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वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष चतुर्वेदी के नजरिये से जानिए साल 2022 की कुछ खट्टी-मीठी यादें
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समाचार4मीडिया ब्यूरो 3 years ago
आशुतोष चतुर्वेदी।।
देश के सभी अखबार कागज के दामों में अभूतपूर्व वृद्धि के कारण संकट के दौर से गुजर रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस संकट में आग में घी का काम किया है। हालांकि, कोरोना काल के दौरान ही अखबारी कागज की किल्लत शुरू हो गई थी। इस दौरान दुनिया भर में अनेक पेपर मिल बंद हो गईं, जिसके कारण अखबारी कागज की कमी हो गई और इसकी कीमतों में भारी वृद्धि होनी शुरू हो गई थी।
यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर तमाम प्रतिबंध लग गए, जिससे रूस से अखबारी कागज की आपूर्ति पूरी तरह से बंद हो गई। इससे रही सही कसर भी पूरी हो गई है। भारत अपनी अखबार कागज की जरूरतों का 50 फीसदी से ज्यादा विदेश से आयात करता है, बाकी 50 फीसदी देश की अखबारी मिलों से आपूर्ति होती है।
आप पसंद करें या न करें, न्यू मीडिया से आप बच नहीं सकते हैं। अखबार हैं और रहेंगे। न्यूज चैनल्स हैं और रहेंगे, लेकिन मोबाइल पर वॉट्सऐप या फेसबुक के जरिये जो सूचनाएं आप तक पहुंच रही हैं, वे लगातार बढ़ेंगी। फेक न्यूज और प्रोपेगंडा आज के कड़वे सच हैं। ऐसे में प्रामाणिक खबरों की जरूरत बढ़ेगी, लेकिन यह जान लीजिए कि लोग आज भी अच्छी पत्रकारिता को महत्व देते हैं और आपदाओं अथवा बड़ी घटनाओं पर समाचार माध्यमों से चिपके रहते हैं।
लोग समाचार पढ़ना-देखना चाहते हैं, लेकिन वे तत्काल इसे जानना चाहते हैं। यूक्रेन युद्ध का उदाहरण हमारे सामने हैं। देश के टीवी पत्रकारों ने जान हथेली पर रखकर युद्धभूमि से शानदार रिपोर्टिंग की और लोगों ने इसे सराहा। कोरोना काल से पहले मुझे ‘बीबीसी’ के लंदन में आयोजित एक सेमिनार में शामिल होने का मौका मिला। उसमें एक बात बड़ी दिलचस्प सामने आयी कि कंटेट अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका प्रचार प्रसार भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक हैं।)
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