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'संपादक-पत्रकार के बीच हुआ सौदा: खाना तुम्हारा-गिफ्ट हमारा'

‘वैसे एक संपादक-प्रकाशक हैं जो कि अंग्रेजी की पत्रिका निकालते हैं। वे इस सिद्धांत को मानने वालों में से हैं कि किसी भाषा का संपादक होने के लिए उसका ज्ञान जरुरी नहीं है। उन्होंने अपने यहां कुछ रिपोर्टर भी रखे हैं। जब कोई प्रेस कांफ्रेंस होती है तो वे इन लोगों को इस शर्त पर उसमें हिस्सा लेने के लिए भेजते हैं कि खाना तु

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

‘वैसे एक संपादक-प्रकाशक हैं जो कि अंग्रेजी की पत्रिका निकालते हैं। वे इस सिद्धांत को मानने वालों में से हैं कि किसी भाषा का संपादक होने के लिए उसका ज्ञान जरुरी नहीं है। उन्होंने अपने यहां कुछ रिपोर्टर भी रखे हैं। जब कोई प्रेस कांफ्रेंस होती है तो वे इन लोगों को इस शर्त पर उसमें हिस्सा लेने के लिए भेजते हैं कि खाना तुम्हारा व गिफ्ट हमारी।’ हिंदी दैनिक अखबार नया इंडिया में छपे अपने आलेख के जरिए ये कहा वरिष्ठ पत्रकार विवेक सक्सेना ने। उनका पूरा आलेख आप यहां पढ़ सकते हैं:

सेवक से मालिक लेगा रिश्वत!

हमारे बाबाजी न्यायपालिका से जुड़े हुए थे। उन्होंने अंग्रेजों के समय में नौकरी की थी। वे बताते थे कि जब देश आजाद नहीं हुआ था तब होली, दीवाली, ईद सरीखे अवसरों पर अंग्रेज हुक्मरानों के यहां ‘डाली’ आती थी। डाली एक बहुत बड़ी टोकरी होती थी, जिसमें फल, फूल, मिष्ठान आदि होते थे। उन लोगों को न्यायिक सेवा में आने पर चीफ जस्टिस ने हिदायत दी थी कि कभी भी किसी की डाली आने पर उसे अपने पास मत रखना। उसमें से बस एक फल लेना व बाकी लाने वाले को यह कहते हुए वापस कर देना कि हमने तुम्हारी खुशी को ध्यान में रखते हुए इसे स्वीकार कर लिया है। बाकी अपने परिवार या दूसरे लोगों में बांट देना।

उन दिनों अपने अधीनस्थ लोगों से कुछ लेना या पाने की कल्पना करना ही बहुत अपमानजनक बात मानी जाती थी। आजादी के बाद इस देश में जो परिवर्तन आए वे चौंकाने वाले हैं। आज मालिक अपने सेवकों से ले रहा है। जो मालिक होली, दीवाली पर अपने कर्मचारियों को बोनस व उपहार देकर उन्हें अपनी खुशी में शामिल करता था, आज वह यह चाहता है कि अगर सेवक उसे कुछ दे तो वह उसकी खुशी के बारे में विचार करें। कम से कम रेलवे कांड में जिस तरह से पूर्व रेलमंत्री पवन बंसल की भूमिका उजागर हुई उसे देखकर तो यही लगता है। वे अपने अधीनस्थ अधिकारियों को उनकी मनचाही पोस्टिंग देने के लिए बड़ी मोटी रकम ले रहे थे। महेश कुमार को यही रकम अदा करने के चक्कर में गिरफ्तार किया गया।

वैसे इसे महज संयोग ही कहा जाएगा कि कांग्रेस के शासनकाल में इस तरह की घटनाएं काफी देखने को मिली। बाकी दल और उनकी सरकारें भी दूध की धूली नहीं है। पीवी नरसिंहराव की सरकार में सुखराम संचार मंत्री हुआ करते थे। उन दिनों टेलीफोन कनेक्शन की बहुत मांग रहती थी। एक बार हम कुछ पत्रकार उनके पास बैठे थे। तभी वहां एक महिला आई। उसने उनके सामने एक प्रार्थनापत्र रखकर आदर भरी आंखों से कहा कि सर, मेरे पति आपके ही महकमे में काम करते थे। उनकी अचानक मृत्यु हो गई। मुझे अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल गई है। मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। मैं चाहती हूं कि आप मुझे बिना बारी के सरकारी मकान आवंटित करवा दे। आपकी बड़ी कृपा होगी।

सुखराम ने उसकी अरजी खोली और कहा कि देखेंगे। उसके कमरे से बाहर जाते ही उसे फाड़कर रद्दी की टोकरी में यह कहते हुए डाल दिया कि यहां सब फुकरे ही चले आते हैं। अभी आवास मंत्री शीला कौल के पास जाती तो इस काम के 30 हजार रुपए देने पड़ जाते।

ये वे सुखराम थे जिनके घर से डेढ़ करोड़ रुपए की नकद राशि पकड़ी गई थी। उन्हें आय से अधिक संपत्ति व रिश्वत लेने के मामले में पकड़ा गया। बाद में उन्हें जेल की सजा सुनाई गई। वे इन दिनों जमानत पर हैं। उन्हें भी यही लगता है कि अपने अधीनस्थ कर्मचारी को मुफ्त में कोई लाभ क्यों पहुंचाया जाए?

