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'मिस्टर मीडिया': सावधान! दर्शक भी उपभोक्ता है
दर्शक कराह रहा है। टीआरपी की होड़ है। अच्छे कार्यक्रमों का अकाल है। अच्छा कंटेंट नदारद...
राजेश बादल 7 years ago
कैसा है आज का मीडिया? क्या हैं उसकी चुनौतियां और कैसा है उसका व्यवहार? कहां हो रही है चूक और क्या हैं उपाय? इन सारे तथ्यों के साथ हम ला रहे हैं एक नया साप्ताहिक कॉलम- 'मिस्टर! मीडिया'। इसे हमारे लिए लिखेंगे देश के जाने माने पत्रकार राजेश बादल। श्री बादल रेडियो, प्रिंट, टेलिविजन और सोशल मीडिया सभी में समान अधिकार रखते हैं और पिछले बयालीस साल से पत्रकार हैं। अपने सरोकारों के लिए उनकी पहचान है। समाचार4मीडिया की सरोकार भरी पत्रकारिता का एक और विस्तार। आपके सुझाव, प्रतिक्रियाएं और इसमें शामिल किए जाने वाले विषयों का स्वागत है -समााचार4मीडिया डॉट कॉम, संपादक
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सावधान! दर्शक भी उपभोक्ता है
राजेश बादल
वरिष्ठ पत्रकार ।।
दर्शक कराह रहा है। टीआरपी की होड़ है। अच्छे कार्यक्रमों का अकाल है। अच्छा कंटेंट नदारद है। बाज़ार का खेल है। विज्ञापन देने वाले पर भी दबाव। जिसे कोई नहीं देखता उसमें विज्ञापन क्यों दे? चैनलों से हिन्दुस्तान ग़ायब है। इंडिया हाज़िर है। जो गांव या क़स्बा स्क्रीन पर है, वह ड्रामा है। चटखारे लेकर चाटने वाले शो। देश बंट गया है। अप मार्केट और डाउन मार्केट इंडिया। डाउन मार्केट बिकता नहीं। इसलिए दिखाते नहीं। जो दिखता नहीं, वो बिकता नहीं। क्या विडंबना है?
रेडियो हो या प्रिंट। टेलिविजन हो या सोशल मीडिया। भरे पड़े हैं गांव और क़स्बों से आए पत्रकार। जॉइन करते ही जड़ें भूल जाते हैं। पुर्ज़े बन जाते हैं इंडस्ट्री के। जिन्हें ज़मीनी समझ नहीं, वे नियंता बने बैठे हैं। जिन्हें ड्राइविंग सीट पर होना था, वे क्लीनर के काम पर हैं। डरते हैं। नौकरी चली गई तो इतने पैसे भी नहीं मिलेंगे। समझौता कर लेते हैं। मीडिया का यही सच है।
चैनल मैनेजमेंट भी दबाव में है। ख़र्च बढ़ रहा है। ऑफिस का किराया बढ़ रहा है। डीज़ल पेट्रोल महंगा हो रहा है। बिजली की कीमतें आसमान पर हैं। उपकरण नए लाने हैं। हर साल वेतन भी बढ़ाने हैं। लागत घटानी है। रेवेन्यू बढ़ाना है। प्रॉफिट भी निकालना है। सरकारें विज्ञापन देती हैं। बदले में जी हज़ूरी चाहती हैं। नहीं करो तो विज्ञापन बंद। दूसरे धंधों पर हमला। छापे और मामले दर्ज़। कहां जाएं मालिक?
जी चाहता है। स्वतंत्र रहें पत्रकार। कैसे करें? निष्पक्षता या चैनल पर ताला। कितने ही चैनल बंद हो गए। उलटी गंगा बह रही है। ब्लैकमेल करने लगी हैं सरकारें। संपादक भी क्या करे? रेवेन्यू लाने का काम भी सर पर। इज़्ज़त से काम है मुश्किल। सरकार से हाथ मिलाना मजबूरी। साथ मिल जाओ तो राज्य सभा पाओ। हमाम में साथ बैठ जाओ। दोनों ही हैं बेहद खुश। घाटे में हैं पत्रकार। मीडिया का यही सच है।
लेकिन दोनों ही भ्रम में हैं। कब तक करेंगे मनमानी? दर्शक भी ग़ुस्से में है। हर महीने ऑपरेटर का पैसा भरते हैं। अपना अनमोल समय देते हैं। दिन भर का थकाहारा। तनाव से राहत चाहता है। बदले में आप क्या देते हैं? आप तनाव बढ़ा देते हैं। पाखंड परोसते हैं। आरती उतारते हैं। नेताओं की। पॉलिटिकल पार्टियों की। दोपहर को साज़िशों से भरे सीरियल। महिलाओं के लिए अफ़ीम। मगर अब उन्हें भी समझ आने लगा है। कब तक बनाओगे बुद्धू। क्या हम जानते नहीं। आपका ज्ञान अज्ञानता से भरा है। प्रोफेशनल नहीं हैं आप। सिर्फ दावा करते हैं। आज बच्चे क्यों छिटके टीवी से? परदा झूठ नहीं बोलता। आपका सच नहीं है सच। उनका मोबाईल फ़ोन ही भला। आपके चैनल से ज़्यादा ज्ञानी हैं दर्शक। वे हंसते हैं आप पर। आपकी टीआरपी की होड़ में अब नहीं चढ़ेगी दर्शक की बलि। देखने वाले मूर्ख नहीं है।
सावधान! अभी मरा नहीं है उपभोक्ता संरक्षण क़ानून। ब्रेड से लेकर बटर तक। टैक्सी से लेकर ट्रेन तक। साबुन से लेकर शैम्पू तक। मोबाइल से लेकर मार्केट तक। हेलिकॉप्टर से लेकर हवाई जहाज़ तक। मिट्टी से लेकर मकान तक। ज़मीन से लेकर जहान तक। कंटेंट से लेकर कार्यक्रम तक। आप प्रोफेशनल हैं तो दर्शक भी प्रोफेशनल। उसे घटिया शो और तमाशे नहीं चाहिए। बिकी हुई ख़बरें नहीं चाहिए। चाहिए शुद्ध और साफ़ ख़बरें। नहीं देंगे तो रहिए खबरदार! अब दर्शक जाग रहा है। नेताओं को सबक़ सिखाता है तो आप किस खेत की मूली हैं। क़ानून ने आपको चौथा स्तंभ नहीं बनाया। पत्रकारिता के पूर्वज आज़ादी की लड़ाई में लड़े थे। इसीलिए सम्मान से माना था चौथा स्तंभ। अब आप कहते हैं कि प्रॉडक्ट बेचते हैं। तो फिर चेतावनी हमारी भी है। हम आपको प्रॉडक्ट ही मानेंगे। साबुन और शैम्पू की तरह। फिर निकालिए घटिया चैनल। हम देते हैं चुनौती। वह दिन दूर नहीं, जब हम होंगे आपके द्वार। खराब प्रॉडक्ट वापस करेंगे। जाएंगे कोर्ट तक। आपने खूब ठगा है हमें। अब हमारी बारी है।
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