दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) ने करीब 8,000 एंप्लॉयीज को नौकरी से बाहर कर दिया है, जबकि 6,000 खाली पदों को भी समाप्त कर दिया गया।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।
दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) ने बड़े पैमाने पर एंप्लॉयीज की छंटनी कर एक बार फिर यह संकेत दे दिया है कि आने वाला दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का होगा। कंपनी ने करीब 8,000 एंप्लॉयीज को नौकरी से बाहर कर दिया है, जबकि 6,000 खाली पदों को भी समाप्त कर दिया गया। इसके साथ ही 7,000 एंप्लॉयीज को नई AI-केंद्रित टीमों में स्थानांतरित किया गया है।
इस बड़े बदलाव पर सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा है कि यह केवल सामान्य बदलाव नहीं, बल्कि इंसानी कार्यक्षमता की जगह AI को स्थापित करने की प्रक्रिया है। उनके अनुसार, Meta का यह कदम पूरी मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा संकेत है।
दरअसल, Meta इस साल AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 115 से 135 बिलियन डॉलर तक खर्च करने जा रही है। कंपनी अब AI को केवल एक नए प्रोडक्ट की तरह नहीं, बल्कि अपने पूरे बिजनेस मॉडल का केंद्र बना रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी इंजीनियर्स से AI एजेंट्स की मदद से अपने काम को ऑटोमेट करने के लिए कह रही है। वहीं एंप्लॉयीज की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिवाइस ट्रैकिंग सॉफ्टवेयर लगाने की भी चर्चा है। इसे लेकर 1,500 से ज्यादा एंप्लॉयीज ने विरोध दर्ज कराया, लेकिन कंपनी ने अपनी योजना में बदलाव नहीं किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट के कारण होने वाली छंटनी नहीं है। Meta इस समय रिकॉर्ड मुनाफे में है। ऐसे में यह “Efficiency Layoffs” यानी दक्षता आधारित छंटनी मानी जा रही है, जहां AI की मदद से इंसानी श्रम की जरूरत कम की जा रही है।
शुभ्रांशु सिंह ने भारतीय मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री को भी सतर्क रहने की सलाह दी है। उनका कहना है कि अब तक भारत में कम लागत, रिश्तों पर आधारित बिजनेस मॉडल और ‘जुगाड़’ संस्कृति को सुरक्षा कवच माना जाता था, लेकिन Meta का यह कदम बताता है कि AI अब केवल बैक-ऑफिस काम तक सीमित नहीं है। यह इंजीनियरिंग, क्रिएटिव वर्क, ऑपरेशंस और प्रोडक्ट डेवलपमेंट जैसे मुख्य क्षेत्रों में भी तेजी से जगह बना रहा है।
उन्होंने कहा कि अगर दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे लाभकारी डिजिटल कंपनियों में से एक AI आधारित मॉडल को प्राथमिकता दे रही है, तो आने वाले समय में क्लाइंट्स भी एजेंसियों और मीडिया कंपनियों से उसी तरह की दक्षता और कम मानव निर्भरता की अपेक्षा करेंगे।
हाल ही में कंपनी के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने कहा था कि जिन प्रोजेक्ट्स के लिए पहले बड़ी टीमों की जरूरत होती थी, उन्हें अब एक प्रतिभाशाली व्यक्ति AI टूल्स की मदद से पूरा कर सकता है। शुभ्रांशु सिंह का मानना है कि यह बयान केवल टेक इंडस्ट्री के लिए नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक मार्केटिंग और मीडिया इंडस्ट्री के भविष्य की दिशा दिखाता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
आने वाले वर्षों में असम की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यही है कि उसे अब भारत के एक दूरस्थ राज्य के रूप में नहीं, बल्कि विकास और अवसरों के उभरते केंद्र के रूप में देखा जाए।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, BW बिजनेसवर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ।
असम लंबे समय तक देश के बाकी हिस्सों में एक जटिल और सीमित पहचान के साथ देखा जाता रहा। जब भी असम की चर्चा होती थी, तो बाढ़, राजनीतिक अस्थिरता, अवैध प्रवासन, उग्रवाद और भौगोलिक दूरी जैसे मुद्दे सबसे पहले सामने आते थे। जबकि वास्तविकता यह है कि असम हमेशा से संस्कृति, प्राकृतिक संसाधनों, चाय उद्योग, जैव विविधता और ऐतिहासिक विरासत से समृद्ध रहा है। फिर भी देश के बड़े हिस्से ने असम को अक्सर दूर और अलग-थलग राज्य के रूप में देखा। लेकिन अब यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है।
आज असम की नई पहचान तैयार की जा रही है। ऐसी पहचान जो विकास, सड़कें, निवेश, स्वास्थ्य सेवाएं, पर्यटन, कनेक्टिविटी और आत्मविश्वास की बात करती है। इस बदलाव के केंद्र में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का नाम प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों में उनकी राजनीतिक शैली और प्रशासनिक सक्रियता ने “ब्रैंड हिमंत” और “ब्रैंड असम” जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया है। दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक छवि असम की नई पहचान को मजबूत करती है और बदलता हुआ असम उनके नेतृत्व की लोकप्रियता को और बढ़ाता है।
