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सावधान! वरदान की शक्ल में आ गया है भस्मासुर, बोले वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल
राजेश बादल एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।। सोशल मीडिया का रूप मी
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
राजेश बादल
एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर, राज्यसभा टीवी ।।
सोशल मीडिया का रूप
मीडिया के संक्रमण काल का एक अजीब सा दौर है। न निगलते बनता है न उगलते। छोड़ते हैं तो ज़िन्दगी की रेस में पिछड़ने का ख़तरा और अंगीकार करो तो दिल, दिमाग और देह में गैंगरीन की आशंका। आज़ादी के सत्तर साल बाद पहली बार इस तरह की स्थिति बनी है। सामाजिक ढांचे और जीवन दर्शन में विरोधाभासों के गुच्छे अक्सर नज़र आते हैं। उन विरोधाभासों के साथ जीने का हुनर तो हमने सीख लिया और बिना किसी को क्षति पहुंचाए भारतीय समाज मन्थर गति से आगे भी बढ़ रहा है। मगर यह विकट स्थिति है। हमें ज़हर के असर की जानकारी है और हम उसे प्याला भर प्याला पिए जा रहे हैं। गुरमेहर का मामला तो एक बानगी है। जीवन के अनेक क्षेत्रों में इस तरह की कहानियां बिखरी पड़ीं हैं। लोकतान्त्रिक ढांचे पर प्रहार करने वाली कोई घटना होती है तो हम प्रतिक्रिया करते हैं, लेकिन अनगिनत कथाएं अपने ज़हर बुझे तीर छोड़ रहीं हैं। समाज की देह में विषदंत गहरा घाव कर चुके हैं। हम नपुंसक आक्रोश के साथ वक़्त के हाथों ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
किसी भी सेना के सामने यह परीक्षा की घड़ी हो सकती है कि उसे किसी हथियार को चलाने का प्रशिक्षण न दिया गया हो और जंग में उतरने का हुक़्म मिल गया हो। ताज़ा हालात कुछ ऐसा ही बयान करते हैं। सोशल मीडिया के इन आधुनिक अवतारों को स्वीकार करने के लिए हम मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। आज नई नस्लें अपने सोच और नज़रिए के साथ इस घातक हथियार का इस्तेमाल कर रहीं हैं। पहले तो हम अपने संस्कारों पर गर्व करते थे। ये संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी आगे जाते थे लेकिन सोशल मीडिया के संस्कार तो हमारी पुरानी पीढ़ियों से नहीं मिल सकते थे। मान भी लिया जाए कि शिखर समूह या छोटा सा अत्याधुनिक साक्षर तबका इन अस्त्र शस्त्रों का संचालन जानता है, लेकिन सिर्फ़ सेनापति प्रशिक्षित हो तो पूरी फौज को संचालन का प्रमाणपत्र नहीं दिया जा सकता। बुनियादी ढांचे पर ध्यान न देने की लोकतांत्रिक कमज़ोरी का दुष्परिणाम तो आना ही था। शिक्षा को हमारे नियंता आज भी जिस हलके फुल्के अंदाज़ में ले रहे हैं, उसका परिणाम समूचा समाज एक झोला छाप संस्कृति का विकास करता दिखाई दे रहा है। यही ग़लती पढ़े लिखे अमेरिकी समाज ने बरसों पहले की थी। वहां की पीढियां आज इसे भुगत रही हैं।
हर नया माध्यम आकर्षित करता है। इसे कोई नकार नहीं सकता। उसके फायदे भी कम नहीं होते, लेकिन उसके कुरूप चेहरे की जानकारी देना भी व्यवस्था और समाज की ज़िम्मेदारी बनती है। नौजवान भारत क्या अधिक असंवेदनशील, हिंसक और मिजाज़ से सामन्ती नहीं हो गया है? आप इससे असहमत होने का अधिकार रखते हैं। कह सकते हैं कि सारी बुराइयों की जड़ सोशल मीडिया को नहीं ठहराया जाना चाहिए तो प्रतिप्रश्न है कि जो हिन्दुस्तान पढ़ने लिखने की आदत छोड़ रहा हो, शिक्षा से ज़िम्मेदारी का भाव नदारद सा हो गया हो, सामाजिक ताने बाने का रस लेना भूल चुका हो, घूसखोरी को राष्ट्रीय चरित्र बना चुका हो, सामूहिक नेतृत्व के स्थान पर निरंकुश अधिनायकवाद की जयजयकार करता हो तो उसकी मानसिक ज़मीन को सींचने का कौन सा यंत्र हमारे पास है? इस तक़लीफ़ का अहसास हमें होना चाहिए।
