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वर्तमान समय में हिंदी फिल्मों के निर्देशकों की स्थिति बेहद अलग: अनंत विजय

जबसे फिल्मों का आकलन उसके निर्माण कला की जगह सौ करोड़ और दो सौ करोड़ से होने लगा है तब से निर्देशक नाम की संस्था का क्षरण आरंभ हो गया है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 2 years ago

अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार।

दिल्ली में आयोजित 'जागरण फिल्म फेस्टिवल' के दौरान फिल्म निर्देशकों ने हिंदी फिल्मों की दुनिया की कई रोचक बातें साझा की। प्रख्यात फिल्म निर्देशक राहुल रवेल, बोनी कपूर और सुभाष घई ने अपने अनुभवों को श्रोताओं के साथ बांटा। फिल्म निर्माता और निर्देशक के संबंधों पर भी बात हुई। राहुल रवेल ने एक फिल्म निर्देशित की थी जिसका नाम है 'लव स्टोरी'। ये फिल्म सुपर हिट रही थी। इसके प्रड्यूसर अपने जमाने के बेहद लोकप्रिय अभिनेता राजेन्द्र कुमार थे। उन्होंने अपने बेटे कुमार गौरव को बतौर हीरो लॉन्च करने के लिए ये फिल्म बनाई थी। फिल्म निर्माण के दौरान इसके निर्देशक राहुल रवेल और राजेन्द्र कुमार के बीच मतभेद हो गए थे। राजेन्द्र कुमार इस फिल्म में खुद का अभिनेत्री विद्या सिन्हा के साथ एक गीत रखना चाहते थे।

राजेन्द्र कुमार कुछ वर्ष पहले रिलीज हुई फिल्म 'त्रिशूल' में संजीव कुमार और वहीदा रहमान फिल्माए गाने ‘आपकी महकी हुई जुल्फ को कहते हैं घटा...’  से प्रभावित थे। कुछ उसी तरह का एक गाना फिल्म लव स्टोरी में भी रखना चाहते थे। राहुल रवेल इसके विरोध में थे। उनका मानना था कि 'लव स्टोरी' युवा प्रेम संबंध की कहानी है। इसलिए 'लव स्टोरी' में बीते जमाने के अभिनेता राजेन्द्र कुमार और अभिनेत्री विद्या सिन्हा पर फिल्माया गीत दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। राजेन्द्र कुमार इस बात पर अड़े थे। राहुल रवेल फिल्म की स्क्रिप्ट के अनुसार राजेन्द्र कुमार के सीन कम करके कुमार गौरव को ज्यादा से ज्यादा स्पेस देने के पक्ष में थे। राजेन्द्र कुमार को ये बातें पसंद नहीं आ रही थी। वो राहुल रवेल को बार-बार कहते थे कि मैं फिल्म का प्रड्यूसर हूं और तुम मेरा रोल कैसे कम कर सकते हो। राहुल रवेल नहीं माने। बात यहां तक पहुंच गई कि राहुल रवेल ने फिल्म पूरी होने के बाद उससे अपना नाम हटा लिया। 

जागरण फिल्म फेस्टिवल के दौरान राहुल रवेल ने बताया कि वो इतने खिन्न हो गए थे कि वो कोर्ट चले गए कि फिल्म से बतौर डायरेक्टर उनका नाम हटा दिया जाए। कोर्ट ने तमाम बातों को सुनने के बाद फैसला दिया कि फिल्म लव स्टोरी से राहुल रवेल का निर्देशक के रूप में नाम हटा लिया जाए, जबकि फिल्म के कई कलाकारों ने अदालत में शपथ पत्र दिया था कि पूरी फिल्म राहुल रवेल ने निर्देशित की है। इस तरह से लव स्टोरी पहली फिल्म बनी जिसके रिकॉर्ड में किसी निर्देशक का नाम नहीं है। राहुल रवेल ने बातचीत के दौरान हंसते हुए कहा था कि 'लव स्टोरी' दुनिया की एकमात्र फिल्म है जिसका कोई डायरेक्टर नहीं है।

इसी तरह का मिलता जुलता एक किस्सा सुभाष घई ने भी सुनाया। सुभाष घई ने फिल्म 'विधाता' के निर्देशन का दायित्व संभाला था। वो इस फिल्म में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे। वो दिलीप कुमार के पास फिल्म की कहानी लेकर पहुंचे। जब बातचीत हो रही थी तो सुभाष घई ने दिलीप कुमार से दो बातें कहीं। सुभाष घई ने दिलीप कुमार से कहा कि फिल्म इंडस्ट्री में लोग कहते हैं कि आप बहुत डोमिनेटिंग हैं और निर्देशक को अपने हिसाब से काम नहीं करने देते हैं। आप निर्देशकों के काम में बहुत दखल डालते हैं। दूसरी बात ये कि आपके साथ काम करने से फिल्म में काफी समय लगेगा। दिलीप कुमार पहली मीटिंग में कुछ भी तय नहीं करते थे। सुभाष घई के मुताबिक दिलीप कुमार किसी भी मसले पर काफी सोच विचार के बाद निर्णय लेते थे। दिलीप कुमार ने उनसे भी कहा कि एक दो बार और मिलते हैं फिर तय करेंगे। 

