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महिला पत्रकार जयंती की कहानी: पेंच फंस गया प्यार में!
महिला पत्रकार जयंती की कहानी: पेंच फंस गया प्यार में!
जयंती रंगनाथन
वरिष्ठ पत्रकार
कोचिंग क्लास में अवस्थी का पहला दिन था। पढऩे का नहीं, पढ़ाने का। उससे कहा गया था कि वह जीन्स-टीशर्ट में ना आए। पूरी बांह की शर्ट में वह अजीब महसूस कर रहा था। क्लास में अंदर जाने से पहले उसने लंबी सांस ली। पहली नौकरी,वो भी पढ़ाने की। प्रभु, लाज रख लेना।
क्लास के अंदर शोर सा मचा
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
जयंती रंगनाथन
वरिष्ठ पत्रकार
कोचिंग क्लास में अवस्थी का पहला दिन था। पढऩे का नहीं, पढ़ाने का। उससे कहा गया था कि वह जीन्स-टीशर्ट में ना आए। पूरी बांह की शर्ट में वह अजीब महसूस कर रहा था। क्लास में अंदर जाने से पहले उसने लंबी सांस ली। पहली नौकरी,वो भी पढ़ाने की। प्रभु, लाज रख लेना।
क्लास के अंदर शोर सा मचा था। सिविल सर्विस की कोचिंग क्लास में अस्सी प्रतिशत लडक़े थे,बाकि लड़कियां। अवस्थी ने अपना बैग संभाला और क्लास के अंदर चला गया।
अगर वह बोर्ड के सामने ना खड़ा हो कर क्लास में बैठ जाता,तब भी कोई यह जान नहीं पाता कि वह मास्टर है। दो साल पहले उसने इंजीनियरिंग का कोर्स किया था। एक नौकरी मिली थी जरूर,मुंबई में,पर अम्मां ने भेजने से मना कर दिया। इसके बाद खूब रगड़ाई हुई। एक दुकान में काम किया,यूरेका फ्रोब्स के फिल्टर बेचे,ट्यूशन पढ़ाई। अम्मा कहती थीं कि वो जो भी करे,यहीं करे। घर से दूर ना जाए।
‘माय सेल्फ अरुण अवस्थी,आपका नया टीचर।’अवस्थी ने कोशिश की रौबदार आवाज में बोलने की। पर उसे पता था कि वह ऐसा नहीं कर पाएगा। उसकी आवाज में रौब वाली बात है ही नहीं। पर कुछ तो असर हुआ सब पर। क्लास में धीरे-धीरे आवाजें कम होती चली गईं। अवस्थी ने आंखों-आंखों में तौला, सामने की कुर्सियों पर बैठे लडक़े कुछ गंभीर से लग रहे थे। पीछे एक ही बैंच पर बैठने वालों का नंबर ज्यादा था। कोने की बैंच पर पांच लड़कियां सट कर बैठी थी। अचानक उसकी नजर सामने लडक़ों के साथ बैठी एक लडक़ी पर पड़ी। लडक़ी उसकी तरफ देख भी नहीं रही थी।आंखें किताब पर।हाथों में पेन। खुले कंधे तक घुंघराले बाल।
अवस्थी ने धीरे से बोलना शुरू किया। ब्लैक बोर्ड पर कुछेक सवाल हल भी किए। इस दौरान उसने पाया कि उस लडक़ी ने आंख उठा कर उसकी तरफ एक बार भी नहीं देखा।
क्लास खत्म होते ही लडक़ों ने उसे घेर लिया। ढेर सारे सवाल थे सबके पास। लेकिन अवस्थी की आंखें उस लडक़ी का पीछा कर रही थीं, जो अपनी पीठ पर बैग लटकाए फौरन दरवाजे से बाहर निकल गई।
दो दिन में पता चला गया। लडक़ी का नाम था- निहारिका सिन्हा। मां समाज सेवी हैं,पिता सरकारी नौकरी में। निहा कुछ अलग है अपनी उम्र की लड़कियों से। पटना वूमेन कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही थी। खाली समय में पेंटिंग करती,मां के साथ झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों को पढ़ाने का काम करती। निहा की अपने साथ कोचिंग में पढऩे वाली लड़कियों से नहीं पटती। वह उनकी तरह हर समय गॉसिप में उलझी नहीं रह सकती। वैसे तो क्लास के लडक़ों से भी वह दूर रहती है।पर एक-दो हैं,जिनसे वह नोट्स एक्सचेंज कर लेती है।
निहारिका को इन दिनों क्लास में दिक्कत होने लगी है। ये जो नए सर हैं, वह हर वक्त उसकी तरफ देख कर बात करते हैं। जैसे पूरी क्लास को नहीं, सिर्फ उसे पढ़ा रहे हों। पूरे डेढ़ घंटे निहा सिर झुका कर रखती है। गलती से सिर उठाया, तो नजरें वहीं। बाबा रे। किससे शिकायत करे?
