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‘विश्वविद्यालयों में एक्टिविज्म को लेकर हमें समझनी होगी ये अहम बात’
प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा। यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा
डॉ. सिराज कुरैशी 6 years ago
डॉ. सिराज कुरैशी, वरिष्ठ पत्रकार।।
आगरा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में आए उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने बीएचयू में होने वाले आंदोलन पर कटाक्ष करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि भाषा को जाति-वर्ग से दूर रखते हुये समझा जाये कि विश्वविद्यालय-कॉलेज और स्कूल ही राष्ट्रीय निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। इन संस्थानों में भाषा और जाति-वर्ग को लेकर जो विद्यार्थी आंदोलन करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिये।
इसी तरह की बात एक सीनियर सिटीजन ने छात्रों से कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का तात्पर्य केवल एक निश्चित भूभाग में स्थित किसी भौतिक अवसंरचना से नहीं होता और न ही हम इसका मूल्यांकन वहां मिलने वाली आर्थिक सुविधाओं से कर सकते हैं, जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है। यह सौ प्रतिशत सच है कि जब किसी विश्वविद्यालय में सस्ती शिक्षा की वकालत की जाती है तो उसका अर्थ किसी चैरिटी को संचालित करना नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की परियोजना के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण को धार देने के समान कहा जा सकता है। अगर बीएचयू या एएमयू की गतिविधियों पर विशेष गौर किया जाये तो यह इस तरह के शिक्षा संस्थान कहे जा सकते हैं, जहां पढ़ाई कम तथा ‘एक्टिविज्म’ पर अधिक ध्यान देते हैं। हमें ऐसे विश्वविद्यालयों की गतिविधियों को देखने के बाद समझना होगा कि जिसको हम ‘एक्टिविज्म’ कहकर उपहास उड़ाते हैं, वह दरअसल शिक्षा का ही रूप होता है, जो अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष के रूप में व्यक्त होता है।
ऐसी परिस्थिति से अनुमान लगाया जाता है कि इस तरह की ‘एक्टिविज्म’ परिस्थितियां सुधार की वाहक न होकर कहीं पूर्व निर्धारित राजनीतिक विचारों की पुनरावृत्ति बनकर न रह जाएं। दिल्ली स्थित जेएनयू की गतिविधियों को उदाहरण के रूप में कहा जा सकता है। यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि बीएचयू, एएमयू, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों को जो सुविधायें मिल रही हैं और उनके बदले मिलने वाले अनुदान का संतुलन बिगड़ा हुआ है। ऐसे विश्वविद्यालयों के उद्देश्यों का एक बार अवश्य स्मरण करना चाहिये।
एक समाजशास्त्री ने जब मुझसे कहा कि एक विश्वविद्यालय, चाहे वह कितना भी उपयोगितावादी क्यों न हो, यदि वह अपने आदर्श, मौलिक सच, सौंदर्य और मानव मस्तिष्क को सुसंस्कृत करने के लिये अपनी खोज को छोड़ देता है, तो उसे विश्वविद्यालय ही नहीं कहा जा सकता। अगर इसी को सरल रूप में कहें तो रोजगार उत्पन्न करना, विश्वविद्यालय नहीं रह जाता, जबकि व्यावहारिकता का निषेध नहीं बल्कि इसे परिष्कार के उदात्त स्तर पर ले जाना ही एक विश्वविद्यालय की विशेषता होनी चाहिये। इसी को कह सकते हैं कि हम विश्वविद्यालय कैम्पस को सिर्फ रोजगार की आस से ही नहीं देखें, बल्कि उसके सभ्यतागत विकास की शक्ति को भी चिन्हित करें।
यह भी पूरी तरह सच है कि हम किसी भी तर्क से एक गरीब देश में महंगी उच्च शिक्षा का पक्ष-पोषण नहीं कर सकते, वर्तमान शिक्षा ही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे आसानी से ऊपर चढ़ा जा सकता है, इसलिये राज्यों की भी जिम्मेदारी है कि देश के गरीब एवं वंचित नागरिकों की पहुंच इस पीढ़ी तक सुनिश्चित कराएं। उच्च शिक्षा केवल मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं है, बल्कि समावेशी विकास का एक टूल है, इसका स्वरूप बने रहना ही बेहतर होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी का यह मंत्र देश के राजनेताओं के साथ-साथ हर सियासतदान को ध्यान में रखना होगा कि ‘सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास।‘ यही मंत्र देश की उन्नति का पहिया होगा। अगर व्यक्ति ने उच्च शिक्षा ग्रहण कर ली और अच्छी नौकरी भी पा ली, परन्तु मोदीजी का मंत्र दिमाग में नहीं रखा तो मेरा विश्वास है कि न ही वह व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता और न ही देश-प्रदेश एवं अपने जिले को आगे बढ़ा सकता है। यही वजह है कि स्वयं मेादीजी इस मंत्र को ही लेकर देश को विश्व पटल की प्रथम पंक्ति में ला रहे हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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