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आखिर क्यों हम अब भी अंग्रेजों के बनाए कानून ढो रहे हैं..?, बोले टीवी एंकर रोहित सरदाना

रोहित सरदाना आउटपुट एडिटर व एंकर, जी न्यूज ।। अगस्त 2015 में आए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2014 में देश भर में 58 लोग, देशद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किए गए। इनमें 55 पुरुष थे और 3

समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago

रोहित सरदाना

आउटपुट एडिटर व एंकर, जी न्यूज ।।

अगस्त 2015 में आए नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़, साल 2014 में देश भर में 58 लोग, देशद्रोह कानून के तहत गिरफ्तार किए गए। इनमें 55 पुरुष थे और 3 महिलाएं। इनमें भी 16 मामले बिहार के थे, जिनमें 28 लोगों की गिरफ्तारियां हुईं और 18 मामले झारखंड के थे, जिनमें 18 गिरफ्तारियां हुईँ। उड़ीसा में तीन गिरफ्तारियां हुईं, तीनों महिलाएं थीं। आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इस दौरान देशद्रोह के मामले तो दर्ज हुए, लेकिन गिरफ्तारी कोई नहीं हुई। अब थोड़ा दिमाग पर ज़ोर डालिए, और याद कीजिए, इनमें से कितने लोगों के खिलाफ़ देशद्रोह का मुकद्मा चलाए जाने के खिलाफ़ कोई पार्टी सड़क पर उतरी? इनमें से कितने लोगों के बचाव के लिए वकीलों ने रात भर अदालतों के दरवाज़े धरना दिया? इनमें से कितने लोगों को बाहर लाने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने एक सुर में मांग की हो कि देशद्रोह का कानून ही गलत है?

दिलचस्प ये है कि राज्य और केंद्र, दोनों की सरकारें अपने अपने विवेक के आधार पर ये तय करती रही हैं कि किस मामले में उन्हें धारा 124ए यानि देशद्रोह कानून के तहत केस दर्ज करना या कराना है।

गुजरात की बीजेपी सरकार ने पाटीदार आंदोलन के दौरान हार्दिक पटेल के खिलाफ़ देशद्रोह का मामला दर्ज किया तो गृह मंत्रालय ने JNU में पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाने और लगने देने वाले उमर खालिद और कन्हैया कुमार के खिलाफ़। छत्तीसगढ़ की बीजेपी सरकार ने डॉ. बिनायक सेन के खिलाफ़ नक्सली गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए देशद्रोह का केस दर्ज किया तो कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के खिलाफ़ भ्रष्टाचार विरोधी कार्टून बनाने के लिए महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता आर पी पांडे की शिकायत पर मुंबई क्राइम ब्रांच ने वही धारा लगा दी।

2010 में दिल्ली पुलिस ने भारत विरोधी भाषण के लिए लेखिका अंरूधती राय और अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी पर देशद्रोह की धारा लगाई, तब यूपीए की सरकार थी। आरोप के मुताबिक़ इन लोगों ने भाषण में कहा था कि कश्मीर की आज़ादी ही एकमात्र रास्ता है। लेकिन जब वही बात, 2016 में नारों की शक्ल में JNU कैंपस में आई – हम क्या चाहें आज़ादी, छीन के लेंगे आज़ादी, लड़ के लेगें आज़ादी – तो पचास साल तक देशद्रोह पर सख्त रूख करने वाली कांग्रेस के नेता छात्रों के अधिकारों की लड़ाई और कैंपस में बाहरी तत्वों के नाम पर उनके साथ हो गए।

बेंगलुरु में एमनेस्टी के प्रोग्राम में भी यही हुआ। देशविरोधी नारे लगे। राज्य की कांग्रेस सरकार ने देशद्रोह की धारा के तहत केस दर्ज किया। लेकिन इसके बाद ये बहस होने लगी कि देशद्रोह का कानून जायज़ भी है या नहीं? क्या इससे पहले जिन लोगों या संगठनों के खिलाफ़ ये धारा लगी, उन्हें इस बात का बेनिफिट ऑफ डाउट नहीं मिलना चाहिए था कि कानून जायज़ है भी या नहीं ?

2012 में देशद्रोह की धाराओं के तहत, तमिलनाडु के कुडनकुलम न्यूक्लियर प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे 11 लोग धर लिए गए थे। राजस्थान में गुर्जर आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैंसला पर भी राज्य सरकार ने देशद्रोह की धारा लगाई। लेकिन वही आरोप जब 2016 में हार्दिक पटेल पर गुजरात में लगा तो कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और एनसीपी ने हार्दिक के समर्थन में मोर्चा खोल दिया।

दिसंबर 2010 में श्रीनगर के गांधी मेमोरियल कॉलेज के लेक्चरर नूर मोहम्मद भट पर देशद्रोह का केस दर्ज हुआ। उनके सेट किए क्वेश्चन पेपर में एक पाराग्राफ़ का भाव था कि क्या छात्र, पत्थरबाज़ों को हीरो मानते हैं? भट ने इसके लिए दो महीने जेल में गुज़ारे तब ज़मानत मिली। लेकिन 2016 में पत्थरबाज़ों को मासूम बच्चे साबित करने के लिए नेताओं की भीड़ है। पत्रकार आतंकवादियों की तुलना भगत सिंह से करते हैं और उन्हें सोशल मीडिया एक्स्पर्ट साबित कर के अपनी ही सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ़ कवर फायर देते हैं।

क्यों कि ये लोग जानते हैं कि भारत में कुछ भी कहना, सुनना, करना, लिखना, छापना, गाना, प्रचारित करना, प्रसारित करना – देशद्रोह नहीं है। कम से कम 1860 के उस कानून की जद में तो नहीं ही है, जो औपनिवेशिक सरकार के हितों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। अंग्रेज़ों का, अंग्रेज़ों के ज़रिए और अंग्रेज़ों के लिए। खुद ब्रिटिश संसद ने 6 साल पहले अपना देशद्रोह कानून बदल लिया, लेकिन हम आज तक उसी कानून को ढो रहे हैं जो अंग्रेज़ों ने बनाया।

क्यों आज़ादी के 70 साल में इस बात पर बहस नहीं हुई कि राजद्रोह के कानून की धाराओं में देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करना गलत है? क्यों कानून को लेकर सवाल सिर्फ कन्हैया, हार्दिक पटेल, एमनेस्टी या कांग्रेस नेता राम्या के केस के बाद ही शुरू हुए?

बेशक, संविधान के तहत नेशन स्टेट या फिर राज्य और राष्ट्र की अवधारणा में बुद्धिजीवी दसियों अंतर बता देंगे, लेकिन इसको तो मानिए कि देश केवल एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं होता। ये पीढ़ियों के त्याग, निष्ठा और प्रयास का हासिल है – आखिर फौरी राजनीतिक या निजी फायदों के लिए उसे कमज़ोर क्यों करना?

(साभार: फेसबुक वाल से)

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