हिमंत बिस्वा सरमा की राजनीतिक यात्रा अचानक नहीं बनी। यह कई वर्षों की मेहनत, संगठन क्षमता, जमीनी राजनीति की समझ और लगातार चुनावी सफलता का परिणाम है। वर्ष 2001 से जलुकबाड़ी विधानसभा सीट से लगातार छह बार चुनाव जीतना केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह जनता के लंबे विश्वास और मजबूत स्थानीय पकड़ का संकेत है। समय के साथ वे केवल एक राजनीतिक रणनीतिकार नहीं रहे, बल्कि पूर्वोत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि वे हमेशा सक्रिय दिखाई देते हैं। चाहे प्रशासन हो, चुनाव हो, सार्वजनिक कार्यक्रम हों या मीडिया से संवाद — उनकी कार्यशैली में गति और तत्परता दिखाई देती है। आधुनिक राजनीति में केवल नीतियां ही नहीं, बल्कि जनता की धारणा भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो निर्णायक, ऊर्जावान और आसानी से उपलब्ध दिखें। हिमंत बिस्वा सरमा ने इसी प्रकार की छवि तैयार की है। उनकी भाषा सीधी होती है, राजनीतिक संदेश स्पष्ट होते हैं और प्रशासनिक फैसलों में त्वरित कार्रवाई दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक ब्रैंडिंग मजबूत हुई है।
हालांकि “ब्रैंड असम” का उद्देश्य केवल एक नेता की लोकप्रियता तक सीमित नहीं है। असम खुद भी भारत के आर्थिक और राजनीतिक नक्शे पर अपनी नई जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। दशकों तक पूर्वोत्तर भारत को निवेश और व्यापार के लिहाज से कठिन और दूरस्थ क्षेत्र माना जाता था। अब असम की सरकार इस सोच को बदलने की कोशिश कर रही है। राज्य को एक शांत, जुड़ा हुआ और अवसरों से भरे क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
असम अब केवल सीमावर्ती राज्य की छवि से बाहर निकलकर खुद को पूर्वोत्तर भारत के प्रवेश द्वार और भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्थापित करना चाहता है। आज के समय में केवल नीतियां ही विकास तय नहीं करतीं, बल्कि किसी राज्य की छवि भी बहुत मायने रखती है। पर्यटन, निवेश, उद्योग और व्यापार काफी हद तक इस बात पर निर्भर करते हैं कि कोई राज्य खुद को दुनिया के सामने किस रूप में प्रस्तुत करता है।
असम की नई कहानी आशावाद पर आधारित है। राज्य यह संदेश देना चाहता है कि वह आधुनिक भी है और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हुआ भी। वह विकास चाहता है लेकिन अपनी पहचान खोए बिना। यही संतुलन “ब्रैंड असम” को विशेष बनाता है।
इस नई छवि को मजबूती इसलिए भी मिल रही है क्योंकि जमीन पर विकास दिखाई देने लगा है। सड़कें, पुल, एयरपोर्ट, मेडिकल कॉलेज और शहरी विकास परियोजनाएं केवल सरकारी उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि वे प्रगति के प्रतीक बन चुकी हैं। बेहतर कनेक्टिविटी असम के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य का भविष्य व्यापार, पर्यटन और क्षेत्रीय सहयोग पर काफी हद तक निर्भर करता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में भी विशेष ध्यान दिया गया है। नए मेडिकल कॉलेजों और स्वास्थ्य संस्थानों के विस्तार से यह संदेश देने की कोशिश हुई है कि सरकार केवल तात्कालिक राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के विकास पर काम कर रही है। इसके साथ ही असम के युवाओं की आकांक्षाएं भी तेजी से बदल रही हैं। नई पीढ़ी अब रोजगार, बेहतर शिक्षा, डिजिटल सुविधाएं, उद्यमिता और आधुनिक जीवनशैली की उम्मीद करती है। उनकी सोच पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वाकांक्षी हो चुकी है।
हालांकि असली चुनौती यही है कि विकास केवल बड़े शहरों या सरकारी विज्ञापनों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लेकर आए। “ब्रैंड असम” की सफलता इसी पर निर्भर करेगी कि राज्य के नागरिक खुद अपने भविष्य को लेकर कितना आत्मविश्वास महसूस करते हैं।
असम की बदलती पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सुरक्षा और स्थिरता की भावना को मजबूत करना भी है। कोई भी राज्य तब तक बड़े निवेश या पर्यटन को आकर्षित नहीं कर सकता जब तक लोग उसके भविष्य को लेकर आश्वस्त न हों। असम लंबे समय तक अस्थिरता और अनिश्चितता की छवि से जूझता रहा है। इसलिए उस धारणा को बदलना बेहद जरूरी था।
यही कारण है कि वर्तमान सरकार कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक नियंत्रण को अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में दिखाती है। यह केवल शासन सुधारने का प्रयास नहीं है, बल्कि लोगों और निवेशकों के बीच भरोसा पैदा करने की कोशिश भी है। निवेशक तभी पैसा लगाते हैं जब उन्हें स्थिरता दिखाई दे। पर्यटक तभी आते हैं जब उन्हें सुरक्षा महसूस होती है। युवा तभी अपने राज्य में भविष्य देखते हैं जब उन्हें अवसर और विश्वास दोनों मिलें।
हिमंत बिस्वा सरमा की छवि एक सख्त और सक्रिय प्रशासक की रही है और यही छवि असम में स्थिरता के बड़े संदेश से जुड़ती है। व्यापक स्तर पर यह संदेश दिया जा रहा है कि असम अब अनिश्चितता की राजनीति से निकलकर आकांक्षाओं की राजनीति की ओर बढ़ रहा है।
