डिजिटल युग में हिंदी मीडिया के समक्ष अवसर और चुनौतियां: प्रो. (डॉ.) के जी सुरेश

डिजिटल युग में हिंदी मीडिया अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर डिजिटल युग में हिंदी मीडिया के समक्ष अवसर और चुनौतियां की समीक्षा करना उचित होगा।

विकास सक्सेना by
Published - Friday, 10 January, 2025
Last Modified:
Friday, 10 January, 2025
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प्रो. (डॉ.) के जी सुरेश ।।

डिजिटल युग में हिंदी मीडिया अपनी  महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर डिजिटल युग में हिंदी मीडिया के समक्ष अवसर और चुनौतियां की समीक्षा करना उचित होगा। वर्तमान में हिंदी में प्रमुख समाचार पत्रों समेत कई ऑनलाइन समाचार पोर्टल हैं तो दूसरी और हिंदी मीडिया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी सक्रिय है, जैसे कि फेसबुक, ट्विटर, और यूट्यूब। कई हिंदी समाचार पत्र और चैनल अपने मोबाइल ऐप्स भी सफलतापूर्वक चला रहे हैं, जिससे पाठकों को ताज़ा खबरें और अपडेट्स मिलते हैं।

हिंदी के पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों के बदलते प्रौद्योगिकी की दिशा में सकारात्मक रुझान इसी बात से स्पष्ट होता है कि हिंदी में पॉडकास्ट की लोकप्रियता बढ़ रही है, जिसमें विभिन्न विषयों पर चर्चा और विश्लेषण किया जाता है। यही नहीं, हिंदी मीडिया वीडियो कंटेंट पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिसमें समाचार, विश्लेषण, और मनोरंजन संबंधी वीडियो शामिल हैं। मगर हिंदी मीडिया की यह प्रगतिशील यात्रा निष्कंटक भी नहीं है। इसके समक्ष एक बड़ी चुनौती डिजिटल साक्षरता की कमी है, जिससे पाठकों को ऑनलाइन सामग्री तक पहुंचने में परेशानी होती है। साथ ही सोशल मीडिया पर झूठी खबरों और अफवाहों का फैलना एक बड़ी चुनौती है, जिससे हिंदी मीडिया की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है। असामाजिक और राष्ट्र विरोधी तत्व छद्म समाचार और आख्यान के माध्यम से समाज में भ्रम और नफरत पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं । मीडिया साक्षरता के अभाव में यह निश्चित ही चिंता का विषय है।

प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिकरण और पाठकों, विशेष कर युवा पीढ़ी के बढ़ते हिंदी प्रेम के चलते, ऑनलाइन मीडिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, जिसके चलते हिंदी मीडिया को अपनी सामग्री और प्रस्तुति में सुधार करना पड़ रहा है। यह निश्चित ही पाठकों के दृष्टि से सकारात्मक है किंतु ऑनलाइन मीडिया के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है, जिससे हिंदी मीडिया, विशेष कर लघु और मध्यम प्लेटफॉर्म्स को अपनी सामग्री और सेवाओं को बनाए रखने में परेशानी हो रही है। 

निश्चित ही वर्तमान परिस्थितियों बहुत सकारात्मक नहीं है लेकिन यह भी सत्य है की ऑनलाइन मीडिया में विज्ञापन राजस्व की संभावनाएं अधिक हैं, जिससे हिंदी मीडिया को अपनी आय बढ़ाने का अवसर मिलेगा। यही नहीं, हिंदी मीडिया को प्रायोजित सामग्री के माध्यम से आयb अर्जित करने का विकल्प तलाशने होंगे। पेड सामग्री की संभावनाएं भी अधिक हैं, जिससे हिंदी मीडिया अपनी आय बढ़ा सकती है। भारत में सब्सक्रिप्शन मॉडल बहुत ज्यादा सफल नहीं साबित हुआ है परंतु एमेजॉन, फ्लिपकार्ट जैसे ऐप्स की सफलता से यह साबित होता है कि हिंदी मीडिया ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के साथ एकीकरण करके आय अर्जित कर सकती है।

आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस और अन्य नवाचारों के माध्यम से ऑनलाइन मीडिया में डेटा विश्लेषण की संभावनाएं अधिक हैं, जिससे हिंदी मीडिया कम खर्चे में अपनी सामग्री और सेवाओं को बेहतर बना सकती हैं। प्रौद्योगिकी और सामग्री में विविधता की दृष्टि से निश्चित ही हिंदी डिजिटल मीडिया का भविष्य उज्जवल है लेकिन साथ ही अपने विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए उसे विशेष प्रयास करने होंगे। तभी हम अपने लोकतांत्रिक भूमिका सही अर्थों में निभा पायेंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया गुरु हैं)

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Cannes Lions से क्या सीख सकता है Goafest? जानिए किन बदलावों की है जरूरत

Cannes सिर्फ फ्रांस के खूबसूरत समुद्री इलाके French Riviera मशहूर नहीं बना, बल्कि इसलिए बड़ा और प्रतिष्ठित बना क्योंकि वहां क्रिएटिविटी, यानी नए और बेहतरीन आइडियाज को बहुत गंभीरता से लिया जाता है।

Samachar4media Bureau by
Published - Tuesday, 26 May, 2026
Last Modified:
Tuesday, 26 May, 2026
DrSandeepGoel

डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन,

पिछले कुछ वर्षों में मैंने कई बार Cannes Lions, Cannes Film Festival और MIPTV जैसे बड़े इंटरनेशनल इवेंट्स में हिस्सा लिया है। Cannes सिर्फ इसलिए मशहूर नहीं बना क्योंकि वह फ्रांस के खूबसूरत समुद्री इलाके French Riviera में होता है। Cannes इसलिए बड़ा और प्रतिष्ठित बना क्योंकि वहां क्रिएटिविटी, यानी नए और बेहतरीन आइडियाज को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। वहां इसे एक बड़े ग्लोबल और प्रोफेशनल मुकाबले की तरह देखा जाता है, जहां क्वालिटी और स्टैंडर्ड सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।

Goafest के पास भी बीच और अच्छी लोकेशन है, लेकिन सिर्फ इतनी चीजों से कोई इवेंट बड़ा नहीं बनता। Goafest में अभी कई चीजों की कमी है और अब, जब यह अपने 20वें साल में पहुंच गया है, तो इसे नए तरीके और नई सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।

यहां बताया गया है कि क्या कॉपी किया जा सकता है, भारतीय बजट और लोगों की पसंद के हिसाब से:

कैटेगरी और जूरी में सख्ती

कान्स क्या करता है:

यहां सिर्फ 30 बड़ी अवॉर्ड कैटेगरीज होती हैं और हर कैटेगरी के इंटरनेशनल स्तर के स्टैंडर्ड तय होते हैं। जूरी में आधे से ज्यादा लोग विदेशों से होते हैं और 40% से ज्यादा महिलाएं होती हैं। कौन जज होगा और क्या नियम होंगे, यह पहले से सार्वजनिक कर दिया जाता है। वहां “uncle quota” यानी सिर्फ पुराने रिश्तों या जान-पहचान के आधार पर लोगों को जगह नहीं मिलती। बार-बार वही लोग नहीं दिखते और बड़े नेटवर्क्स का दबदबा भी सीमित रहता है।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • Abbys को मर्ज करें। “Digital Craft in Subcategory 3B” जैसी चीजें खत्म हों। एक Film, एक Digital, एक Design, एक Effectiveness। कम कैटेगरी = ज्यादा प्रतिष्ठा।
  • Blind pre-judging और live Grand Prix debates हों। कम से कम एक कैटेगरी की फाइनल जूरी चर्चा लाइव दिखाई जाए। विवाद से भरोसा बढ़ता है। अभी किसी को नहीं पता चलता कि कौन क्यों जीता।
  • जूरी को ट्रिप नहीं, सम्मान दिया जाए। हर ट्रैक में 3 ग्लोबल CDs और 3 भारतीय CMOs को बुलाया जाए। एजेंसी ECDs और CEOs अपने ही नेटवर्क को जज करते नजर नहीं आने चाहिए।

Lanyard नहीं, सीख सबसे जरूरी

कान्स क्या करता है:

असल प्रोडक्ट वहां का कंटेंट है। 4 दिन, 8 स्टेज और 400 से ज्यादा सेशंस। लोग वहां सिर्फ घूमने नहीं, सीखने जाते हैं।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • “Cannes on a Budget” ट्रैक हो। 10 Lion-winning campaigns को उनकी असली टीम के साथ समझाया जाए। सिर्फ CMO ज्ञान नहीं, बल्कि storyboard से लेकर sales data तक सब बताया जाए।
  • Craft Labs शुरू हों। 90 मिनट की workshops, जिनमें सिर्फ 40 लोग हों। जैसे “6-second reels के लिए writing”, “risk-averse client को bold काम कैसे बेचें”, “अच्छे AI Midjourney prompts कैसे बनाएं।” यहां panels नहीं, सिर्फ practitioners और laptops हों।
  • Paid speaking slots बंद हों। अगर किसी ब्रांड ने stall लिया है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे stage भी मिल जाए। Cannes में sponsor और content को अलग रखा जाता है, इसलिए लोग वहां ध्यान से सुनते हैं।

युवा टैलेंट को मुख्य मंच मिले

कान्स क्या करता है:
Young Lions competitions, Roger Hatchuel Academy और See It Be It जैसे प्रोग्राम्स के जरिए नई पीढ़ी को आगे लाता है।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • “Abbys Young Gun” शुरू हो। 30 साल से कम उम्र की टीमों को Day 1 पर असली client brief मिले और Day 3 पर live presentation हो। विजेता को ₹5 लाख मिलें और वही campaign सच में इस्तेमाल भी हो। एजेंसियां अपनी टीम भेजने के लिए उत्साहित होंगी।
  • “Speed Mentoring” beach हो। हर टेबल पर 1 CD, 1 planner और 1 film director। 10 मिनट के छोटे सेशन। सिर्फ portfolio books, business cards नहीं।
  • Scholarship के तहत 100 passes दिए जाएं। अगर कोई Tier-3 शहर से है और ₹40,000 का पास नहीं खरीद सकता, तो GoaFest उसका खर्च उठाए। इससे लंबे समय की loyalty बनेगी।

