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वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय का बड़ा सवाल- सरकार ही क़ानून तोड़ेगी तो क़ानून की रक्षा कौन करेगा...

संतोष भारतीय प्रधान संपादक, चौथी दुनिया ।। सरकार ही क़ानून तोड़ेगी तो क़ानून की रक्षा कौन करेगा ये शिकायत नहीं है, ये गुस्सा भी नहीं है और इसके आगे कहें, तो अब कोई तकली़फ भी नहीं है, क्योंकि ऐसा लगता है कि दर्द हद से ज्यादा बढ़ गय

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

संतोष भारतीय प्रधान संपादकचौथी दुनिया ।। सरकार ही क़ानून तोड़ेगी तो क़ानून की रक्षा कौन करेगा

ये शिकायत नहीं है, ये गुस्सा भी नहीं है और इसके आगे कहें, तो अब कोई तकली़फ भी नहीं है, क्योंकि ऐसा लगता है कि दर्द हद से ज्यादा बढ़ गया है। स़िर्फ कुछ शंकाएं हैं वो शंकाएं प्रधानमंत्री जी से कह नहीं सकते क्योंकि प्रधानमंत्री जी को लोगों का ख़त मिलना पसंद नहीं आता। वो कहते भी हैं कि कुछ लोग मुझे ख़त लिखने की हिम्मत कर रहे हैं। उनके सलाहकार इस देश को ज्यादा जानते हैं। भारतीय जनता पार्टी के सांसद या कार्यकर्ता या अब तो मीनाक्षी लेखी का नाम ले सकते हैं। अगर उनसे ही प्रधानमंत्री अपने उठाए क़दमों के बारे में प्रतिक्रिया जान लेते कि जनता क्या सोच रही है, तो भी हमें थोड़ा सुकून मिलता, लेकिन शायद उनका भी संवाद प्रधानमंत्री जी के साथ नहीं है। इसलिए चलिए आपस में ही कुछ बातें कर लेते हैं।

500 रुपए और 2000 रुपए के नये नोट रिज़र्व बैंक द्वारा छपाई के बाद बाज़ार में आ गये हैं। उन नोटों का डिज़ाइन देखकर लगता है कि ये ऐसे नोट हैं जिनकी नक़ल नहीं हो सकती, जिन्हें कहीं छापा नहीं जा सकता, या इनके डिज़ाइन अद्भुत हैं। पर नोट देखकर अधिकांश लोगों का कहना है कि इसकी डिज़ाइन बिल्कुल बाज़ार में मुफ्त में दिये जा रहे चूरन वाले नोटों की तरह है। ये नोटों का अपमान करने के लिए नहीं कह रहा हूं। मैं स़िर्फ ये कह रहा हूं कि जिन लोगों ने भी डिज़ाइन को पास किया वो कितने बड़े बुद्धिमान हैं। इस नोट पर सरकार के विज्ञापन हैं, जो ग़ैर-क़ानूनी हैं, क्योंकि क़ानूनन किसी भी करेंसी के ऊपर किसी तरह का विज्ञापन नहीं हो सकता। यहां तक कि नोट के ऊपर अपना नाम लिखना भी ग़ैर-क़ानूनी है। लेकिन सरकार ने अपने विज्ञापन किये, वो सरकार जाने, क्योंकि जब सरकार ही क़ानून तोड़ेगी तो क़ानून की रक्षा कौन करेगा।

