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अरनब की गिरफ्तारी पर बोले डॉ. अनुराग बत्रा, मीडिया के लिए इससे बुरा दौर नहीं हो सकता
चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है
समाचार4मीडिया ब्यूरो 5 years ago
डॉ. अनुराग बत्रा, चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ, एक्सचेंज4मीडिया ग्रुप ।।
चुप रहने से ज्यादा किसी मुद्दे पर अपनी आवाज उठाना ज्यादा सही है। मीडिया में मेरे मित्रों, यह समय आगे बढ़कर अपनी बात रखने का है। इसे अपने लोकतंत्र के लिए काला दिवस कहा जा सकता है और इस तरह का कृत्य कल को किसी दूसरे के घर को भी निशाना बना सकता है। हमारे लोकतंत्र में, कानून का शासन सर्वोपरि है और यह सिर्फ मीडिया प्रोफेशनल्स और पत्रकारों पर सबसे ज्यादा लागू होता है। इसलिए, मीडिया और देश में हम सभी के लिए अरनब गोस्वामी को गिरफ्तारी के दौरान घसीटे जाने और उनसे दुर्व्यवहार किए जाने के जो दृश्य देखने को मिले हैं, उनके खिलाफ आगे आना चाहिए। अरनब की गिरफ्तारी के दौरान जिस तरह के दृश्य देखने को मिले, वह मुझे काफी हैरान और परेशान करने वाले लगे।
पिछले करीब आठ हफ्तों से टीआरपी पर विवाद और न्यूज चैनल्स व मीडिया संगठनों के बीच झगड़ा देखने को मिल रहा है, लेकिन एक्सचेंज4मीडिया के रूप में हमने तथ्यात्मक और संतुलित रुख अपनाए रखा है। हमारा मानना है कि सही चीजों को सही कारण के लिए और सही तरीके से करना चाहिए और हमने वही किया है।
हालांकि आज जो कुछ भी हुआ, वह काफी डराने वाला है। हम इस तरह के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। अगर मुंबई में अरनब के साथ ऐसा हो सकता है तो नोएडा में किसी भी मीडिया मालिक या संपादक, पत्रकार या देश के किसी भी हिस्से में किसी भी अन्य मीडिया पेशेवर के साथ ऐसा हो सकता है।
इससे बुरी मिसाल नहीं हो सकती
मैंने एक सम्मानित मीडिया कंपनी के और बेहद ही संतुलित सीईओ को फोन किया, जिन्हें मैं अपना मित्र कहता हूं और उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे यह कॉलम नहीं लिखना चाहिए। उन सीईओ ने मुझसे कहा कि उन्हें (अरनब को) आत्महत्या के एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया है। मैं अपने दोस्त और आप सभी से कहता हूं कि आज जो कुछ हुआ और पुराने मामले को महत्वहीन नहीं बताया जाना चाहिए और इसे प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह पुराना केस था जिसे बंद कर दिया गया था। लोग ये मानेंगे कि इसे सामान्य के अलावा अन्य कारणों से फिर से खोला गया।
मैं यहां दो अक्टूबर 2020 को लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर सुप्रीम कोर्ट के बयान का उल्लेख करना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, 'उकसाने के अपराध में दोषी ठहराने के लिए अपराध विशेष को अंजाम देने की मनोदशा दिखनी चाहिए।'
अरनब को साथ दुर्व्यवहार और बाद में उनकी गिरफ्तारी पुलिसिया कार्यशैली का सबसे खराब उदाहरण है और यह सरकारी मशीनरी और शक्ति का दुरुपयोग है। मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में यह हमारा कर्तव्य कि हम इसके खिलाफ अपनी आवाज उठाएं, भले ही हमें इस तरह की पत्रकारिता पसंद हो अथवा नहीं।
फ्रांसीसी दार्शनिक वोल्टेयर (Voltaire) का कहना था, ‘हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं। परन्तु विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूंगा।’
मुझे आज भी यह याद है। मैं किसी भी प्रोफेशनल, पत्रकार, मीडिया मालिक के साथ खड़ा रहूंगा, भले ही मैं उनके संपादकीय विचारों से असहमत होऊं। यदि अरनब गोस्वामी जैसी मीडिया हस्ती इस तरह की पुलिसिया बर्बरता और सत्ता के दुरुपयोग का शिकार हो सकती है, तो हमें मीडिया के रूप में इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। चुप रहना मेरे या हमारे लिए कोई विकल्प नहीं है, न ही आपमें से किसी के लिए एक विकल्प होना चाहिए।
कुछ अन्य प्रमुख मीडिया मालिकों के खिलाफ भी विभिन्न तरह की जांच चल रही हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि उनके साथ भी भविष्य में इस तरह हो सकता है। इसलिए उन सभी को अरनब का समर्थन करना चाहिए ताकि भारतीय मीडिया की रीढ़ न टूटे।
लोकतंत्र की रक्षा करने वालों और कानून की नुमाइंदगी करने वालों ने खुद का आज एक बुरा चेहरा दिखाया है।
भारतीय मीडिया प्रोफेशनल्स के रूप में हमारे विभिन्न दृष्टिकोण अथवा विचारधाराएं हो सकती हैं, लेकिन आज जो कुछ हुआ, उसकी एकतरफा निंदा किए जाने और अरनब को सुरक्षित रखने व न्याय दिलाने में मदद करने का समय है।
मुझे आज महात्मा गांधी की वह बात याद आ रही है, जो उन्होंने कई दशक पहले कही थी-
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