Effectiveness को भी महत्व मिले

कान्स क्या करता है:
Creative Effectiveness Lions को CMOs, CFOs और consultancies जज करते हैं। वहां third-party data जरूरी होता है।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • “Business Impact Abbys” शुरू हों। Data section जरूरी हो। 100 शब्दों में समस्या, 200 में idea और 500 में results, साथ में Nielsen/Kantar/BARC का proof।
  • “GoaFest Effectiveness Index” हर साल जारी हो। इसमें बताया जाए कि किन agencies और clients ने awards जीते और market share बढ़ाया। Award जीतने का मतलब सिर्फ LinkedIn पोस्ट नहीं, career growth भी होना चाहिए।

FOMO पैदा करें

कान्स क्या करता है: 

छोटे venues, लंबी queues, secret parties और limited-access talks। कमी ही उसकी खासियत बनाती है।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • बड़े ballrooms खत्म हों। 300 लोगों की “Cabana Sessions” हों, जहां Harit Nagpal, Uday Shankar और Josy Paul जैसे लोग बात करें। अगर miss किया तो miss किया। Recording 3 महीने बाद आए।
  • “Off-Goafest” की शुरुआत हो। एजेंसियों को unofficial events करने की आजादी मिले। Cannes में Edelman, Meta, Dentsu और TikTok तक beach takeovers करते हैं।
  • हर रात 9 बजे “Daily Wrap Reel” आए। 90 सेकेंड का वीडियो जिसमें दिन की सबसे अच्छी बात, सबसे बड़ी बहस और सबसे अच्छा idea हो। जो वहां नहीं है, उसे महसूस होना चाहिए कि वह कुछ miss कर रहा है।

Global बनें, लेकिन भारतीय भी रहें

कान्स क्या करता है:

90 देशों की entries आती हैं। जज Tokyo से São Paulo तक से आते हैं।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • “Bharat Lions” sub-fest हो। सिर्फ regional languages और non-metro audiences के campaigns के लिए।
  • SAARC देशों के लिए 50 passes reserved हों। Pakistan (अगर भारत सरकार अनुमति दे), Bangladesh, Sri Lanka, Nepal, Maldives और Bhutan की एजेंसियों को बुलाया जाए।
  • हर session में 1 global case और 1 Indian case जरूरी हो। Inferiority complex खत्म करना होगा।

Data को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी Cannes Champagne को लेता है

कान्स क्या करता है:
“Lions Creativity Report” जारी करता है जिसमें trends, themes और country rankings होती हैं।

Goafest को क्या करना चाहिए:

  • “State of Indian Creativity Report” 2027 में लॉन्च हो। इसमें बताया जाए कि कितनी entries AI-assisted थीं, कितनी purpose-driven थीं, scripts में सबसे ज्यादा कौन से शब्द आए, और spend बनाम metals का क्या रिश्ता रहा।
  • Entry data एक साल बाद anonymized form में public हो ताकि ISB/IIMs जैसी संस्थाएं study कर सकें कि भारत में क्या जीतता है।

आज जरूरत एक बड़े mindset shift की है:
Cannes curate करता है। GoaFest accommodate करता है।

Cannes 95% समय “ना” कहता है — entries को, speakers को, sponsors को। इसलिए वहां Lion जीतना मायने रखता है।

अगर GoaFest को भारत का Cannes बनना है, तो उसे “everyone-gets-a-trophy” festival होना बंद करना होगा।

2027 के लिए शुरुआत सिर्फ 3 चीजों से हो सकती है:

  • Abby categories को 200 से घटाकर 40 किया जाए।
  • ₹5 लाख प्राइज वाला Young Gun live brief शुरू हो।
  • कम से कम एक Grand Prix jury debate लाइव stream की जाए।

अगर यह हो गया, तो 2029 तक सवाल यह नहीं होगा कि “Goafest कितना Cannes जैसा है?” सवाल होगा, “Cannes, Goafest जैसा क्यों नहीं है?”

यह हो सकता है और होना चाहिए।

(डॉ. संदीप गोयल Rediffusion और Everest के Chairman हैं। वह Dentsu India & Middle East के पूर्व India JV Partner और Chairman रह चुके हैं, साथ ही Zee के पूर्व CEO भी हैं।)

 

 

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मीम से वोट तक की राह: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के लिए चुनावी राजनीति में ब्रैंडिंग की चुनौती

भारत में उभरते राजनीतिक व्यंग्य आंदोलनों में “कॉकरोच जनता पार्टी” (Cockroach Janta Party) ने जिस तरह लोगों का ध्यान खींचा है, वह काफी अलग और दिलचस्प माना जा रहा है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 25 May, 2026
Last Modified:
Monday, 25 May, 2026
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प्रभाकर मुंदकुर, वरिष्ठ विज्ञापन विशेषज्ञ ।।

सोशल मीडिया वाली राजनीति के दौर में सबसे बड़ी ताकत है लोगों का ध्यान खींचना। और भारत में उभरते राजनीतिक व्यंग्य आंदोलनों में “कॉकरोच जनता पार्टी” (Cockroach Janta Party) ने जिस तरह लोगों का ध्यान खींचा है, वह काफी अलग और दिलचस्प माना जा रहा है। यह एक ऐसा डिजिटल आंदोलन बन चुका है जिसने नफरत जैसी भावना को बहस में और मजाक को राजनीतिक टिप्पणी में बदल दिया है।

शुरुआत में यह सिर्फ सोशल मीडिया पर लोगों की नाराजगी दिखाने का तरीका था, लेकिन धीरे-धीरे यह एक पहचान वाला प्रतीक बन गया। यहां “कॉकरोच” यानी तिलचट्टा एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल हो रहा है- ऐसा जीव जो आसानी से खत्म नहीं होता और हर मुश्किल में बचा रहता है। इसी वजह से यह उन युवाओं से जुड़ रहा है जो पारंपरिक राजनीति से निराश हैं। 

सोशल मीडिया पर इस आंदोलन की ब्रैंडिंग काफी असरदार रही है। यह अलग है, तुरंत याद रह जाती है, देखने में आकर्षक है और लोगों की भावनाओं से जुड़ती है। डिजिटल दौर में वायरल होने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है, इसमें वे लगभग सभी मौजूद हैं। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या “Cockroach Janta Party” सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित रहने वाला एक विद्रोही समूह है, या यह आगे चलकर एक असली राजनीतिक पार्टी भी बन सकती है?

और अगर ऐसा होता है, तो क्या यह मीम कल्चर से निकलकर चुनावी राजनीति में टिक पाएगी? यहीं से असली चुनौती शुरू होती है।

सोशल मीडिया ब्रैंडिंग और चुनावी राजनीति में बड़ा फर्क

सोशल मीडिया पर राजनीति चलाने और असली चुनाव लड़ने के नियम बिल्कुल अलग होते हैं। सोशल मीडिया पर विवाद, प्रतीक और मजेदार कंटेंट तेजी से वायरल हो जाते हैं। लेकिन चुनावी राजनीति नियमों, कागजी प्रक्रिया और संस्थागत ढांचे से चलती है।

अगर कोई आंदोलन औपचारिक रूप से राजनीति में उतरना चाहता है, तो उसे भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के नियमों का पालन करना पड़ता है। सबसे पहले पार्टी रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया होती है। इसके साथ ही कोई भी संगठन यह मानकर नहीं चल सकता कि सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हुआ उसका प्रतीक उसे चुनाव चिन्ह के रूप में मिल ही जाएगा।

कॉकरोच’ चिन्ह ही सबसे बड़ी ताकत, लेकिन यही बन सकता है संकट

यहीं “Cockroach Janta Party” के सामने सबसे बड़ी ब्रैंडिंग चुनौती खड़ी होती है। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, राजनीतिक दल केवल उन्हीं चुनाव चिन्हों में से चुन सकते हैं जो आयोग की स्वीकृत सूची में मौजूद हों। “कॉकरोच” जैसा चिन्ह शायद उस सूची में नहीं है। ऐसे में अगर यह आंदोलन औपचारिक राजनीतिक पार्टी बनना चाहता है, तो उसे कोई दूसरा चुनाव चिन्ह अपनाना पड़ सकता है। यही सबसे बड़ा जोखिम है।

आज इस पूरे आंदोलन की पहचान ही कॉकरोच से बनी है। यह सिर्फ एक तस्वीर नहीं, बल्कि इसका पूरा संदेश है- व्यवस्था के खिलाफ विरोध, हर हाल में टिके रहना और एंटी-एलीट सोच।

अगर कॉकरोच हटा दिया जाए, तो यह आंदोलन अपनी वही पहचान खो सकता है जिसने इसे वायरल बनाया। मार्केटिंग की भाषा में कहें तो यह ऐसा होगा जैसे किसी बड़ी कंपनी से कहा जाए कि बाजार में उतरते समय वह अपना लोगो, पैकेजिंग और शुभंकर सब बदल दे।

क्या लोग नए चिन्ह को अपनाएंगे?

अब सवाल यह है कि क्या लोग उस भावनात्मक जुड़ाव को किसी नए चुनाव चिन्ह के साथ जोड़ पाएंगे? क्या सोशल मीडिया पर विद्रोह का प्रतीक बना कॉकरोच किसी सरकारी मंजूर चुनाव चिन्ह में बदलने के बाद भी उतना ही असरदार रहेगा?

