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वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास बोले, डॉ. स्वामी का कुछ नहीं बिगड़ेगा!
‘डॉ. स्वामी ने ही लाल झंडा उठाए राज्यसभा में कांग्रेस की बोलती बंद करने का जिम्मा लिया हुआ है। डॉ. स्वामी ने हाल में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ धरने पर बैठे गिरि की जो हौसलाबुलंदी की और केजरीवाल से जैसे राजनैतिक तौर पर भिड़े वैसा कोई दूसरा शख्स नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास नहीं है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘डॉ. स्वामी ने ही लाल झंडा उठाए राज्यसभा में कांग्रेस की बोलती बंद करने का जिम्मा लिया हुआ है। डॉ. स्वामी ने हाल में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ धरने पर बैठे गिरि की जो हौसलाबुलंदी की और केजरीवाल से जैसे राजनैतिक तौर पर भिड़े वैसा कोई दूसरा शख्स नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास नहीं है।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार और संपादक हरिशंकर व्यास का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
डॉ. स्वामी का कुछ नहीं बिगड़ेगा!
इसलिए कि प्रधानमंत्री के लिए यही कहना शोभादायी है। और इसके बाद यदि अरुण जेटली शिकायत करने पहुंचे भी तो प्रधानमंत्री कह सकें कि मैंने कह तो दिया है। इससे ज्यादा और क्या हो? क्या डॉ. स्वामी को पार्टी से निकालें?
मतलब अरुण जेटली रोना-धोना लेकर पहुंचे उससे पहले प्रधानमंत्री ने बला टाली याकि प्रीएम्पट किया। जैसा मैंने पिछले सप्ताह भी लिखा कि डॉ. स्वामी ने रघुराम राजन या अरविंद सुब्रहमण्यम को लेकर वही कहा जो संघ परिवार में सोच है। ये सब क्योंकि कांग्रेस सरकार, पी. चिदंबरम की विरासत में मिले हैं इसलिए भाजपा की सोच में इनका क्या मतलब? इस बात को अपने अंदाज में नरेंद्र मोदी ने भी बताया तो गुरुमूर्ति आदि ने लेख लिख कर जाहिर किया।
तभी इस बात को नोट करके रखें कि नरेंद्र मोदी–अमित शाह का विकास का, आर्थिक नीतियों का, कांग्रेस मुक्त भारत का, नेहरू-गांधी परिवार के प्रति रवैए के एजेंडे का नंबर एक योद्धा, सिपहसालार डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी हैं न कि अरुण जेटली। दिल्ली का अंग्रेजीदां मीडिया भले सोचे कि नरेंद्र मोदी के पास अरुण जेटली का विकल्प नहीं है। पर वे कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के पूरे एजेंडे, 2000 से मोदी-अमित शाह के अनुभव के बदले के एजेंडे में फिट नहीं होते हैं।
जैसा मैंने पिछली बार लिखा, पुराने अहसानों के कारण अरुण जेटली को नरेंद्र मोदी-अमित शाह अपने बगल में बैठाए रखेंगे लेकिन राजकाज में उनका दायरा यों सिकुड़ा है तथा आगे और सिकुड़ेगा। मीडिया में इस सप्ताह यह फालतू चर्चा थी कि अमित शाह और अरुण जेटली को बुला कर नरेंद्र मोदी उनके साथ कैबिनेट फेरबदल पर चर्चा कर रहे हैं। मई 2014 में कैबिनेट गठन के वक्त अरुण जेटली ने जो निर्णायक रोल अदा किया था वह स्थिति आज नहीं है।
नरेंद्र मोदी सौ फीसद अपने आंकलन अनुसार फैसला ले रहे हैं। उसमें संगठन, चुनाव के कारण सिर्फ और सिर्फ अमित शाह की फीडबैक एक निर्णायक बात है। तय मानें कि आगे रिजर्व बैंक से लेकर वित्त मंत्रालय की तमाम अहम नियुक्तियों का काम प्रधानमंत्री अपने स्तर पर करेंगे। बहुत जल्द भूपेंद्र यादव को लेकर कानूनी टीम भी प्रधानमंत्री खुद संभालेंगे।
संदेह नहीं कि आज लाख टके का सवाल है कि अरुण जेटली बनाम डॉ. सुब्रहमण्यम स्वामी के शक्ति परीक्षण में नरेंद्र मोदी, अमित शाह की निगाह में आज और आने वाले वक्त में किसकी ज्यादा उपयोगिता होगी? दूसरा सवाल यह है कि अरुण जेटली क्योंकि मई 2014 से आज तक ग्राफ के जिस मुकाम पर हैं उस पर बने रहते हुए आगे भी क्या डॉ. स्वामी को नीचे बैठाए रखेंगे या पार्टी से बाहर निकलवा सकते हैं?