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तीन दिन वह कोचिंग क्लास नहीं गई। कनाडा से बुआ आई थीं। चौथे दिन अपने आपको ठेल कर क्लास तक ले आई, हालांकि उसे पता था कि घर में सब फिल्म देखने और बाहर खाने का प्रोग्राम बना रहे हैं। क्लास में किसी ने उसे टोका भी नहीं कि तीन दिन वह कहां रह गई थी? हमेशा की तरह अवस्थी ने क्लास में एंट्री लेते ही उसकी तरफ देखा,आंखों में कुछ अजीब से भाव आए,कहां थी इतने दिन? मैं परेशान था,डर गया था तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया?
निहा ने बेपरवाही से नजरें नीची कर लीं। क्लास के बाद बाहर निकल कर वह अपनी स्कूटी की तरफ जरा बढ़ी ही थी कि सामने से अवस्थी सर आ गए। उन्होंने जल्दी से कहा, ‘मिस निहारिका, आप क्लास में नहीं आईं...सब ठीक है?’
निहारिका ने आंख उठा कर सर की तरफ देखा,वह जवाब देना चाहती थी कि इससे आपको क्या मतलब,पर उसने धीरे से अपने को यह कहते पाया,‘सर,फैमिली फंक्शन था...।’कहकर वो दो मिनट जैसे जाने की इजाजत लेकर खड़ी रही। अवस्थी ने सिर हिलाया। निहा अपना स्कूटी स्टार्ट करके चली गई।
बात सिर्फ इतनी सी थी। निहा चाहे तो इसे बढऩे देती,प्रेम कहानी बना देती।पर उसका ऐसा कोई इरादा नहीं था। घर आ कर देर तक सोचती रही कि अवस्थी सर की आवाज कांप रही थी या उसे ऐसा लग रहा था? उसे उनका इस तरह से पूछना बुरा क्यों नहीं लगा?पर यह बात भी तय था कि उसकी मंजिल कहीं और थी।
अगले दिन पूरे परिवार का बोधगया जाने का कार्यक्रम बना। निहा अपनी बुआ की मुंहलगी तो थी ही। रास्ते में बुआ ने उसे कनाडा आने के लिए मना लिया,‘सुन री चेली,कितने सालों से तुझसे कह रही हूं। चल मेरे साथ टोरंटो। इतना बड़ा बिजनेस है। मिल कर संभालेगे।’ फिर वे उसे बिजनेस के बारे में बताने लगीं। टोरंटो में बुआ के घर निहा कई बार जा चुकी थी।आलीशान कोठी। घर के अंदर स्वीमिंग पूल। साफ-सुथरा,खूबसूरत शहर।वैसे तो बुआ पहले भी कई उसके सामने आकर्षक चुग्गा डाल चुकी थीं,पर इस बार उसने फौरन हां कह दिया।
बोधगया से लौटते ही उसने अपना बोरिया-बिस्तर बांध लिया। कनाडा जाने की सुध में वह भूल गई कि कोचिंग क्लास में बता कर जाना है। दस दिन बाद वह कनाडा में थी...बुआ के घर के लॉन में बैठ कर गर्म चाय की चुस्कियां ले रही थी। बुआ ने नाश्ते के लिए सैंडविच और कटलेट बनाया था। बस खा कर दोनों ऑफिस के लिए निकलने वाली थीं।
ऑफिस में काम के बाद निहा लैपटॉप खोल कर फेसबुक देखने लगी। फ्रेंड रिक्वेस्ट में कई दिनों से एक नाम सबसे ऊपर आ रहा था—अरुण अवस्थी।याद आया, ये तो उसके कोचिंग क्लास के सर थे। उसने दोस्ती स्वीकार कर ली। कनाडा में इस समय दिन के दो बज रहे थे, यानी हिंदुस्तान में रात के एक बज रहे होंगे। अचानक स्क्रीन पर पॉप अप आया,अवस्थी ने पहले दोस्ती के लिए उसे थैंक्यू कहा और फिर सवालों की झड़ी लगा दी—कहां चली गई? क्लास आधे में छोड़ कर? कब वापस आओगी?