शीला कौल ने तो अपने ही कर्मचारियों से रिश्वत लेने के सारे रिकार्ड तोड़ दिए थे। उनके समय में सरकारी कर्मचारियों को सरकारी आवास आवंटित करने में जमकर भ्रष्टाचार हुआ। हजारों लोगों से कमरे के आधार पर रिश्वत लेकर मकान आवंटित किए गए। उनके निजी सचिव राजन लाला की इसमें बहुत बड़ी भूमिका रही। प्रति कमरा 10 हजार रुपए की रिश्वत देनी पड़ती थी। रिश्वत पहुंच जाने पर मंत्री, बिना बारी वाले मकानों की सूची पर दस्तखत कर देती थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इस मामले में शीला कौल पर मुकदमा चला। हालांकि उन्हें जेल भेजा जाना अभी बाकी है।

वे संभवतः पहली ऐसी मंत्री बनीं जो कि बहुत बड़े खानदान से थी। इंदिरा गांधी की सगी मामी थी लेकिन उन्हें अपने ही लोगों से रिश्वत लेने में कोई गुरेज नहीं था। उनके स्टाफ के लोग बताते थे कि वे अपने स्टाफ तक के लोगों पर बेहद शक करती थी। मंत्रालय जाते समय फ्रिज खोलकर उसमें रखी मिठाई और मीट के टुकड़े गिन कर जाती थी। वापस लौटने पर उनकी वापिस गिनती करती थी कि कहीं उनके पीछे किसी ने एकाध टुकड़ा चुपके से खा तो नहीं लिया।

फिर किसी ने बताया कि एक पुलिस अधिकारी है जो कि अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अच्छे काम के लिए पुरस्कृत करने के एवज में पैसा लेता है। वे चाहते हैं कि घर पर होने वाले विभिन्न खर्च कर्मचारी ही वहन करें। कभी रुफ आफजा की बोतलें मंगवाते हैं तो कभी समोसे लाने को कहते हैं। जब एक दिन उनके यहां काम करने वाले पुलिसकर्मी ने धीमे स्वरों में उनसे पैसे मांगे तो उन्होंने बिफरते हुए कहा कि चल हिसाब दें। तुझे कई बार हजार-हजार रुपए का इनाम दिलवा चुका हूं। बता कितने का सामान लाया है।

अनेक सरकारी दफ्तरों में भी अफसरों के चाय-पानी का खर्च उनके अधीनस्थ इंस्पेक्टरों को उठाना पड़ता है। कस्टम विभाग में तो यह सच सबको पता है कि हवाई अड्डे पर तैनात कर्मचारियों को अपने अफसरों के यहां होने वाली शादी ब्याह के खर्च उठाने पड़ते हैं।

देश के एक बहुत बड़े प्रकाशन घराने के ड्राइवर ने किस्सा सुनाया। उस घराने की बुजुर्ग मालकिन भी दफ्तर आती थी। एक बार वह उनके बेटे की ससुराल गया। वहां उसकी सास ने उसकी खातिरदारी की। उन्हें पता था कि वह घर का सबसे पुराना ड्राइवर है। उन्हें अपनी समधिन को लेकर भी कुछ शंकाए थीं। उन्होंने उससे पूछा कि बेटा यह बताओं कि क्या यह बात सही है कि समधिनजी दफ्तर में कूड़ा बीनती हैं? असलियत यह थी कि मालकिन ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी। उनकी रुचि प्रकाशन हाउस की रद्दी, कतरन, पुराने कलपुरर्जों, मशीन साफ करने में इस्तेमाल करने के बाद बेकार हो चुकी धोतियों में ज्यादा होती थी। उन्हें पता था कि कतरन सबसे ज्यादा मंहगी बिकती है। इसलिए वे दफ्तर पहुंच कर सीधे प्रेस में जातीं और ये चीजें छांटकर अलग करवाती थी। फिर उन्हें अलग-अलग दामों पर बेचा जाता।

ड्राइवर ने उनकी जिज्ञासा शांत कर दी। चलते समय उसको शगुन के रुप में 21 रुपए भी मिले। जब वह दफ्तर वापस लौटा तो मालकिन ने उससे पूछा कि वहां क्या हुआ था। उसने गोलमोल बातें बताईं। फिर उन्होंने पूछा कि तुम्हें खाने में क्या खिलाया गया। उसने सब कुछ सच सच बता दिया। उन्होंने फिर पूछा कि क्या चलते समय समधिन ने कुछ दिया था? उसने जैसे ही हां कहा, वे बोली लिफाफा इधर ला। वह तो हमारे हिस्से का है। तूने खा पी लिया इतना ही काफी है। हमारे यहां नौकरी न कर रहा होता तो लिफाफा कैसे मिलता। सच माने कि उन्होंने उससे वह लिफाफा लेकर ही दम लिया।

वैसे एक संपादक-प्रकाशक हैं जो कि अंग्रेजी की पत्रिका निकालते हैं। वे इस सिद्धांत को मानने वालों में से हैं कि किसी भाषा का संपादक होने के लिए उसका ज्ञान जरुरी नहीं है। उन्होंने अपने यहां कुछ रिपोर्टर भी रखे हैं। जब कोई प्रेस कांफ्रेंस होती है तो वे इन लोगों को इस शर्त पर उसमें हिस्सा लेने के लिए भेजते हैं कि खाना तुम्हारा व गिफ्ट हमारा। अक्सर वे दूसरे संवाददाताओं से इस भी बात की पुष्टि कर लेते हैं कि प्रेस कांफ्रेंस में क्या उपहार मिला था? कही उसका रिपोर्टर तो झूठ नहीं बोल रहा!

(ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)

(साभार: नया इंडिया)

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