विकास के साथ-साथ असम अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी बचाए रखना चाहता है। पूर्वोत्तर भारत में विकास हमेशा भाषा, परंपरा, संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव से जुड़ा विषय रहा है। असम अब आधुनिकता और संस्कृति को विरोधी नहीं, बल्कि पूरक रूप में प्रस्तुत कर रहा है। असमिया त्योहार, संगीत, वस्त्र, चाय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपराएं और स्थानीय विरासत राज्य की नई पहचान का हिस्सा बनते जा रहे हैं। इससे “ब्रैंड असम” को भावनात्मक गहराई मिलती है। राज्य आधुनिक दिखना चाहता है लेकिन अपनी जड़ों से कटकर नहीं। असम के भीतर रहने वाले लोगों के लिए यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास आर्थिक प्रगति जितना ही महत्वपूर्ण है।
आने वाले वर्षों में असम की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा यही है कि उसे अब भारत के एक दूरस्थ राज्य के रूप में नहीं, बल्कि विकास और अवसरों के उभरते केंद्र के रूप में देखा जाए। बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, रणनीतिक भौगोलिक स्थिति, बढ़ती कनेक्टिविटी और मजबूत राजनीतिक उपस्थिति के साथ असम खुद को पूर्वोत्तर भारत के भविष्य के केंद्र में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के तहत असम के पास व्यापार, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन और क्षेत्रीय व्यापार का बड़ा केंद्र बनने की क्षमता है। यदि आने वाले दशक में यह विकास निरंतर बना रहता है, तो असम पूर्वी भारत की सबसे बड़ी आर्थिक सफलता की कहानियों में शामिल हो सकता है। अंततः “ब्रैंड हिमंत” और “ब्रैंड असम” दोनों की वास्तविक ताकत केवल राजनीतिक प्रचार में नहीं, बल्कि इस बात में होगी कि क्या आम लोग वास्तव में महसूस करते हैं कि राज्य लगातार और स्थायी रूप से आगे बढ़ रहा है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
इसकी नींव उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही पड़ गई थी। उस समय उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो प्रशासन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास पर विशेष ध्यान देता है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा, BW बिजनेसवर्ल्ड और एक्सचेंज4मीडिया के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ
नरेंद्र मोदी ने जब वर्ष 2014 में पहली बार भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले वर्षों में उनका नेतृत्व भारतीय राजनीति की दिशा और चर्चा दोनों को इतनी गहराई से प्रभावित करेगा। आज लगभग 12 वर्षों बाद “ब्रांड मोदी” केवल एक राजनीतिक नाम नहीं रह गया है, बल्कि यह मजबूत नेतृत्व, विकास, अनुशासन, राष्ट्रीय आत्मविश्वास और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती पहचान का प्रतीक बन चुका है। करोड़ों समर्थकों के लिए नरेंद्र मोदी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि नए भारत की आकांक्षाओं का चेहरा हैं।
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक पहचान अचानक नहीं बनी। इसकी नींव उनके गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही पड़ गई थी। उस समय उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा गया जो प्रशासन, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास पर विशेष ध्यान देता है। गुजरात में तेज़ विकास, बेहतर सड़कें, निवेश को आकर्षित करने वाली नीतियां और उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण ने “गुजरात मॉडल” को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया। यही छवि आगे चलकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में ले आई और 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय राजनीति का पूरा समीकरण बदल गया।
“ब्रांड मोदी” की सबसे बड़ी ताकत उनकी निर्णायक नेतृत्व शैली मानी जाती है। भारतीय राजनीति में अक्सर नेताओं पर फैसले टालने या राजनीतिक गणित में उलझने के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन मोदी ने अपने लिए एक अलग छवि बनाई — ऐसे नेता की जो बड़े और कठिन निर्णय लेने से पीछे नहीं हटता। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें मजबूत इच्छाशक्ति वाला नेता मानते हैं।
प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी सरकार ने कई बड़े अभियान शुरू किए। “डिजिटल इंडिया”, “मेक इन इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया” और “स्वच्छ भारत अभियान” जैसी योजनाओं ने देश के विकास मॉडल को नई दिशा देने का प्रयास किया। साथ ही, हाईवे, रेलवे, एयरपोर्ट और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े स्तर पर हुए विस्तार ने यह संदेश दिया कि सरकार केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबी अवधि के विकास पर काम कर रही है। मोदी की राजनीति में “बड़ा सोचो और बड़ा करो” का संदेश लगातार दिखाई देता है।