इतिहास बताता है कि ऐसा करना आसान नहीं होता। राजनीति में किसी पार्टी की पहचान बार-बार दिखने वाले चुनाव चिन्ह और लोगों की पहचान से बनती है। भारत की बड़ी पार्टियों ने सालों तक मेहनत करके अपने चिन्ह लोगों के दिमाग में बैठाए हैं- कमल, हाथ, झाड़ू, साइकिल जैसे प्रतीक अब पहचान बन चुके हैं। इन चिन्हों की खास बात यह है कि पढ़े-लिखे हों या नहीं, लोग इन्हें तुरंत पहचान लेते हैं। ऐसे में अगर कोई नई पार्टी शुरुआत में ही अपना सबसे पहचान वाला प्रतीक छोड़ दे, तो उसे अपनी पहचान फिर से शुरू से बनानी पड़ेगी।  यही स्थिति “Cockroach Janta Party” की भी है।

आंदोलन बने रहना या पार्टी बनना?

इस समय “Cockroach Janta Party” एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। अगर यह सिर्फ सोशल मीडिया आंदोलन बनी रहती है, तो इसकी अलग पहचान, आजादी और डिजिटल दुनिया में लोकप्रियता बनी रह सकती है। लेकिन अगर यह असली राजनीतिक पार्टी बनती है, तो उसे नियमों और सिस्टम के हिसाब से कई समझौते करने पड़ सकते हैं। इससे इसकी मूल पहचान और आकर्षण कमजोर हो सकता है। यह आज की राजनीति की एक बड़ी सच्चाई भी दिखाता है- सोशल मीडिया पर वायरल होना और चुनावी राजनीति में सफल होना, दोनों अलग बातें हैं। हर वायरल आंदोलन चुनावी पार्टी नहीं बन सकता। 

लेकिन एक बात साफ है... 

चाहे “Cockroach Janta Party” कभी चुनाव लड़े या नहीं, उसने एक बड़ी बात जरूर साबित कर दी है। आज की राजनीति में सिर्फ विचारधारा ही नहीं, बल्कि प्रतीक और इमेज भी बहुत मायने रखते हैं, कई बार उससे भी ज्यादा।

एक अलग और अनोखा प्रतीक लोगों के दिमाग और समाज में वैसी जगह बना सकता है, जो पारंपरिक राजनीतिक संदेश अक्सर नहीं बना पाते।

हो सकता है कि “कॉकरोच” वाला यह आंदोलन कभी संसद तक पहुंचे या नहीं, लेकिन राजनीतिक ब्रैंडिंग और सोशल मीडिया राजनीति के एक अनोखे उदाहरण के तौर पर यह लोगों की सोच और राजनीतिक चर्चा का हिस्सा जरूर बन चुका है।  

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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भारत की राजनीतिक स्थिरता के दुश्मन अंदर या बाहर?

समय-समय पर विभिन्न प्रधानमंत्रियों और बड़े नेताओं ने यह आरोप लगाया कि विदेशी शक्तियाँ भारत की सरकार, राजनीति, अर्थव्यवस्था या राष्ट्रीय एकता को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।

Alok Mehta by
Published - Monday, 25 May, 2026
Last Modified:
Monday, 25 May, 2026
Alok Mehta ...

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और स्तंभकार।

'दुश्मन हैं हजारों यहां जान के, तुम रहना मगर पहचान के।' लता मंगेशकर ने यह मशहूर गीत 1962 के आसपास गाया था। वैसे 'ए मेरे वतन के लोगों' जैसे गीत की तरह यह देशभक्ति वाली फिल्म के गीत के बोल नहीं थे। यह प्रेम और रहस्य कथा वाली फिल्म 'बीस साल बाद' के गीत का अंश था। लेकिन भारत की राजनीतिक स्थिरता और देश विरोधी ताकतों के संदर्भ में यह बात इंदिरा गांधी से नरेंद्र मोदी तक के सत्ता काल में मुझ जैसे पत्रकारों को राजनेताओं या शीर्ष पर बैठे अधिकारियों, राजनयिकों से सुनने को मिलती रही है। इसलिए पिछले दिनों अचानक भारतीय लोकतंत्र को निशाना बनाकर सुदूर अमेरिका और यूरोप से मासूम कहे गए दो युवाओं द्वारा प्रतीकात्मक राजनीतिक हमलों से देश के अंदर ही नहीं, विदेशों में हंगामेदार चर्चा हो गई। जब हम जैसे लोग इसमें किसी षड्यंत्र की आशंका करते हैं, तो हमारे मित्र, परिजन अथवा असहमत और नाराज लोग हमें अकारण 'शंकालु' या बात का बतंगड़ बनाने वाला कहने लगते हैं।

फिर भी न हम स्वीकार कर सकते हैं और न ही कोई सही ढंग से किसी को विश्वास दिला सकता है कि यूरोप के छोटे से देश नार्वे की 26 वर्ष की एक अनजान सी कथित पत्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस देश की ऐतिहासिक यात्रा और यूरोप, एशिया, अमेरिका, रूस तक को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण वार्ताओं के दौर में अनर्गल सवालों से भारत विरोधी हंगामा ऐसे ही खड़ा कर देगी। फिर हंगामे की गूंज खत्म होने से पहले अमेरिका के बोस्टन या किसी शहर में बैठा तीस साल का भारतीय युवा अचानक सोशल मीडिया के बल पर एक झटके में 'कॉकरोच जनता पार्टी' घोषित कर डेढ़ करोड़ समर्थक तथा बेरोजगारी पर ज्ञापन सहित आंदोलन आदि की घोषणा क्या बिना सोचे-समझे, किसी का वरदहस्त रहे बिना कर सकता है?

नार्वे की कथित पत्रकार हेले लिंग ने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नार्वे पीएम से वार्ता के बाद केवल वक्तव्य के अवसर पर बिना किसी अनुमति के चिल्लाकर पूछा कि, 'हम आपकी बात पर कैसे विश्वास करें, जबकि भारत में स्थिति खराब है? वे सवालों के जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं?' स्वाभाविक है, इस तरह के प्रयास पर मोदीजी ने शांत रहकर आगे बढ़ना उचित समझा। जब सवाल विश्वास न करने से ही शुरू होगा, तो कोई नेता, राजनयिक या संत-महात्मा भी क्या समझाएगा? कहा जाता है कि मूर्ख या दुष्ट को सामान्य ढंग से समझाया नहीं जा सकता। फिर भी बाद में भारतीय राजनयिकों द्वारा आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में हेली लिंग को बुलाया गया। उसने फिर पूछा, "हमें आप (भारत) पर भरोसा क्यों करना चाहिए? क्या आप अपने देश में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने का प्रयास कर सकते हैं?" भारत ने इन आरोपों को खारिज करते हुए न्याय और स्वतंत्रता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया है। बहरहाल, खुद हेली ने स्वीकारा कि उसका इरादा ही मुद्दे को उछालना था। इधर भारत में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अगले ही क्षण इस बात को सोशल मीडिया पर उछाल दिया और भारत ही नहीं, यूरोप, पाकिस्तान, चीन तक मीडिया में सुर्खियां बन गईं।

प्रेस की आजादी में नार्वे को दुनिया में सबसे ऊंचे नंबर वन पर बताया जाता है। इस देश की आबादी करीब 56 लाख है। देश के सबसे बड़े अखबार की प्रसार संख्या करीब 1 लाख 72 हजार है। इस युवा महिला पत्रकार ने अपने को देगसेविसेन बताया, जिसका शाब्दिक अर्थ 'दैनिक अखबार' है और करीब बीस हजार प्रतियां छपती हैं। भारत में ऐसे अखबारों की संख्या सैकड़ों में होगी। यही नहीं, नार्वे के इस अखबार के राजनीतिक पूर्वाग्रह भी हैं। अपनी पुरानी वामपंथी वैचारिक झुकाव को काफी हद तक बनाए रखा है। यह झुकाव उसके लंबे समय तक लेबर पार्टी से जुड़े रहने के कारण माना जाता है, जहां अखबार वामपंथी नेताओं या समूहों से जुड़े विवादों को अपेक्षाकृत कम महत्व देता है। विशेष रूप से आर्थिक नीतियों, आप्रवासन (इमिग्रेशन) और कल्याणकारी योजनाओं जैसे मुद्दों पर सत्ताधारी पार्टी का विरोध करता है, जबकि सरकार परंपरागत रूप से अमेरिका और पश्चिमी गठबंधन के काफी करीब मानी जाती है। नाटो का संस्थापक सदस्य होने के कारण नॉर्वे की सुरक्षा नीति लंबे समय से अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साथ जुड़ी रही है।

दूसरी तरफ अमेरिका से 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) अभियान के पीछे अभिजीत दिपके हैं, जो 30 वर्षीय बोस्टन विश्वविद्यालय का छात्र हैं। 2020 से 2023 तक उसने दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) के साथ मिलकर सोशल मीडिया और चुनाव प्रचार का काम संभाला। याद करें, आम आदमी पार्टी (आप) - या कॉमन मैन पार्टी - को 26 नवंबर 2012 को दिल्ली के जंतर-मंतर वेधशाला में अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों द्वारा औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया। केजरीवाल ने कहा था कि उनकी पार्टी "भ्रष्टाचार, लोकतंत्र और भाई-भतीजावाद" पर कभी समझौता नहीं करेगी। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान की उनकी पहली वेबसाइट अमेरिका में बैठे उनके मित्र संभाल रहे थे। तब चुनाव में भी विदेशों से समर्थक आए थे।

इस पूरे हंगामे पर मेरी आशंका का आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार या भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता की बातों से नहीं है। किसी ने मुझसे कोई बात भी नहीं की। हाँ, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, नरसिंहा राव, इंदर कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए स्वयं अथवा उनके वरिष्ठ नेताओं (डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा सहित) से मुझे कई अवसरों पर यही बताया गया कि भारत विरोधी ताकतें हमारे देश में राजनीतिक स्थिरता से बहुत विचलित होकर उसे गड़बड़ाने के प्रयास विभिन्न तरीकों से करती हैं। इन ताकतों में चीन-पाकिस्तान से अधिक अमेरिकी व्यवस्था का एक प्रभावशाली वर्ग रहता है।

