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नहीं पता कि किस दम पर लोग वर्षों प्राइम टाइम कर लेते हैं। क्या मिल जाता है, रोजगार के अलावा:रवीश कुमार
रवीश कुमार वरिष्ठ टीवी पत्रकार ।। बहुत दिनों से मन बगावत कर रहा था। मन एक शाम मांग रहा था। कब से डूबते सूरज के बाद का नीला आकाश नहीं देखा था। मेरा मन थोड़ा सा नीला आकाश मांग रहा था। मैं कुछ दिनों के लिए हर शाम
समाचार4मीडिया ब्यूरो 9 years ago
रवीश कुमार
वरिष्ठ टीवी पत्रकार ।।
बहुत दिनों से मन बगावत कर रहा था। मन एक शाम मांग रहा था। कब से डूबते सूरज के बाद का नीला आकाश नहीं देखा था। मेरा मन थोड़ा सा नीला आकाश मांग रहा था। मैं कुछ दिनों के लिए हर शाम डूबते सूरज को देखना चाहता हूं। मैं थोड़ी सी शाम के लिए अपनी जिंदगी की रात छोड़ देना चाहता हूं। दफ्तर में कंप्यूटर के पार एक खिड़की भी है मगर जिस वक्त सूरज डूब रहा होता है, अंधेरे में डूबने से पहले शाम गुम होती रौशनी के आखिरी सिरे को थामे रहती है, उस वक्त मैं की-बोर्ड पर दौड़ रहा होता हूं। सब कुछ अंतिम अवस्था के मुकाम पर होता है। प्राइम टाइम आने वाला होता है।
अचानक कुछ दिनों से लगा कि मन कई दिनों की शाम न देखने का बकाया वसूलना चाहता है। जल्दी घर लौटना चाहता है। आज लगा कि मैं समय से होड़ कर रहा हूं। गुड़गांव जाकर तेजी से रिकॉर्डिंग पूरी की। दफ्तर आकर मेज से डाउन टू अर्थ की कॉपी उठा कर भागा। किसी से नजर न मिल जाए और बात न होने लगे, मैं ठहर न जाऊं इसलिए तेजी से सीढ़ियां उतरने लगा। पांव किसी सैनिक की तरह सीधे पटकता हुआ। पांव को इसकी आदत नहीं थी। जूते के नीचे की काठ ने घुटने की चिकोटी काट ली। कार तक पहुंचते पहुंचते दायां पांव चलने से मना करने लगा। जब मुड़ा नहीं तो किसी तरह मोड़ कर कार में बैठ गया।
अब बस उस दिल्ली से निकल जाना था जहां मेरी कई शामें गुम हो गईं हैं। याद आया कि दफ्तर में कुछ सामान रह गया है। सहयोगी सुशील से कहा कि बाहर लेकर आ जाओ, मैं गाड़ी घुमाता हूं। इसी अफरा-तफरी में उसने कुछ समझा और मैं कहीं और पहुंच गया। तब तक दिमाग आगे आगे दौड़ने लगा था। शरीर वहीं ठहरा हुआ था। दोनों के बीच जैसे कहासुनी हो गई हो। नजर बार-बार साढ़े पांच बजने पर टिकी जा रही थी। इससे पहले नहीं निकला तो दक्षिण दिल्ली के जाम में फिर तमाम। पहले रिकॉर्डिंग का कोई फायदा नहीं।
साढ़े पांच बजने में पंद्रह मिनट बाकी थे। किसी तरह निकला तो सामने जाम। आश्रम जाम में सैंकड़ों कारें फंसी हुई थी। पोस्टमार्टम हाउस में रखी लाश की तरह तमाम कारों में आदमी और औरत चेतना शून्य बैठे चले जा रहे थे। रुके-रुके से चल रहे थे। चलते-चलते से लग रहे थे। जाम ने घुटने को तबाह कर दिया। भागते भागते इतना पस्त हो गया कि घर में घुसते ही बिस्तर पर धड़ाम। भूल गया कि किस लिए आया हूं। पांव ने धोखा दे दिया। कई दिनों की थकान जैसे पांव में उतर गई।
जिस शाम के लिए इतनी दौड़ लगाई, वो तो जा चुकी थी। खिड़की से वही आखिरी सिरा दिखा जिसे कैमरे से पकड़ने चला गया। देर रात तक घर से बाहर रहना कभी फितरत नहीं रही। मैं हमेशा शाम को घर लौटना चाहता था। मेरे बगैर शाम घर लौटने लगी। मुझे नहीं पता कि किस दम पर लोग वर्षों प्राइम टाइम कर लेते हैं। क्या मिल जाता है, रोजगार के अलावा। काश किसी के पास शाम गिनने का रोजगार होता। मैं जल्दी घर आ जाता। उन आवाजों को सुनने के लिए जिनकी खनखनाहट भीतर ही भीतर कम होने लगी है। थोड़ी बहुत ही सही थोड़ी सी शाम देख ली।
(साभार : कस्बा ब्लॉग से)
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