उनकी लोकप्रियता का दूसरा बड़ा कारण उनकी संवाद क्षमता है। नरेंद्र मोदी उन नेताओं में गिने जाते हैं जो जनता की भावनाओं और मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझते हैं। उनके भाषण सरल भाषा में होते हैं और उनमें ऐसे नारे होते हैं जो सीधे लोगों के मन में जगह बना लेते हैं। “सबका साथ, सबका विकास”, “आत्मनिर्भर भारत” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे नारे केवल राजनीतिक शब्द नहीं रहे, बल्कि आम जनजीवन और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन गए।
मोदी ने डिजिटल माध्यमों की ताकत को बहुत जल्दी समझ लिया था। सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और “मन की बात” जैसे कार्यक्रमों के जरिए उन्होंने जनता से लगातार संवाद बनाए रखा। आज वे दुनिया के सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले राजनीतिक नेताओं में शामिल हैं। यही सीधा संवाद उनकी लोकप्रियता को लगातार बनाए रखने में मदद करता है। लोग महसूस करते हैं कि प्रधानमंत्री सीधे उनसे बात कर रहे हैं और देश के मुद्दों पर उन्हें जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
समय के साथ नरेंद्र मोदी केवल भारत के नेता नहीं रहे, बल्कि एक वैश्विक नेता के रूप में भी उभरे। विदेशों में भारतीय समुदाय को संबोधित करने से लेकर बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने तक, उन्होंने दुनिया के सामने एक आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी भारत की छवि प्रस्तुत की। भारत की सफल G20 अध्यक्षता ने भी इस धारणा को और मजबूत किया। कई भारतीयों के लिए यह गर्व का विषय था कि भारत वैश्विक मंच पर केंद्र में दिखाई दे रहा है।
दुनिया के बड़े नेताओं के साथ उनकी मुलाकातें, रणनीतिक साझेदारियों पर जोर और भारत की वैश्विक भूमिका को मजबूत करने की कोशिशों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण आवाज़ बना दिया। समर्थकों का मानना है कि “ब्रांड मोदी” अब भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ चुका है।
मोदी की छवि में व्यक्तिगत अनुशासन भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग के प्रति उनका समर्पण, लंबे समय तक काम करने की आदत और ऊर्जावान सार्वजनिक जीवन अक्सर चर्चा में रहते हैं। आज के समय में लोग ऐसे नेताओं को पसंद करते हैं जो खुद उदाहरण प्रस्तुत करें, और मोदी की जीवनशैली इस अपेक्षा को मजबूत करती है।
उनकी निजी जीवन यात्रा भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करती है। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री बनना लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का संदेश देता है। खासकर युवा वर्ग उनके जीवन से यह संदेश लेता है कि सीमित परिस्थितियां भी बड़े सपनों को रोक नहीं सकतीं।
राजनीति के अलावा मोदी की रुचि अध्यात्म, भारतीय संस्कृति और लेखन में भी दिखाई देती है। इससे उनकी छवि केवल एक राजनीतिक नेता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की बनती है जो भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा हुआ है।
हालांकि “ब्रांड मोदी” की सबसे मजबूत नींव विकास ही है। गुजरात से लेकर दिल्ली तक उनकी राजनीति का केंद्र विकास रहा है। सड़कें, रेलवे, डिजिटल तकनीक, विनिर्माण, हरित ऊर्जा और आधुनिक बुनियादी ढांचे पर लगातार जोर देने से उनकी सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। समर्थकों के अनुसार यही बात उन्हें पारंपरिक राजनीति से अलग बनाती है। वे उन्हें केवल चुनावी राजनीति करने वाला नेता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और भारत के भविष्य के बारे में सोचने वाला नेता मानते हैं।
आज 12 वर्षों के बाद भी नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में बने हुए हैं। “ब्रांड मोदी” अब केवल एक व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उस नए भारत का प्रतीक बन चुका है जो तेज़ विकास, मजबूत नेतृत्व और वैश्विक पहचान चाहता है। करोड़ों लोगों के लिए मोदी उस भारत की उम्मीद हैं जो बड़ा सोचता है, तेजी से आगे बढ़ना चाहता है और दुनिया में अपनी अलग जगह बनाना चाहता है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (C. Joseph Vijay) का लगातार ब्लैक सूट और व्हाइट शर्ट में दिखना केवल फैशन नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक ब्रांडिंग रणनीति माना जा रहा है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
एम. गौतम मचैया, सीनियर मीडिया प्रोफेशनल।
उपभोक्ता ब्रांडिंग की दुनिया में लगातार एक जैसी छवि पहचान और भरोसा बनाने का सबसे मजबूत माध्यम मानी जाती है। एप्पल (Apple) की मिनिमल डिजाइन, नाइकी (Nike) का स्वूश लोगो या स्टीव जॉब्स (Steve Jobs) का हमेशा काले टर्टलनेक में नजर आना इसी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। अब यही फॉर्मूला राजनीति में भी तेजी से दिखाई दे रहा है और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (C. Joseph Vijay) इसकी ताजा मिसाल बनते नजर आ रहे हैं।
