होम / विचार मंच / जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलिविजन में हो रहा है: रोहित सरदाना

जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलिविजन में हो रहा है: रोहित सरदाना

रोहित सरदाना वरिष्ठ पत्रकार ।। किले दरक रहे हैं। तनाव बढ़ रहा है। पहले तनाव टीवी की रिपोर्टों तक सीमित रहता था। फिर एंकरिंग में संपादकीय घोल देने तक आ पहुंचा। जब उतने में भी बात नहीं बनी तो ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉ

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

रोहित सरदाना

वरिष्ठ पत्रकार ।।

किले दरक रहे हैं। तनाव बढ़ रहा है। पहले तनाव टीवी की रिपोर्टों तक सीमित रहता था। फिर एंकरिंग में संपादकीय घोल देने तक आ पहुंचा। जब उतने में भी बात नहीं बनी तो ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, अखबार, हैंगआउट – जिसकी जहां तक पहुंच है, वो वहां तक जा कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करने लगा।

जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलिविजन में हो रहा है। कभी सेंसरशिप के खिलाफ नारा लगाने वाले कथित पत्रकार, एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें निकाल के तभी खड़े हुए हैं जब अपने अपने गढ़ बिखरते दिखने लगे हैं। क्योंकि उन्हें लगता था कि ये देश केवल वही और उतना ही सोचेगा और सोच सकता है, जितना वो चाहते और तय कर देते हैं।

लेकिन ये क्या? लोग तो किसी और की कही बातों पर भी ध्यान देने लगे। किसी और की कही बातों पर भी सोचने लगे। और किसी और की कही बातों को सुनने-समझने के बाद, जब उन्हें अहसास हुआ कि आज तक जो देखते-सुनते आए उसका कोई और पक्ष भी है, तो सवाल भी पूछने लगे।

बस। यही बुरा लग गया मठाधीशों को। हमसे कोई सवाल कैसे पूछ सकता है? हम अभिव्य़क्ति की आजादी अपने लिए मांगते हैं, दूसरों के लिए थोड़े ही न। ब्लॉक करो सालों को। भक्त हैं। दलाल हैं। सांप्रदायिक हैं। राष्ट्रवादी हैं।

दुनिया भर में कत्ल-ए-आम मचा हुआ है। भारत छोड़ के हर मुल्क के पत्रकारों को पता है कि कौन मार रहा है, किसको मार रहा है, किस लिए मार रहा है। सिर्फ भारत का टीवी इस बात पे बहस करता है कि आतंकवाद का धर्म नहीं होता बजाए इसके कि आतंकवाद से उस धर्म को कैसे बचाया जाए।

‘चंद भटके हुए नौजवानों’ के जुमले की आड़ लेने वाले वही सारे पत्रकार, दादरी कांड के बाद पूरे हिंदू समाज को हत्यारा, आतंकवादी, क्रूर और भारत को असहिष्णु का सर्टिफिकेट देने में पल भर की देर नहीं लगाते। लेकिन किला तब दरकता है जब देश असहिष्णुता के नाम पे अवॉर्ड वापसी को ड्रामा मानता है – और इनटॉलरेंट होने की पत्रकारों और संपादकों की उपाधि कुबूल करने से इनकार कर देता है।

कश्मीर में पत्थर चलते हैं। पैलेट गन चलती है। हर बार की तरह कुछ पत्रकार अलगाववादियों के दफ्तरों तक जाते हैं। उनकी बाइट लाते हैं। और बता देते हैं कि कश्मीर तो आजादी चाहता है। बुरहान वानी की मां भले बेटे को जिहाद की भेंट चढ़ा कह रही हो, कुछ पत्रकार इसे सेना की ज्यादती साबित करने में जुटे रहते हैं। लेकिन किले तब दरकते हैं जब गुरेज़ में रहने वाला महबूब बेग, टीवी कैमरे पर 'भारत माता की जय' का नारा लगा देता है, 'हिन्दुस्तान जिंदाबाद' कहता है और आजादी की जंग को बकवास करार देता है। क्योंकि देश उस समय उन पत्रकारों से पूछने लगता है कि कश्मीर क्या सिर्फ अलगाववादियों की गलियों में बसता है जनाब?

