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आज भी याद है जेटली जी का वह आखिरी सवाल, बोले वरिष्ठ पत्रकार पंकज झा
काफी संकोच से जेटली जी के कार्यालय में फोन लगाकर स्थिति बतायी। लगा कि काफी नाराजगी झेलनी होगी इस बात के लिए कि आप इतने व्यस्ततम नेता का वक्त खराब कर रहे हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
पंकज झा, वरिष्ठ पत्रकार।।
अरुण जेटली जी को सुनने का मौका तो अनेक बार मिला ही, व्यक्तिशः मिलने और जरा लम्बी बात करने का अवसर भी एक बार आया था। उन्हें बस्तर के बारे में कुछ साहित्य देने और ब्रीफ करने का आदेश हुआ था। मैंने अलग से कुछ तैयारी की नहीं थी। सोचा था एकाध मिनट ही शायद बात करने का मौका मिले उनसे। सोचा कि वैसे भी बस्तर जैसे विषय पर उनकी क्या दिलचस्पी होगी भला? लेकिन मैं गलत साबित हुआ था।
एक्चुअली एक और बहुत बड़े नेता से इसी काम के लिये समय मांगा था। संयोग से एक ही समय पर दोनों नेताओं का समय मिला था। काफ़ी धर्मसंकट था कि कहां जायें, कहां छोड़ें। काफी संकोच से जेटली जी के कार्यालय में फोन लगाकर स्थिति बतायी। लगा कि काफी नाराजगी झेलनी होगी इस बात के लिए कि आप इतने व्यस्ततम नेता का वक्त खराब कर रहे हैं।
आशंका के विपरीत उनके दफ्तर से काफी शालीनता से कहा गया कि कोई बात नहीं। पहले उनसे (बड़े नेता से) मिल लीजिये। फिर मुझे मेरी ही सुविधा के अनुसार तीन घंटे बाद का समय मिला। दक्षिण दिल्ली स्थित उनके घर के दफ्तर में मिलना हुआ। (सांसद के नाते मिला घर भाजपा दफ्तर के लिये दिया था उन्होंने)
बस्तर पर ऐसे-ऐसे सवाल पूछने लगे जेटली जी कि जवाब देने में पसीना आ गया मुझे। थोड़ा बहुत जानकार होने का अपना दावा दो मिनट में हवा हो गया था। लेकिन, खुद को जिज्ञासु ही दिखाते रहे जेटली जी।
अंतिम सवाल उनका याद है अभी भी। उन्होंने पूछा था-‘ये बताइये, बस्तर में इतनी समृद्ध संस्कृति है आदिवासियों की, लेकिन वहां काफी अभाव भी है। वहां वन्य क्षेत्रों में आदिवासी मां-बहनें आभूषण भी पहनती होंगी। क्या आभूषण होता है उनका और किस धातु का?’ मैं जवाब देने में लड़खड़ा गया था और तुरंत जानकारियों के मेरे अभाव को समझते हुए जेटली जी ने सवाल बदल लिया, ताकि मैं असहज नही होऊं।
लोगों में आमतौर पर जेटली जी जैसे धाकड़ वकीलों, विद्वानों और नेताओं की जैसी कड़क छवि होती है, मैं खुद भी वैसी ही समझ रहा था, इसके उलट लगे थे अरुण जी। छत्तीसगढ़ से पहुंचे मेरे जैसे एक अति कनिष्ठ व्यक्ति से इतनी विनम्रता और स्नेह से पेश आना वास्तव में अकल्पनीय था। मेरा वह अद्भुत अनुभव था।
एक बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव में, चुनाव की पूर्व संध्या पर मैं तब के प्रभारी के साथ था। आश्चर्य लगा यह देखकर कि जेटली जी दिल्ली के एक-एक विधानसभा क्षेत्र का नाम लेकर हर क्षेत्र की विस्तृत रिपोर्ट लेते रहे थे। ऐसा लगा ही नहीं कि राजनीतिक कार्यकर्ता के अलावा मानो कोई और काम हो इनके पास। यानी अलग-अलग भूमिकाओं में जब जो भी भूमिका निभा रहे हों, उसी में रम जाते थे वे पूरे परफ़ेक्शन और सम्पूर्णता के साथ।
मात्र महीने भर के भीतर भाजपा (और देश) के दो प्रखर विद्वान, बेहतरीन वक्ता का चले जाना कितनी बड़ी क्षति है, आप आकलन भी नहीं कर सकते। दुखद... त्रासद...शोकप्रद।
हर एक्शन में परफेक्शनिस्ट, हर भूमिका में सम्पूर्ण अरुण जेटली जी को विनम्र श्रद्धांजलि। सादर प्रणाम।
(लेखक छत्तीसगढ़ से प्रकाशित भाजपा के मुखपत्र के समाचार संपादक हैं)
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