मुख्यमंत्री बनने के बाद से विजय लगातार ब्लैक सूट और सफेद शर्ट में सार्वजनिक मंचों पर दिखाई दे रहे हैं। इसे केवल फैशन नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक ब्रांडिंग रणनीति माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह लुक विजय को बाकी पारंपरिक नेताओं से अलग पहचान देने का काम कर रहा है।
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सफेद शर्ट और वेष्टी की छवि से जुड़ी रही है। ऐसे में विजय का यह कॉरपोरेट स्टाइल लुक उन्हें पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग स्थापित करता है। यह छवि उन्हें एक “प्रशासक” और “कॉरपोरेट लीडर” के रूप में पेश करती है, न कि सिर्फ जननेता के तौर पर।
मार्केटिंग विशेषज्ञ इसे “यूनिफॉर्म इफेक्ट” बताते हैं। यानी जब कोई सार्वजनिक चेहरा लगातार एक जैसी विजुअल पहचान बनाए रखता है तो लोगों के दिमाग में उसकी मजबूत ब्रांड रिकॉल बनने लगती है। सोशल मीडिया और डिजिटल राजनीति के दौर में यह रणनीति और भी असरदार मानी जा रही है।
ब्लैक सूट जहां अधिकार, प्रोफेशनलिज्म और आधुनिकता का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं सफेद शर्ट भारतीय राजनीति में पारदर्शिता और जनसेवा की छवि को बनाए रखती है। इस तरह विजय दोनों प्रतीकों को मिलाकर एक नई राजनीतिक पहचान गढ़ने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति खासतौर पर युवा और शहरी वोटर्स को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। कॉरपोरेट संस्कृति और वैश्विक मीडिया से प्रभावित मध्यम वर्ग के लिए यह लुक आधुनिक नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता का संकेत देता है।
हालांकि इस रणनीति के जोखिम भी हैं। तमिलनाडु की राजनीति में जमीनी और सांस्कृतिक रूप से जुड़े नेताओं को ज्यादा स्वीकार्यता मिलती रही है। ऐसे में सूट-बूट वाली छवि को कुछ लोग “अत्यधिक कॉरपोरेट” या आम जनता से दूर भी मान सकते हैं।
फिर भी राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विजय केवल पुरानी राजनीतिक शैली को अपनाने के बजाय उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। डिजिटल दौर की राजनीति में जहां तस्वीरें और विजुअल पहचान विचारधारा जितनी ही महत्वपूर्ण हो चुकी हैं, वहां विजय का ब्लैक सूट और व्हाइट शर्ट अब उनकी नई राजनीतिक ब्रांडिंग बन चुका है।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
गांधी जी ने सिर्फ अहिंसा और सत्याग्रह के जरिए अंग्रेजों से लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि उन्होंने ब्रांडिंग, स्टोरीटेलिंग, ऑडियंस सेगमेंटेशन और मीडिया रिलेशंस जैसे आधुनिक PR सिद्धांतों का इस्तेमाल किया।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
जब दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति और विशाल साम्राज्य का सामना एक कमजोर से दिखने वाले, साधारण धोती पहने वकील से होता है, तो इतिहास में नेतृत्व, रणनीति और पब्लिक रिलेशंस (PR) का सबसे बड़ा सबक देखने को मिलता है। आधुनिक कॉरपोरेट कंपनियों के महंगी ग्लोबल एजेंसियां हायर करने से बहुत पहले ही महात्मा गांधी रणनीतिक कम्युनिकेशन की कला में माहिर हो चुके थे। उन्होंने बहुत पहले समझ लिया था कि केवल शारीरिक ताकत से शारीरिक ताकत को हराया नहीं जा सकता। इसके लिए इंसानी अंतरात्मा, जनमत और नैतिक वैधता के मैदान में लड़ाई लड़नी होगी।
गांधी जी ने सिर्फ अहिंसा और सत्याग्रह के जरिए अंग्रेजों से लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि उन्होंने ब्रांडिंग, स्टोरीटेलिंग, ऑडियंस सेगमेंटेशन और मीडिया रिलेशंस जैसे आधुनिक PR सिद्धांतों का इस्तेमाल किया। इन सिद्धांतों की मदद से गांधी जी ने अंग्रेजी हुकूमत का आत्मविश्वास तोड़ दिया, इंडियन नेशनल कांग्रेस को एक एलीट बहस मंच से निकालकर घर-घर की पहचान बना दिया और करोड़ों भारतीयों को आजादी की लड़ाई में एकजुट कर दिया।
पब्लिक रिलेशंस की बुनियाद को समझना
गांधी जी की प्रतिभा को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आधुनिक दौर में पब्लिक रिलेशंस को कैसे परिभाषित किया जाता है। आधुनिक PR के जनक माने जाने वाले Edward L. Bernays ने PR को ऐसी प्रक्रिया बताया था, जिसमें सूचना, समझाने और तालमेल के जरिए किसी उद्देश्य, आंदोलन या संस्था के लिए लोगों का समर्थन तैयार किया जाता है। बाद में Public Relations Society of America (PRSA) ने इसे और आधुनिक रूप देते हुए कहा कि PR एक रणनीतिक कम्युनिकेशन प्रक्रिया है, जो संस्थाओं और जनता के बीच फायदे वाले रिश्ते बनाती है।
असल में नैतिक और प्रभावी PR कभी भी ऊपर से थोपा गया नियंत्रण, हेरफेर या खोखला प्रचार नहीं होता। यह सच, जानकारी और पारदर्शिता पर आधारित दोतरफा भरोसे का रिश्ता बनाने की लगातार कोशिश होती है।
