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बीजेपी और कांग्रेस कॉर्पोरेट समूह के दो हाथ हैं, बोले टीवी पत्रकार रवीश कुमार
‘वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का कार्पोरेट से इतना गहरा रिश्ता है कि वे उस रिश्ते की खातिर दूसरे दलों के नेताओं से फर्क मिटाते चले गए। इसीलिए कई मौकों पर जनता को कांग्रेस और भाजपा एक ही लगती है। दोनों एक ही प्रकार के कार्पोरेट समूह के शुभचिंतक हैं या कहिए कि दो हाथ हैं।’ हिंदी दैनिक अखब
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
‘वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का कार्पोरेट से इतना गहरा रिश्ता है कि वे उस रिश्ते की खातिर दूसरे दलों के नेताओं से फर्क मिटाते चले गए। इसीलिए कई मौकों पर जनता को कांग्रेस और भाजपा एक ही लगती है। दोनों एक ही प्रकार के कार्पोरेट समूह के शुभचिंतक हैं या कहिए कि दो हाथ हैं।’ हिंदी दैनिक अखबार ‘नवोदय टाइम्स’ में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहना है वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार का। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:
क्या बनारस के ‘रोड शो’ से कांग्रेस का भला होगा
सोशल मीडिया पर बनारस की कांग्रेस रैली की तस्वीर खूब शेयर की जा रही है। शेयर करने वाले कांग्रेस के समर्थक और कार्यकर्ता ही होंगे। उस तस्वीर में बहुत दूर तक कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और लोगों का हुजूम दिखाई देता है। बीच में सोनिया गांधी का काफिला कहीं गुम-सा नजर आता है। कांग्रेसी इस तस्वीर के जरिए क्रॉस चैकिंग कर रहे हैं कि वाकई यह भीड़ कांग्रेस अध्यक्ष के रोड शो में ही आई है।
बनारस के रोड शो से कांग्रेस का कितना वास्तविक भला होगा, इसका अनुमान लगाना ठीक नहीं रहेगा मगर यह दिख रहा है कि कांग्रेसी जनों को अपने घरों और दफ्तरों में टांगने के लिए एक तस्वीर मिल गई है। हो सकता है वह तस्वीर उनके लिए टॉनिक का काम करे। कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को फिर से राजनीतिक कार्यकर्ता बनने के लिए प्रेरित करे।
‘दर्द-ए-बनारस’ सोनिया गांधी के रोड शो का नाम था। आपने सुबह-ए-बनारस तो सुना है मगर दर्द-ए-बनारस नहीं सुना होगा। 2007 में शाहरुख खान की एक फिल्म आई थी ‘ओम शांति ओम’। उसका एक गाना खूब चला था जिसका मुखड़ा था दर्द-ए-डिस्को। कांग्रेस का यह रोड शो जितना बनारस के दर्द का इजहार नहीं था, उससे कहीं ज्यादा उसकी अपनी कराह थी। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास 28 सीटें ही बची हैं। वह 27 साल से वहां सत्ता में नहीं है। पार्टी के रूप में कांग्रेस का दफ्तर इतिहास के शोधार्थियों के ज्यादा काम आने लगा था। कांग्रेस के लिए पूरा प्रदेश खाली है, फिर भी उसके नेताओं में इतनी भी चाह नहीं कि अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विस्तार के लिए अतिरिक्त प्रयास करें। ऐसी कोई बात रखें जिसे यूपी की जनता सुनना चाहे।
कई प्रदेशों में बड़े नेता की छत्रछाया में नए नेता नहीं पनप पाते हैं। यूपी में तो कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नहीं है। उन्होंने पनपने का प्रयास क्यों नहीं किया। आप उत्तर प्रदेश कांग्रेस के किसी नेता के बोलने का अंदाज देखिए। वह पार्टी के लिए कम बोलता है। राजनीति के लिए कम बोलता है। अपनी वैचारिक आस्था के लिए कम बोलता है। वह जल्दी वापस एयरकंडीशन रूम में लौट जाने के लिए बोलता है। कांग्रेस ने अपने इस पतन के लिए बहुत तैयारी की है।
अब कांग्रेस संकेत देना चाहती है कि वह अपने उत्थान के लिए मेहनत कर रही है। बनारस के रोड शो के जरिए कांग्रेस ने बताने का प्रयास किया है कि एक पार्टी के रूप में वह बची हुई है। उसके नेता भले उसकी पार्टी का चेहरा न हों मगर उसके पास कार्यकर्ताओं की फौज है, जो प्रदेश भर में बिखरे हुए हैं, लेकिन वह चाहे तो अपनी बची-खुची ताकत को एक जगह जमा कर अंदाजा लगा सकती है कि हां, हम हैं। कांग्रेस विचित्र पार्टी है।
वह सत्ता और विपक्ष दोनों ही अवस्थाओं में आलस्य को नहीं छोड़ती है। इतनी आलसी है कि अपनी उपलब्धियों को भी नहीं पहचानती। यही कारण है कि उसके नेताओं में वैचारिक पतन भी हुआ है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी का उभार हो रहा था, कांग्रेस के नेताओं के पास मुकाबला करने के लिए नेता तो नेता, एक ऐसा कार्यकर्ता तक नहीं नजर आया जो निकलकर उस उभार के मुकाबले ठोस रूप से विकल्प रख पाता। कांग्रेसी नेता और कार्यकर्ता टी.वी. स्टूडियो से लेकर चौक-चौराहे और चलती ट्रेन की बहसों में आसानी से हारते चले जा रहे थे। अपनी जमीन छोड़ते चले जा रहे थे। वे अपनी पार्टी की विचारधारा से ज्यादा नरेंद्र मोदी से अधिक प्रभावित होने लगे थे।