इसे तो हमारे देश को चला रहा ईश्वर ही जाने, लेकिन उसमें हिंदी ग़लत है, मराठी ग़लत है, उर्दू ग़लत है। दो हज़ार रुपए की इबारत तीनों भाषाओं में ग़लत छपी है। इसलिए हमने कहा कि जिन्होंने इस डिज़ाइन को अंतिम रूप से पास किया वो महान बुद्धिमान और महान समझदार लोग हैं। ये नोट जब हाथ में आया इसका रंग उतरने लगा। हमने अपने दफ्तर में 2000 रुपए का नोट बैंक से मंगवाया, रूई हल्की गीली की और नोट के ऊपर दो बार घुमाया, नोट की स्याही छूटने लगी। वित्त सचिव टेलिविज़न पर आकर के कहते हैं कि जिन नोटों की स्याही छूटती है, वो नोट सही हैं और जिन नोटों की स्याही नहीं छूटती है, वो गलत हैं। मजे की बात, इसके चौबीस घंटे बाद वित्त मंत्रालय ये बयान देता है कि जिन नोटों की स्याही छूट रही है वो ग़लत नोट हैं या नक़ली नोट हैं और जिनकी स्याही नहीं छूटती है वो असली नोट हैं। हम किसे सही माने। जो नोट हमारे पास आया वो तो बैंक ने दिया और अधिकांश लोगों के पास वही नोट है जो बैंक दे रहे हैं। उनकी स्याही छूट रही है। क्या हम ये माने कि ये सारे नोट नक़ली हैं या ये सारे नोट असली हैं। अगर ये नोट असली हैं, तो ये कैसी डिज़ाइन है कि जो तीन महीने से नोट छप रहे थे, वो सूख नहीं भी पाए और जब वो उपभोक्ता के हाथ में या जनता के हाथ में पहुंचे तो अपनी स्याही छोड़ रहे हैं।

हिन्दुस्तान में अधिकांश लोग गर्मी से परेशान होते हैं, उन्हें पसीना निकलता है, उनकी बनियान यहां तक कि क़मीज़ भी गीली हो जाती है। उसमें रखे हुए ये सारे नोट अगर गीले होकर स्याही छोड़ दें और एक दूसरे के ऊपर स्याही ओवरलैप कर जाए, तो क्या ये नोट बाज़ार में चलेंगे। अब न ये शिकायत है न तकलीफ़ है, ये स़िर्फ आपस में बातचीत करने का एक माध्यम है, क्योंकि हमें तो कचोट हो रही है और वो कचोट इसलिए हो रही है कि इस देश के अधिकांश लोगों की ये चिंता है। अब सवाल खड़ा होता है कि क्या ये नोट दोबारा बदले जाएंगे? अगर दोबारा बदले जाएंगे तो फिर वही अफ़रा तफ़री होगी, तो क्या सरकार चलाने वाले मुखिया जिन्होंने बहुत गोपनीय रखकर ये सारा काम किया, क्या उन्हें इन सवालों के ऊपर सोचने का अभी समय मिल पायेगा? शायद नहीं मिल पायेगा, क्योंकि ये सरकार जो कर देती है वही आख़िरी होता है। उससे वो पीछे नहीं आती। भले ही कितना भी बड़ा ऩुकसान हो जाये। सरकार की तारीफ़ करनी चाहिए।

हिन्दुस्तान के 60 प्रतिशत लोग खेती के ऊपर जी रहे हैं और 25 प्रतिशत तो सीधा खेती के पर ही निर्भर हैं। गांव से बैंक छह से आठ किलोमीटर दूर हैं। उस गांव को छोड़ दें, जहां पर बैंक की शाखा है और किसान का परंपरागत अभ्यास बैंक में पैसे रखने का, रोज़ जाकर जमा कराने का नहीं है, वो महीने दो महीने में एक बार जाता है अपना पैसा जमा करा देता है या जब क़र्ज़ लेने जाना होता है तो किसान क्रेडिट कार्ड से पैसे ले लेता है। क्या वो किसान जिसकी फ़सल खेत में पड़ी हुई है और नहीं बिक रही है या ग़लती से बिक जाये और वो पैसा लेकर जाये और उसका रंग छूट जाये तो किसान क्या करे। इससे भी बड़ी समस्या किसान की धान की फ़सल के बिकने या अभी जो फ़सल बोनी है, जिसके लिये खाद और बीज चाहिए उसके लिए वो पैसे कहां से लाये।