गांधी जी ने इस सामाजिक विज्ञान को सहज रूप से समझ लिया था। उन्हें पता था कि ब्रिटिश साम्राज्य जैसे विशाल ताकतवर शासन को हराने के लिए बंदूक, तोप या गुप्त सेना की जरूरत नहीं है। जरूरत है वैश्विक जनमत को प्रभावित करने की, अंग्रेजी राज की नैतिकता को चुनौती देने की और जनता का अटूट भरोसा जीतने की। गांधी जी जानते थे कि अगर लोग आजादी के विचार से पूरी तरह जुड़ गए, तो अंग्रेजों की शासन करने की ताकत खुद खत्म हो जाएगी।
दक्षिण अफ्रीका: गांधी जी का पहला ‘बीटा टेस्ट’
गांधी जी की पहचान एक मास्टर कम्युनिकेटर के रूप में भारत में नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुई। वहां एक युवा वकील के रूप में उन्होंने नस्लीय भेदभाव और भारतीय प्रवासियों के अपमान को करीब से देखा। तभी उन्होंने समझ लिया कि अगर किसी आंदोलन की अपनी आवाज नहीं होगी, तो दुनिया उसे कभी नहीं देख पाएगी।
इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने अपना पहला बड़ा प्रकाशन ‘Indian Opinion’ नाम का साप्ताहिक अखबार शुरू किया। यह सिर्फ एक अखबार नहीं था, बल्कि राजनीतिक लामबंदी और नैरेटिव कंट्रोल का बेहद ताकतवर माध्यम था। इसके जरिए गांधी जी ने नस्लवाद की क्रूर सच्चाइयों को लगातार दुनिया के सामने रखना शुरू किया।
इन कहानियों को बड़े स्तर पर फैलाकर उन्होंने सिर्फ दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, बल्कि भारत और ब्रिटेन तक सहानुभूति की लहर पैदा कर दी। उन्होंने पश्चिमी लोकतंत्र की बात करने वालों को आईना दिखाया। जब गांधी जी 9 जनवरी 1915 को अपने राजनीतिक गुरु स्वर्गीय Gopal Krishna Gokhale के कहने पर भारत लौटे, तब तक वे दुनिया भर में शांतिपूर्ण प्रतिरोध की एक मजबूत पहचान बन चुके थे।
दोस्तों, गांधी जी की भारत वापसी की याद में भारत सरकार हर साल 9 जनवरी को Pravasi Bharatiya Divas मनाती है।
गांधी जी की कम्युनिकेशन रणनीति के ‘Three Cs’
आज जब गांधी जी के अभियानों को देखा जाता है, तो उनकी रणनीति में “Three Cs of Communication” साफ नजर आते हैं- Credibility, Consistency और Connection। यही तीन स्तंभ उनकी ताकत बने।
Credibility (बात और व्यवहार में एक जैसा होना)
PR की दुनिया में संदेश उतना ही मजबूत होता है, जितना भरोसा संदेश देने वाले व्यक्ति पर होता है। गांधी जी ने इसे अपने प्रसिद्ध विचार “Be the change you want to see in the world” के जरिए समझाया। उन्होंने सिर्फ सादगी, गरीबी और आत्मनिर्भरता की बातें नहीं कीं, बल्कि खुद उस जीवन को जिया।
जब उन्होंने पश्चिमी दिखावे का विरोध किया, तो अपने महंगे यूरोपीय सूट छोड़ दिए और भारत के गरीब लोगों जैसे साधारण कपड़े पहनने लगे। उनके त्याग और सादगी में दिखावा नहीं था, इसलिए लोगों का भरोसा उन पर अटूट हो गया। जनता को लगा कि यह नेता दूर बैठा हुआ कोई एलीट नेता नहीं, बल्कि उन्हीं के बीच का इंसान है।
Consistency (संदेश में लगातार एकरूपता)
लंबे समय तक जनमत बदलने के लिए लगातार एक जैसा संदेश देना बहुत जरूरी होता है। दशकों तक चली आजादी की लड़ाई में गांधी जी का मुख्य संदेश कभी नहीं बदला। वे लगातार यही कहते रहे कि भारत को पूरी आजादी केवल शांतिपूर्ण और सत्य के रास्ते से मिलेगी।
चाहे वे ब्रिटिश वायसराय से बातचीत कर रहे हों, हजारों लोगों को संबोधित कर रहे हों या जेल से लेख लिख रहे हों, उनका रुख कभी नहीं बदला। यही निरंतरता धीरे-धीरे अंग्रेजी शासन की नैतिक और राजनीतिक ताकत को कमजोर करती गई।
Connection (एलीट वर्ग से हटकर सीधे जनता से जुड़ना)
एक प्रभावी कम्युनिकेटर वही होता है, जो सीधे लोगों के दिल तक पहुंचे। गांधी जी के आने से पहले भारतीय राष्ट्रवाद मुख्य रूप से पढ़े-लिखे शहरी वर्ग तक सीमित था। गांधी जी समझ गए थे कि इससे जन आंदोलन नहीं बन सकता।
इसलिए उन्होंने पारंपरिक राजनीतिक रास्तों को छोड़कर सीधे जनता तक पहुंच बनाई। वे थर्ड क्लास रेल डिब्बों में यात्रा करते थे, खुले मैदानों में प्रार्थना सभाएं करते थे, आसान भाषा में भाषण देते थे और गांव-गांव पदयात्राएं करते थे। उन्होंने लोगों को दर्शक नहीं, बल्कि आंदोलन का हिस्सा बनाया। इसी वजह से करोड़ों भारतीयों से उनका भावनात्मक रिश्ता बन गया।
गांधी जी की विजुअल ब्रांडिंग: धोती और चरखा
आज की कॉरपोरेट दुनिया में किसी कंपनी का लोगो, यूनिफॉर्म और विजुअल पहचान उसके मूल्यों को दर्शाती है। गांधी जी इस मामले में भी बेहद आगे थे। उन्होंने दो ऐसे प्रतीक दिए, जिन्होंने इतिहास बदल दिया- चरखा और खादी।
चरखा सिर्फ सूत कातने का साधन नहीं था। यह आत्मनिर्भरता, आर्थिक आजादी और मेहनत की गरिमा का प्रतीक बन गया। गांधी जी चाहते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा हर व्यक्ति रोज कुछ समय चरखा चलाए।
खादी जल्दी ही आजादी की लड़ाई की यूनिफॉर्म बन गई। जो व्यक्ति खादी पहनता था, वह बिना कुछ बोले आजादी आंदोलन से अपनी निष्ठा जाहिर कर देता था। इससे गरीब और अनपढ़ लोग भी खुद को इस राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा महसूस करने लगे।