अपना मानना है कि डॉ. स्वामी की उपयोगिता बढ़ेगी। मामला नेशनल हेराल्ड का हो या अगस्ता का या व्यक्तियों में हसन अली, राबर्ट वाड्रा से ले कर कार्ति चिदंबरम आदि के तमाम मामलों में संघ परिवार में यदि आत्मघाती हमलावर यदि कोई है तो वह डॉ. सुब्रहमण्यम स्वामी है।
नोट करके रखें कि डॉ. स्वामी ने ही लाल झंडा उठाए राज्यसभा में कांग्रेस की बोलती बंद करने का जिम्मा लिया हुआ है। डॉ. स्वामी ने हाल में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ धरने पर बैठे गिरि की जो हौसलाबुलंदी की और केजरीवाल से जैसे राजनैतिक तौर पर भिड़े वैसा कोई दूसरा शख्स नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास नहीं है। यूपी में मंदिर का एजेंडा गरमाना है या कोर्ट में लड़ाई लड़नी है तो डॉ. स्वामी ही नंबर एक उपयोगी हैं। इसलिए फिलहाल भले डॉ. स्वामी मंत्री न बनें लेकिन उनकी उपयोगिता, संघ परिवार में उनका ग्राफ लगातार बढ़ना है। अंग्रेजी मीडिया में कुछ पंडितों ने थीसिस दी है कि मोदी व अमित शाह को यह खतरा लगने लगा है कि डॉ. स्वामी बाद में उनके लिए भी भारी पड़ेंगे। उन्हें कंट्रोल नहीं किया जा सकता। इसलिए राज्यसभा में लाने की गलती कर डॉ. स्वामी से पिंड छुड़ाने की अब मोदी-शाह सोचने लगे हैं।
यह थीसिस फालतू है। इसलिए कि उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव तक डॉ. स्वामी मंदिर मुद्दे और भ्रष्टाचार के मामलों में पार्टी के एजेंडे को धार देने के लिए है। नरेंद्र मोदी और संघ दोनों ने डॉ. स्वामी को सुविचारित रणनीति में आगे किया है। पहले उन्हें दिल्ली में भारी सुरक्षा मुहैया कराई। बड़ी कोठी दी। फिर राज्यसभा पहुंचाया गया। फिर उनसे रघुराम राजन को निपटवाया गया। हां, रघुराम राजन सिर्फ और सिर्फ डॉ. स्वामी के कारण निपटे हैं। यदि वे विवाद नहीं करते, हल्ला नहीं करते तो उनके हटने का फैसला क्या इतनी आसानी से होता जैसे हुआ है। नरेंद्र मोदी ने उनकी तारीफ तब की जब उन्होंने खुद न बनने की मंशा बता दी। राजन के माता-पिता ने ठीक कहा कि यदि प्रधानमंत्री पहले ऐसा बोल देते तो वे रुक जाते।
सो डॉ. स्वामी की उपयोगिता को गहराई से समझा जाए। उनकी दो साल में बनी एक के बाद एक सीढ़ी और एजेंडे को भी समझते हुए आगे की राजनीति बूझनी चाहिए।
बावजूद इसके अरुण जेटली के करीबी सौ टका विश्वास के साथ मान रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को डॉ. स्वामी के खतरे समझ आ गए हैं और अब भाजपा में उनके ज्यादा दिन नहीं बचे। और तो और यहां तक लिख दिया जा रहा है कि कहीं वे कांग्रेस में शामिल होने की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं।
यह बहुत मूर्खतापूर्ण रिपोर्टिंग है। जो हो, डॉ. स्वामी को मुंह पर पट्टी न बंधी है और न बंधेगी। और न ही वे भाजपा से निकाले जा रहे हैं।
(साभार: नया इंडिया)
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