सुभाष घई कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार से मिलने पहुंचे। फिल्म 'विधाता' पर बात होने लगी। काफी देर की बातचीत के बाद दिलीप कुमार ने फिल्म करने के लिए हामी भरी। सुभाष घई प्रसन्न होकर चलने लगे। तब दिलीप कुमार ने उनको रोका और कहा कि फिल्म 'विधाता' तुम ही डायरेक्ट करोगे सिर्फ तुम। दिलीप कुमार के मन में सुभाष घई की निर्देशक के काम में दखल डालने वाली बात रही होगी, इस वजह से उन्होंने ऐसा कहा। बातचीत के दौरान सुभाष घई ने बताया कि पूरी फिल्म के दौरान दिलीप कुमार ने एक भी फ्रेम के बारे को बदलने या इंप्रूव करने के लिए सुभाष घई को नहीं कहा, दबाव डालने की बात तो दूर।

निर्देशक के तौर पर सुभाष घई जो भी कहते गए दिलीप कुमार ने वैसा ही किया। दिलीप कुमार ने जितनी डेट्स दी थी उसके अनुसार वो शूटिंग के लिए उपस्थित रहे। फिल्म समय पर पूरी हुई। कहना ना होगा कि दिलीप कुमार ने निर्देशक नाम की संस्था का न केवल सम्मान किया बल्कि उसकी गरिमा भी बनाकर रखी। 

उपरोक्त दो उदाहरण हैं हिंदी फिल्मों में निर्देशकों की भूमिका को लेकर। एक में निर्देशक ने अपना सम्मान कायम रखने के लिए प्रड्यूसर के दबाव से तंग आकर फिल्म से अपना नाम वापस ले लिया और दूसरे में एक सुपर स्टार ने एक अपेक्षाकृत नए निर्देशक का मान रखा और उन पर किसी प्रकार का कोई दबाब नहीं डाला। इन दो घटनाओं को सामने रखकर अगर वर्तमान समय में हिंदी फिल्मों के निर्देशकों की स्थिति का आकलन करते हैं तो स्थिति बेहद अलग दिखाई देती है। आज तो हालात ये है कि सुपरस्टार्स फिल्मों में अपनी मर्जी चलाते हैं।

निर्देशकों से लेकर वस्त्र सज्जा से लेकर मेकअप आदि तक में दखल देते हैं। स्क्रिप्ट में तो शूटिंग के समय बदलाव कर देते हैं। और तो और फिल्म की एडिटिंग देखने के बाद जब उनको लगता है कि साथी कलाकारों का अभिनय प्रभावशाली बन रहा है तो उसको कटवा देते हैं या सीन छोटे करवा देते हैं। एक अभिनेता के बारे में तो कहा जाता है कि उनके पास तीन-चार हजार चुटकुलों का एक संग्रह है। वो अपनी फिल्म के संवादों में उन चुटकुलों को डलवाने के लिए पटकथा लेखक और निर्देशक पर दबाव डालते हैं। आज के अधिकतर फिल्मी सितारों को लगता है कि वो फिल्म निर्माण की हर कला से वाकिफ हैं। यह अनायास नहीं है कि कई फिल्मों में उसके मुख्य अभिनेता के साथ या उनकी कंपनी में काम करनेवाले किसी भी व्यक्ति को निर्देशक का दयित्व सौंप दिया जाता है।

अगर हम इसके कारणों की तह में जाते हैं तो मुझे लगता है कि जबसे फिल्मों का आकलन उसके निर्माण कला की जगह सौ करोड़ और दो सौ करोड़ से होने लगा है तब से निर्देशक नाम की संस्था का क्षरण आरंभ हो गया है। आज फिल्म निर्माण की कला को उत्कृष्टता पर न तो अधिकतर निर्माता का ध्यान है और ना ही निर्देशक का। उनका सारा ध्यान इस पर लगा होता है कि फिल्म को कितने करोड़ की ओपनिंग मिलेगी, फिल्म पहले सप्ताह में बाक्स आफिस पर कितने करोड़ का कारोबार करेगी।

इस कारोबार और सौ करोड़ क्लब में जल्द से जल्द शामिल होने की होड़ में फिल्म निर्माण की कला प्रभावित होती चली जा रही है। इससे हिंदी फिल्मों का बहुत नुकसान हो रहा है। आज पहले की तुलना में अधिक फिल्में बन रही हैं। पहले की तुलना में तकनीक बहुत उन्नत हो गई है लेकिन ऐसी फिल्में नहीं बन पा रही हैं जो भविष्य में क्लासिक का दर्जा हासिल कर सके। जिस फिल्म को देखकर फिल्म निर्माण की बारीकियों पर चर्चा हो सके। निर्देशक के सोच पर चर्चा हो सके और उसके फिल्माए दृश्यों को लोग वर्षों तक याद रखे। आज उस तरह के संवाद भी नहीं लिखे जा रहे हैं जो दर्शकों की जुबान पर चढ जाए और आम बोलचाल में उसका प्रयोग हो। यह स्थिति हिंदी फिल्मों के लिए अच्छी नहीं है और इसके बारे में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े लोगों को विचार करना होगा।  

(साभार- दैनिक जागरण)


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