रणनीतिक इवेंट्स: 20वीं सदी के वायरल कैंपेन
गांधी जी को यह भी अच्छी तरह पता था कि लोग नाटकीय और भावनात्मक घटनाओं को ज्यादा याद रखते हैं। वायरल मार्केटिंग शब्द आने से बहुत पहले गांधी जी ऐसे बड़े आयोजन कर रहे थे, जिनका उद्देश्य वैश्विक मीडिया का ध्यान खींचना था।
चंपारण और खेड़ा आंदोलन उनके शुरुआती प्रयोग थे। यहां उन्होंने किसानों को अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण टैक्स के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए संगठित किया। जब इन आंदोलनों की खबरें राष्ट्रीय मीडिया में छपीं, तो पूरे देश को विश्वास हुआ कि अहिंसक आंदोलन सच में असरदार हो सकता है।
बाद में अंग्रेजों की सेंसरशिप से बचने के लिए गांधी जी ने और ज्यादा रचनात्मक तरीके अपनाए। विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक होली इसी रणनीति का हिस्सा थी। यह एक तरह का राजनीतिक थिएटर था, जिसकी तस्वीरें और खबरें दुनिया भर में फैल गईं।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता 1930 का Dandi Salt March था। अंग्रेजों ने नमक पर टैक्स लगा रखा था, जबकि नमक हर इंसान की जरूरत थी। कई लोगों को लगा कि नमक जैसे मुद्दे पर आंदोलन करना बेकार है, लेकिन गांधी जी ने इसमें PR की बड़ी ताकत देखी।
उन्होंने अचानक आंदोलन शुरू नहीं किया, बल्कि पहले वायसराय को इसकी जानकारी दी और फिर साबरमती आश्रम से दांडी तक 24 दिन और 240 मील की यात्रा शुरू की। यह उस दौर का एकदम परफेक्ट वायरल कैंपेन था।
हर दिन दुनिया भर के पत्रकार गांधी जी की यात्रा को कवर कर रहे थे। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए, दुनिया की नजरें उन पर टिकती गईं।
जब गांधी जी ने समुद्र किनारे पहुंचकर एक मुट्ठी नमक उठाया, तो उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य का कानून तोड़ा। लेकिन यह विरोध इतना शांतिपूर्ण, प्रतीकात्मक और प्रभावशाली था कि अंग्रेज सरकार पूरी दुनिया के सामने हास्यास्पद और क्रूर दिखाई देने लगी।
इसके बाद 8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने Quit India Movement शुरू किया। इस आंदोलन के लिए उन्होंने बेहद छोटा लेकिन ताकतवर नारा दिया- “Do or Die” यानी “करो या मरो”। यह नारा इतना आसान और प्रभावी था कि कुछ ही समय में पूरे देश में फैल गया।
गांधी जी की सबसे बड़ी PR जीत
इन सभी रणनीतियों के जरिए गांधी जी ने तीन बड़े काम कर दिखाए। पहला, उन्होंने धर्म, भाषा और संस्कृति के आधार पर बंटे भारत को एक राष्ट्रीय पहचान दी। दूसरा, उन्होंने अंग्रेजों की सेंसरशिप और कानूनी बंदिशों को मात दे दी। तीसरा, और सबसे अहम, उन्होंने अंग्रेजों को एक ऐसे PR जाल में फंसा दिया, जिससे निकलना मुश्किल था। अगर अंग्रेज शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला करते, तो वे दुनिया के सामने क्रूर दिखते। और अगर कुछ नहीं करते, तो कमजोर दिखाई देते।
गांधी जी ने अंग्रेजों की नैतिक ताकत को धीरे-धीरे खत्म कर दिया। उन्होंने ब्रिटेन की जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़ा कर दिया।
आखिरकार 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। गांधी जी ने दुनिया को दिखा दिया कि सच, स्पष्ट संदेश और रचनात्मक रणनीतिक कम्युनिकेशन किसी भी बड़ी सैन्य ताकत से ज्यादा शक्तिशाली हो सकता है।
असल में महात्मा गांधी की पूरी यात्रा रणनीतिक पब्लिक रिलेशंस की सबसे बड़ी मिसाल है। उन्होंने Indian Opinion और Harijan जैसे प्रकाशनों के जरिए मजबूत मीडिया नेटवर्क बनाया, दांडी मार्च जैसे बड़े प्रतीकात्मक इवेंट्स आयोजित किए और चरखा-खादी जैसी विजुअल पहचान तैयार की। उन्होंने आधुनिक मीडिया और पारंपरिक पदयात्राओं को मिलाकर ऐसा भावनात्मक जुड़ाव बनाया, जिसे अंग्रेजी सेंसरशिप भी नहीं रोक पाई।
गांधी जी की हत्या के बाद Indian National Congress ने इस कम्युनिकेशन विरासत को आगे बढ़ाया। आजादी के बाद कांग्रेस ने जनसंपर्क, भावनात्मक कहानी कहने और प्रतीकों के इस्तेमाल को अपनी राजनीति का अहम हिस्सा बनाया। बड़े विकास कार्यक्रमों, जन आंदोलनों और खादी को सार्वजनिक सेवा के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करके गांधी जी की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।
इस तरह गांधी जी ने सिर्फ आजादी की लड़ाई नहीं जीती, बल्कि आधुनिक राजनीतिक कम्युनिकेशन और राजनीतिक PR की पूरी दिशा हमेशा के लिए बदल दी।
मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
अनंत विजय, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
इतिहास एक ऐसा विषय है जिसकी चर्चा भारतीय राजनीति में निरंतर होती रहती है। भारतीय राजनीतिक दल हमेशा एक दूसरे पर दोषारोपण करने में अबतक लिखे इतिहास का सहारा लेते रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारतीय इतिहास को समग्रता में देखे और लिखने की बात प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई बार कर चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने कुछ वर्षों पहले काशी की एक गोष्ठी में कहा था कि इतिहास लेखन में दूसरे की गलतियों को रेखांकित करने से बेहतर होगा कि अपनी लकीर लंबी की जाए।