समय-समय पर विभिन्न प्रधानमंत्रियों और बड़े नेताओं ने यह आरोप लगाया कि विदेशी शक्तियाँ भारत की सरकार, राजनीति, अर्थव्यवस्था या राष्ट्रीय एकता को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। कभी यह आरोप सीधे किसी देश पर लगाया गया, तो कभी “विदेशी हाथ”, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों, खुफिया संगठनों, विदेशी फंडिंग या वैश्विक दबाव समूहों की ओर संकेत किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कई बार कहा है कि 'भारत के विकास और स्थिरता को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं।' “देश विरोधी”, “भारत विरोधी”, “टुकड़े-टुकड़े गैंग”, “अर्बन नक्सल”, “विदेशी ताकतें” जैसे शब्द राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने। मोदी ने कई भाषणों में कहा कि भारत के तेजी से उभरने से कुछ वैश्विक शक्तियाँ असहज हैं। भारत की आर्थिक और रणनीतिक प्रगति रोकने की कोशिश होती है। इस संदर्भ में विशेषज्ञों के तर्क रहे हैं कि भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका से प्रतिद्वंद्वी शक्तियाँ चिंतित हैं। दुष्प्रचार अभियान और अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग के जरिए दबाव बनाया जाता है। 2020-21 किसान आंदोलन के दौरान बताया गया कि कई विदेशी हस्तियों और संगठनों ने समर्थन किया। विदेशी तत्व आंदोलन को प्रभावित कर रहे हैं। भारत की छवि खराब करने की कोशिश हो रही है। हाल के वर्षों में कई बार यह आरोप लगाया गया कि कुछ विदेशी फंडेड एनजीओ भारत की नीतियों को प्रभावित करना चाहते हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत की नकारात्मक छवि पेश करता है। कानून के तहत कई संगठनों पर कार्रवाई भी हुई।

पहले प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सत्तर के दशक में कई बार “विदेशी शक्तियों” या “विदेशी हाथ” का उल्लेख करती रहीं। विशेषकर 1970 के दशक और 1980 के दशक में उन्होंने कई आंदोलनों और अस्थिरता के पीछे बाहरी ताकतों की भूमिका होने की बात कही। आपातकाल घोषित करने पर इंदिरा गांधी ने कहा कि देश के खिलाफ “गहरी साजिश” चल रही थी। उन्होंने कई भाषणों में कहा कि विदेशी शक्तियाँ भारत की एकता तोड़ना चाहती हैं। आर्थिक संकट और राजनीतिक अशांति को बाहरी समर्थन मिल रहा था। भारत को कमजोर करने के लिए प्रचार युद्ध चलाया जा रहा था। मीडिया में सीआईए की भूमिका पर लगातार चर्चा होती थी। 1980 के बाद सत्ता में रहने पर कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में बैठे खालिस्तान समर्थकों के फंडिंग नेटवर्क पर चिंता जताई गई।

राजीव गांधी के समय भी विदेशी हस्तक्षेप और अस्थिरता के मुद्दे उठे। राजीव गांधी सरकार ने लगातार कहा कि पाकिस्तान की ISI भारत को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने हथियारों की तस्करी और प्रशिक्षण शिविरों का मुद्दा उठाया। 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के बाद राजीव गांधी सरकार पर भारी दबाव पड़ा। सरकार का तर्क था कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियाँ दक्षिण एशिया की राजनीति को प्रभावित करना चाहती थीं। भारत की क्षेत्रीय भूमिका को चुनौती दी जा रही थी।

पी. वी. नरसिंह राव का कार्यकाल (1991-1996) भारत के इतिहास का अत्यंत संवेदनशील दौर था। भारत गंभीर आर्थिक संकट में था। कश्मीर और पंजाब में आतंकवाद सक्रिय था। इसी पृष्ठभूमि में नरसिंह राव ने कई बार विदेशी दबाव और अंतरराष्ट्रीय शक्ति राजनीति की चर्चा की। अमेरिकी दबाव में वह परमाणु परीक्षण नहीं कर पाए और फिर कभी अटल बिहारी वाजपेयी से कहा कि यह अधूरा काम वह करें। प्रधानमंत्री बनने पर अटलजी ने परमाणु परीक्षण करवाया। इसके बाद अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भी अमेरिकी दबाव के कारण परमाणु समझौते के लिए राजनीतिक समस्याएं झेलीं। सो, बाहरी दुश्मनों से खतरे सदा रहे और शायद रहेंगे। हाँ, भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंतरिक समस्याओं पर प्रतिपक्ष विरोध करे, तो कौन अनुचित कहेगा? वही तो लोकतंत्र मजबूत रखेगा।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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GoaFest में बदलाव जरूरी: क्या भारत को मिलेगा अपना Cannes?

गेस्ट कॉलम: डॉ. संदीप गोयल ने हाल ही में खत्म हुए Goafest 2026 पर अपनी राय साझा की कि क्या चीजें अच्छी रहीं और किन बातों में सुधार की जरूरत है।

Samachar4media Bureau by
Published - Monday, 25 May, 2026
Last Modified:
Monday, 25 May, 2026
SandeepGoel521

डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन, पिछले हफ्ते मैं GoaFest में था। इसके 19 साल के इतिहास में यह मेरी पहली यात्रा थी। इस बार हमारी एजेंसी Everest को AAAI@80 कार्यक्रम में 50 साल से ज्यादा समय तक AAAI सदस्य रहने के लिए सम्मानित किया जा रहा था। साथ ही GoaFest आयोजक मेरे बॉस और मेंटर रहे दिवंगत दीवान अरुण नंदा को श्रद्धांजलि देने वाले थे। ऐसे में मुझे लगा कि गोवा जाना जरूरी है।

सच कहूं तो आयोजन अच्छा था। AAAI के प्रेसिडेंट श्रीनिवास ‘सुंदर’ स्वामी, उनके सहयोगी जयदीप गांधी और GoaFest के प्रमुख मोहित जोशी ने काफी मेहनत की थी। इसका असर भी दिखा। स्पॉन्सर्स की अच्छी संख्या थी, लोगों की भागीदारी ठीक रही और सिंगर सुखबीर की परफॉर्मेंस ने माहौल में ऊर्जा भर दी। लेकिन फिर भी मुझे लगा कि कुछ कमी है।

GoaFest में धूप है, बीच है, बड़े लोग हैं, लेकिन जो चीज सबसे ज्यादा नहीं दिखी, वो है FOMO यानी “मिस कर देने का डर”। भारतीय विज्ञापन जगत की धड़कन बनने का दावा करने वाला यह फेस्टिवल अभी भी ऐसा लगता है जैसे किसी क्लाइंट-एजेंसी का शांत सा ऑफसाइट इवेंट हो, जहां गलती से अवॉर्ड भी बांट दिए गए हों।

Ogilvy, VML, Dentsu जैसी बड़ी एजेंसियों के प्रमुख नजर नहीं आए। बड़े क्लाइंट CEOs की मौजूदगी भी बेहद कम थी। ऐसे में GoaFest के 20वें साल में पहुंचने से पहले कुछ बदलाव जरूरी लगते हैं।

GoaFest महंगा है, लेकिन गोवा वाली फील बनी रहनी चाहिए

मेरे हिसाब से सबसे बड़ी समस्या यह है कि GoaFest काफी महंगा हो गया है। युवा क्रिएटिव लोगों के लिए यह ऐसा इवेंट बन गया है जहां वे तीन दिन तक सिर्फ बड़े लोगों को खर्चे पर पार्टी करते देखते हैं। इसका समाधान क्या हो सकता है?

स्टूडेंट्स और छोटी इंडी एजेंसियों के लिए 80% तक डिस्काउंट वाले पास होने चाहिए। इसका खर्च प्रीमियम स्पॉन्सर्स से निकाला जा सकता है। अगर 25 साल के युवा यहां आ ही नहीं पाएंगे, तो इंडस्ट्री अपना भविष्य खो देगी।

साथ ही GoaFest को गोवा से हटाने की जरूरत नहीं है। बीच इसकी पहचान है। जैसे Cannes पेरिस में नहीं होता, वैसे ही GoaFest की असली जान भी गोवा ही है। लेकिन इसके साथ “GoaFest Fringe” जैसा ओपन इवेंट भी होना चाहिए, जहां बीच पर पोर्टफोलियो रिव्यू, ओपन स्क्रीनिंग और ब्रांड एक्टिवेशन हों। ऐसा कार्यक्रम जिसमें पास हो या न हो, कोई भी शामिल हो सके।

अवॉर्ड्स की चमक फिर लौटानी होगी

युवा प्रतिभागियों से बातचीत में सबसे साफ संदेश यही मिला कि “अवार्ड्स को फिर से मायनेदार बनाइए।” अभी Abbys अवॉर्ड्स की विश्वसनीयता पर सवाल हैं। बहुत ज्यादा कैटेगरी, बहुत ज्यादा राजनीति और हर साल लगभग वही विजेता। ऐसा लगता है जैसे कुछ लोगों ने “Goa Code” समझ लिया हो।

इसमें बदलाव जरूरी है। सबसे पहले अवॉर्ड कैटेगरी करीब 40% कम की जानी चाहिए। हर छोटी चीज के लिए अलग अवॉर्ड की जरूरत नहीं। अगर Cannes में सीमित Lions हैं, तो Abbys में 200 कैटेगरी क्यों?

