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OTT को लेकर संतुलित नियमन की व्यवस्था बने: अनंत विजय

लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार।

ओवर द टाप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म्स पर दिखाई जाने वाली सामग्री के विनियमन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था बनाई गई थी, उसके परिणाम संतोषजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। न तो अश्लीलता रुक रही है और न ही विवादित प्रसंग। सरकार की तरफ से लगातार ओटीटी प्लेटफार्म्स को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। उनको सरकारी समारोहों में भागीदार बनाया जा रहा था।

स्वाधीनता के अमृत महोत्सव से लेकर गोवा में आयोजित होने वाले अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल तक में उनकी भागीदारी के रास्ते खोले जा रहे थे। इस वर्ष तो फिल्म फेस्टिवल में ओटीटी के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई है। दूसरी तरफ इन प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर शिकायतें भी बढ़ती जा रही थीं। ओटीटी प्लेटफार्म्स की सामग्रियों के प्रमाणन को लेकर एक संस्था बनाने पर भी निरंतर चर्चा हो रही है।

लोगों को लगता है कि भारत जैसे देश में ओटीटी प्लेटफार्म्स पर किसी तरह का रेगुलेशन नहीं होने से अराजकता को बढ़ावा मिल रहा है। इन चर्चाओं को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक की जिनमें इन सब बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। इस चर्चा में सरकार ने अपना रुख साफ कर दिया। अनुराग ठाकुर ने नसीहत दी कि ओटीटी प्लेयर्स को कलात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अश्लीलता दिखाने से बचना चाहिए।

मंत्री ने इन प्लेटफार्म्स को सलाह दी कि वो भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और विविधताओं को लेकर सतर्क भी रहें और संवेदनशील भी। बताया जाता है कि इस बैठक में लस्ट स्टोरीज और राना नायडू जैसे सीरीज की सामग्री को लेकर चर्चा हुई। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में आकर जिस तरह की सामग्री परोसी जा रही है वो भारतीय समाज के लिए कितना उचित है। चर्चा तो इस बात पर भी हुई कि कि ओटीटी प्लेटफार्म्स के रेगुलेशन को लेकर जो त्रिस्तरीय व्यवस्था है उसमें एक स्तर और जोड़ा जाए। ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री की स्क्रिप्ट को शूटिंग के पहले एक कमेटी देखे। ओटीटी प्लेटफार्म्स के प्रतिनिधियों को 15 दिनों का समय दिया गया है ताकि वो इसको लेकर कोई व्यवस्था बनाएं और सरकार को सुझाएं। हलांकि ये व्यवस्था कितनी व्यावहारिक होगी ये देखनेवाली बात होगी।

ओटीटी प्लेटफार्म्स  पर दिखाई जाने वाली सामग्री को लेकर देश में लंबे समय से चर्चा हो रही है। सामग्री के पक्ष और प्रतिपक्ष में कई प्रकार के तर्क सामने आते रहते हैं। कई बार यहां दिखाई जानेवली वेब सीरीज को लेकर हंगामा तक हो चुका है। मामला पुलिस से लकर अदालतों तक में गया है। वेब सीरीज में गालियों की भरमार, यौनिकता और नग्नता का प्रदर्शन, जबरदस्त हिंसा और खून खराबा, अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां, कई बार सेना और सैनिकों की छवि खराब करने जैसे प्रसंग भी सामने आते रहे हैं। कोरोना काल के पहले जब ओटीटी प्लेटफार्म्स और वेब सीरीज हमारे देश में लोकप्रिय हो रहे थे तब कई निर्माताओं ने सेक्स और गाली गलौच के जरिए लोकप्रिय होने का रास्ता चुना था। कई विदेशी वेब सीरीज में तो नग्नता आम बात थी।

ओटीटी को लेकर किसी प्रकार का कोई नियमन नहीं होने के कारण नग्न दृश्यों के प्रदर्शन पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं था। अब भी नहीं है। कोरोना काल में ओटीटी बेहद लोकप्रिय हो गया। नेटफ्लिक्स ने दिसंबर 2021 में ग्राहकों को कम मूल्य पर अपनी सेवाएं उपलब्ध करवाना आरंभ किया। नेटफ्लिक्स ने दो तरह की रणनीति अपनाई थी। एक तो ग्राहकों को जो शुल्क देना पड़ता था उसको कम किया और अपने प्लेटफार्म पर भारतीय फिल्में और भारतीय कहानियों पर बनीं वेब सीरीज को प्राथमिकता देना आरंभ कर दिया।

इंडस्ट्री को जानकारों का मानना है कि नेटफ्लिक्स को इसका काफी लाभ हुआ। इसी तरह से प्राइम वीडियो, हाटस्टार आदि ने भी भारतीय कहानियों को केंद्र में रखकर कहानियां पेश करनी शुरु कर दी। उनको भी इसका लाभ हुआ। कहना न होगा कि कोरोना के बाद जिस तरह से ओटीटी प्लेटफार्म्स ने स्थानीय कंटेंट को बढ़ावा दिया और ग्राहकों के शुल्क को युक्तिसंगत बनाया उससे इनकी लोकप्रियता काफी बढ़ी।

