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बलूचिस्तान: मनमोहन भी बोले थे, मोदी ने दमदारी दिखाई, राजेश बादल ने किया विश्लेषण..

लाल किले के प्राचीर से पीएम नरेंद्र मोदी ने ब्लूचिस्तान का मुद्दा क्या उठाया, सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां और कुछ सही-गलत तथ्य पेश करने की होड़ लग गई है। कई पोस्ट्स में कहा जा रहा है कि आजाद भारत में पहली बार इस विषय पर बात हो रही है। पर इस मुद्दे पर एक विश्लेषण 2008 में राज्यसभा टीवी के एग्जिक्यूटिव

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

लाल किले के प्राचीर से पीएम नरेंद्र मोदी ने ब्लूचिस्तान का मुद्दा क्या उठाया, सोशल मीडिया पर इसे लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां और कुछ सही-गलत तथ्य पेश करने की होड़ लग गई है। कई पोस्ट्स में कहा जा रहा है कि आजाद भारत में पहली बार इस विषय पर बात हो रही है। पर इस मुद्दे पर एक विश्लेषण 2008 में राज्यसभा टीवी के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर राजेश बादल ने वेबसाइट 'देशकाल' के अपने कॉलम 'समय सरगम' में भी किया था। उनका वे पुराना कॉलम आज की परिस्थितियों में भी फिट बैठ रहा है। पेश है ये कॉलम...

अगर आप समय की स्लेट पर लिखी इबारत को भूल जाएं तो इसके गंभीर परिणाम भी देखने को मिलते हैं। बलूचिस्तान के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ है। मैं इस समय याद करता हूं 1971 को, जब सारा देश श्रीमती इंदिरा गांधी, थल सेनाध्यक्ष मानेक शॉ और जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की जय जयकार कर रहा था तो बलूचिस्तान में भी यह जयकार गूंज रही थी। वहां भी इंदिरा गांधी और जनरल अरोड़ा जिंदाबाद के नारे महीनों तक सुनाई देते रहे थे।

अखबारों में भी ये खबरें सुर्खियों में थीं। पाकिस्तान के लोग हैरान थे कि देश के दो टुकड़े होने के बाद उनके देश में शत्रुदेश की जिंदाबाद क्यों रही है? इसका उत्तर बहुत सीधा-सपाट नहीं है। अतीत के कुछ पन्ने पलटने होंगे। कभी बौद्ध धर्म की शिक्षाएं बलूचिस्तान में अपना व्यापक असर दिखाती थीं, मौर्य सम्राज्य का प्रभुत्व चरम पर था और कनिष्क की कथाएं आज भी बलूचिस्तान के गांवों में सुनाई जाती हैं।

अखंड भारत को जब अंग्रेजों ने बांटा और 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनाया, तब उन्होंने बलूचिस्तान पाकिस्तान को नहीं सौंपा था। इसके तीन दिन पहले 11 अगस्त को उन्होंने बलूचिस्तान को आजाद कर दिया था। बंटवारे से पहले ही बलूच-संसद में अंग्रेजों से हुई संधि रद्द कर चुकी थी और बलूचिस्तान स्वतंत्र देश ही था। पाकिस्तान ने अस्तित्व में आते ही फौजी कार्रवाई की और बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया था। बेचारे बलूच स्वायत्ता-अंखडता का राग अलापते रह गए। उनकी संसद के नेता जेलों में डाल दिए गए या मार दिए गए। स्वाभिमानी बलूचियों ने इसे कभी मंजूर नहीं किया।

भारत चाहता तो यही काम वो नेपाल या भूटान के साथ कर सकता था और वहां तब शायद वैसा विरोध भी न होता, जैसा बलूचिस्तान में लगातार होता आया है। पाकिस्तानी फौज ने वहां वर्षों तक फौजी अभियान चलाए हैं। जनरल टिक्का खान को तो बलूचिस्तान का कसाई कहा जाता है। उन्होंने गाजर मूली की तरह बलूचियों को काटा और हवाई हमलों से उनकी नींद हराम कर दी। यह सिलसिला आज भी जारी है। तब न वहां अलकायदा था, न आतंकवाद, न ओसामा, न अमेरिका। भारत ने तो कभी कश्मीर में भी ऐसा नहीं किया। बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान से कब्जा छोड़ने की मांग वैसे ही कर रहे हैं, जैसे हिन्दुस्तान अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग कर रहा था।

अगर हम पाकिस्तान की तरफ से एक बार यह सोचें भी की बलूचिस्तान उनका अटूट हिस्सा है तो सवाल यह है की अपने ही नागरिकों पर हवाई हमलों और लगातार फौजी कार्रवाई के लिए पाकिस्तानी हुक्मरानों को किसने मजबूर किया था? क्या कोई देश अपने ही नागरिकों पर इस तरह की कार्रवाई करता है? और याद कीजिए 1970 को – पाकिस्तान ने ही अपने देश के एक टुकड़े पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में सिर्फ छह महीनों के दौरान सीधी फौजी कार्रवाई करते हुए तीन लाख से ज्यादा लोगों को मार डाला था। यह आंकड़ा खुद पाकिस्तान के अपने जांच आधिकारी हामिद उर रहमान की रिपोर्ट में दिया गया है। तब भी दुनिया भर के चौधरी चुप्पी साधे थे– सिवाए भारत के।

जब मनमोहन सिंह ने ब्लूचिस्तान पर बात की, तो उनके रवैये पर कांग्रेस पार्टी में छाती पीट पीट कर विलाप किया जा रहा है। हाय! मनमोहन! तुमने ये क्या कर दिया? बलूचिस्तान का उल्लेख क्यूं होने दिया?

