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भारतीय शांति सेना का यह गुमनाम अध्याय गौरवमयी है: पंकज शर्मा

कांग्रेस भारतीय शाति सेना की कुर्बानी को याद करे और मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी शांति सेना के कालजयी योद्धाओं को समारोहिक आदरांजलि अर्पित करें।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

पंकज शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार।

35 साल पहले, 1988 में, मैं भारतीय शांति सेना के साथ जाफना के जंगलों में था। हमारी शांति सेना राष्ट्रपति जूनियस रिचर्ड जयवर्द्धने के आग्रह पर श्रीलंका पहुंची थी। लिट्टे और श्रीलंका सरकार के बीच चल रही घनघोर लड़ाई में श्रीलंका-सेना की मदद के लिए भारतीय शांति सेना तकरीबन पौने तीन साल वहां रही।

इस दौरान चुनिंदा पत्रकारों के कुछ छोटे-छोटे दल जाफना ले जाए गए थे और ऐसे ही दो-एक दलों में नवभारत टाइम्स के संवाददाता के नाते मैं शामिल था। लेफ्टिनेंट जनरल ए. एस. कालकट तब शाति सेना के प्रमुख थे और हम लोगों से लंबी बातचीत किया करते थे।

उस जमाने में जिन लोगों ने जाफना के घने जंगलों में चप्पे-चप्पे पर, लिट्टे की बिछाई सुरंगों को, थोड़ा-बहुत साफ कर तैयार किए गए, पगडंडीनुमा रास्तों पर दिन-दिन भर मीलों चल कर, लिट्टे से निपटने में भारतीय शांति सेना की खून-पसीनाई देखी है, वे आप को बता सकते हैं कि हमारे सैन्य-इतिहास का यह गुमनाम अध्याय कितना गौरवमयी है।

आज फौज की हर उपलब्धि पर खुद की पीठ को जोर-जोर से खुद ही थपथपाने के हुनरमंद राजनीतिक रहनुमाओं के दौर में मैं श्रीलंका भेजी गई शाति सेना का जिक्र मैं इसलिए जानबूझ कर कर रहा हूं कि उस की कुर्बानियों को साजिशन विस्मृत किया जा रहा है। और-तो-और, शांति सेना श्रीलंका भेजे जाने के तत्कालीन सरकार के फैसले पर सवाल भी दागे जाने लगे हैं।

सो, कोई मेरी सुने तो मैं तो कहूंगा कि इस महीने की 29 तारीख को, जब भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच हुए समझौते को 36 बरस पूरे हों तो कांग्रेस भारतीय शाति सेना की कुर्बानी को याद करे और मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी शांति सेना के कालजयी योद्धाओं को समारोहिक आदरांजलि अर्पित करें।

यह दरअसल सालाना-प्रसंग होना चाहिए। बीच में शांति सेना की स्मृतियों को सहेजे रखने के लिए उस के कुछ पुराने योद्धाओं ने वार्षिक आयोजन शुरू किए थे। लेकिन वे ‘जंगल में मोर नाचा’ साबित हुए। जाफना के जंगलों का पराक्रम सत्ता-वन की राजधानी के झुरमुटों में खो गया।

हालांकि यह अलग बात है कि तब की बेहद प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय ताकतों ने लिट्टे और भारतीय शांति सेना के बीच समीकरण बदलने में बाद में कामयाबी हासिल कर ली थी, मगर कांग्रेस को इसलिए कोई लज्जा-बोध नहीं होना चाहिए कि राजीव ने जयवर्द्धने से एक बेहद नेकनीयत समझौता किया था, उस का मकसद श्रीलंका में चल रहे गृहयुद्ध में जयवर्द्धने की सैन्य-मदद के बजाय शांति स्थापना में भूमिका अदा करने का था और जो लिट्टे श्रीलंका की सेना के सामने झुकने को कतई तैयार नहीं था, उस ने भारतीय शाति सेना को अपने हथियार खुशी-खुशी सौंप दिए थे।

यह मामूली बात नहीं थी। श्रीलंका में भारतीय शाति सेना हमारे सैन्य-इतिहास की अकेली ऐसी मिसाल है, जब भारतीय सेना को दीर्घकालीन अवधि के लिए विदेशी भूमि पर भेजा गया था। भारतीय सेना की टुकड़ियां संयुक्त राष्ट्रसंघ के मिशन पर ही कुछ समय के लिए भेजी जाती रही हैं।

सिर्फ एक ही मौका और आया था, जब 1988 में ही मालदीव के राष्ट्रपति मैमून अब्दुल गय्यूम के तख्ता-पलट की कोशिश को नाकाम करने के लिए राजीव गांधी ने भारतीय सेना का एक दस्ता भेजा था। लेकिन वह दो-चार दिनों की बात थी। पूर्वी पाकिस्तान को नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए भारत ने अपनी भूमिका इसलिए निभाई थी कि पाकिस्तान प्रजातीय-दमन कर रहा था।