वैचारिक आज़ादी का कौन सा प्लेटफॉर्म आज हमारे सामने है? आप किसी भी माध्यम पर अपनी टिप्पणी दर्ज़ कराएं, असहमत स्वर अपने सर्वाधिक क्रूर, आक्रामक और असहिष्णु तेवरों से आपके विचारों का स्वागत करते हैं। अगर कहीं आपने भूल से उसी अंदाज़ में उत्तर दे दिया तब तो आपकी ख़ैर नहीं। विचारों के गुलदस्ते में मौजूद सभी फूलों की खुशबू का आनंद हम नहीं लेना चाहते। सहिष्णुता किसी भी सभ्य समाज की पहली अनिवार्य शर्त है।
भ्रामक, अवैज्ञानिक और पाखण्ड से भरे प्रागैतिहासिक प्रोपेगंडा कारतूस अगर दो हज़ार सत्रह के युद्ध में इस्तेमाल किए जाएंगे तो वे उलट कर नहीं लगेंगे- इसकी क्या गारन्टी है। मनोवैज्ञानिक सत्य है कि नकारात्मक विचार, साहित्य और विस्फोटक सामग्री की ओर इंसान जल्द आकर्षित होता है। सोशल मीडिया के एक मंच पर पेश कोई विचार, किसी राजनेता की छबि अगर सकारात्मक पेश करता है तो कुछ ही पलों में विनाशक तत्व उस छबि की ऐसी धज्जियां उड़ाते हैं कि बरसों तक इंसान उससे मुक्त नहीं हो पाता। नहीं भूलना चाहिए कि इंसान अपना मर जाना पसन्द करेगा। अपने यश का मरना पसन्द नहीं करेगा। यश का मर जाना खुद के मर जाने से ज़्यादा तक़लीफ़देह है। सरोकारों और मूल्यों की ज़िन्दगी से विदाई का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है कि फेसबुक पर पढ़े लिखे और आधुनिक तकनीक के जानकार फ़र्ज़ी नाम से संवाद करते हैं। संवाद ही नहीं, सभी तरह की अभद्र, अश्लील और अमर्यादित क्रिया कलापों के जनक बन जाते हैं। खुल्लमखुल्ला अवैधानिक खिलवाड़ होता है। न कोई इसे रोकना चाहता है और न कोई इसके विरोध में नज़र आता है। इसका अर्थ तो यही है कि हमारा सभ्य समाज अपने पतन की लक्ष्मण रेखा पार कर रहा है। छबियों के शिकार का यह आत्मघाती दौर हमें कहां ले जा रहा है।
मेरी बात से असहमत लोग इसके उजले पक्ष को भी सामने लाना चाहेंगे। सही है कि सोशल मीडिया के अनेक मंचों ने दुनिया भर के लोगों को आपस में जोड़ दिया है। तेज़ रफ़्तार से भागती ज़िन्दगी में उतनी ही गति से सूचनाओं, तथ्यों, फ़िल्मों या अन्य सामग्री को भी एक कौने से दूसरे कौने तक भेजने का काम ये मंच कर रहे हैं। प्रतिभाओं को निखारने और सामने लाने का काम भी ये कर रहे हैं। फ़ायदों को याद करने का काम भी मैं किसी कंजूसी के साथ नहीं करना चाहता।
ज़रा सोचिए क्या हम अपनी खुशियां पैसे से खरीद सकते हैं? नहीं। आप साधन-सुविधाएं धन से हासिल कर सकते हैं मगर सुख और शान्ति के लिए पूंजी काम नहीं आती। आज रोज़ी रोटी के लिए इंसान सात समंदर पार बैठा हुआ है। बचपन का गांव, उस दौर के रिश्ते और अतीत की यादों का हिन्दुस्तान उसे तड़पाता है। पैसा हाथ में है लेकिन उससे बचपन की दोस्तियां नहीं मिलतीं। फेसबुक पर अगर टिम्बक टू से कोई बुन्देलखण्ड के अंदरूनी गांव अनगौर में बैठे बचपन के दोस्तों से बात करता है, सारे मित्र एक साथ उस मंच पर संवाद करते हैं, न केवल संवाद करते हैं बल्कि एक दूसरे को देख भी सकते हैं तो उस रात कितनी गहरी नींद आती है- कोई नहीं समझ सकता।
किसी नींद की गोली की ज़रूरत नहीं होती। इसी फ़ोरम पर रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए भी आज़ादी मिलती है। अनुभव से कह सकता हूं कि मैं फेसबुक पर जब आज के हालात पर दिल की बात रखता हूं तो लोग अहसास के साथ अपने अनुभव बांटते हैं। विचार रखते हैं। पता चलता है कोई नया दर्शन सामने आ गया। इंसान का असल सुख तो सृजन में है। अगर सोशल मीडिया का कोई मंच सृजन का अवसर मुहैया कराता है तो उससे बड़ा क्या है?