अगला सवाल पढ़ कर निहा थोड़ी ठिठक गई...क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आती?
याद? क्या याद आने जैसा कोई रिश्ता था?
निहा ने बहुत संक्षिप्त सा जवाब दिया—सर, मैं कनाडा में हूं। यहां बुआ के साथ काम कर रही हूं। अभी वापस आने का तो कोई इरादा नहीं है। सॉरी, मैं आपको सूचित नहीं कर पाई।
उसने लैपटॉप बंद कर दिया। अब मोबाइल पर मैसेंजर में संदेश आने लगे—निहारिका, मैं तुमसे पहले ही कह देना चाहता था...तुमने कभी मौका नहीं दिया। मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं। तुम चौंको मत। तुम मेरा पहला प्यार हो। मैं अपनी जिंदगी तुम्हारे बिना बिताने की सोच भी नहीं सकता।
निहा का चेहरा लाल हो गया। कोई बंदा ऐसे कैसे उसे आई लव यू कह सकता है?उसने तो अपनी तरफ से कभी ऐसा कोई संकेत नहीं दिया?हां, यह सही है कि अवस्थी सर की नजरों में उसे अपनापन लगता था,इसलिए डरती थी वो। पर ऐसे,बिना दोस्ती किए प्यार? शायद पटना में रहती,तो दोस्ती भी हो जाती अवस्थी सर से। माना कि वे दूसरे लडक़ों से अलग थे,एक अजीब सा आकर्षण था उनमें...पर वो मंजिल तो नहीं हो सकते ना।
रात तक उसके पास अवस्थी के ढेरों संदेश आ चुके थे। निहा परेशान हो गई। क्या जवाब दे इन संदेशों का?वही किया,जो उसे सबसे आसान लगा। उसने फेसबुक में अवस्थी को ब्लॉक कर दिया।
ना संदेश आएंगे,ना वह परेशान होगी। कई महीने बीत गए। निहा कनाडा में पूरी तरह रम गई। दरअसल, उसकी जिंदगी में कोई आ गया गया था। कनाडा का रैप सिंगर ओलिवर, दोनों की मुलाकात नाइट क्लब में हुई। दोनों में दोस्ती हो गई। बुआ को भी ओलिवर भा गया। शनिवार को अकसर वो घर आ जाता। गाने-वाने की महफिल जमती। ओलिवर को देख बुआ को भी जोश आ गया था। वह भी अपने जमाने के हिट गाने गाने लगतीं-- निगाहें मिलाने को जी चाहता है, रसिक बलमा, रुला के गया सपना मेरा, अजीब दास्तां है ये ...
