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वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का सवाल- मोदी शपथ लेकर कह सकते हैं कि वे काले धन का उपयोग नहीं करते?

डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। मोदी-मुद्राः अराजकता-पर्व इंदिरा गांधी ने 1975 में जब आपातकाल थोपा था, तब आचार्य विनोबा भावे ने उसे ‘अनुशासन पर्व’ कहा था, अब नरेंद्र मोदी ने देश में ‘अराजकता पर्व’ थोप दिया है। 15 दिन होने आए लेकिन देश में आर्थिक अराजकता

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

डॉ. वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार ।। मोदी-मुद्राः अराजकता-पर्व

इंदिरा गांधी ने 1975 में जब आपातकाल थोपा था, तब आचार्य विनोबा भावे ने उसे ‘अनुशासन पर्व’ कहा था, अब नरेंद्र मोदी ने देश में ‘अराजकता पर्व’ थोप दिया है। 15 दिन होने आए लेकिन देश में आर्थिक अराजकता फैली हुई है। हालात काबू में ही नहीं आ रहे हैं। मोदी बार-बार भावुक हो रहे हैं। इंदिरा गांधी की तरह विरोधियों पर बरस रहे हैं। ईश्वर की कृपा है कि उन्हें वे अंदर नहीं कर रहे हैं। उन पर वे भ्रष्टाचार और काले धन के पोषक होने का आरोप लगा रहे हैं। मानो कि वे खुद दूध के धुले हुए हों। क्या वे खुद शपथ लेकर कह सकते हैं कि वे काले धन का धड़ल्ले से उपयोग नहीं करते हैं?

मोदी तो क्या, कोई जिला स्तर का नेता भी यह दावा नहीं कर सकता है। राजनीति और भ्रष्टाचार तो चोली-दामन की तरह है। इसमें शक नहीं कि मोदी की नोटबंदी ने विरोधियों के हौसले बुलंद कर दिए हैं लेकिन उनके इस आरोप पर जनता बिल्कुल भी भरोसा नहीं कर रही है कि यह कदम मोदी ने पूंजीपतियों या अपनी पार्टी या अपना कोई फायदा करने के लिए उठाया है। इसीलिए सरकारी अराजकता के जवाब में जनता की अराजकता नहीं हो रही है। भारत की जनता के धैर्य को मेरा सलाम लेकिन सरकार क्या कर रही है? भाजपा क्या कर रही है? संसद क्या कर रही है?

संसद में विरोधी लोग सरकार की कड़ी निंदा कर रहे हैं, जिसे हम गलत नहीं कह सकते लेकिन वे इस नोट-संकट से निपटने के लिए कौन से ठोस सुझाव दे रहे हैं? बेचारे प्रधानमंत्री की तो घिग्घी बंध गई है। यह मोदी-मुद्रा है। यदि संसद में भी उन्होंने आंसू टपका दिए तो क्या होगा? संसद में आकर वे क्या बोलेंगे? संसद में बोलने वाले को खरी-खरी सुननी भी पड़ती है। मोदी को सुनाने की आदत है, सुनने की नहीं। इसीलिए वे आजकल सभाओं में बोलकर खुद को खुश करते रहते हैं। भाजपा के संसदीय दल की बैठक में भी उन्होंने यही किया। जो कुछ सामने आया है, उससे यही पता चला है कि सबने हां में हां मिला दी। किसी ने चूं भी नहीं की।

आपातकाल की तरह सभी मंत्री, सांसद और नौकरशाह अपनी-अपनी नौकरियां बचाने में लगे हुए हैं। नोटबंदी को पूरे संसदीय दल ने ‘महान’ और ‘क्रांतिकारी’ अभियान कहकर इसके समर्थन में प्रस्ताव पारित कर दिया। उसने आपातकाल में इंदिराजी के संसदीय दल की याद ताजा कर दी। किसी ने भी कतारों में दम तोड़ते लोगों, चौपट होती शादियों, बर्बाद होते किसानों, रातोंरात सफेद या सुनहरे होते काले धन की चर्चा भी नहीं की। यह भी नहीं बताया कि नए नोटों में ऐसा क्या है, जो वे काले नहीं हो जाएंगे? इस ‘नए काले धन’ से यह पहले से लड़खड़ाई हुई सरकार कैसे निपटेगी? दो हजार का नोट दुगुना काला धन बनाएगा। उसके नकली नोट भी पकड़े गए हैं। मारे गए आतंकवादियों की जेब से नकली नहीं, असली नए नोट निकले हैं।

नए नोटों के अभाव में सब्जियां सड़ रही हैं, मिट्टी के मोल बिक रही हैं। विदेशी राजनयिक और पर्यटक बदहवास हो रहे हैं। प्रवासी भारतीय अपने पुराने नोटों के बंडलों को सामने रखकर मोदी-मुद्रा धारण कर रहे हैं। किसी को कुछ समझ नहीं पड़ रहा है। अराजकता फैली हुई है।

(साभार: नया इंडिया)

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