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‘अगर मीडिया नहीं, तो सरकार को भी कानून से कोई विशिष्ट छूट पाने का अधिकार नहीं है’

बुद्धिजीवियों का कहना है कि इन नए विधानों के जरिए सरकार ने अपने चारों ओर कवच बना लिया है

राजेश बादल 6 years ago

राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार।।

ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार गुस्से में हैं। सोमवार की सुबह उनकी यह नाराजगी अखबार के पन्नों पर दिखाई दी। बीते दो दशकों में अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से असर डालने वाले दर्जनों कानून वहां की सरकार ने थोप दिए हैं। सिर्फ दो साल में ही देश के संविधान में 22 नए विधान जोड़ दिए गए हैं। मुल्क के बुद्धिजीवियों का कहना है कि इन नए विधानों के जरिए सरकार ने अपने चारों ओर कवच बना लिया है। जो भी इस कवच पर प्रहार करने का प्रयास करेगा, उसे पुलिस, अदालत, दंड, नौकरी खोने और सामाजिक अपयश जैसे ‘हिंसक हथियारों’ का सामना करना पड़ेगा।

संपादक-पत्रकार अगर आक्रमण के इन आधुनिक अवतारों से बचना चाहते हैं तो उन्हें सरकार के खिलाफ लिखना बंद कर देना चाहिए। खोजी पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए। सरकारी दफ्तरों से ऐसी सूचनाएं नहीं जुटानी चाहिए, जिनसे हुक़ूमत की पेशानी पर बल पड़ते हों। कह सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का लोकतंत्र एक ऐसी सुरंग में प्रवेश कर चुका है, जिसके दूसरे छोर पर निरंकुशता के पहरेदार तैनात हैं। संसार में स्वतंत्रता की बयार के मायने लोकतंत्र की किताबों के आधुनिक संस्करणों में बदलने लगे हैं।

ऑस्ट्रेलिया की सरकार सफाई दे रही है कि वह पत्रकारों के अभिव्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करना चाहती है, लेकिन कानून से ऊपर कोई भी नहीं है। इस ‘मासूम तर्क’ को कोई भी जागरूक समाज क्यों न खारिज कर दे। उसके सामने एक लेख के प्रकाशन पर ऑस्ट्रेलियन ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के एक पत्रकार और न्यूजकॉर्प की एक महिला संवाददाता के घर पुलिस के छापे का उदाहरण है। पुलिस लंबे समय से उस पत्रकार की जासूसी कर रही थी। जासूसी का हक भी उसे हालिया कानूनों से मिला है।

इसका एक नमूना इस बात पर संवाददाता को महीनों परेशान करने का है कि उसने संसद की कैंटीन में सांसदों को मिलने वाली खाने-पीने की चीजों की कीमतें पूछने की गुस्ताख़ी की थी। एक अन्य पत्रकार को भी पुलिस की पूछताछ और मामले दर्ज होने की कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उसने समाचार प्रकाशित किया था कि सरकार का आयकर विभाग किस तरह लोगों के खाते से चुपचाप पैसे निकाल लेता है। यह एक तरह से चोरी ही है। अब जो प्रकरण उसके विरुद्ध पंजीबद्ध किए गए हैं, उनमें उसे ‘कई जन्मों’ की कैद हो सकती है।

देश में बैंक घोटाले और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव कोष में अनियमितताओं की खबरों ने लोगों में सरकार के प्रति भरोसा कम किया है। इस तरह के अनेक मामले हैं, जिनमें मीडिया से जुड़े लोगों और पूर्णकालिक संपादकों तथा पत्रकारों को सताया गया है।