हैरत की बात यह है की कश्मीर में आतंकवाद को पाकिस्तान खुले–आम कश्मीरियों की आजादी की जंग बताता है और नैतिक समर्थन देता है। वह कश्मीर जो कल्हड़ की 'राजतरंगिणी' की भूमि है, वह कश्मीर जो 1947 तक हिन्दू राजा की सियासत था, वह कश्मीर जो 1947 से ही हमारे साथ विलय कर चुका था, अगर वह हिन्दुस्तान का नहीं है तो बलूचिस्तान पाकिस्तान का कैसे है? एक स्वतंत्र देश पर कब्जा कितना जायज है? उसका विलय तो कभी पाकिस्तान में हुआ ही नहीं। पाकिस्तान के कब्जे का यह देश क्षेत्रफल में पाकिस्तान के सभी राज्यों से बड़ा है, सबसे अमीर भी है। वहां के लोग 62 साल से अपनी आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं।

हमें बलूचिस्तान की आजादी के आंदोलन को खुला समर्थन क्यों नहीं देना चाहिए? कश्मीर के मसले पर पाक को इससे अच्छा उत्तर नहीं दिया जा सकता। भले ही मनमोहन सिंह या हमारे अफसरों से अनजाने में ही बलूचिस्तान का उल्लेख हुआ हो, लेकिन वास्तव में हमारे हाथ में अब एक ऐसा हथियार है, जिसे हमें पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए इस्तेमाल करना ही होगा। पाकिस्तान की अखंडता अगर पाकिस्तान को प्यारी हो सकती है तो भारत को क्यों नहीं? अगर हिन्दुस्तान के लोग एक बार पाकिस्तान की अखंडता को स्वीकार कर भी लें, तो यह देखना होगा कि उससे पहले हमें हमारी अखंडता प्रिय है। हमारी अंखडता की कीमत पर यदि पाकिस्तान बिखरता है तो किसी को इस पर ऐतराज क्यों होना चाहिए।

एक और उदाहरण सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान और उनके खुदाई खिदमतगार भारत से अलग होना ही नहीं चाहते थें। उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार ही नहीं दिया गया। अलग होने की सूरत में वे अपना देश चाहते थे। जाने-माने पत्रकार स्व. राजेन्द्र माथुर ने करीब 50 साल पहले यह सवाल उठाया था कि पख्तून सूबे का जबरन विलय पाकिस्तान में अंतिम क्यों है और कश्मीर का भारत में विलय अंतिम क्यों नहीं हैं।

लब्बोलुआब यह कि भारत को मौजूदा हालात में अपनी विदेश नीति और पाकिस्तान नीति में बदलाव करना ही होगी। बलूचिस्तान की आजादी के लिए खुलकर सामने आना ही होगा। कमजोरी छोड़नी होगी और विलाप को विजय में बदलने का प्रयास करना होगा। दुनिया में कमजोर कभी नहीं जीतते। अब तक की नीति का अनुभव यही है कि भारत ने खोया ही खोया है, पाया कुछ नहीं है। 1947-48 में एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तान ने छीन लिया। हम वापस नहीं ले पाए। 1962 में चीन ने हजारों किलोमीटर जमीन छीन ली। हम वापस नहीं ले पाए। 1965 में कच्छ की जमीन पाकिस्तान ने हड़प ली। और तो और 65 और 71 में हमने जीती हुई जमीन भी वापस कर दी।

चीन ने 1959 में तिब्बत हड़पा। दुनिया जानती है कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक नजरिए से तिबब्बत पर हमारी दावेदारी बनती थी। हम वह भी नहीं कर पाए। पाकिस्तान ने हमारे कश्मीर का एक हिस्सा चीन को तोहफे के तौर पर दे दिया। हम देखते रहे। तो अब बलूचिस्तान प्रसंग पर हम रक्षात्मक क्यों है?

दुनिया के नक्शे पर भारत की आवाज अब सुनी जाती है। बलूचिस्तान की आजादी हमारी पाक नीति का अस्त्र होना चाहिए। जानबूझकर साहस हम शायद न दिखाते, लेकिन अनजाने में कुदरत ने बलूचिस्तान का ब्रह्मास्त्र भारत को दे दिया है।

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