीच में अलग-अलग देशों में उसे एक्जीबीशन के लिए ले जाता रहा है। इसी हीरे की अब तक कई रिप्लिका बन चुकी हैं। हीरे का कहानी पर कई टेलिविजन सीरीज अलग-अलग देशों में बनाई जा चुकी हैं।

तीन साल पहले इसका 250 मिलियन डॉलर में बीमा किए जाने की खबर आई। होप परिवार की एक एक्ट्रेस ने पब्लिसिटी पाने के लिए भी इसके श्रापित होने की खबरें उड़ाईं। यानी अमेरिका, ब्रिटेन, टर्की, फ्रांस समेत कई देशों में इस हीरे की कहानियां बिखरी पड़ी हैं। लेकिन सौ बात की एक बात जिस देश का इस हीरे पर असली हक है, क्या उसके नेता, इतिहासकार, मीडिया या कोहिनूर का ही राग अलापने में लगी जनता इसके बारे में जानती भी है? क्या इस हीरे की वापसी के लिए भी इस देश से कभी आवाज उठेगी, जोकि कोहिनूर की तरह किसी जबरन संधि पर हस्ताक्षर करवाकर नहीं बल्कि चुरा कर ले जाया गया था? होप अभी बाकी है...!

(साभार: inkhabar.com)

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