दूसरा, जजिंग को ज्यादा पारदर्शी बनाया जाए। Grand Prix बहस को लाइव स्ट्रीम किया जाए ताकि लोग समझ सकें कि किस कैंपेन ने क्यों जीत हासिल की।

तीसरा, “Real Impact Abby” जैसा नया अवॉर्ड होना चाहिए, जो सिर्फ क्रिएटिविटी नहीं बल्कि बिजनेस रिजल्ट्स के आधार पर दिया जाए। इसमें CFO जैसे लोग भी जूरी में हों ताकि ROI यानी असली असर को महत्व मिले।

बीच से ज्यादा दिमाग पर फोकस जरूरी

GoaFest के कई सेशन बेहद बोरिंग लगते हैं। अक्सर 6-7 CEOs AI जैसे विषय पर 45 मिनट तक एक-दूसरे की बातों से सहमत होते रहते हैं। मॉडरेटर भी वही पुराने टीवी चेहरे होते हैं। Gen Z दर्शक पहले कुछ मिनट में ही बाहर निकल जाते हैं।

जरूरत है ज्यादा प्रैक्टिकल और क्राफ्ट आधारित सेशंस की। जैसे- “हमने वह लाइन कैसे लिखी”, “IPL एड की एडिटिंग कैसे हुई”, “50 लाख के मीडिया प्लान का पोस्टमार्टम”। यानी प्रैक्टिशनर सीधे प्रैक्टिशनर्स को सिखाएं। साथ ही इंटरव्यू स्टाइल भी बदले। मंच पर प्रसून जोशी जैसे दिग्गज को किसी 22 साल के TikTok क्रिएटर के साथ बिना स्क्रिप्ट बैठाइए, तभी मजा आएगा।

GoaFest में अंतरराष्ट्रीय स्पीकर्स के साथ भारत के छोटे शहरों के डिजिटल क्रिएटर्स को भी बराबर मंच मिलना चाहिए। कोयंबटूर के किसी टेक्सटाइल शॉप के लिए 1 करोड़ व्यूज वाले रील बनाने वाला व्यक्ति शायद किसी “Metaverse keynote” से ज्यादा सिखा सकता है।

सिर्फ बड़े लोगों के लिए नहीं होना चाहिए फेस्टिवल

अभी GoaFest ऐसा लगता है जैसे यह उन्हीं 200 लोगों के लिए डिजाइन हुआ है जो पहले से एक-दूसरे को जानते हैं और CEO लाउंज में बैठे रहते हैं। इसे बदलने के लिए “Portfolio Pub” जैसे सेशन होने चाहिए, जहां 30 साल से कम उम्र के युवा क्रिएटिव्स सीधे बड़े क्रिएटिव डायरेक्टर्स से अपना काम दिखाकर सलाह ले सकें।

“Brief Battles” भी दिलचस्प आइडिया हो सकता है। सुबह ब्रांड ब्रीफ दे और शाम तक टीमें अपना आइडिया पेश करें। विजेता को इनाम और शायद अकाउंट भी मिले। इससे GoaFest सिर्फ देखने का नहीं, भाग लेने का मंच बनेगा।

YouTubers, meme pages और D2C founders के लिए अलग स्टेज भी जरूरी है। अब विज्ञापन इंडस्ट्री अकेले कल्चर नहीं चलाती, कंटेंट क्रिएटर्स भी उतने ही प्रभावशाली हैं।

सिर्फ भीड़ नहीं, असर भी मापा जाए

अभी GoaFest की सफलता “वाइब” और भीड़ से मापी जाती है। लेकिन यह नहीं देखा जाता कि इससे इंडस्ट्री आगे बढ़ी या नहीं। हर साल “State of Indian Creativity” रिपोर्ट जारी होनी चाहिए। इसमें बताया जाए कि कितने कैंपेन डिजिटल-फर्स्ट थे, कितने भारत के छोटे शहरों के लिए बने, कौन से माध्यम खत्म हो रहे हैं और क्या CTV ने पारंपरिक टीवी को पीछे छोड़ दिया है।

इसके अलावा यह भी ट्रैक होना चाहिए कि GoaFest में शामिल होने वाले लोगों के करियर पर इसका क्या असर पड़ा।

दूसरों से सीखने में हर्ज नहीं

GoaFest को Cannes, SXSW और IPL जैसे बड़े आयोजनों से सीखना चाहिए। Cannes से बेहतर नेटवर्किंग, SXSW से म्यूजिक-टेक-ब्रांड का मेल और IPL से रियल टाइम हाइप व एंगेजमेंट सीखा जा सकता है।

GoaFest को आइडिया की प्रयोगशाला बनना होगा

कल्पना कीजिए कि पहले दिन HUL यूपी-बिहार के लिए नए साबुन का ब्रीफ दे और तीसरे दिन 10 टीमें लाइव स्टेज पर अपने आइडिया पेश करें। विजेता कैंपेन अगले महीने प्रोडक्शन में चला जाए। अगर ऐसा होता है, तो GoaFest सिर्फ पुरानी उपलब्धियों का जश्न नहीं रहेगा, बल्कि नई सोच और नए कैंपेन पैदा करने वाली प्रयोगशाला बन जाएगा।

तब क्लाइंट्स यहां काम कराने आएंगे, क्रिएटिव लोग करियर बदलने वाले मौके के लिए आएंगे और मीडिया इसलिए कवर करेगा क्योंकि यहां सच में कुछ नया हुआ। आखिर में सवाल यही है- GoaFest सिर्फ पुरानी यादों का मिलन बनना चाहता है या इंडस्ट्री में बदलाव की शुरुआत?

अगर यह सिर्फ रीयूनियन है, तो अवॉर्ड्स और पार्टी काफी हैं। लेकिन अगर यह बदलाव का मंच बनना चाहता है, तो इसे सस्ता, युवा, तेज और ज्यादा उपयोगी बनना होगा। सबसे बेहतरीन फेस्टिवल सिर्फ इंडस्ट्री का जश्न नहीं मनाते, वे उसे आगे धकेलते हैं।

यह लेख किसी की आलोचना के लिए नहीं है। GoaFest अच्छा है, लेकिन और बेहतर बन सकता है। इस तीन भागों की सीरीज के अगले लेखों में मैं बताऊंगा कि Cannes और SXSW से GoaFest क्या सीख सकता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं) 

 

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क्या डॉलर ₹100 तक जाएगा? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

यही कारण है कि वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने रिज़र्व बैंक को सलाह दी कि ₹100 तक गिरने के डर से डॉलर न बेचे। बाज़ार को अपना काम करने दें।

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Published - Monday, 25 May, 2026
Last Modified:
Monday, 25 May, 2026
milindkhandekar

मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

डॉलर की क़ीमत पिछले हफ़्ते ₹96 के पार चली गई तो लगने लगा कि ₹100 दूर नहीं है। तभी रिज़र्व बैंक हरकत में आया और दो दिन में चार-पाँच बिलियन डॉलर बेचकर रुपए को बचा लिया। डॉलर शुक्रवार को ₹95.69 पर बंद हुआ। फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या डॉलर ₹100 तक गिर सकता है?

पहले समझिए कि रुपया गिर क्यों रहा है?

इसका कारण है डॉलर की माँग बढ़ रही है। चाहे कोई सामान हो या करेंसी, जिसकी सप्लाई कम हो और माँग बढ़ती हो, तो भाव बढ़ जाता है। डॉलर की माँग ईरान युद्ध के बाद से बढ़ी है। युद्ध शुरू होने से पहले फ़रवरी में डॉलर का भाव ₹91 था और अब ₹96। दुनिया में किसी करेंसी में इतनी गिरावट नहीं आई, तो फिर भारत में क्या हुआ?

डॉलर के मुक़ाबले रुपया गिरने के दो बड़े कारण हैं। पहला, युद्ध के कारण क्रूड ऑयल महँगा हो गया। युद्ध से पहले क्रूड ऑयल प्रति बैरल $70 था और अब $100 के पार। क्रूड ऑयल से हम पेट्रोल-डीज़ल बनाते हैं। ज़्यादा डॉलर खर्च करने पड़े।

दूसरा बड़ा कारण है शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशकों (FII) की बिक्री। युद्ध शुरू होने के बाद से वे $22 बिलियन के शेयर बेच चुके हैं। विदेशी निवेशक जब शेयर ख़रीदते हैं तो डॉलर लेकर आते हैं और बेचते हैं तो डॉलर लेकर जाते हैं। युद्ध के बाद से उन्होंने जितनी बिक्री की है, वह पिछले पूरे साल के बराबर है। यह डॉलर की माँग बढ़ने का बड़ा कारण बन गया है।

रुपया डॉलर के मुक़ाबले गिरता है तो रिज़र्व बैंक बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचता है, जैसे उसने पिछले हफ़्ते बेचे। डॉलर बेचने से सप्लाई बढ़ती है। सप्लाई बढ़ने से डॉलर का भाव कम होता है। रिज़र्व बैंक के इस तरीक़े में रिस्क है क्योंकि विदेशी मुद्रा भंडार कम होता है। युद्ध से पहले हमारे पास $730 बिलियन का भंडार था और अब $690 बिलियन।

यह हमारा बफ़र है। दुनिया भर से अगर नौ-दस महीने तक एक भी डॉलर नहीं आया, तब भी हम विदेशी मुद्रा भंडार से अपने आयात का खर्च चला सकते हैं। डॉलर आता है सामान या सर्विस विदेश में बेचने से या विदेशी निवेश से।

यही कारण है कि वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने रिज़र्व बैंक को सलाह दी कि ₹100 तक गिरने के डर से डॉलर न बेचे। बाज़ार को अपना काम करने दें। लेकिन लगता है कि रिज़र्व बैंक ने यह सलाह दरकिनार कर दी है। वह अभी तो डॉलर को ₹100 तक नहीं गिरने देगा — इसका कारण राजनीतिक भी है। ₹100 का आँकड़ा किसी भी सरकार के लिए असहज होता है।

सवाल है-कब तक?

