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'छियालीस साल की पत्रकारिता में पहली बार मैंने इस तरह की विभाजन रेखा इस बरस देखी'

स्वभाव से मैं कभी भी निराशावादी नहीं रहा। जिंदगी में कई बार आशा और निराशा के दौर आए और चले गए, लेकिन यह साल जिस तरह पत्रकारिता और पत्रकारों को बांटकर जा रहा है, वह अवसाद बढ़ाने वाला है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago

राजेश बादल।।

स्वभाव से मैं कभी भी निराशावादी नहीं रहा। जिंदगी में कई बार आशा और निराशा के दौर आए और चले गए, लेकिन यह साल जिस तरह पत्रकारिता और पत्रकारों को बांटकर जा रहा है, वह अवसाद बढ़ाने वाला है। ऐसा लगता है कि यह दौर थोड़ा लंबा चलेगा। पर, जब यह कुहासा छंटेगा, तब तक पत्रकारिता को बड़ा नुकसान हो चुका होगा। इस साल ने भारत के तथाकथित चौथे स्तंभ को जिस तरह खंडों में विभाजित किया है, वह हुक्मरानों की सेहत के लिए तो फायदेमंद है, मगर लोकतंत्र की नींव को सौ फीसदी कमजोर करने वाला है।

अखबारों के संपादक अब कसमसाते हुए अपने संस्करण निकालते हैं। संपादकीय लिखते हुए विषय नहीं, बहुत सारी लक्ष्मण रेखाएं दिमाग के आर-पार जाती हैं। तमाम टीवी चैनल्स के मुखिया जानते हैं कि वे अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। अब उनके सामने अपने हित सर्वोपरि होते हैं। चैनल मालिक अपना हित देखता है और पत्रकार अपना। वह मालिक के बड़े जूते में अपना पैर डाल देता है।

यही वजह है कि पत्रकारिता के हित हाशिए पर हैं। आज महात्मा गांधी जैसा साहस किसके पास है, जो 1919 में अंग्रेजी शासकों के कानून की धज्जियां उड़ाते हुए अखबार निकाल सकते थे और ऐलान कर सकते थे कि न मैं परदेसी शासकों से समाचार पत्र निकालने की इजाजत लूंगा और न ही एक भी शब्द लिखने की अनुमति मांगूंगा। आजादी के बाद भी राजेंद्र माथुर, गिरिलाल जैन, सुरेंद्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी जैसे रौशनदान हमारे सामने रहे। उनके रहते भी तमाम सियासी और बाजार के दबाव होते थे, लेकिन उनका होना ही इन दबावों का विनाश कर देता था।

छियालीस साल की पत्रकारिता में पहली बार मैंने इस तरह की विभाजन रेखा इस बरस देखी। कभी गोरी हुकूमत ने अपने स्वार्थों के लिए हिंदुस्तान के समाज को बांट दिया था। मौजूदा कालखंड भी सियासत के हाथों हमें बांट रहा है और हम बेखबर हैं। हम अपने घर में छिपे इस अदृश्य दुश्मन को कैसे पहचानें? इस साल यह अपने सबसे विकराल रूप में सामने आया।

किससे तू जंग छेड़ता, कुछ गौर से तो देख/

है दुश्मनों की फौज, तेरे घर में छिपी हुई/

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)


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