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अरनब की बेबाकी और पत्रकारीय निष्ठा ने उन्हें एक ब्रैेंड बनाया: अनुरंजन झा

अनुरंजन झा वरिष्ठ पत्रकार ।। अरनब गोस्वामी, बस नाम ही काफी है। यही कहा जा सकता है और यही कहा भी जाना चाहिए इस शख्स के बारे में। अंग्रेजी न्यूज चैनल को हिंदी भाषी समाज के दिल में जगह दिला देना न तो कोई इत्तेफाक

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

अनुरंजन झा

वरिष्ठ पत्रकार ।।

अरनब गोस्वामी, बस नाम ही काफी है। यही कहा जा सकता है और यही कहा भी जाना चाहिए इस शख्स के बारे में। अंग्रेजी न्यूज चैनल को हिंदी भाषी समाज के दिल में जगह दिला देना न तो कोई इत्तेफाक है और ना ही कोई हंसी ठट्ठा का खेल। किसी पत्रकार के लिए टाइम्स नाउ चैनल का पर्याय बन जाना भी आसान नहीं रहा होगा। जब अरनब के इस्तीफे की खबर आई तो मैं जायजा लेने के लिए सोशल मीडिया पर गया। फेसबुक पर हर दूसरी पोस्ट अरनब से जुड़ी हुई थी और रात को नौ बजे जब अरनब का ‘द न्यूजआर’ शुरू हुआ तो हैशटैग #ArnabGoswami ट्विटर पर सबसे ऊपर ट्रेंड कर रहा था। जिस शो की लगभग हर बड़ी खबर ट्विटर पर ट्रेंड करती हो उस शो के होस्ट का इस्तीफा नहीं ट्रेंड करता तो खबर हो सकती थी। फिर भी जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया पर जिस तरीके से प्रतिक्रयाएं आई इस पर इतना ही कहा जा सकता है कि Either you hate Aranb or Love Arnab, you can’t ignore Arnab.

अरनब की लोकप्रियता के आलम का परिणाम है कि बीबीसी जैसी संस्था अरनब पर एक रिपोर्ट लिखती है। हालांकि वो हंसी उड़ाते हुए रिपोर्ट लिखती है लेकिन जिन वक्तव्यों को आधार बना कर रिपोर्ट लिखी गई उसमें से कोई भी ऐसा वक्तव्य नहीं है जिसका जिक्र होना चाहिए। तमाम फर्जी ट्विटर अकाउंट से ट्वीट किए गए बातों के आधार पर खबर लिखना निहायत ही बचकाना है। लगातार गिर रही अपनी साख पर इस खबर से बीबीसी ने बट्टा ही लगाया है, जो सिमी के आतंकवादियों को तथाकथित कार्यकर्ता कहता हो उस संस्था से हम यही उम्मीद कर सकते हैं।

जब साल 2006 में टाइम्स ग्रुप ने टाइम्स नाऊ की शुरुआत की और अरनब एनडीटीवी छोड़ कर यहां आए तो लोगों में न तो इतना उत्साह था और न हीं ऐसी उम्मीद कि यह चैनल और यह पत्रकार देश का सबसे मशहूर और लोकप्रिय चेहरा बन जाएगा। इसके एक साल पहले 2005 में ही एनडीटीवी छोड़ कर राजदीप ने सीएनएन का दामन थामा था और मालिकाना हक के साथ वेंचर शुरू किया था। एनडीटीवी में रहते हुए राजदीप अरनब से काफी आगे थे। समय के साथ राजदीप पीछे छूटते गए, वजह रही अरनब की बेबाकी और निस्संदेह पत्रकारीय निष्ठा। इधर अरनब को टाइम्स ग्रुप ने खुली छूट दी और वो कमाल करते गए।