1991 में डॉलर की क़ीमत ₹17 थी। पिछले 35 साल में सालाना क़रीब 5% की रफ़्तार से गिर रहा है रुपया। यही गति रही तो अगले साल के आख़िर तक डॉलर ₹100 का होगा। लेकिन यह दो और दो चार नहीं है। अगर युद्ध ख़त्म होता है, तेल की क़ीमतें घटती हैं और विदेशी निवेशक बाज़ार में लौटते हैं, तो डॉलर की क़ीमत घट भी सकती है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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देश की वैश्विक पहचान बनाने में मिली है कामयाबी: प्रो.संजय द्विवेदी

पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।

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Published - Friday, 22 May, 2026
Last Modified:
Friday, 22 May, 2026
sanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

इन दिनों भारत की मीडिया में बंदिशों और लोकतंत्र के सिकुड़ते जाने की कथाएं हवा में तैर रही हैं। लोकतंत्र बचाने में वे सब आगे हैं जिनके शासन की कथाएं उन्हें खुद मुंह चिढ़ा रही हैं। मीडिया को दबाने, नियंत्रित करने की कहानियां आज की नहीं हैं। लेकिन मीडिया की हिम्मत भी आज की नहीं है। हमारे देश में पत्रकारिता की शुरुआत ही जेम्स आगस्टस हिकी की क्रांतिकारी लेखनी से प्रारंभ होती है, जिसने अंग्रेज लाट साहबों की बैंड बजा दी।

अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध फूंककर उसने अंग्रेज होकर भी जेलें झेलीं, जुर्माने चुकाए और खामोश मौत पाई। किंतु हिकी यह बता गया कि पत्रकारिता क्यों और कैसे करनी है। इसके बाद आजादी के आंदोलन में यही पत्रकारिता ‘खबर’ की जगह ‘पैगाम’ देने वाली बन गयी। जिसके कारण शायर को कहना पड़ा कि जब तोप मुकाबिल तो अखबार निकालो।

हमारे देश के हर क्रांतिकारी और आजादी के नायकों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पत्रकारिता को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया। लोकमान्य तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी सबने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र को जागृत किया। पत्रकारिता की भावभूमि आजादी के आंदोलन ने तय कर दी। वह थी जनपक्षधरता, न्याय के लिए संघर्ष और सत्यान्वेषण। आजादी के बाद देश के नवनिर्माण का काम हो या आपातकाल विरोधी संघर्ष हमारे पत्रकारों ने हर जगह अपने उजले पदचिन्ह छोड़े।

आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है। वह अनेक मंचों से की जा रही है। प्रिंट, टीवी, रेडियो से अलग मोबाइल पर हो रही पत्रकारिता गजब कर रही है। कहा जा रहा कि डिजिटल का सूरज कभी नहीं डूबता। इसलिए आप देखें तो पाएंगे मीडिया की पहुंच मोबाइल के माध्यम से ज्यादातर लोगों तक हो रही है। मीडिया कन्वर्जेंस का माध्यम मोबाइल बने हैं। ऐसे में ज्यादातर चीजें सुनी और देखी जा रही हैं।

पठनीयता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। फिर भी इतना बड़ा देश अगर कुछ प्रतिशत में भी पढ़ता है तो भी संख्या आसानी से करोड़ों में होती है। दुनिया के तमाम देश एक भाषा में सोचते, पढ़ते और बोलते हैं। हिंदुस्तान 22 बड़ी भाषाओं और तमाम बोलियों में सुनता, पढ़ता और देखता है। इसलिए भारत के मीडिया का आकार बहुत व्यापक है।

डिजिटल मीडिया ने हमारे माध्यमों को वैश्विक किया है। भारतीय भाषाओं को वैश्विक किया है। कभी फिल्में हमारे भारतीय समाज का वैश्विक चेहरा बनाती थीं। अब मीडिया इसके केंद्र में है। यू-ट्यूब,सोशल मीडिया, वेब माध्यमों , ई-पेपर और ई-बुक्स से एक नई दुनिया बन रही है, जिसने भारत की वैश्विक छवि बनाने का काम किया है। आज भारत और उसकी भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा में भी भारतीयों की खास उपस्थिति है। वे जो लिख, कह और कर रहे हैं उसने देश को दुनिया में व्यक्त किया है। हिंदुस्तानी जहां-जहां गए अपनी भाषा और संस्कृति के साथ गए और वहां एक लघु भारत खड़ा किया।

यह लघु भारत आज मीडिया और संचार माध्यमों से शक्ति पाता है। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करता है। एक समय में अपनी भाषा के प्रकाशनों, पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और मनोरंजन को प्राप्त करना मुश्किल था, किंतु डिजिटल माध्यमों ने इसे संभव किया है। दूरियां, भूगोल और भाषा सबके अंतर को पाटकर भारत आपके घर पहुंच जाता है। इससे भारत की शक्ति बन रही है। साफ्टपावर क्या कर सकती है, इसे हम सब महसूस कर रहे हैं।

एक नया भारत बनाने और उसके एकीकरण में भारतीय मीडिया की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। अपने प्रारंभ से ही उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम भारतीय पत्रकारिता और साहित्य का स्वर एक रहा है। सबने भारत बोध को स्वर दिया है। एकत्व को स्थापित किया है। जगदगुरु शंकराचार्य के बाद भारत के एकीकरण का काम पत्रकारिता और साहित्य ने ही किया है। अपने राष्ट्रीय विचारों के समाचार पत्र से तमिलनाडु के सुब्रम्यण्यम भारती जो कर रहे थे, वही काम हिंदी में माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे। उनके साहित्य और पत्रकारिता दोनों में भारत बोलता है।

इस तरह हम देखते हैं कि समाचार माध्यमों ने न सिर्फ सूचनाओं का आदान प्रदान किया बल्कि एक देश में एक भाव भी भरा। यही हमारी पत्रकारिता की मूल शक्ति है। पत्रकारिता के नायक लोकमान्य तिलक का वाक्य स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, देश की वाणी बन गया। देश ने आजादी के सपने देखने प्रारंभ किए। उनकी प्रेरणा से अनेक लोग पत्रकारिता में आए और उसी भाव को लेकर आगे बढ़े।

इनमें हिंदी के माधवराव सप्रे का उदाहरण सबसे खास है, जिन्होंने तिलक जी के मराठी अखबार ‘केसरी’ से प्रेरणा लेकर ‘हिंदी केसरी’ प्रारंभ किया। ऐसे अनेक नायक देश को जोड़ने के सूत्र खोजकर पत्रकारिता के माध्यम से सामने आते रहे। समस्त भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ संपादकों ने इस दौर में जो भाव जागरण किया है, वह अप्रतिम है।

इतनी सारी भाषाओं, बोलियों, खानपान, स्थानीय प्रतीकों को लेकर चलता हुआ देश अगर एक है तो इसका कारण है, उसके सांस्कृतिक प्रवाह का एक होना। लंबी गुलामी, वैचारिक दासता से घिरे बुद्धिजीवियों द्वारा किए लंबे अनर्थ चिंतन के बाद भी इस देश की प्रज्ञा अगर सो नहीं गयी तो इसका कारण इस देश की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। समय-समय पर नायक आते रहे हैं।

जो हमें याद दिलाते हैं कि सब कुछ कभी खत्म नहीं हो सकता। भारतेंदु हरिश्चंद्र उनमें एक हैं, गांधी हैं, बाद के दिनों में दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी हैं। इनमें से सब पत्रकारिता को अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से समाज को उसके बोध से जोड़ते हैं।

भारतीय पत्रकारिता कमोबेश अपनी इस भूमिका पर आज भी कायम है। अपनी इस भूमिका को और प्रखर करते हुए पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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'AI के दौर में बदल रही मीडिया इंडस्ट्री, Meta की छंटनी ने बढ़ाई चिंता'

दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) ने करीब 8,000 एंप्लॉयीज को नौकरी से बाहर कर दिया है, जबकि 6,000 खाली पदों को भी समाप्त कर दिया गया।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 21 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 21 May, 2026
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शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।

दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) ने बड़े पैमाने पर एंप्लॉयीज की छंटनी कर एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि आने वाला दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का होगा। कंपनी ने करीब 8,000 एंप्लॉयीज को नौकरी से बाहर कर दिया है, जबकि 6,000 खाली पदों को भी समाप्त कर दिया गया। इसके साथ ही 7,000 एंप्लॉयीज को नई AI-केंद्रित टीमों में स्थानांतरित किया गया है।

इस बड़े बदलाव पर सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा है कि यह केवल सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि इंसानी कार्यक्षमता की जगह AI को स्थापित करने की प्रक्रिया है। उनके अनुसार, Meta का यह कदम पूरी मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा संकेत है।

दरअसल, Meta इस साल AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 115 से 135 बिलियन डॉलर तक खर्च करने जा रही है। कंपनी अब AI को केवल एक नए प्रोडक्ट की तरह नहीं, बल्कि अपने पूरे बिजनेस मॉडल का केंद्र बना रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी इंजीनियर्स से AI एजेंट्स की मदद से अपने काम को ऑटोमेट करने के लिए कह रही है। वहीं एंप्लॉयीज की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिवाइस ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर लगाने की भी चर्चा है। इसे लेकर 1,500 से ज्यादा एंप्लॉयीज ने विरोध दर्ज कराया, लेकिन कंपनी ने अपनी योजना में बदलाव नहीं किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट के कारण होने वाली छंटनी नहीं है। Meta इस समय रिकॉर्ड मुनाफे में है। ऐसे में यह “Efficiency Layoffs” यानी दक्षता आधारित छंटनी मानी जा रही है, जहां AI की मदद से इंसानी श्रम की जरूरत कम की जा रही है।

शुभ्रांशु सिंह ने भारतीय मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री को भी सतर्क रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अब तक भारत में कम लागत, रिश्तों पर आधारित बिजनेस मॉडल और ‘जुगाड़’ संस्कृति को सुरक्षा कवच माना जाता था, लेकिन Meta का यह कदम बताता है कि AI अब केवल बैक-ऑफिस काम तक सीमित नहीं है। यह इंजीनियरिंग, क्रिएटिव वर्क, ऑपरेशंस और प्रोडक्ट डेवलपमेंट जैसे मुख्य क्षेत्रों में भी तेजी से जगह बना रहा है।