राजीव ने शाति सेना इसलिए श्रीलंका भेजी थी कि वहां के तमिल बहुल इलाकों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव हो जाएं। जयवर्द्धने ने इस के लिए जरूरी कदम भी भारत के आग्रह पर उठा लिए थे। जब चीजें सही दिशा में बढ़ने लगीं तो वैश्विक दादागिरी की कुख्यात शक्तियां सक्रिय हुईं, राजीव की अगुआई में बहुत तेजी से शक्तिशाली हो रहा भारत उनकी आंखों में वैसे ही खटक रहा था, सो कुछ ऐसा हुआ कि एक दिन लिट्टे ने अपने हथियार फिर उठा लेने का ऐलान कर दिया और तब शांति सेना की बंदूकों को अपना रुख बदलना पड़ा। श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहली समाज द्वारा लगातार किए जा रहे राज्य-समर्थित सघन-भेदभाव की वजह से अल्पसंख्यक तमिल समुदाय को मिली आम सहानुभूति तो बरकरार रही, मगर पश्चिम के भूमिगत राजनयिक संसार के इशारे पर हुए लिट्टे-प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन के रंगबदलूपन से राजीव-जयवर्द्धने समझौता अलग चक्रव्यूह में फंस गया।

मैं उस जमाने में उन्हीं छोटे-छोटे समूहों में जाफना ले जाए गए, और पिछले कुछ दशकों में अपने बाजार-कौशल से स्वनामधन्य बन गए, अंग्रेजी के और टूटी-फूटी अंग्रेजी-हिंदी के, ऐसे तीन-चार पत्रकारों को भीतर तक जानता हूं, जो भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजने के राजीव गांधी के कदम को  पिछले कुछ बरसों से एक तरह से देशद्रोह सरीखा बताने में दिन-रात लगे हुए हैं।

इन में से एक उम्र में अपने गंभीर शर्करा-असंतुलन की वजह से, दिखता मुझे दस साल बड़ा है, लेकिन है मेरी ही उम्र का। दूसरा जरूर मुझ से बारह साल बड़ा है। शक्कर-दोष तो उस का भी कम नहीं है, लेकिन मेकओवर की आधुनिक तकनीकों को दुबई  जाकर अपनी काया में आत्मसात कर लाया है। इसलिए ऊपर से दस साल से कम का दिखता है।

दोनों गजब की हरफनमौलाई करने का ढोंग जानते हैं। संसार का कोई विषय ऐसा नहीं है, जिस का ये अपने को विशेषज्ञ नहीं मानते हैं। पत्रकारिता में चूंकि यह दौर अर्द्धशिक्षित या पूर्णतः अशिक्षित नन्हे-मुन्ने राहियों का है, सो, वे बेचारे यूरेका-मुद्रा में इन दो-चार लोगों की जोरशोर से आरती उतारते रहते हैं।

श्रीलंका और लिट्टे की अंतर्गाथा में बहुत-से घुमाव हैं, मगर इस के चलते राजीव द्वारा भारतीय शाति सेना भेजने के पीछे मी मंशा पर संदेह खड़े करने और शाति सेना के योगदान का अवमूल्यन करने की कोशिशें मेरे हिसाब से देशद्रोह हैं।

आज भी 57, 54 और 36 इन्फेंट्री डिवीजन से लेकर वायुसेना के 33 स्क्वेड्रन और 109 हैलीकॉप्टर यूनिट से ले कर जलसेना के 321 स्क्वेड्रन तक में रहे ऐसे पचासों सैनिक-अधिकारी आप को मिल जाएंगे, जिन के मन में जाफना में शाति सेना के दिनों की यादें जिंदा हैं। मैरीन कमांडो फोर्स के वे लोग भी अभी मौजूद हैं, जो आप को बता सकते हैं कि भारतीय शांति सेना की श्रीलंका में मौजूदगी के क्या सामाजिक मायने थे।

आज जो स्वयंभू उन के योगदान को अपने लुच्चागिरी की भट्टी में स्वाहा करने पर उतारू हैं, उन का कच्चा-चिट्ठा भी, जिन्हें मालूम है, मालूम है। इसलिए मेरी उन्हें सलाह है कि जरा अपने गिरेबां में भी ठीक से झांक लें।

बाजारू-घराने के इन तबलावादकों को सकारात्मक विमर्श की संगीत संध्याओं से बाहर किए बिना अब बात नहीं बनेगी। सैन्य विरासतों को अपने सियासी फायदों के लिए खुद के सेहरे पर टांक लेने और दूसरों की सच्ची उपलब्धियों को बदनाम गलियों में ठेल देने के कुचक्र नौ साल में बहुत हो लिए।

2014 के पहले अगर कुछ हुआ ही नहीं था तो क्या हम ऐसे ही टहलते हुए यहां तक पहुंच गए? यह समय मुंहतोड़ जवाब देने का तो है ही, सख़्ती से जवाब तलब करने का भी है। आज के हालात ऐसे इसलिए हैं कि एक दशक में जवाबतलबी करने का हमारा आत्मविश्वास डिग गया है। जिस दिन यह  खुदएतिमादी हमारी रक्त शिराओं का अटूट हिस्सा फिर बन जाएगी, ज़िल्लेसुब्हानी के मिथ्याचार का परदा गिर जाएगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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