अब इसके बाद अगर आपस में होड़ वाले समाचार पत्र-द टेलीग्राफ, द एडवरटाइजर, द सिडनी मॉर्निंग हेरॉल्ड, द क्रॉनिकल, फाइनेंशियल रिव्यू, द एज, द हेरॉल्ड, सन, द ऑस्ट्रेलियन, द केनबरा टाइम्स और द कूरियर मेल एक मंच पर आकर सरकार के इन फैसलों को गलत ठहरा रहे हैं तो मान लेना चाहिए कि अचानक उन्हें किसी पागल कुत्ते ने नहीं काटा है। वे पहले पन्ने को काला रंग देकर सिर्फ दमन का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि ऑस्ट्रेलिया की अवाम और प्रतिपक्ष को भी आगाह कर रहे हैं। इन दिनों इन दो महत्वपूर्ण मंचों से सत्ता के रवैए पर असहमति का स्वर बुलंद नहीं हुआ तो लोकतंत्र को टिकाने के लिए मजबूत स्तंभ किस मंडी में मिलेंगे, कोई नहीं कह सकता। विपक्ष की ओर से अभी तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में फिलहाल कोई ऐलान नहीं आया है।

वैसे तो ऑस्ट्रेलियाई सरकार के इस बयान से कौन असहमत हो सकता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। अगर मीडिया नहीं तो सरकार को भी कानून से कोई विशिष्ट छूट पाने का अधिकार नहीं है। लोकतांत्रिक प्रणाली किसी भी निर्वाचित सरकार को यह हक नहीं देती कि वह शासन तंत्र के लिए बनाए गए संविधान को तोड़ मरोड़कर अपने हित में इस्तेमाल करे। यदि जनता के नुमाइंदे अपने ही मतदाताओं को जानने का अधिकार नहीं देना चाहते और पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाते हैं तो वे पद पर बने रहने का हक खो चुके हैं। इसी महीने वहां हुए एक सर्वेक्षण में 87 फ़ीसदी नागरिकों ने ऑस्ट्रेलियन सरकार के इस रुख से असहमति जताई है। मीडिया समुदाय से एक भी साक्ष्य नहीं है जिसमें उसने अपने को कानून से ऊपर समझने की मानसिकता दिखाई हो या अपने लिए संविधान में किसी विशिष्ट स्थान की मांग की हो।

विडंबना है कि इन दिनों संसार के प्रतिष्ठित लोकतंत्र एक ऐसे मोर्चे पर डटे दिखाई देते हैं, जिनका सामना तानाशाही के घुड़सवारों से हो रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना पहला कार्यकाल शुरू करते ही अनेक मीडिया घरानों के सामने म्यान से अपनी तलवार निकाल ली थी। अब तक उनकी भवें तनी हुई हैं। अमेरिकी प्रेस ने लगातार उनके पूर्वाग्रही रवैए पर सवाल उठाए हैं। मध्य पूर्व के अनेक मुल्कों में अखबारनवीसी के जोखिम जगजाहिर हैं। चीन का शासन तंत्र तो निष्पक्ष पत्रकारिता के प्रति क्रूर रवैए के लिए कुख्यात है। ताज्जुब है कि इस विचित्र तंत्र को लेकर सारे विश्व ने चुप्पी साधी हुई है।

भारत में यदाकदा अधिनायकवादी प्रवृतियां सर उठाती रही हैं। आपातकाल के बाद बिहार प्रेस बिल से लेकर मानहानि विधेयक और मौजूदा दौर तक निष्पक्ष पत्रकारिता करना विकराल चुनौती बन चुकी है। जनता और प्रतिपक्ष की भूमिका ऐसे अवसरों पर महत्वपूर्ण हो जाती है। भारतीय विचारक संपादक राजेंद्र माथुर ने अनेक अवसरों पर पत्रकारों की भूमिका को लेकर स्पष्ट राय व्यक्त की थी। उनका कहना था कि जब पत्रकारिता को अपने निष्पक्ष धर्म का निबाहना कठिन हो जाए और उसे लगे कि किसी न किसी पक्ष में जाना ही पड़ेगा तो उसे जनता के साथ खड़ा हो जाना चाहिए। यह कसौटी इकतरफा नहीं है, क्योंकि भारत में जब भी पत्रकारिता को कुचलने के प्रयास हुए तो अवाम ने मीडिया का साथ दिया है। बशर्ते मीडिया के अपने निजी स्वार्थ न हों।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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