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सिर्फ चुनाव में क्यों याद आता है संविधान : प्रो. संजय द्विवेदी
संविधान सभा को इस बात की जानकारी थी, कि संविधान को नए सूत्रों में पिरोना होगा। एक गतिशील विश्व मे, यह जनता और समग्र राष्ट्र की सेवा करने का सर्वोत्तम माध्यम बनेगा।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 3 months ago
प्रो. संजय द्विवेदी, पूर्व महानिदेशक, भारतीय जन संचार संस्थान।
देश में जब भी चुनाव आते हैं, संविधान की याद आती है। गत लोकसभा चुनावों में संविधान बदलने के शिगूफे से विपक्ष को अनेक स्थानों पर चुनावी लाभ भी मिला। अब एक बार फिर बिहार चुनाव के बहाने संविधान चर्चा में है। जबकि भारत के संविधान की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसका विचार-दर्शन चिरस्थाई है, लेकिन इसका ढांचा और अनुच्छेद लचीले हैं।
हमारे संविधान निर्माता समय के साथ अनुच्छेदों के संशोधन और परिवर्तन के लिए भावी पीढ़ी को पर्याप्त शक्ति प्रदान करने के मामले में प्रबुद्ध और दूरदर्शी थे। हमारा संविधान गतिहीन नहीं है, बल्कि एक सजीव दस्तावेज है। संविधान सभा को इस बात की जानकारी थी, कि संविधान को नए सूत्रों में पिरोना होगा। एक गतिशील विश्व मे, यह जनता और समग्र राष्ट्र की सेवा करने का सर्वोत्तम माध्यम बनेगा। भारतीय संविधान को हमने अनेकों बार संशोधित किया है, जिससे यह परिलक्षित होता है कि हम कितनी सक्रियता से यह सुनिश्चित करने में लगे हैं, कि तेजी से रूपांतरित हो रहे इस देश में इसकी प्रासंगिकता कम न पड़ जाए।
संविधान निर्माताओं ने अनुभव किया था कि संविधान, चाहे कितना बढ़िया लिखा गया हो और कितना बड़ा हो, अमल में लाए और मूल्यों का अनुकरण किए बिना उसका कोई अर्थ नहीं है। इसलिए हमने भावी पीढ़ियों पर विश्वास जताया है। संविधान लोगों को उतना ही सशक्त बनाता है, जितना लोग संविधान को सशक्त बनाते हैं। जब व्यक्ति और संस्थाएं पूछती हैं कि संविधान ने उनके लिए क्या किया है और इसने उनकी क्षमता को कितना बढ़ाया है, उन्हें यह भी विचार करना चाहिए कि उन्होंने संविधान के अनुपालन के लिए क्या किया है?
उन्होंने इसके मूल्य तंत्र के समर्थन के लिए क्या किया है? संविधान का अर्थ ‘हम लोग’ हैं और ‘हम लोग, संविधान’ हैं। भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति और समुदाय को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार देने का वादा करता है और उन्हें किसी प्रकार के भेदभाव से भी बचाता है। हमने इसे हमेशा बनाए रखने और प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुनिश्चित करने का संकल्प गणतंत्र की शुरुआत में ही लिया था। यह हमारी प्रगति का मूल्यांकन और विश्लेषण करने का भी समय है कि हमने आम आदमी के लिए इस वादे को कितने अच्छे तरीके से निभाया है।
राष्ट्र केवल सीमाओं, प्रतीकों और संस्थाओं का समूह नहीं है, बल्कि राष्ट्र उसके लोगों में निहित होता है। राष्ट्र की तीन शाखाओं - न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के संबंधों को खोजते हुए इनके जटिल और नाजुक संतुलन का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। सभी एक समान हैं। इन्हें अपनी स्वतंत्रता के प्रति जागरूक होना चाहिए तथा स्वायतत्ता की रक्षा करने का प्रयास करना चाहिए। हमारे स्तंभों में से प्रत्येक स्तंभ को अपनी शक्तियों के प्रयोग में स्वतंत्र होने की आवश्यकता है, लेकिन राष्ट्रीय एकता, अखंडता और खुशहाली के लिए संगठित रूप से अन्य दो स्तंभों के साथ कड़ी के रूप काम करने की भी जरूरत है।