गौरक्षा कथित लिबरल पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा चुटकुलेबाजी का विषय है। बेशक गौरक्षा के नाम पर जो घटनाएं कई जगह घटी हैं, वो माफी के काबिल नहीं हैं। ऐसे तत्वों से कानून को सख्ती से निबटना चाहिए। लेकिन किले तब दरकते हैं जब लोग पूछने लगते हैं कि कुत्ता-रक्षा के लिए तो आपने जान की बाजी लगा दी थी। घोड़ा-रक्षा के लिए आप चौराहे पर घोड़े की मूर्ति लगा दिए जाने तक लड़े थे। गैय्या का क्या कुसूर है? उसके लिए भी लड़िए न! आप लड़ लेते उसके लिए तो शायद ये गली-गली गौरक्षा दल की दुकानें न चल पातीं। आपकी मां ने भी तो कभी चूल्हे से पहली रोटी गाय के लिए ही उतारी होगी! चलिए उसके लिए न कीजिए, अपने अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वाले फेवरेट गेम में इसी बात के लिए गाय को कानूनी हक दिला दीजिए कि देश का बहुसंख्यक समाज उसको पूजता है।

झगड़ा राष्ट्रवाद या सेकुलरिज्म का नहीं है। मसला किसी सरकार के पक्ष या सरकार के विरोध का भी नहीं है। दर्शकों और पाठकों को बेवकूफ बनाने के लिए उस पर राष्ट्रवाद बनाम सेकुलरवाद का मुलम्मा वैसे ही चढ़ाया गया, जैसे आज तक हर चीज़ पर चढ़ाया जाता रहा है। सेकुलरिज्म वाला थोड़ा कमजोर पड़ता दिखे तो दलितिज्म का चढ़ा दो। बाबा साहेब अंबेडकर जब मुंबई में सूटबूट पहन कर निकलते थे, तो जो टिप्पणियां उन पर की गईं, वो स्थिति आज है क्या? और जो दलित उत्थान अभी तक हुआ है, उस तक आने के लिए इन टीवी पत्रकारों ने अपनी रिपोर्टों से कितने ऐसे आंदोलन खड़े किए जिससे दलितों की हालत बेहतर हुई हो? सिवा इसके कि इन्होंने हमेशा दलित और सवर्ण समाज के बीच की खाई को गहरा ही किया। किले तब दरकने लगे जब लोगों ने पूछना शुरू कर दिया।कभी अखबार में हेडलाइन छापते हो क्या-ब्राह्मण युवक की मौत या क्षत्रिय युवक की मौत या बनिया युवक की मौत। अगर नहीं तो लूटपाट, चोरी चकारी, डकैती, हत्या, फिरौती में जा के जाति का एंगल क्यों तलाशते हो भाई? तब आपकी तटस्थता कहां चली जाती है?

निष्पक्षता और तटस्थता, दो परिस्थितियां हैं। आंख-नाक-कान बंद होने का ड्रामा कीजिए। अपनी पसंद के तथ्य (किसी भी एक तरफ के) अपनी च्वॉइस के कवर में लपेट कर दर्शक को दीजिए और तटस्थ बने रहिए। या फिर आंख-नाक-कान खुला रखिए और कहिए कि देख-सुन-सोच-समझ कर बता रहा हूं। जो सही है, उसके साथ ताल ठोक के खड़ा हूं, इसलिए मैं तटस्थ नहीं,निष्पक्ष हूं।

और पत्रकार निष्पक्ष हो या तटस्थ, ये जानने-समझने के लिए हमें किसी अमेरिकी या ब्रिटिश पत्रकार का उदाहरण नहीं चाहिए (BBC और CNN दोनों ‘PERSPECTIVE’ के लिए दुनिया भर में कुख्यात हैं, इसके हजारों उदाहरण हैं)। राजा राम मोहन राय, लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी ने पर्याप्त पत्रकारिता की है। भारतीयों को, भारतीय परिस्थिति में, भारत के हित की पत्रकारिता सिखाने के लिए वो काफी है।