उन्होंने कहा कि अगर दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे लाभकारी डिजिटल कंपनियों में से एक AI आधारित मॉडल को प्राथमिकता दे रही है, तो आने वाले समय में क्लाइंट्स भी एजेंसियों और मीडिया कंपनियों से उसी तरह की दक्षता और कम मानव निर्भरता की अपेक्षा करेंगे।

हाल ही में कंपनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा था कि जिन प्रोजेक्ट्स के लिए पहले बड़ी टीमों की जरूरत होती थी, उन्हें अब एक प्रतिभाशाली व्यक्ति AI टूल्स की मदद से पूरा कर सकता है। शुभ्रांशु सिंह का मानना है कि यह बयान केवल टेक इंडस्ट्री के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री के भविष्य की दिशा दिखाता है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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‘ब्रैंड असम’ बना विकास और आत्मविश्वास का प्रतीक: डॉ. अनुराग बत्रा

आने वाले वर्षों में असम की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यही है कि उसे अब भारत के एक दूरस्थ राज्य के रूप में नहीं, बल्कि विकास और अवसरों के उभरते केंद्र के रूप में देखा जाए।

Samachar4media Bureau by
Published - Thursday, 21 May, 2026
Last Modified:
Thursday, 21 May, 2026
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डॉ. अनुराग बत्रा, BW बिजनेसवर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ।

असम लंबे समय तक देश के बाकी हिस्सों में एक जटिल और सीमित पहचान के साथ देखा जाता रहा। जब भी असम की चर्चा होती थी, तो बाढ़, राजनीतिक अस्थिरता, अवैध प्रवासन, उग्रवाद और भौगोलिक दूरी जैसे मुद्दे सबसे पहले सामने आते थे। जबकि वास्तविकता यह है कि असम हमेशा से संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों, चाय उद्योग, जैव विविधता और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध रहा है। फिर भी देश के बड़े हिस्से ने असम को अक्सर दूर और अलग-थलग राज्य के रूप में देखा। लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है।

आज असम की नई पहचान तैयार की जा रही है। ऐसी पहचान जो विकास, सड़कें, निवेश, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यटन, कनेक्टिविटी और आत्मविश्वास की बात करती है। इस बदलाव के केंद्र में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का नाम प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक शैली और प्रशासनिक सक्रियता ने “ब्रैंड हिमंत” और “ब्रैंड असम” जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया है। दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक छवि असम की नई पहचान को मजबूत करती है और बदलता हुआ असम उनके नेतृत्व की लोकप्रियता को और बढ़ाता है।

हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक यात्रा अचानक नहीं बनी। यह कई वर्षों की मेहनत, संगठन क्षमता, जमीनी राजनीति की समझ और लगातार चुनावी सफलता का परिणाम है। वर्ष 2001 से जलुकबाड़ी विधानसभा सीट से लगातार छह बार चुनाव जीतना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह जनता के लंबे विश्वास और मजबूत स्थानीय पकड़ का संकेत है। समय के साथ वे केवल एक राजनीतिक रणनीतिकार नहीं रहे, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि वे हमेशा सक्रिय दिखाई देते हैं। चाहे प्रशासन हो, चुनाव हो, सार्वजनिक कार्यक्रम हों या मीडिया से संवाद — उनकी कार्यशैली में गति और तत्परता दिखाई देती है। आधुनिक राजनीति में केवल नीतियां ही नहीं, बल्कि जनता की धारणा भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो निर्णायक, ऊर्जावान और आसानी से उपलब्ध दिखें। हिमंत बिस्वा सरमा ने इसी प्रकार की छवि तैयार की है। उनकी भाषा सीधी होती है, राजनीतिक संदेश स्पष्ट होते हैं और प्रशासनिक फैसलों में त्वरित कार्रवाई दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रैंडिंग मजबूत हुई है।

हालांकि “ब्रैंड असम” का उद्देश्य केवल एक नेता की लोकप्रियता तक सीमित नहीं है। असम खुद भी भारत के आर्थिक और राजनीतिक नक्शे पर अपनी नई जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। दशकों तक पूर्वोत्तर भारत को निवेश और व्यापार के लिहाज से कठिन और दूरस्थ क्षेत्र माना जाता था। अब असम की सरकार इस सोच को बदलने की कोशिश कर रही है। राज्य को एक शांत, जुड़ा हुआ और अवसरों से भरे क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

असम अब केवल सीमावर्ती राज्य की छवि से बाहर निकलकर खुद को पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार और भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता है। आज के समय में केवल नीतियां ही विकास तय नहीं करतीं, बल्कि किसी राज्य की छवि भी बहुत मायने रखती है। पर्यटन, निवेश, उद्योग और व्यापार काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि कोई राज्य खुद को दुनिया के सामने किस रूप में प्रस्तुत करता है।

असम की नई कहानी आशावाद पर आधारित है। राज्य यह संदेश देना चाहता है कि वह आधुनिक भी है और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ भी। वह विकास चाहता है लेकिन अपनी पहचान खोए बिना। यही संतुलन “ब्रैंड असम” को विशेष बनाता है।

इस नई छवि को मजबूती इसलिए भी मिल रही है क्योंकि जमीन पर विकास दिखाई देने लगा है। सड़कें, पुल, एयरपोर्ट, मेडिकल कॉलेज और शहरी विकास परियोजनाएं केवल सरकारी उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि वे प्रगति के प्रतीक बन चुकी हैं। बेहतर कनेक्टिविटी असम के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य का भविष्य व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय सहयोग पर काफी हद तक निर्भर करता है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी विशेष ध्यान दिया गया है। नए मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य संस्थानों के विस्तार से यह संदेश देने की कोशिश हुई है कि सरकार केवल तात्कालिक राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के विकास पर काम कर रही है। इसके साथ ही असम के युवाओं की आकांक्षाएं भी तेजी से बदल रही हैं। नई पीढ़ी अब रोजगार, बेहतर शिक्षा, डिजिटल सुविधाएं, उद्यमिता और आधुनिक जीवनशैली की उम्मीद करती है। उनकी सोच पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वाकांक्षी हो चुकी है।

हालांकि असली चुनौती यही है कि विकास केवल बड़े शहरों या सरकारी विज्ञापनों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लेकर आए। “ब्रैंड असम” की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि राज्य के नागरिक खुद अपने भविष्य को लेकर कितना आत्मविश्वास महसूस करते हैं।

असम की बदलती पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षा और स्थिरता की भावना को मजबूत करना भी है। कोई भी राज्य तब तक बड़े निवेश या पर्यटन को आकर्षित नहीं कर सकता जब तक लोग उसके भविष्य को लेकर आश्वस्त न हों। असम लंबे समय तक अस्थिरता और अनिश्चितता की छवि से जूझता रहा है। इसलिए उस धारणा को बदलना बेहद जरूरी था।

यही कारण है कि वर्तमान सरकार कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में दिखाती है। यह केवल शासन सुधारने का प्रयास नहीं है, बल्कि लोगों और निवेशकों के बीच भरोसा पैदा करने की कोशिश भी है। निवेशक तभी पैसा लगाते हैं जब उन्हें स्थिरता दिखाई दे। पर्यटक तभी आते हैं जब उन्हें सुरक्षा महसूस होती है। युवा तभी अपने राज्य में भविष्य देखते हैं जब उन्हें अवसर और विश्वास दोनों मिलें।

हिमंत बिस्वा सरमा की छवि एक सख्त और सक्रिय प्रशासक की रही है और यही छवि असम में स्थिरता के बड़े संदेश से जुड़ती है। व्यापक स्तर पर यह संदेश दिया जा रहा है कि असम अब अनिश्चितता की राजनीति से निकलकर आकांक्षाओं की राजनीति की ओर बढ़ रहा है।

विकास के साथ-साथ असम अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी बचाए रखना चाहता है। पूर्वोत्तर भारत में विकास हमेशा भाषा, परंपरा, संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव से जुड़ा विषय रहा है। असम अब आधुनिकता और संस्कृति को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक रूप में प्रस्तुत कर रहा है। असमिया त्योहार, संगीत, वस्त्र, चाय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपराएं और स्थानीय विरासत राज्य की नई पहचान का हिस्सा बनते जा रहे हैं। इससे “ब्रैंड असम” को भावनात्मक गहराई मिलती है। राज्य आधुनिक दिखना चाहता है लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं। असम के भीतर रहने वाले लोगों के लिए यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास आर्थिक प्रगति जितना ही महत्वपूर्ण है।

आने वाले वर्षों में असम की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यही है कि उसे अब भारत के एक दूरस्थ राज्य के रूप में नहीं, बल्कि विकास और अवसरों के उभरते केंद्र के रूप में देखा जाए। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, बढ़ती कनेक्टिविटी और मजबूत राजनीतिक उपस्थिति के साथ असम खुद को पूर्वोत्तर भारत के भविष्य के केंद्र में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के तहत असम के पास व्यापार, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और क्षेत्रीय व्यापार का बड़ा केंद्र बनने की क्षमता है। यदि आने वाले दशक में यह विकास निरंतर बना रहता है, तो असम पूर्वी भारत की सबसे बड़ी आर्थिक सफलता की कहानियों में शामिल हो सकता है। अंततः “ब्रैंड हिमंत” और “ब्रैंड असम” दोनों की वास्तविक ताकत केवल राजनीतिक प्रचार में नहीं, बल्कि इस बात में होगी कि क्या आम लोग वास्तव में महसूस करते हैं कि राज्य लगातार और स्थायी रूप से आगे बढ़ रहा है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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'ब्रांड मोदी' की सबसे मजबूत नींव विकास : डॉ. अनुराग बत्रा

