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‘वर्ना कहीं तो सजेगी ही स्ट्रिंगर्स की दुकान’
स्ट्रिंगर्स को पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल के साथ ही कई क्षेत्रीय चैनल्स भी शामिल हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
एक स्ट्रिंगर, बरेली।।
देश में एक से बढ़कर एक न्यूज चैनल ने दस्तक दी और एक से बढ़कर एक टैगलाइन के साथ मीडिया के क्षेत्र में प्रवेश किया| लोगों ने भी बड़ी उम्मीद के साथ नए चैनलों का साथ पकड़ा कि उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलेगा, लेकिन यह सिर्फ उम्मीद बनकर रह गई|
आपको जानकर हैरानी होगी कि एक तरफ चैनल के मालिक राजनीतिक दलों से मोटा पैसा कमाते रहे, वहीं अपने स्ट्रिंगर को एक टका रुपया नहीं दिया| ऐसा नहीं कि यह देश में पहली बार हुआ, पहले भी होता रहा है, लेकिन कोई सरकार आज तक टीवी चैनल के मालिकों के खिलाफ कार्यवाही की हिम्मत नहीं जुटा सकी, आखिर उन्हें भी टीवी चैनल के मालिकों से डर लगता है| पैसा नहीं देने के मामले में नेशनल चैनल के साथ क्षेत्रीय चैनल भी शामिल हैं | मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि 100 में से 99 चैनल ऐसे होंगे जो स्ट्रिंगर से फ्री में या फिर पेमेंट देने के आश्वासन पर काम करा रहे होंगे |
अब सवाल इन चैनलों के संपादकों का उठता है कि आखिर वह चैनल में बैठकर क्या कर रहे होंगे| क्या उन्हें अपने स्ट्रिंगर और चैनल की रीढ़ कहे जाने वाले शख्स की चिंता नहीं है तो आपको बता दें उन्हें किसी की समस्या से क्या मतलब? संपादक जी को अपनी मेहनत का पैसा मिल रहा है, साथ ही साधु-संतों की तरह अच्छी बातें करने को मिल रही हैं और अगर कोई पेमेंट मांग रहा है तो उनके पास बाहर का रास्ता दिखाने का अधिकार भी है। इस अधिकार को वे जब चाहें, तब प्रयोग कर लेते हैं|
अब सवाल उन स्ट्रिंगरों का आखिर कि वह अपने परिवार की जिम्मेदारी कैसे निभाएं तो उन्होंने भी इसका थोड़ा सा इंतजाम कर लिया है। कहीं से कुछ दाल-दलिया मिल गया तो बेहतर, वर्ना उनकी दुकान कहीं तो सजेगी ही| अब समाज भी यह बात समझ गया है आखिर मीडिया को बिकाऊ मीडिया का तमगा क्यों मिला है| मेरी मालिकान से गुजारिश है कि अपनी ‘लेबर’ का भुगतान करें, नहीं तो लाखों उन स्ट्रिंगरों की हाय आपको सुनामी की गति से तेज उड़ाकर ले जाएगी| फिर नहीं बचेगा आपका साम्राज्य|
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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