फ़सल बोने का एक समय होता है और उस समय अगर किसान के पास कैश नहीं हो तो वो चीज़ें ख़रीद नहीं सकता और अगर ख़रीद नहीं पायेगा तो खेत में बोएगा क्या? सरकार चलाने वाली व्यवस्था को इस बात का एहसास नहीं है कि इतने सालों से खेती की ज्यादातर ख़रीद और बिक्री, खेती के फ़सल की ख़रीद और बिक्री नक़द होती है। व्यापारी या आढ़ती किसान से जब ख़रीदता है तो उसे नक़द पैसा देता है। या फ़सल कटने से पहले बयाना भी वो नक़द ही देता है। किसान उस पैसे को अपने घर में रखता है। पूरा एग्रीकल्चर सेक्टर इस समय पशोपेश में है क्या करे? उसकी चीख़ सुनने वाला न उसका सांसद है न उसका विधायक है और न मीडिया के लोग। खुदरा दुकानदार का सारा व्यापार कैस के उपर नक़द लेन-देन पर चलता है, लेकिन कैश नहीं होने की वजह से सप्लाई लाईन कमज़ोर हो गयी। पर हम ये मान भी लें कि ये सब एक या दो महीने में ठीक हो जायेगा तो भी जो मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट है उस डिफेक्ट का क्या करेंगे। और अब पहली बार किसान के ऊपर इनकम टैक्स लगने का ख़तरा संकेतों में आ चुका है। अब तक खेती से उपजी आमदनी या किसान की किसी भी तरी़के से हुई आमदनी टैक्स फ्री थी। पर अब उनके खातों के ऊपर नज़र रखी जा रही है कि अगर वो अपने किसी रिश्तेदार का पैसा या किसी का पैसा अपने खाते में डालते हैं, तो इनकम टैक्स उनसे टैक्स भी वसूल सकता है और जुर्माना भी लगा सकता है।

100 करोड़, 80 करोड़, 60 करोड़ जिनका पैसा व्हाइट है, वो भी अपना पैसा बैंक से नहीं निकाल पाएंगे, न निकाल पा रहे हैं, क्योंकि बैंक के पास नोट ही नहीं हैं और दूसरी तरफ रोज़मर्रा के खाने-पीने के लिए जो लोग कल तक नोट बदल रहे थे, अब वो भी नहीं बदल पायेंगे। सरकार निश्चिंत है कि उसने काले धन के ऊपर काबू पा लिया है।

सरकार की ये निश्चिंतता कि उसने काले धन के उपर क़ाबू पा लिया है, हमें भी अच्छी लग रही है, क्योंकि टेलिविज़न चैनलों ने और ख़ासकर सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री के या सरकार के किसी भी कदम की तारीफ़ करने वाली दो या तीन हज़ार लोगों की सेना ने माहौल ऐसा बना दिया है कि अगर आप नोट बदली को कालेधन के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा क़दम बताकर तारीफ़ नहीं करते तो आप कालेधन के समर्थक हैं। ये ठीक उसी तरह की बात है, जैसे एक महीने पहले अगर आप पाकिस्तान को गाली न दें तो आप देशभक्त नहीं हैं। अगर आप युद्ध का विरोध करें तो आप देशद्रोही हैं। लेकिन नोटबंदी के इस माहौल में जब आदमी अपनी ज़िंदगी की एक अहम लड़ाई लड़ रहा है, अचानक पाकिस्तान के साथ तनाव समाप्त हो गया है। कश्मीर का तनाव समाप्त हो गया है।

रक्षामंत्री कहते हैं कि कश्मीर में पत्थर नहीं चल रहे हैं। ये रक्षामंत्री के लिए ख़ुशी की बात है। लेकिन कश्मीर का दर्द समाप्त हो गया इसके उपर रक्षामंत्री कुछ नहीं बोल रहे हैं। ये भी कह देना चाहिए कि कश्मीर की सारी समस्याएं हल हो गई हैं। अब वहां के लोगों के मन में भारतीय क़दमों को, भारत सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों को समर्थन ही समर्थन है। लेकिन एक अच्छी बात है कि देश जिस युद्धोन्माद की तरफ बढ़ रहा था और जिसमें टेलिविज़न चैनल सबसे बड़ा योगदान कर रहे थे। सोशल मीडिया में तीन हज़ार लोग जो कहीं से तनख्वाह पाते हैं और जो सरकार द्वारा उठाये गये हर क़दम को अतिरेक की सीमा तक ले जाते हैं, उन लोगों द्वारा बढ़ाया गया युद्धोन्माद अचानक आठ तारीख़ से ख़त्म हो गया है। ऐसा लग रहा है कि पाकिस्तान की सीमा पर सब शांति है और अब हमारा कोई सिपाही कहीं नहीं मर रहा।