इसकी नींव उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही पड़ गई थी। उस समय उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो प्रशासन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास पर विशेष ध्यान देता है।

Samachar4media Bureau by
Published - Wednesday, 20 May, 2026
Last Modified:
Wednesday, 20 May, 2026
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डॉ. अनुराग बत्रा, BW बिजनेसवर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ

नरेंद्र मोदी ने जब वर्ष 2014 में पहली बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले वर्षों में उनका नेतृत्व भारतीय राजनीति की दिशा और चर्चा दोनों को इतनी गहराई से प्रभावित करेगा। आज लगभग 12 वर्षों बाद “ब्रांड मोदी” केवल एक राजनीतिक नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह मजबूत नेतृत्व, विकास, अनुशासन, राष्ट्रीय आत्मविश्वास और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती पहचान का प्रतीक बन चुका है। करोड़ों समर्थकों के लिए नरेंद्र मोदी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि नए भारत की आकांक्षाओं का चेहरा हैं।

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान अचानक नहीं बनी। इसकी नींव उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही पड़ गई थी। उस समय उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो प्रशासन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास पर विशेष ध्यान देता है। गुजरात में तेज़ विकास, बेहतर सड़कें, निवेश को आकर्षित करने वाली नीतियां और उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण ने “गुजरात मॉडल” को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। यही छवि आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ले आई और 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय राजनीति का पूरा समीकरण बदल गया।

“ब्रांड मोदी” की सबसे बड़ी ताकत उनकी निर्णायक नेतृत्व शैली मानी जाती है। भारतीय राजनीति में अक्सर नेताओं पर फैसले टालने या राजनीतिक गणित में उलझने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन मोदी ने अपने लिए एक अलग छवि बनाई — ऐसे नेता की जो बड़े और कठिन निर्णय लेने से पीछे नहीं हटता। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें मजबूत इच्छाशक्ति वाला नेता मानते हैं।

प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने कई बड़े अभियान शुरू किए। “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया” और “स्वच्छ भारत अभियान” जैसी योजनाओं ने देश के विकास मॉडल को नई दिशा देने का प्रयास किया। साथ ही, हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े स्तर पर हुए विस्तार ने यह संदेश दिया कि सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबी अवधि के विकास पर काम कर रही है। मोदी की राजनीति में “बड़ा सोचो और बड़ा करो” का संदेश लगातार दिखाई देता है।

उनकी लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण उनकी संवाद क्षमता है। नरेंद्र मोदी उन नेताओं में गिने जाते हैं जो जनता की भावनाओं और मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं। उनके भाषण सरल भाषा में होते हैं और उनमें ऐसे नारे होते हैं जो सीधे लोगों के मन में जगह बना लेते हैं। “सबका साथ, सबका विकास”, “आत्मनिर्भर भारत” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे नारे केवल राजनीतिक शब्द नहीं रहे, बल्कि आम जनजीवन और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन गए।

मोदी ने डिजिटल माध्यमों की ताकत को बहुत जल्दी समझ लिया था। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और “मन की बात” जैसे कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने जनता से लगातार संवाद बनाए रखा। आज वे दुनिया के सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं। यही सीधा संवाद उनकी लोकप्रियता को लगातार बनाए रखने में मदद करता है। लोग महसूस करते हैं कि प्रधानमंत्री सीधे उनसे बात कर रहे हैं और देश के मुद्दों पर उन्हें जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

समय के साथ नरेंद्र मोदी केवल भारत के नेता नहीं रहे, बल्कि एक वैश्विक नेता के रूप में भी उभरे। विदेशों में भारतीय समुदाय को संबोधित करने से लेकर बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने तक, उन्होंने दुनिया के सामने एक आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी भारत की छवि प्रस्तुत की। भारत की सफल G20 अध्यक्षता ने भी इस धारणा को और मजबूत किया। कई भारतीयों के लिए यह गर्व का विषय था कि भारत वैश्विक मंच पर केंद्र में दिखाई दे रहा है।

दुनिया के बड़े नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें, रणनीतिक साझेदारियों पर जोर और भारत की वैश्विक भूमिका को मजबूत करने की कोशिशों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज़ बना दिया। समर्थकों का मानना है कि “ब्रांड मोदी” अब भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ चुका है।

मोदी की छवि में व्यक्तिगत अनुशासन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग के प्रति उनका समर्पण, लंबे समय तक काम करने की आदत और ऊर्जावान सार्वजनिक जीवन अक्सर चर्चा में रहते हैं। आज के समय में लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो खुद उदाहरण प्रस्तुत करें, और मोदी की जीवनशैली इस अपेक्षा को मजबूत करती है।

उनकी निजी जीवन यात्रा भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनना लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का संदेश देता है। खासकर युवा वर्ग उनके जीवन से यह संदेश लेता है कि सीमित परिस्थितियां भी बड़े सपनों को रोक नहीं सकतीं।

राजनीति के अलावा मोदी की रुचि अध्यात्म, भारतीय संस्कृति और लेखन में भी दिखाई देती है। इससे उनकी छवि केवल एक राजनीतिक नेता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की बनती है जो भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है।

हालांकि “ब्रांड मोदी” की सबसे मजबूत नींव विकास ही है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक उनकी राजनीति का केंद्र विकास रहा है। सड़कें, रेलवे, डिजिटल तकनीक, विनिर्माण, हरित ऊर्जा और आधुनिक बुनियादी ढांचे पर लगातार जोर देने से उनकी सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। समर्थकों के अनुसार यही बात उन्हें पारंपरिक राजनीति से अलग बनाती है। वे उन्हें केवल चुनावी राजनीति करने वाला नेता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और भारत के भविष्य के बारे में सोचने वाला नेता मानते हैं।

आज 12 वर्षों के बाद भी नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में बने हुए हैं। “ब्रांड मोदी” अब केवल एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उस नए भारत का प्रतीक बन चुका है जो तेज़ विकास, मजबूत नेतृत्व और वैश्विक पहचान चाहता है। करोड़ों लोगों के लिए मोदी उस भारत की उम्मीद हैं जो बड़ा सोचता है, तेजी से आगे बढ़ना चाहता है और दुनिया में अपनी अलग जगह बनाना चाहता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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तमिलनाडु की राजनीति में नया विजुअल ब्रांड बन रहे हैं विजय : एम. गौतम मचैया

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (C. Joseph Vijay) का लगातार ब्लैक सूट और व्हाइट शर्ट में दिखना केवल फैशन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक ब्रांडिंग रणनीति माना जा रहा है।

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Published - Tuesday, 19 May, 2026
Last Modified:
Tuesday, 19 May, 2026
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एम. गौतम मचैया, सीनियर मीडिया प्रोफेशनल।

उपभोक्ता ब्रांडिंग की दुनिया में लगातार एक जैसी छवि पहचान और भरोसा बनाने का सबसे मजबूत माध्यम मानी जाती है। एप्पल (Apple) की मिनिमल डिजाइन, नाइकी (Nike) का स्वूश लोगो या स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) का हमेशा काले टर्टलनेक में नजर आना इसी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। अब यही फॉर्मूला राजनीति में भी तेजी से दिखाई दे रहा है और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (C. Joseph Vijay) इसकी ताजा मिसाल बनते नजर आ रहे हैं।

मुख्यमंत्री बनने के बाद से विजय लगातार ब्लैक सूट और सफेद शर्ट में सार्वजनिक मंचों पर दिखाई दे रहे हैं। इसे केवल फैशन नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक ब्रांडिंग रणनीति माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह लुक विजय को बाकी पारंपरिक नेताओं से अलग पहचान देने का काम कर रहा है।

तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सफेद शर्ट और वेष्टी की छवि से जुड़ी रही है। ऐसे में विजय का यह कॉरपोरेट स्टाइल लुक उन्हें पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग स्थापित करता है। यह छवि उन्हें एक “प्रशासक” और “कॉरपोरेट लीडर” के रूप में पेश करती है, न कि सिर्फ जननेता के तौर पर।

मार्केटिंग विशेषज्ञ इसे “यूनिफॉर्म इफेक्ट” बताते हैं। यानी जब कोई सार्वजनिक चेहरा लगातार एक जैसी विजुअल पहचान बनाए रखता है तो लोगों के दिमाग में उसकी मजबूत ब्रांड रिकॉल बनने लगती है। सोशल मीडिया और डिजिटल राजनीति के दौर में यह रणनीति और भी असरदार मानी जा रही है।

ब्लैक सूट जहां अधिकार, प्रोफेशनलिज्म और आधुनिकता का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं सफेद शर्ट भारतीय राजनीति में पारदर्शिता और जनसेवा की छवि को बनाए रखती है। इस तरह विजय दोनों प्रतीकों को मिलाकर एक नई राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति खासतौर पर युवा और शहरी वोटर्स को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। कॉरपोरेट संस्कृति और वैश्विक मीडिया से प्रभावित मध्यम वर्ग के लिए यह लुक आधुनिक नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता का संकेत देता है।

हालांकि इस रणनीति के जोखिम भी हैं। तमिलनाडु की राजनीति में जमीनी और सांस्कृतिक रूप से जुड़े नेताओं को ज्यादा स्वीकार्यता मिलती रही है। ऐसे में सूट-बूट वाली छवि को कुछ लोग “अत्यधिक कॉरपोरेट” या आम जनता से दूर भी मान सकते हैं।

फिर भी राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विजय केवल पुरानी राजनीतिक शैली को अपनाने के बजाय उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल दौर की राजनीति में जहां तस्वीरें और विजुअल पहचान विचारधारा जितनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी हैं, वहां विजय का ब्लैक सूट और व्हाइट शर्ट अब उनकी नई राजनीतिक ब्रांडिंग बन चुका है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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