(साभार: फेसबुक वॉल)

समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।


टैग्स
सम्बंधित खबरें

'जब स्कोरबोर्ड से आगे निकलकर खेल सिखाता है जिंदगी की बड़ी सीख'

जब भारत एक और शानदार टी20 वर्ल्ड कप जीत का जश्न मना रहा है, तो स्वाभाविक है कि सबसे ज्यादा चर्चा मैच, ट्रॉफी और खिलाड़ियों की हो रही है।

8 hours ago

क्या दुनिया वैसी नहीं रहेगी जैसी हम जानते हैं?

मैं जब विज्ञापन इंडस्ट्री में चल रहे बड़े बदलावों की खबरें देख रहा था, तो मेरे मन में एक सवाल आया कि इन बदलावों से क्लाइंट्स को आखिर क्या फायदा होगा।

1 day ago

खुद को नया रूप देकर आगे बढ़ेगा इंडियन न्यूज इकोसिस्टम, भविष्य रहेगा मजबूत: हर्ष भंडारी

भारतीय न्यूज इकोसिस्टम में इस हफ्ते चार हफ्तों के लिए TRP को अस्थायी रूप से रोक दिया गया। इसके बाद कई मीडिया वॉचर्स ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों हुआ।

1 day ago

ChatGPT को टक्कर देने वाला Claude क्या है? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

Anthropic कंपनी ने Claude AI बनाया है। उसका दावा है कि अमेरिकी सरकार AI का ‘दुरुपयोग’ करना चाहती थी। सरकार Claude का इस्तेमाल दो कामों के लिए करना चाहती थी।

1 day ago

राहुल गांधी की सिनेमा की बचकानी समझ: अनंत विजय

लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में यह कोई नई प्रवृत्ति है? क्या भारतीय सिनेमा और वेब सीरीज में राजनीतिक विचारों और वैचारिक संदेशों का इस्तेमाल पहले नहीं होता था?

1 day ago


बड़ी खबरें

एक बार फिर धूम मचाने आया Laqshya Pitch Best CMO अवॉर्ड्स, 12 मार्च को होगा इवेंट

एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप Laqshya Pitch Best CMO Awards एक बार फिर आयोजित करने जा रहा हैं।

7 hours ago

ESOP स्कीम के तहत 'बालाजी टेलीफिल्म्स' ने एम्प्लॉयीज को यूं बनाया अपना हिस्सेदार

बालाजी टेलीफिल्म्स लिमिटेड ने अपने एम्प्लॉयीज को ESOP (एम्प्लॉयी स्टॉक ऑप्शन प्लान) के तहत 51,997 इक्विटी शेयर आवंटित किए हैं।

9 hours ago

वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी में नीरज झा को मिली ये बड़ी जिम्मेदारी

नीरज झा पिछले 6 साल से ज्यादा समय से वॉर्नर ब्रदर्स डिस्कवरी से जुड़े हुए हैं। इस प्रमोशन से पहले वह कंपनी में कंटेंट, प्रोग्रामिंग और एक्विजिशन के डायरेक्टर के पद पर काम कर रहे थे।

9 hours ago

‘TV9’ में इस बड़े पद से अलग हुए प्रसन्ना राघव, जल्द शुरू करेंगे नई पारी

10 मार्च इस संस्थान मैं उनका आखिरी कार्यदिवस है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, वह जल्द ही एक बार फिर ‘जी मीडिया’ (Zee Media) में लीडरशिप भूमिका में नजर आ सकते हैं।

3 hours ago

'जी मीडिया' में डिजिटल विज्ञापन रणनीति को मजबूत करने के लिए इस अहम पद पर जुड़े मयंक जैन

जी मीडिया ने अपनी डिजिटल विज्ञापन रणनीति को मजबूत करने के लिए मयंक जैन को डिजिटल एड सेल्स का सीनियर वाइस प्रेजिडेंट नियुक्त किया है।

9 hours ago