पिछले आठ दशकों में हमारा लोकतांत्रिक अनुभव सकारात्मक रहा है। अपनी इस यात्रा में हमें अत्यंत गौरव के साथ पीछे मुड़ कर देखना चाहिए कि हमारे देश ने, न केवल अपने लोकतांत्रिक संविधान का पालन किया है, बल्कि इस दस्तावेज में नए प्राण फूंकने और लोकतांत्रिक चरित्र को मजबूत करने में भी अत्यधिक प्रगति की है। हमने 'जन' को अपने 'जनतंत्र' के केंद्र में रखा है और हमारा देश न केवल सबसे बड़े जनतंत्र के रूप में, बल्कि एक ऐसे देश के रूप में उभर कर सामने आया है, जो निरंतर पल्लवित होने वाली संसदीय प्रणाली के साथ जीवंत और बहुलतावादी संस्कृति का उज्ज्वल प्रतीक है।
हमने संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप एक समावेशी और विकसित भारत के निर्माण के लिए न केवल अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों को साकार करने पर ध्यान केंद्रित किया है, बल्कि हम शासन-प्रणाली में भी रूपांतरण कर रहे हैं। यह वास्तव में एक आदर्श परिवर्तन है, जिसमें लोग अब निष्क्रिय और मूकदर्शक या 'लाभार्थी' नहीं रह गए हैं, बल्कि परिवर्तन लाने वाले सक्रिय अभिकर्ता हैं। जब तक हम में से प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं करेगा, तब तक अन्य लोगों के अधिकारों को मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता।
भारत के पास ऐसी बहुत सी शक्तियां और क्षमताएं हैं, जो हमें उच्च विकास के मार्ग की ओर प्रेरित कर सकती हैं। हमारा समृद्ध मानव संसाधन उनमें से एक है। हमारे पास सक्षम सिविल सेवा के रूप में एक मजबूत ढांचा है, जिसे सरदार पटेल के नेतृत्व में हमारे संविधान निर्माताओं ने बनाया था। हमारी प्रमुख निष्ठा हमारे संविधान के मूल्यों तथा हमारे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास के फायदों को समाज के निचले पायदान तक ले जाने की होनी चाहिए। इसके लिए, हमें अधीनस्थ संस्थानों के स्तर को उठाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए और उन्हें सभी क्षेत्रों की उच्च संस्थाओं के बराबर लाना चाहिए।
यदि हम राष्ट्रीय उद्देश्यों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन निष्ठा एवं प्रतिबद्धता के साथ करें, तो विकास पथ पर देश तीव्र गति से अग्रसर होगा और हमारा लोकतंत्र ओर अधिक परिपक्व लोकतंत्र बनेगा। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विश्व में हमारा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हो। हमें 'विचारशील' व्यक्ति भी बनना चाहिए और यह देखना चाहिए कि हम मौजूदा प्रक्रियाओं एवं प्रणालियों को कैसे 'सुधार' सकते हैं। भारत अपने इतिहास के ऐसे महत्वपूर्ण समय में हैं, जहां हम एक प्रमुख विश्व अर्थव्यवस्था के रूप में निरंतर विकास कर रहे हैं।
हम लगातार अपने लोकतंत्र को कार्यशील बनाए हुए हैं और यह सुनिश्चित करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं कि इसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। यही समय है कि हम संविधान में प्रस्तावित कर्तव्यों को याद रखें। यही समय है कि भारत का प्रत्येक नागरिक इस उत्साहपूर्ण भावी यात्रा का हिस्सा बनने की शपथ ले। आज जब देश अमृतकाल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाशकर नए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो ये सिद्धि सबके साथ से ही पूरी होगी।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
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