कई मौकों पर हम अरनब से भी सहमत नहीं हो पाते हैं और इसकी छूट इस लोकतंत्र में होनी चाहिए लेकिन इसका कतई मतलब नहीं कि बिना वजह शिकायत की जाए। अरनब की बेबाकी ने ही उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाया है। हमने अकसर देखा कि जिस शो में किसी गेस्ट की लगभग बेइज्जती जैसी खिंचाई होती हो और वो मेहमान बनकर फिर दोबारा उस कार्यक्रम में आने को लालायित रहता हो तो जाहिर सी बात है कि उस शो की लोकप्रियता चरम पर है। जितने जोक्स अरनब पर बने होंगे शायद उससे ज्यादा सिर्फ संता-बंता पर ही हों। डिजिटल माध्यम में अलग अलग तरह से जितनी खिंचाई अरनब की हुई होगी शायद उतना किसी हिट मूवी का ट्रेलर नहीं देखा जाता हो। मतलब साफ है कि अरनब मौजूदा टेलिविजन न्यूज के दौर में एक किवदंती बन गए।

हमने ऐसे ऐसे लोगों को अरनब का शो देखते हुए देखा है जिसका अंग्रेजी का ज्ञान यस और नो तक ही सीमित होगा लेकिन पैनल में मौजूद लोगों की भाव-भंगिमाएं देखकर वो इतना अंदाजा लगा लेते थे कि अरनब किसकी खिंचाई कर रहे हैं। इधर कुछ समय से अरनब पर तरह तरह के आरोप लगाए जाने लगे। अपने दो दशक के अनुभव में हमने देखा है कि जो जीवन में कुछ नहीं कर पाते उनको अक्सर दूसरा व्यक्ति दलाल नजर आता है। खुद को मिला बार-बार का मौका गंवाने वाला समुदाय अरनब के पीछे पड़ गया। एक वक्त था जब कई बड़े पत्रकारों की गाड़ियां सीधे 10 जनपथ बिना रोकटोक जाती थी, लेकिन जब अरनब ने प्रधानमंत्री मोदी का पहला टीवी इंटरव्यू कर डाला तो कई के मुंह लाल हो गए। फिर नुक्ताचीनी शुरू हुई, ये सवाल नहीं पूछा वो सवाल नहीं पूछा वगैरह वगैरह। तब भी हमने लिखा था जो सवाल अरनब से नहीं पूछा गया वो सवाल, सवाल खड़ा करने वालों को पूछ लेना चाहिए।

इधर कुछ समय से कुछ ऐसी घटनाएं घटी जो अरनब के लिए चिंता का विषय थीं। कुछ तो वजह रही होगी कि चैनल का पर्याय बने चुके अरनब को जाना पड़ा। निस्संदेह इस प्रतिभावान पत्रकार को चिंता नहीं होगी लेकिन इसका आंकलन भी जरूरी है। क्या ऐसा हो सकता है कि सरकार की अच्छी नीतियों को तारीफ करने का भी खामियाजा अरनब को भुगतना पड़ा? ऐसे ही आरोप तो उनपर इन दिनों लग रहे थे। उन्हें सत्ता का साथी कहा गया। पत्रकारिता में एक धड़ा ऐसा है जो हमेशा सत्ता के खिलाफ बोलना चाहता है और साथ ही उसकी चाशनी में डूबना भी चाहता है। मेरी नजर में अरनब ने इससे परहेज किया, जब सही लगा साथ दिया और जब गलत लगा विरोध किया, और यही वजह रही कि अरनब की लोकप्रियता बढ़ती गई।

दर्शक टाइम्स नाऊ को अरनब का चैनल समझने लगे। पिछले दिनों की दो घटनाएं आप लोगों को याद दिलाता हूं, तीन तलाक के मामले पर एक गेस्ट को स्टूडियो से बाहर करना और एक दिन जेडीयू के प्रवक्ता पवन वर्मा का बार बार यह कहना कि यह टाइम्स का चैनल नहीं अरनब का चैनल है। कुल मिलाकर अरनब का कद इतना बड़ा हो गया कि शायद...।

आज सुबह जब हमारी फोन पर बात हुई तो बातचीत में बिल्कुल बिंदास थे अरनब कहा कि सब अच्छा होगा जाहिर है कुछ न कुछ सोच रखा होगा। उनके दोस्तों के अनुसार अरनब की चाहत है कि इस देश में मीडिया को मिले आजादी। कन्हैया वाली नहीं... देश की जरुरत वाली। अंत में दोस्त मनीष झा का ट्वीट शेयर करता हूं - Times Now will become Times Never, Without Arnab.

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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