इतना ही नहीं, हमारे विकास के पचास से ज्यादा वायदे सरकार ने किये थे। स्वच्छ भारत से लेकर के नोटबंदी तक ऐसा लग रहा है कि वो सब अपनी पूरी गति से चल रहे हैं और हमारे दरवाज़े पर अच्छे दिन की ट्रेन आशाओं और ख़ुशियों से भरे हुये बैग जल्दी उतारने वाली है। इन सारी बातें जिनका ज़िक्र हम कर रहे हैं, इस आशा के साथ कर रहे हैं कि सरकार द्वारा करेंसी बदलने का अति बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला लिया गया, उस फैसले के परिणामस्वरूप कहीं हम महंगाई या मंदी की चपेट में तो नहीं आ जाएंगे। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लग ऐसा रहा है कि सरकार संसद में भी थोड़ी सी कलाबाज़ी दिखा रही है। इस दौरान अचानक एक बैंक ने जिसका नाम स्टेट बैंक है, सात हजार करोड़ से ज्यादा का उन लोगों का क़र्ज़ माफ़ कर दिया है जिनके बारे में ये माना जाता है कि वो देश के बड़े व्यापारी हैं और बैंकों का सारा पैसा जो भी जनता का पैसा है, हड़प चुके हैं। अगर सारे बैंकों का ये फिगर आएगा तो ये पैसा 60 हजार करोड़ से ज्यादा का निकलेगा।

आख़िर में एक और चिंताजनक बात कि क्या वो लोग जिनके ऊपर कालेधन चलाने का आरोप है, जिनके खाते विदेशी बैंकों में हैं, जिनको लेकर के भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव जीता। क्योंकि उसने कहा था कि जब ये पैसा आएगा तो हरेक के खाते में 15 लाख रुपए जमा हो जायेंगे। या वो लोग देश में जो कालेधन की सत्ता के प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री हैं क्या उन्हें कोई फ़़र्क इस नोटबंदी के फैसले से पड़ा है। वो तो कहीं चिंतित नहीं दिखाई दिये और फिल्मी दुनिया के लोग जिनके बारे में माना जाता है कि वो जितना चेक से पैसा लेते हैं उससे ज्यादा ब्लैक में लेते हैं। वो लोग इस क़दम की तारीफ़ कर रहे हैं। दरअसल, हर वो आदमी इस कदम की तारीफ़ कर रहा है, चाहे वो उद्योगपति हों या फिल्म स्टार हों या क्रिकेटर हों जिनके उपर आमतौर पर ये संदेह है कि ब्लैकमनी का व्यापार यही करते हैं और यही उस अर्थव्यवस्था के काली अर्थव्यवस्था के चलन के ज़िम्मेदार लोग हैं, वो सब तारीफ़ कर रहे हैं। और जो लाईन में लगा हुआ है जो मुश्किल से दो हज़ार, पांच हज़ार, दस हज़ार रुपए अपनी मुसिबत के वक्त के लिए घर में रखता है वो नोट बदलने के लिए लाईन में खड़ा है, लेकिन उसका नोट नहीं बदला जा रहा है। और ऊपर से अब उसके ऊपर ये संदेह हो गया कि असली कालाधन तो ये है, जो लोगों ने अपने घर में हारी-बिमारी, आना-जाना, लेन-देन, बच्चों की चिंताओं को दूर करने के लिए रखा हुआ था, वो कालेधन का फेस हो गया। और तभी शायद ये कहा गया कि जो चोर हैं, वो लाइनों में खड़े हैं और नोट बदलवा रहे हैं। ये चिंताएं हैं। इन चिंताओं का न सोशल मीडिया पर भड़ैती करने वाले लोगों के ऊपर असर पड़ेगा और न ही टेलीविज़न चैनल पर आकर सवाल और चिंता को मोड़ने में माहिर टेलिविज़न के पत्रकारों के ऊपर इन चिंताओं का असर पड़ेगा, क्योंकि दरअसल ये सब कालेधन की दुनिया के लठ्ठबाज़ हैं, लठैत हैं। इसका फ़़र्क तो इस देश के किसान पर पड़ेगा, इस देश के मज़दूर पर पड़ेगा, उसका पैसा भी नहीं बदला जा रहा है और महंगाई की मार भी उसे ही झेलनी पड़ेगी। हमारी ये चिंताएं सच न हो बस ये ईश्वर से प्रार्थना है, अगर वो कहीं है तो।

(साभार: चौथी दुनिया, ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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