दिल को ठंडक पहुंचाने वाली अनेक कथाएं हैं। हम अपने गांव, परिवार, ख़ानदान और संबंधी संसार से सैकड़ों मील दूर बैठे हैं। एक व्हाट्सअप समूह बनाते हैं। यह समूह संवाद करता है, चित्र भेजता है, आवाज़ और विडियो का आदान प्रदान होता है और हर सदस्य एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है। ख़ुशी और बढ़ जाती है जब किसी महानगर में बसे, अपनी जड़ों से उखड़े लोग आपस में ऐसे ही समूह के ज़रिए जुड़ जाते हैं। किसी पर मुसीबत आती है तो चुटकियों में समाधान हो जाता है। एक सदस्य के रिश्तेदार दिल्ली आते हैं। उन्हें ऑपरेशन कराना है तो कोई सदस्य अस्पताल के पास अपनी जगह देता है, दूसरा टिफ़िन पहुंचाता है, तीसरा दुर्लभ रक्त समूह का रक्त देता है। सामुदायिकता का विलोप आज हमें चोट पहुंचाता है क्योंकि बचपन से हम पढ़ते आए हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। आज का संकट यही है कि हम सामाजिक रहे कहां? पड़ोसी से संवाद किए महीनों गुज़र जाते हैं। अपने अपने खोल में बंद हैं। सामाजिकता के दरवाज़े पर अलीगढ़ का ताला लटकाए। ऐसा नहीं है कि कोई बाज़ार से अस्पताल के निकट आवास किराए पर नहीं ले सकता, टिफ़िन नहीं खरीद सकता या खून नहीं पा सकता। पैसे से सब उपलब्ध है। मगर जब समूह इस तरह की सामाजिक एकजुटता दिखाता है तो आत्मिक सुख का भाव हिलोरें मारता है।
एक अवतार ट्विटर है। विचारों का विस्फ़ोटक माध्यम। अपनी वाली पर आ जाए तो व्यवस्था और सरकार को हिला दे। एक उदाहरण। हिन्दुस्तान में रोज़ाना क़रीब एक करोड़ लोग पहियों पर सफ़र करते हैं। चलती रेल में आपका एक ट्वीट पेन्ट्री के मैनेजर को माफ़ी मांगने पर मज़बूर कर देता है, ट्रेन कंडक्टर को बर्थ देने के लिए बाध्य कर देता है और दिल के दौरे से तड़पते मरीज़ को चिकित्सा दिलाता है। यही अवतार उस समय वरदान बन जाता है। अलबत्ता इसका दुरुपयोग पलक झपकते अभिशाप भी बन जाता है। कह सकते हैं कि वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा साकार हो रही है तो काफी हद तक इसका श्रेय संचार और सोशल मीडिया को है। उसे कोई नकार नहीं सकता। लेकिन किसी दवा से शरीर को हो रहे फ़ायदों पर आपकी नज़र है तो उसके साइड इफेक्ट्स से भी आंखें नहीं मूंद सकते।
अभी इस माध्यम के नए अवतारों का अंत नहीं हुआ है। हर साल कोई न कोई नया अवतार अपने अपने गुण दोष के साथ आएगा। नई नस्लें उसकी तरफ आकर्षित भी होंगीं। उनका उपयोग-दुरुपयोग भी करेंगी। जिन रूपों को सारे संसार में करोड़ों लोग इस्तेमाल कर रहे हों, वो लाखों बेरोज़गारों के लिए रोज़गार का ज़रिया भी हैं। रोज़ी रोटी के दबाव में दुष्परिणामों को किस सीमा तक अनदेखा करना है, उसका संतुलन बिंदु कहां है- यह भी देखना होगा। अवसर आत्मघाती न बने- इसका ध्यान कौन रखेगा? बिल्ली के गले में घण्टी बांधने की ज़िम्मेदारी किसकी है? मेरे ख़्याल से मीडिया शिक्षा संस्थानों को पहल करनी चाहिए। सरोकारों और तकनीक का यह मिश्रण पाठ्यक्रम में शामिल होगा तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
सामान्य शिक्षा पाठ्यक्रमों में भी इंटरमीडिएट तक सोशल मीडिया और उसके इस्तेमाल पर फाउंडेशन कोर्स अनिवार्य कर देना चाहिए। इसमें नए अवतारों और उसके दुरुपयोग से छात्रों को आग़ाह करने की व्यवस्था भी बनाई जाए। ऐसा न हुआ तो सोशल मीडिया ऐसे विकराल और दानवीय आकार में सामने होगा, जिसकी व्यापक पहुंच का खामियाज़ा हमें भुगतना पड़ेगा। सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि उनके हाथ में जो ब्रह्मास्त्र है, वो उन्ही के ख़िलाफ़ भी जा सकता है। भस्मासुर की तरह।
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