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जर्नलिज्म पढ़ने वाले दोस्तो! होशियार...खबरदार!
जर्नलिज्म पढ़ने वाले दोस्तो! होशियार...खबरदार!
शंभुनाथ चौधरी ।।
बाकी प्रोफेशनल कोर्स के बारे में तो नहीं पता, लेकिन जर्नलिज्म या मास कम्युनिकेशन की प
समाचार4मीडिया ब्यूरो
9 years ago
शंभुनाथ चौधरी ।।
बाकी प्रोफेशनल कोर्स के बारे में तो नहीं पता, लेकिन जर्नलिज्म या मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई के नाम पर ज्यादातर कॉलेज, विश्विवद्यालय और संस्थान सरासर ठगी कर रहे हैं। जर्नलिज्म का ग्लैमर दिखाकर सपनों के दोहन का कारोबार ऐसे चल रहा है जैसे खुला खेल फरुखाबादी। हर कॉलेज, विश्वविद्यालय, संस्थान के पास कुछ ऐसे एक्स-स्टूडेंट्स की मुस्कुराती तस्वीरें हैं, जिन्हें देखकर नवागंतुक स्टूडेंट्स यह भ्रम पाल लेता है कि यहां पढ़ाई कर वह भी इन्हीं की तरह तोपचंद बन जाएगा। लेकिन, जब साल, दो- तीन साल या पांच साल का वक्त और पिताजी के हजारों-लाखों रुपए फूंककर जब वह संस्थान से बाहर निकलता है तो पता चलता है कि तोपची क्या, वह तो मामूली बंदूकची भी नहीं है।
हैरान करने वाली हकीकत यह कि ज्यादातर संस्थानों में हिंदी, संस्कृत, हिस्ट्री, फिलॉसफी जैसे विषयों के टीचर्स ने जर्नलिज्म पढ़ाने की 'सुपारी' ले रखी है। जिनका खुद कभी जर्नलिज्म से वास्ता रहा नहीं, वे जर्नलिस्ट पैदा करने की ठेकेदारी चला रहे हैं। न कभी अखबारों में काम किया, न चैनल में। न कभी न्यूजरूम का हिस्सा रहे और न ही कभी रिपोर्टिंग-एडिटिंग की। कई टीचर्स तो ऐसे भी हैं, जिन्हें कंप्यूटर का 'क' भी नहीं पता। पत्रकारिता की किताबें पढ़कर, फिलॉसफी और हिस्ट्री रट कर स्टूडेंट्स को 'रटा-रटाया ज्ञान' ट्रांसफर कर देना और बात है, उन्हें पेशे की चुनौतियों के लिए तैयार करना बिल्कुल अलग बात। मेरी जानकारी में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कोर्स कराने वाले कई ऐसे संस्थान वर्षों से चल रहे हैं, जिनके पास छात्रों को प्रैक्टिकल ज्ञान के लिए न तो स्टूडियो है और न दूसरे जरूरी उपकरण।
मेरा यकीन है कि इन संस्थानों से पढ़कर जो लोग आगे कहीं ठौर बनाने में कामयाब हो पाए हैं, उनकी मेकिंग में उनका खुद का योगदान कहीं ज्यादा है। जिन स्टूडेंट्स के भीतर पत्रकारिता में ठुकने-पिटने-घिसने का जज्बा रहा वो अपनी राहें फिर भी तलाश लेते हैं, लेकिन जो जर्नलिज्म को महज एकेडमिक विधा समझने की भूल करते हैं उन्हें कदम-कदम पर मायूस होना पड़ता है। हकीकत में, पूरे देश में आज भी कायदे के दो-चार संस्थान ही हैं, जहां पर जर्नलिज्म या मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई पर कुछ हदतक भरोसा कर सकते हैं।
यह पोस्ट लिखने का मकसद महज वैसे छात्रों को खबरदार करना है, जो जर्नलिज्म के कोर्स में दाखिले के तलबगार हैं। सोचिए, समझिए, पूरी जानकारी हासिल कीजिए, उसके बाद ही ऐसे किसी कोर्स में एडमिशन का फैसला कीजिए।
(लेखक एक दैनिक अखबार में एडिटोरियल हेड के तौर पर कार्यरत हैं)
(साभार: शंभुनाथ चौधरी की फेसबुक वॉल से )
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