इसी आदत के कारण 2 साल लग गए कांग्रेस को एक राजनीतिक पार्टी के रूप में खुद को पेश करने में। उत्तर प्रदेश में लखनऊ और बनारस में कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी के रूप में नजर आ रही है लेकिन उसे समझना होगा कि यह कामयाबी बेहद शुरूआती है। हो सकता है कि राजनीतिक प्रबंधन के अथक प्रयास के कारण ऐसी 2 बड़ी सभाएं हो गई हों लेकिन प्रचार प्रबंधन से राजनीति नहीं बनती है। नरेंद्र मोदी एक बार सफल रहे तो कई बार असफल भी रहे हैं। राजनीति में वापसी होती है राजनीति से। क्या कांग्रेस अपने नेता से लेकर कार्यकर्ता तक को वैचारिक प्रतिबद्धता से लैस कर पाएगी। क्या उसके पास इतनी तैयारी है, क्या उसके पास अब वक्त बचा है। देखते-देखते यूपीका चुनाव समाप्त हो जाएगा और लोकसभा का आ जाएगा।
भारतीय जनता पार्टी भी शिथिलता का शिकार रही है। आंतरिक गुटबाजी का शिकार रही है। 10 साल तक वह भी दिल्ली की सत्ता से विस्थापित रही है। 20 साल से दिल्ली जैसे छोटे प्रदेश में वापसी नहीं कर सकी है लेकिन इसके बाद भी उसने कई राज्यों में अपनी पकड़ बना ली है। अपना राजनीतिक विस्तार किया है। 2004 में कांग्रेस कई दलों के साथ और सहयोग से लड़ी थी। 2016 में भाजपा ने मूल रूप से अपने दम पर विस्तार किया था। कांग्रेस ने ऐसा चुनावी करिश्मा कभी नहीं दिखाया है। यही नहीं, 2014 में कांग्रेस का हर सदस्य वैचारिक घबराहट का शिकार हो गया। इसका कारण यही है कि वह कांग्रेस में तो है मगर उसे यही नहीं पता कि वह कांग्रेस में क्यों है। उसकी अपनी वैचारिक तैयारी क्या है?
इसी तैयारी के न होने की वजह से कांग्रेस उस वक्त भी सामने नहीं आ पाती है जब कई दल उसकी तरह चुप हो जाते हैं। रोहित वेमुला के मामले में राहुल गांधी हैदराबाद यूनिवर्सिटी गए। जे.एन.यू. के मामले में वहां जाकर भाषण दिया। मगर ज्यादातर कांग्रेसी उस वक्त के तथाकथित राष्ट्रवादी उभार के शिकार हो गए। भाजपा ने जब उन पर यूनिवर्सिटी में 2-2 बार जाने का आरोप लगाया तो वे अपने ही नेता का बचाव नहीं कर सके। जे.एन.यू जाने पर दबी जुबान में राहुल गांधी की ही आलोचना करने लगे कि वहां जाने की क्या जरूरत थी।
कहने का मतलब है कि जब हवा खिलाफ हो तो उसी वक्त राजनीतिक कार्यकर्ता की पहचान होती है, वह उस हवा के खिलाफ खड़ा होकर बोले। सामान्य कांग्रेसियों में हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की कोई धारदार समझ नहीं है। इसलिए लोकसभा चुनाव के वक्त कई कांग्रेसी नेता आराम से भाजपा में चले गए और वहां उन्हें कोई वैचारिक दिक्कत नहीं है। कांग्रेस को अपनी विचारधारा का भी उसी तरह से प्रदर्शन करना होगा जैसा उसने बनारस में किया है। वर्ना आज की राजनीति में इतनी भीड़ का आ जाना या जुटा लेना कोई बड़ी बात नहीं है।
वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ कांग्रेस के कई बड़े नेताओं का कार्पोरेट से इतना गहरा रिश्ता है कि वे उस रिश्ते की खातिर दूसरे दलों के नेताओं से फर्क मिटाते चले गए। इसीलिए कई मौकों पर जनता को कांग्रेस और भाजपा एक ही लगती है। दोनों एक ही प्रकार के कार्पोरेट समूह के शुभचिंतक हैं या कहिए कि दो हाथ हैं। कांग्रेस का असली बदलाव उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता और नीतियों की स्पष्टता में दिखेगा जो इस वक्त बिल्कुल नहीं है। इस वक्त यही लगता है कि भाजपा ने 2 साल सरकार चला ली,अब वह हट जाए और हमें कुर्सी दे दे या भगवान कुछ ऐसा कर दे कि सत्ता मिल जाए। भ्रष्टाचार के सवाल पर उसने अपने घर में कोई खास सफाई नहीं की है। उसके सांसद और विधायक जिस भी संख्या में बचे हों, उनका कोई खास प्रदर्शन नहीं है। उनमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जो जनता से जुड़ कर अपनी पार्टी की छवि को बेहतर कर रहा होगा।
कुल मिलाकर पार्टी को आयोजन से नहीं, आत्मा से बदलना होगा। हम देखना चाहेंगे कि उत्तर प्रदेश का यह जुटान कांग्रेस के मूल चरित्र को कितना बदलता है। अगर नहीं बदला तो इस तरह के प्रदर्शन और प्रबंधन से किसी राजनीतिक बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष होना चाहिए, विपक्ष की मौजूदगी संख्या से नहीं, उसके वैचारिक विकल्पों के प्रदर्शन से होनी चाहिए। कांग्रेस इस मामले में भी बहुत कमज़ोर है। कई जगहों पर डरपोक भी लगती है। बनारस में उसमें हिम्मत तो आई है लेकिन क्यावह इसे बनाकर रख पाएगी।
(साभार: नवोदय टाइम्स)
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