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वो घर में उनका कत्ल कर दें, इससे अच्छा है कि उन्हें तलाक दे दिया जाए: रोहित सरदाना

रोहित सरदाना आउटपुट एडिटर व एंकर, जी न्यूज ।। ‘पुरुष ज्यादा समझदार होते हैं, उनका अपनी भावनाओं पर बेहतर कंट्रोल होता है, वो आनन फानन में फैसले नहीं लेते, इसलिए तीन तलाक का न्या

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

रोहित सरदाना

आउटपुट एडिटर व एंकर, जी न्यूज ।।

‘पुरुष ज्यादा समझदार होते हैं, उनका अपनी भावनाओं पर बेहतर कंट्रोल होता है, वो आनन फानन में फैसले नहीं लेते, इसलिए तीन तलाक का न्यायसंगत इस्तेमाल कर सकते हैं’

‘किसी से अवैध संबंध रखने से बेहतर है कि पुरुष को घर में दूसरी वैध पत्नी रखने की इजाजत हो’

ये वो दलीलें हैं जो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अदालत में तीन तलाक के मामले पर सुनवाई के दौरान रखीं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वो संस्था है जिसका गठन इसलिए किया गया था कि संविधान के दायरे में शरिया कानूनों के मुताबिक मुसलमानों के कानूनी हितों की रक्षा हो सके। ये अलग बहस का विषय है कि कितने मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को मानते हैं।

लेकिन मेरा सवाल ये है कि आम तौर पर किसी भी छोटे बड़े मसले में महिला आजादी का नारा लगाने वाले संगठन/ संस्थाएं/ नेता/ व्यक्ति/ पोस्टरब्वॉयज मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ये दलीलें सुनने के बाद कहां जा दुबके हैं? आज जब एक बार फिर महिलाओं को उनके साथ की दरकार है, तो उन लोगों को सांप क्यों सूंघ गया है?

चार दिन पहले की तो बात है। पर्यटन मंत्री महेश शर्मा के एक स्कर्ट वाले बयान पर हंगामा मचा रहा। मंत्री ने कहा मैंने सलाह दी, कोई कानून नहीं बनाया। स्कर्ट का उदाहरण दिया कोई नियम उद्धृत नहीं किया। लेकिन महिला आजादी के पैरोकार स्कर्ट से हर्ट हो चुके थे। बहस यहां तक चली गई कि कई मंदिरों में पुरुषों को तो सिर्फ धोती पहन कर जाने की छूट है वो ऊपर नंगे ही रहते हैं, जबकि महिलाओं से कहा जाता है कि साड़ी में लिपट कर आओ। जाहिर है, इसके बाद किसी के पास कोई जवाब नहीं था। महिला आजादी की सीमा महिला ही तय करेगी – पुरुष कैसे करेगा?

इससे पहले शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं की एंट्री को ले कर भी अच्छी खासी खींचतान हुई। मामला कोर्ट तक गया। पहले ट्रस्ट ना-ना करता रहा। फिर उसने भी कोर्ट के आदेश के आगे घुटने टेक दिए। महिला अधिकार की जीत हुई।

हाजी अली में एंट्री के लिए आंदोलन कर रही महिलाओं को भी आस बंधी कि उनके लिए भी दरवाजा खुलेगा। लेकिन शनि शिंगणापुर में घुसने के लिए हेलीकॉप्टर तक का सहारा ले लेने की दलील देने वाली तृप्ति देसाई, हाजी अली में जबरदस्ती गई भी तो वहीं तक हो कर आ गईं जहां तक महिलाओं को जाने की इजाजत थी। सुप्रीम कोर्ट ने दरवाजा खोला भी तो मामला अपील में चला गया।

लेकिन बुरी बात ये कि हाजी अली में एंट्री की लड़ाई लड़ रही महिलाओं के लिए किसी नामचीन महिला अधिकारवादी ने मोर्चा नहीं खोला, कोई महिला संगठन सड़क पर नहीं उतरे, किसी नामी गिरामी महिला एक्टिविस्ट ने सोशल मीडिया पर कैंपेन लॉन्च नहीं किया। क्यों?

'किस ऑफ लव' तो आप लोगों को याद ही होगा? देश के बड़े शहरों की सड़कों पर लड़के-लड़कियां खुलेआम किस कर के अभिव्यक्ति की आजादी का इजहार करें, ये आंदोलन छेड़ा गया। एक राजनीतिक पार्टी के सोशल मीडिया मैनेजर्स तो खुल के उसके लिए मैदान में कूदे। आजादी इसी बात से तय होनी थी कि हमें इंसान होते हुए भी सड़क पर जानवर हो जाने की छूट हो। कई नामी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का स्टैंड इस दौरान वही था, जो किसी भी महिला आजादी आंदोलन के दौरान होता है। क्यों कि महिला आजादी की सीमा तो महिला ही तय करेगी, पुरुष कैसे करेगा?

यूनिवर्सिटी कैंपस में पेड़ों पर सैनिटरी पैड्स बांधने का आंदोलन चलाया गया। लड़कियां शादी करेंगी या नहीं करेंगी, शादी से पहले किसी से संबंध रखेंगी या नहीं रखेंगी, साइज जीरो रहेंगी या साइज फिफ्टी रहेंगी, पुरुष से संबंध रखेंगी या महिला से संबंध रखेंगी – माइ चॉयस के कैंपेन को महिला अधिकार की लड़ाई लड़ने वालों का खूब साथ मिला। सच बात है। महिला आजादी की सीमा महिला ही तय करेगी, पुरुष क्यों करेगा?

तो फिर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की दलीलों के सामने इन सब महिला अधिकारवादियों को सांप क्यों सूंघ गया है? क्या मुस्लिम महिलाओं की लड़ाई, महिला अधिकार की लड़ाई नहीं है? क्यों कोई मेनस्ट्रीम सोशल मीडिया कैंपेन इन महिलाओं के लिए खड़ा नहीं होता? क्यों मुख्य धारा के टीवी चैनल इस पर बहस करने में उतनी सहजता महसूस नहीं करते जितनी सहजता से सबरीमला को लेकर मोर्चा खोल बैठते हैं? क्यों बड़े-बड़े अखबार इस खबर का एक कॉलम पहले पन्ने पे लगा कर और बाकी पेज-4 पर लिख के पतली गली से निकल लेने में भलाई समझते हैं?

या कि महिला अधिकार में भी वही सिलेक्टिविज्म हमने पाल लिया है,जो हर जगह कचोटता है। खबरों की रिपोर्टिंग में, उनके प्रस्तुतिकरण में, उनके विश्लेषण में। राजनीतिक बहसों में, पार्टियों के घोषणा पत्रों में, नेताओं के बयानों में। सरकारों की सोच, नीतियों और फैसलों में। त्यौहारों पर जारी होने वाली एडवाइजरियों में। हर जगह।

(साभार: फेसबुक वाल से) समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडियापोर्टल exchange4media.com की हिंदी वेबसाइट है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें mail2s4m@gmail.com पर भेज सकते हैं या 01204007700 पर संपर्क कर सकते हैं। आप हमें हमारे फेसबुक पेज पर भी फॉलो कर सकते हैं।


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