ओलिवर अच्छा दोस्त था,उसे खूब हंसाता। निहा ने पाया कि वह उसे दोस्त से आगे भी देखने लगी है। उसके दिल के तार बजने लगे ओलिवर के गानों के साथ। ओलिवर ने भी अपने को बहने दिया। दोनों खुश रहते थे एक-दूसरे के साथ।तय था कि निहा ओलिवर से शादी करेगी। पर पटना में पापा-मम्मी से रजामंदी कौन ले? बुआ ने कहा कि वह भैया से बात करेगी।
वैसे भी निहा को कनाडा आए डेढ़-दो साल हो चले थे। बुआ ने कहा कि वे सब इंडिया चलते हैं। वहीं बात कर लेंगे। निहा को अजीब सा डर लग रहा था। उसे पता था कि पापा ओलिवर से उसकी शादी के लिए कभी हां नहीं कहेंगे। वे लोग रात की फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। तय हुआ कि एयर पोर्ट के पास किसी होटल में रात बिताएंगे और सुबह पटना के लिए निकलेंगे। बुआ और निहा एक कमरे में, ओलिवर दूसरे कमरे में। सुबह निहा और बुआ ओलिवर के कमरे का दरवाजा खटखटाते रहे, वह उठा नहीं। मैनेजर को बुला कर कमरा खुलवाया। पर वह तो कमरे में था ही नहीं, ना ही कोई नोट छोड़ कर गया था।
सीसीटीवी फुटेज में वह रात दो बजे कमरे से निकल कर होटल के बाहर जाता दिख रहा था। निहा की समझ नहीं आ रहा था कि यह सब उसके ही साथ हो रहा है। बुआ ही दौड़-भाग कर रही थीं। पुलिस आई, निहा को याद नहीं कि उसने पूछताछ में क्या बताया। शाम होते-होते पापा और मम्मी भी आ गए।
ओलिवर को कुछ पता नहीं चला।दो दिन दिल्ली रह कर सब पटना लौट आए। निहा का रो-रो कर बुरा हाल था। पापा उसे नाराज थे, बोल ही नहीं रहे थे। मम्मी ने जरूर उसे ढांढस बंधाने की कोशिश की,पर वे बुआ से गुस्सा थीं कि उन्होंने ओलिवर और निहा के रिश्ते वाली बात उनसे क्यों छिपाई?
निहा की हंसती-खेलती जिंदगी में अचानक फुल स्टॉप लग गया। पटना में अपने कमरे से वह बहुत कम बाहर निकलती थी। उसे बुखार रहने लगा।चेहरे से रौनक तो कब की गायब हो चुकी थी। कुछ दिन उसके साथ रह कर बुआ कनाडा लौट गईं। मां उसे समझातीं,‘जो हो गया,उसे जाने दे। तुमने तो कुछ गलत नहीं किया ना? फिर इतना दिल पर क्यों ले लिया?’
निहा की आवाज बहुत धीमी थी,जैसे किसी खोह से आ रही हो,‘मम्मा, ओलिवर इस तरह कैसे गायब हो सकता है? पता नहीं उसके साथ क्या हुआ है? किस हाल में होगा वो...’
फिर एक दिन निहा के मोबाइल पर एक फोन आया। निहा ने नहीं, मम्मी ने उठाया और कुछ चीख सी पड़ीं वो,‘निहा, ओलिवर का फोन आया है...’
निहा को यकीं नहीं हुआ। लड़खड़ाते कदमों से उठी,ओलिवर ही था। पर उसकी आवाज, ढंग कुछ बदला हुआ था। उस रात अपने गायब होने की अजीब सी दलील दे रहा था,‘मैं डर गया था, शादी को लेकर। तुम मेरी बहुत अच्छी दोस्त हो निहारिका। जब हमने शादी की बात की,तो मैं तैयार तो हो गया,पर तब भी कम्फर्टेबल नहीं था। इंडिया पहुंचने के बाद से मैं बहुत नर्वस महसूस करने लगा। मैं कमिटमेंट के लिए तैयार नहीं था। मैं मुंबई में अपने फ्रेंड के पास चला गया। मेरा वीजा आज खत्म हो रहा है। मैं कनाडा लौट रहा हूं। तुम कैसी हो?आयम सॉरी। हम जीवनसाथी ना सही, दोस्त तो रह सकते हैं ना? तुम कनाडा कब आ रही हो?’
निहा ने अपने को कहते सुना,‘कभी नहीं।’
अगले दिन तक निहा कुछ-कुछ संभल गई। बोरिंग रोड में ज्योतिषी योगा सेंटर घर से बहुत दूर नहीं था। पहले भी वह योगा सीखने वहां जाया करती थी। सालों बाद वहां जाकर अच्छा लगा। दो-तीन घंटे आसन करती रही। स्कूटी से लौटते समय उसे अपना कोचिंग सेंटर नजर आ गया। कितनी तो बातें याद आ गईं? उसके बैच के छात्र तो निकल गए होंगे वहां से? उनमें से कुछ तो बन भी गए होंगे डिप्टी कलेक्टर। निहा घर लौटी तो पूरी तरह चार्ज्ड थी। रात को सबके साथ खाने पर बैठी और कुछ तेज आवाज में पूछ लिया,‘मैं फिर से सिविल सर्विस की तैयारी करूं क्या? पापा, आपको क्या लगता है, मुझे पहले अपना पीजी पूरा करना चाहिए?’
