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अमेरिका में ट्रम्प के व्यवहार को लेकर निराशा का भाव: समीर चौगांवकर
फोर्ड से लेकर कई पैसे वालों ने राष्ट्रपति होने का सपना देखा, लेकिन उनके मामले में लोकतंत्र के चौकीदार कहीं ज़्यादा सतर्क साबित हुए। कई बार अमेरिकी संविधान में संशोधन भी किए गए।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 8 months ago
समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को उनके परम मित्र एलन मस्क ने धंधे का चस्का लगा दिया है। ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में धंधा कम नेतागिरी ज़्यादा की थी, लेकिन अब नेता कम धंधेबाज ज्यादा बन गए है। ट्रम्प अपने फैसलों,अपने व्यवहार और अपने तुनकमिजाज के कारण अमेरिका की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहे हैं और अपने धंधे को चमका रहें है। अमेरिकी लोगों में ट्रम्प के व्यवहार कों लेकर एक निराशा का भाव उभर रहा है।
अमेरिकी लोगों को अब महसूस हों रहा है कि आत्ममुग्ध पूंजीवादी जब सर्वोच्च पद पर पहुंच जाता है तो वह किस हद तक तानाशाही और सनक से भरा सलूक कर सकता है। अमेरिका के भीतर इसको लेकर बहुत गहरी तकलीफ़ दिख रही है। डोनाल्ड ट्रम्प पहले पूंजीपति नहीं हैं, जिनके भीतर अमेरिका का राष्ट्रपति होने की इच्छा पैदा हुई। फोर्ड से लेकर कई पैसे वालों ने राष्ट्रपति होने का सपना देखा, लेकिन उनके मामले में लोकतंत्र के चौकीदार कहीं ज़्यादा सतर्क साबित हुए।
कई बार अमेरिकी संविधान और चुनाव की प्रक्रिया में संशोधन भी किए गए। मगर इस बार लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की वह छन्नी ठीक से काम नहीं कर सकी और ट्रंप छन्नी से बचकर फिर सत्ता के शिखर पर पहुंच गए। अमेरिका ने एक ऐसे आदमी को राष्ट्रपति चुना है, जिसके पास सार्वजनिक सेवा का कोई अनुभव नहीं है। संवैधानिक अधिकारों को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखती, और जिसमें बहुत साफ़ अधिनायकवादी प्रवृतियां हैं।
पूंजी अपने भ्रष्टाचार छुपाने के लिए सत्ता को भ्रष्ट करती चलती है। वह जितना टैक्स सरकारों को देती है, उससे कहीं ज़्यादा पैसे राजनीतिक दलों और नेताओं तक पहुंचाती है। धीरे-धीरे यह रुग्ण पूंजीवाद पूरे लोकतंत्र को अपनी पूंजी की तरह ही इस्तेमाल करने का आदी हो जाता है। क़ानून उसकी सहूलियत के लिए बनाए जाते हैं, संशोधन उसके फायदे के लिए किए जाते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प ने यही काम किया था और इसलिए उन्हें लग रहा कि उनका यह दूसरा और आख़िरी कार्यकाल उनकी निजी जायदाद के तरह चलना चाहिए।
2018 में दो अमेरिकी प्रोफ़ेसरों - स्टीवन लेवित्स्की और डेनियल ज़िब्लैट ने एक किताब लिखी - 'हाउ डेमोक्रेसीज़ डाई' - यानी लोककतंत्र कैसे मरते है। इन दो प्रोफ़ेसरों ने दशकों तक दुनियाभर के लोकतंत्र का अध्ययन किया और पाया कि अमेरिका जैसा मज़बूत लोकतंत्र भी ख़तरे में है। अमेरिका के लोकतंत्र पर ट्रम्प यह यह हमला धीरे-धीरे कर रहें है। लोकतंत्र का क्षरण बहुत धीरे-धीरे होता है। अक्सर शिशु पदचाप की तरह। हर एक क़दम मासूम प्रतीत होता है।
किसी से नहीं लगता कि लोकतंत्र को ख़तरा है। ट्रम्प भी अमेरिका के लोकतंत्र पर हमला बहुत मासूम बनकर कर रहें है। ट्रम्प पर भले ही मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का जुनून सवार है, लेकिन ट्रम्प की इस सनक में अमेरिका अकेला पड़ता जा रहा है। भारत जैसे करीबी देश भी अब अमेरिका को संदेह की नज़र से देख रहें है। देख लेना ट्रम्प अपने इस कार्यकाल में इतना रायता फैलाकर जाएँगे कि अमेरिका को उसे समेटने ने सालों लग जाएँगे।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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