एक तरफ ओटीटी प्लेटफार्म्स की लोकप्रियता बढ़ रही थी लेकिन साथ ही साथ वहां दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद भी बढ़ने लगे थे। सरकार की नजर भी इनपर थी। इंडस्ट्री को लोगों को लेकर लंबे समय तक चले विचार विमर्श के बाद फरवरी 2021 में इंटरनेट मीडिया को लेकर केंद्र सरकार ने एक गाइडलाइन जारी की थी। उसके अंतर्गत ही ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक त्रिस्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था बनाई गई थी। तब ओटीटी प्लेटफार्म्स से जुड़े लोगों ने इसका स्वागत किया था। उस व्यवस्था का कोई खास प्रभाव देखने को नहीं मिला। वेब सीरीज और ओटीटी पर दिखाई जानेवाली सामग्री को लेकर विवाद जारी रहे।

शिकायतें भी आती रहीं उसका निबटारा भी होता रहा लेकिन विवाद फिर भी जारी रहे। बाद के दिनों में एक खास प्रकार की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी कि इन ओटीटी प्लेटफार्म्स पर दिखाई जानेवाली सामग्री में कभी प्रत्यक्ष तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक विचारों को उठाने और गिराने का खेल चलने लगा। संवाद से लेकर दृश्यों तक में। अभिव्यक्ति की रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थ  की आड़ में नग्नता और गाली गलौच दिखाने का चलन कम नहीं हुआ। इस वर्ष अप्रैल में संसदीय समिति ने ओटीटी प्लेटफार्म पर दिखाई जानेवाली अश्लीलता पर चिंता प्रकट की थी।

समिति के अधिकांश सदस्यों का मानना था कि जिस प्रकार की अश्लीलता इन सीरीज में दिखाई जाती है वो भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है। इसका दुष्प्रभाव समाज पर पड़ता है। सरकार और समाज के स्तर पर भी इसको लेकर निरंतर मंथन हो रहा है।ओटीटी प्लेटफार्म्स भी अपने ग्राहकों की संख्या को बढ़ाने, उसको कायम रखने के लिए लगातार कंटेंट में प्रयोग करते रहे। अब भी कर भी रहे हैं। यह एक अलग विषय है जिसपर फिर कभी चर्चा होगी।

प्रश्न ये उठता है कि जब इस देश में फिल्मों को लेकर एक प्रकार के प्रमाणन की व्यवस्था है तो फिर् ओटीटी को लेकर क्यों नहीं इस तरह की व्यवस्था बन सकती है। ओटीटी का आकार इतना व्यापक होता जा रहा है कि अगर इसके लिए किसी प्रमाणन की व्यवस्था तय होती है तो उसके लिए काफी संसाधन की आवश्यकता होगी।

अगर प्रोडक्शन के पहले स्क्रिप्ट देखने की व्यवस्था बनाई जाती है तो इसके लिए भी क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर समितियों का गठन करना होगा। अगर इसके अलावा किसी तरह की कोई व्यवस्था बनाई जाती है तो उसके भी व्यावहारिक पक्ष को देखने की आवश्यकता होगी। इस स्तंभ में पहले भी कई बार ओटीटी की सामग्रियों के प्रमाणन या फिर किसी अलग प्रकार के मैकेनिज्म की चर्चा हो चुकी है।

आज जिस प्रकार से इन प्लेटफार्मस पर वेब सीरीज के माध्यम से राजनीति की जा रही है या जिस प्रकार से हिंदुत्व और उसके प्रतीक चिन्हों पर टिप्पणियां की जाती हैं उसको ध्यान में रखना चाहिए। धर्म विशेष या समुदाय विशेष को बदनाम करने वाले कंटेंट का इंटेंट देखा जाना चाहिए। आलोचना हो लेकिन आलोचना के पीछे राजनीतिक उद्देश्य न हो। आलोचना के पीछे किसी राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने की मंशा न हो। क्योंकि जब मनोरंजन राजनीति का औजार बनता है तो कई बार समाज का बड़ा वर्ग उसको समझ नहीं पाता है और वो परोक्ष रूप से लोकतंत्र को कमजोर करता है।

ओटीटी आज एकक ऐसे सेक्टर के तौर पर उभरा है जहां अनेक प्रकार की संभावनाएं हैं। उन संभावनाओं को बाधित किए बगैर ओटीटी प्लेटफार्म्स को लेकर एक प्रभावी नियमन होना चाहिए। विमर्श काफी लंबे समय से चल रहा है अब वक्त है कि सरकार एक नीति बनाकर उसको लागू कर दे।  

साभार- दैनिक जागरण।


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