पापा चहकती हुई निहा को देख खुश हो गए, ‘तुम जो चाहो बेटी। पर अगर तुम्हारा मन है तो कल कोचिंग क्लास होती हुई आना। देख लो, मुझे लगता है तुम मां की तरह सोशल सर्विस करो,तुम्हारे लिए अच्छा रहेगा। ’
निहा ने सिर हिलाया। अगले दिन योगा क्लास से निकल कर सीधे कोचिंग इंस्टीट्यूट पहुंच गई। इंस्टीट्यूट के मालिक जोगिंदर उसे अच्छी तरह जानते थे। पहले तो उन्होंने निहा की क्लास ली कि उसने कोचिंग बीच में क्यों छोड़ दिया,फिर तुरंत कहा,‘चलो,अच्छा हुआ, तुम्हें जल्दी बुद्धि आ गई। कल से आ जाना क्लास में। अभी तो शुरू ही हुई है क्लास। ज्यादा मिस नहीं किया। दो-चार एक्स्ट्रा क्लासेज अवस्थी सर से करवा दूंगा।’
अवस्थी सर के नाम से निहा के सामने एक जाने-पहचाने शख्स का चेहरा उभर आया। जोगिंदर ने बेल बजा कर अवस्थी सर को बुलाया। निहा थोड़ी अनमनी सी हो उठी। पता नहीं अवस्थी सर उसके बारे में क्या सोचेंगे?
अरुण अवस्थी। लगभग वैसे ही,जैसा निहा उन्हें छोड़ कर गई थी। दाढ़ी थोड़ी बढ़ गई थी। गंभीर चेहरा। आंखों में चश्मा लग गया। अवस्थी की नजर निहा पर नहीं पड़ी। जब जोगिंदर ने उनसे परिचय करवाया तो अवस्थी की निगाह में अजीब से भाव आए। ये वही निहा है? क्या हो गया है इसे? बीमार थी क्या?
निहा ने धीरे से हैलो कहा,गौर से अवस्थी की आंखों में कुछ पढऩे की कोशिश की।
अवस्थी कह रहा था,‘जी सर, ब्राइट स्टुडेंट थी। पता नहीं क्यों बीच में छोड़ कर चली गईं। कोई बात नहीं सर। एक्स्ट्रा क्लास ले लूंगा।’
दोनों जोगिंदर के कमरे से साथ में बाहर निकले।
दोनों एक-दूसरे के सामने ठिठके से खड़े रहे। अवस्थी बहुत कुछ पूछना और जानना चाहता था। बहुत कुछ बताना भी चाहता था। यह तो उसे अंदेशा हो गया था कि निहा को उसका फेसबुक पर प्रपोज करना अच्छा नहीं लगा। वह तो माफी मांगना चाहता था,अपनी बेवकूफी पर। पर निहा ने उसे मौका ही नहीं दिया।
अवस्थी को क्लास जाना था, उसने आंखों-आंखों में निहा से पूछा—जाऊं।अवस्थी सर की आंखें नम थीं,निहा का दिल कुछ जोर से धडक़ने लगा। उसने कितना गलत किया उनके साथ। उसने सिर हिलाया और बस इतना भर कह पाई,‘सॉरी, सर...! मैंने आपके साथ...आप मुझे माफ कर देंगे ना?...’
अवस्थी के होठों पर हल्की सी मुस्कराहट आई और वह आगे बढ़ गया।
निहा अवस्थी का चेहरा देख नहीं पाई। अर्से बाद अवस्थी के चेहरे पर रौनक लौटी थी। आंखों में चमक। उसे यकीं जो था कि एक ना एक दिन निहा जरूर लौटेगी...
निहा धीरे से स्कूटी की तरफ बढ़ गई। उसे बहुत दिनों बाद कुछ अच्छा-अच्छा सा लग रहा था। स्कूटी घर के बजाय उसने ब्यूटी पार्लर की तरफ मोड़ दिया।
(लेखिका दैनिक 'हिन्दुस्तान' में सीनियर फीचर एडिटर हैं और जानी-मानी साहित्यकार हैं)
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