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'चुनाव सिर पर हैं, इसलिए अमित शाह-पर्रिकर अपने सिद्धांत की दुम दबाकर रखें, यह जरुरी है'
‘यदि पर्रिकर-जैसे लोग चार साल पहले ही (सत्तारुढ़ होते ही) अपने घोषणा-पत्र पर ईमानदारी से काम शुरु कर देते तो आज उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता। अब गोआ के चुनाव सिर पर हैं, इसलिए अमित शाह और पर्रिकर अपने सिद्धांत की दुम दबाकर रखें, यह जरुरी है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘यदि पर्रिकर-जैसे लोग चार साल पहले ही (सत्तारुढ़ होते ही) अपने घोषणा-पत्र पर ईमानदारी से काम शुरु कर देते तो आज उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता। अब गोआ के चुनाव सिर पर हैं, इसलिए अमित शाह और पर्रिकर अपने सिद्धांत की दुम दबाकर रखें, यह जरुरी है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वैदिक का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
वेलिंगकरः संघ फिर सोचे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। पहले कभी किसी प्रांत के संघ-प्रमुख को पद-मुक्त करने की बात नहीं सुनी गई। गोआ के संघ प्रमुख सुभाष वेलिंगकर को इसलिए पद-मुक्त किया गया है कि वे गोआ की भाजपा सरकार से आग्रह कर रहे थे कि वह संघ और भाजपा की भाषा नीति को लागू करे। संघ और भाजपा की भाषा-नीति क्या है?
2012 के गोआ के चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में मराठी और कोंकण माध्यम की शिक्षा का समर्थन किया था और अंग्रेजी-माध्यम की शिक्षा को संस्कृति-विरोधी और अराष्ट्रीय घोषित किया था। बाद में मुख्यमंत्री बने मनोहर पर्रिकर ने गोआ की सभाओं में अंग्रेजी माध्यम के विरुद्ध तर्कों के अंबार लगा दिए थे। उन्होंने अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों को अनुदान बंद करने का भी वादा किया था। मुख्यमंत्री रहते हुए पर्रिकर ने कुछ नहीं किया। पर्रिकर ने उसे चुनावी जुमला कहकर उड़ा दिया। नए मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पर्सेकर भी कुछ नहीं कर सके।
गोआ के संघ-प्रमुख होने के नाते वेलिंगकर ने अपनी ही सरकार को चुनौती दे डाली। उन्होंने मांग की कि अंग्रेजी-माध्यम के स्कूलों का अनुदान बंद किया जाए। उन्होंने बयान दिया, सभाएं की और प्रदर्शन भी किए।
एक सच्चे स्वयंसेवक और कट्टर देशभक्त होने का प्रमाण उन्होंने दिया। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को काले झंडे दिखाने की भी हिम्मत की। वे ऐसा करने के पूरे हकदार हैं। आज के भाजपा के राष्ट्रीय और प्रांतीय नेता जब बच्चे रहे होंगे तब से वेलिंगकरजी संघ की गोआ शाखा को सींच रहे हैं। उनका नैतिक प्रभाव कितना प्रबल है कि गोआ के लगभग सभी संघ-पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे दिए हैं। मुख्यमंत्री ने भी उनकी तारीफ की है। यदि वेलिंगकर चाहें तो वे एक नई पार्टी खड़ी कर सकते हैं, जो गोआ में भाजपा के लिए जानलेवा सिद्ध हो सकती है।
लेकिन भाजपा की मजबूरी भी हमें समझनी चाहिए। भाजपा एक राजनीतिक दल है। हर दल के प्राण सत्ता में बसते हैं। सत्ता ही ब्रह्म है, सिद्धांत मिथ्या है। यदि अंग्रेजी स्कूलों की मदद बंद कर दी जाए तो भाजपा को डर है कि गोआ के ईसाई वोट खतरे में पड़ जाएंगे हालांकि न तो ईसामसीह अंग्रेजी जानते थे और न ही बाइबिल अंग्रेजी में लिखी गई है। संघ और भाजपा के नेताओं में इतना बुद्धिबल नहीं है कि वे ईसाई संस्थाओं को उनके अंग्रेजी-प्रेम से डिगा सकें। यदि पर्रिकर-जैसे लोग चार साल पहले ही (सत्तारुढ़ होते ही) अपने घोषणा-पत्र पर ईमानदारी से काम शुरु कर देते तो आज उन्हें यह दिन देखना नहीं पड़ता। अब गोआ के चुनाव सिर पर हैं, इसलिए अमित शाह और पर्रिकर अपने सिद्धांत की दुम दबाकर रखें, यह जरुरी है।
मुझे तो यह भी लगता है कि इस सारे मामले के भड़कने के पीछे असली कारण पर्रिकर की अक्खड़ता है। यह संभव है कि पर्रिकर ने अपने गुरु सुभाष वेलिंगकर की वैसे ही उपेक्षा की होगी, जैसे नरेंद्र मोदी ने आडवाणी और डॉ. जोशी की की है। वेलिंगकर, वेलिंगकर हैं। वे सबक सिखाए बिना नहीं रहेंगे। संघ की यह सोच सही है कि संघ-प्रमुख को अपनी ही सरकार के विरुद्ध मोर्चा खेालना और पदासीन रहते हुए आंदोलन छेड़ना ठीक नहीं लगता लेकिन मैं संघ से पूछता हूं कि उसके पास क्या यही एक मात्र रास्ता बचा था? वेलिंगकर को निकालकर संघ पछताएगा। संघ के माथे पर सिद्धांत-हनन का काला टीका लग जाएगा। वे अपने फैसले पर फिर सोचे।
(साभार: नया इंडिया)
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