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'भारतीय परंपरा आशावाद की है, मैं इसी अंदाज में मीडिया के भविष्य को भी देख रहा हूं’

वैसे भी साल 2023 में जी20 की मेजबानी भारत करने जा रहा है। इसलिए भारतीय मीडिया के पास इस मोर्चे पर स्कूप और समाचारों की कमी नहीं रहेगी।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

उमेश चतुर्वेदी।।

सोशल मीडिया के तूफानी विस्तार के दौर में मुख्यधारा की मीडिया को लेकर यूटोपियन अवधारणा स्थापित करने की कोशिश हो रही है। मीडिया को समाज से इतर बताने और जताने की कोशिश हो रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया भी समाज का ही एक अंग है। जिस तरह समाज में बुद्धिमान और ज्ञानी लोगों की कुछ विशेष स्थिति होती है, मीडिया भी कुछ वैसे ही विशेष है। लेकिन यह विशेषता अतिरेकी नहीं है। मीडिया का समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था से सीधा संबंध है। बेशक वह कई बार तीनों में ही हस्तक्षेप करता है। वह इनकी दिशा और दशा पर असर डालने की कोशिश भी करता है। कई बार असर सकारात्मक हो सकता है तो कई बार नकारात्मक। इसके बावजूद मीडिया की समाज, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर निर्भरता कम नहीं हो जाती।

इन अर्थों में देखें तो साल 2023 में मीडिया से और मीडिया को लेकर तमाम उम्मीदें की जा सकती हैं। बेशक भावी मंदी की आशंका बार-बार जताई जा रही है। साल 2009 की आर्थिक मंदी का असर मीडिया पर भी खूब दिखा था। इसलिए मंदी की आशंका होना स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर आशान्वित हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि कोरोना से हलकान रहा भारतीय मीडिया नए साल में नई उंचाइयां ग्रहण करेगा।

कोरोना के दौरान विशेषकर प्रिंट माध्यम में भारी गिरावट दर्ज की गई थी। पाठकों की संख्या में भी गिरावट रही। कोरोना वायरस फैलने के डर से पहले अखबार अछूत बने और बाद में उनके बिना रहने की आदत विकसित हुई। लेकिन कोरोना बीतने के बाद अखबारों ने लय और गति पकड़ी। विशेषकर हिंदी समेत भाषायी मीडिया के प्रसार ने गति पकड़ी है। हालांकि अंग्रेजी में तुलनात्मक रूप से गति कम दिख रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले साल में भाषायी प्रिंट के माध्यम के पाठक भी बढ़ेंगे और उनका प्रसार भी।

कोरोना का असर टेलीविजन पर भी दिखा। हालांकि उस दौरान आफत और राहत दोनों तरह की सूचनाओं का वही एकमात्र माध्यम बनकर उभरा। उस दौरान तमाम लोगों के लिए टेलीविजन के सामने मजबूरीवश बैठना जरूरी हुआ और वह आदत में शुमार होता गया। चूंकि बाकी आर्थिक गतिविधियां ठप थीं। लिहाजा दर्शक संख्या बढ़ने के बावजूद दृश्य माध्यमों की कमाई कम हुई। हालांकि कोरोना घटने के बाद जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियां बढ़ीं, वैसे-वैसे टेलीविजन की कमाई में भी विस्तार होता गया। चूंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के बेहतर रहने की उम्मीद जताई जा रही है, लिहाजा इसका सकारात्मक असर टेलीविजन पर भी पड़ेगा।

साल 2022 के आखिरी दिनों में नए माध्यम यानी वेबमीडिया की कमाई में कमी देखी जा रही है। इसलिए यह माध्यम भी आशंकित हैं। लेकिन जब आर्थिकी से सकारात्मक उम्मीद जताई जा रही है तो फिर इस माध्यम को भी नकारात्मक नहीं होना चाहिए। वैसे भी साल 2023 में जी20 की मेजबानी भारत करने जा रहा है। इसलिए भारतीय मीडिया के पास इस मोर्चे पर स्कूप और समाचारों की कमी नहीं रहेगी। भारतीय परंपरा आशावाद की परंपरा है। हमारा दर्शन है कि विगत की नकारात्मकता को झाड़कर आगे बढ़ जाना चाहिए। मैं इसी अंदाज में भारतीय मीडिया के भविष्य को भी देख रहा हूं। मंगल ही मंगल...।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों ‘ऑल इंडिया रेडियो न्यूज’ में कंसल्टेंट के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।)


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