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विनोद दुआ का जाना दुख का सबब भी है और सबक भी: विनोद अग्निहोत्री

उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 4 years ago

विनोद अग्निहोत्री
सलाहकार संपादक, अमर उजाला समूह

बात उन दिनों की है, जब मैं ‘नवभारत टाइम्स‘ दिल्ली में बतौर उप संपादक काम करता था। एक दिन ‘नवभारत टाइम्स‘ के तत्कालीन कार्यकारी संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह से मिलने एक सज्जन आए। संयोग से मैं उस दिन एसपी सिंह के कमरे में ही बैठा था। एसपी ने मुझे उनसे मिलवाया कि ये विनोद दुआ हैं और दुआ से कहा कि ये आपके समान नाम वाले विनोद अग्निहोत्री हैं। विनोद दुआ से व्यक्तिगत रूप से मेरी वह पहली और सीधी मुलाकात थी। हालांकि, मैं उन्हें ‘दूरदर्शन‘ के तमाम कार्यक्रमों में देखता था और उनके बारे में जानता था। मुझे ‘दूरदर्शन‘ पर अपने नाम वाले को कार्यक्रम होस्ट करते देख बेहद आत्मतुष्टि मिलती थी और लगता था कि जैसे मैं ही यह कार्यक्रम कर रहा हूं। इसलिए विनोद दुआ से प्रत्यक्ष मिलकर बेहद खुशी हुई, क्योंकि उन दिनों ‘दूरदर्शन‘ पर जो चेहरे दिखते थे, वह सामान्य व्यक्ति के लिए फिल्मी सितारों की तरह ही होते थे। मेरे लिए विनोद दुआ से मिलना एक अविस्मरणीय अनुभव था, क्योंकि मुझे पत्रकारिता में आए कुछ साल ही हुए थे। इस मुलाकात में ही विनोद दुआ ने जिस बेतकल्लुफी से मुझसे बात की, उसने भी मुझे बेहद प्रभावित किया।

बाद में विनोद दुआ से मेरा मिलना-जुलना होता रहा। उनकी सहजता और अपनेपन ने मुझे बेहद प्रभावित किया। हालांकि उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और देश पर कांग्रेस का एकाधिकार था और मेरी वैचारिक पृष्ठभूमि समाजवादी होने के कारण मेरा उन सभी लोगों से मतभेद रहता था जो कांग्रेस के करीब दिखाई देते थे। इसके बावजूद विनोद दुआ के साथ मेरी आत्मीयता बढ़ती चली गई। पिछले करीब दो दशकों के दौरान मुझे कई बार कुछ कार्यक्रमों में उनके साथ मंच साझा करने का भी मौका मिला। ‘इंडिया इंटरनेशलन सेंटर‘ में उनसे अक्सर मुलाकात हो जाती थी। कुछेक ऐसी दावतों में भी मैंने शिरकत की, जहां विनोद दुआ का गाना सुनने का मौका भी मिला। वह बेहतरीन गायक थे। देश विभाजन के बाद उनके माता-पिता पाकिस्तान से दिल्ली आ गए थे और दिल्ली की एक रिफ्यूजी कालोनी से उठकर विनोद दुआ पत्रकारिता के शिखर पर सितारे की तरह चमके। हिंदी और अंग्रेजी में समान अधिकार रखने वाले विनोद दुआ के भीतर मैंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती के प्रति एक खास तरह की तड़प देखी थी। दिल्ली वाला होते हुए भी उनके भीतर एक ठेठ पंजाबीपना भी था, जिसने उन्हें बेहद हंसमुख, बेपरवाह और मस्त इंसान बना दिया था।

‘दूरदर्शन‘ पर उनके कार्यक्रम जनवाणी, परख और चुनाव विश्लेषण तो भारतीय टीवी पत्रकारिता के लिए मील का पत्थर हैं, जिनमें तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था और सरकारी तंत्र के खोखलेपन को उजागर किया जाता था। ‘एनडीटीवी‘ में उनका विशेष शो जायका इंडिया का भी बेहद  लोकप्रिय रहा, जिसने देश के तमाम अंचलों के खान पान और पकवानों से दर्शकों को रूबरू कराया। इसके लिए उन्होंने पूरे देश में हर छोटे-बड़े शहर के गली-मुहल्लों में घूम-घूमकर वहां के खास पकवानों और व्यंजनों पर विस्तृत रिपोर्टिंग की। विनोद दुआ के समकालीन कई पत्रकारों ने अकूत संपत्ति बनाई, लेकिन अपनी तमाम योग्यता और ब्रैंड वैल्यू के बावजूद विनोद दुआ ने अपने पेशे को कारोबार नहीं बनाया। उन्होंने जिस संस्थान में भी काम किया, अपनी शर्तों पर किया और जब लगा कि संस्थान में उनके लिए काम करना मुश्किल हो रहा है तो उन्होंने बेहद शालीनता से उसे अलविदा कह दिया।

पिछले कुछ सालों से इंटरनेट पर उनका शो बेहद लोकप्रिय हुआ। हालांकि उसके लिए उन्हें मुकदमेबाजी के कानूनी झंझटों से भी उलझना पड़ा और आखिरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। लेकिन उन्होंने अपने विचारों, सिद्धांतों और मूल्यों से समझौता नहीं किया और आखिर तक उनके लिए वह लड़ते रहे। विनोद दुआ उन बहादुर पत्रकारों में थे, जिनके भीतर किसी भी सरकार और बड़े से बड़े नेता से अनचाहा सवाल भी पूछने की हिम्मत थी। चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या गैर कांग्रेसी सरकार, हर बड़े नेता मंत्री और अधिकारी से उनके निजी रिश्ते भी थे, लेकिन इन संबंधों को उन्होंने कभी भी अपनी पत्रकारिता के आड़े नहीं आने दिया। इस सबके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से विनोद दुआ अकेलेपन का शिकार हो गए थे। शायद मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के इस दौर में उन्हें अपने-पराए की सही पहचान हो गई थी। तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया ने अपने इस दिग्गज से कन्नी काट ली और उन्हें सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। कोरोना काल में जब सब अपने घरों में एक तरह से कैद होकर रह गए थे, तब विनोद दुआ जैसे फराखदिल इंसान के लिए वह समय बेहद कठिन और चुनौती भरा रहा।

विनोद दुआ का यूं चले जाना एक सामान्य घटना नहीं है। कहा जा सकता है कि पिछले करीब एक साल से उनकी सेहत ठीक नहीं थी और करीब छह महीने पहले पत्नी के निधन के शोक ने उन्हें भीतर से और भी कमजोर कर दिया था, जो धीरे-धीरे उन्हें मौत के करीब ले गया। मैं उनकी इस मृत्यु को स्वाभाविक इसलिए नहीं मानता हूं कि एक तो 67 साल की आयु आम तौर पर ऐसी नहीं होती कि यह मान लिया जाए कि चलो उनका वक्त पूरा हो गया था, दूसरे विनोद दुआ जैसे जिंदादिल और खुशदिल इंसान के लिए शायद यह दुनिया अब घुटन भरी हो चुकी थी, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए छोड़ दिया। इसलिए विनोद दुआ का निधन पूरे पत्रकारिता जगत या आधुनिक शब्दावली में मीडिया की दुनिया के लिए एक शोक का सबब तो है ही, एक बड़ा सबक भी है।

सबक यह कि जिस कदर हम सब अपने आप में एकाकी होते जा रहे हैं वह कहीं न कहीं हम सबको भीतर ही भीतर इतना कमजोर बना रहा है कि हम अपने बाहर जो कुछ भी अच्छा-बुरा घट रहा है, न सिर्फ उससे अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं बल्कि उससे लड़ने की हमारी ताकत भी घटती जा रही है। इसलिए अगर इस चुनौती भरे समय में हम सब अपने अपने घरौंदों से निकलकर एक बार फिर वैसे ही मिलना-जुलना, उठना-बैठना, लड़ना-झगड़ना, उलझना और फिर हाथ मिलाकर गले मिलकर अगले दिन मिलने का वादा करने का सिलसिला शुरु कर सकें तो शायद हम अपने एकाकीपन से भी लड़ पाएंगे और विनोद दुआ को यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी।


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