कहना ना होगा कि देश का शीर्ष नेतृत्व भारतीय इतिहास को समग्रता में लिखे जाने और देश की जनता के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की अपेक्षा करता है। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने तब से वामपंथी इतिहास लेखन की जगह भारतीय दृष्टि से इतिहास लेखन की बात की जाने लगी थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के करीब चार वर्ष बाद 2018 में भारत के समग्र इतिहास लेखन का सोच भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (इंडियन काउंसिल आफ हिस्टारिकल रिसर्च- आईसीएचआर) में आया। चार वर्षों तक वहां इसपर मंथन होता रहा।
इस बीच देश की जनता ने एक बार फिर से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत दिया। 2022 में भारत के समग्र इतिहास की योजना पर कार्य आरंभ हुआ। उस समय के समाचार पत्रों में आईसीएचआऱ के चैयरमैन राघवेन्द्र तंवर के हवाले से ये बातें प्रकाशित हैं कि आईसीएचआर भारत के समग्र इतिहास के प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। वामपंथी इतिहासकारों ने इसको इतिहास के पुनर्लेखन से जोड़कर इसकी आलोचना आरंभ कर दी। एक वामपंथी सांसद ने 2022 के दिसंबर में संसद में इसपर प्रश्न भी उठाया।
शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने उस प्रश्न के उत्तर में सदन को बताया था कि इतिहास का पुनर्लेखन नहीं किया जा रहा है। आईसीएचआर ने भारत के समग्र इतिहास लेखन पर एक प्रोजेक्ट आरंभ किया है। कांग्रेस सांसद मनीषे तिवारी ने भी इस पर प्रश्न उठाया था। प्रश्न ये नहीं है कि इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है या इतिहास लेखन के एकांगी प्रविधि से उत्पन्न रिक्त स्थानों की पूर्ति के लिए इतिहास लिखा जा रहा है। प्रश्न ये है कि आईसीएचआर ने 2018 में जो सोचा वो आठ वर्षों बाद भी भौतिक रूप से आकार नहीं ले सका है।
अब तक भारत के समग्र इतिहास का एक भी खंड प्रकाशित नहीं हो पाया है। जबकि इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया गया था। इस प्रोजेक्ट के लिए इतिहासकार सुष्मिता पांडे की नियुक्ति संपादक के पद पर की गई थी। उनके साथ प्रधानमंत्री मेमोरियल लाइब्रेरी से नरेन्द्र शुक्ल को प्रतिनियुक्ति पर लाकर इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया। दो और युवा विद्वानों को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा गया था। नरेन्द्र शुक्ल वापस जा चुके हैं। कहना ना होगा कि इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के वेतन आदि का खर्च तो आईसीएचआर उठा ही रहा है।
इस बीच आईसीएचआर के सदस्य सचिव रहे उमेश कदम पर 2022 में गंभीर वित्तीय अमियमितता के आरोप लगे। वो यहां से कार्यमुक्त हो गए। भारत के समग्र इतिहास के पहले खंड पर कार्य आरंभ हो चुका था। इस प्रोजोक्ट से जुड़े लोगों ने बताया कि उमेश कदम ने पदमुक्त होने के बाद पत्र लिखकर आईसीएचआर को अपने लिखित कार्यों के उपयोग से रोक दिया था। पहले खंड के लिए उन्होंने मध्यकालीन इतिहास पर लिखा था। उसकी जगह नए व्यक्ति की खोज करना और लिखवाने में समय लगा, बताया गया। इस बात को भी चार वर्ष बीत गए।
अभी तक पहला खंड नहीं आ पाना आईसीएचआर की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल है। प्रभारी सचिव ओमजी उपाध्याय को आशा है कि जल्द ही पहला खंड प्रकाशित हो जाएगा। अगर ये मान भी लिया जाए कि 2022 में ये प्रोजेक्ट जमीन पर उतरा और पहला खंड 2026 में आ जाएगा तो इस हिसाब से तो आठ खंड को प्रकाशित होने में 32 वर्ष लगेंगे। इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों के अनुसार ये तय हुआ था कि भारत का समग्र इतिहास का पहला खंड परिचयात्मक होगा। इस खंड में भारत के समग्र इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्थापित किया जाएगा।
इस बात की चर्चा होगी कि भारत के इतिहास लेखन का आधार भू-राजनीतिक न होकर भू-सांस्कृतिक होगा। पहला खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का होना था। बढ़ते बढ़ते वो करीब ग्यारह सौ पृष्ठों का हो गया। इसके प्रकाशन के बारे में जानकारी लेने पर पता चला कि ग्यारह सौ पन्नों के पहले खंड को तीन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। उनसे अनुरोध किया गया है कि वो इसका मूल्यांकन करके अपनी राय दें। विशेषज्ञों के लिखे हुए को विशेषज्ञों से मूल्यांकन करवाने की क्या आवश्यकता है। क्या आईसीएचआर को इस प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों पर भरोसा नहीं है।
इस प्रोजेक्ट की संपादक सुष्मिता पांडे विदुषी हैं। आईसीएचआर के अध्यक्ष राघवेन्द्र तंवर स्वयं विद्वान इतिहासकार हैं। ऐसे में मूल्यांकन के लिए बाहर के विद्वानों के पास भेजने की आवश्यकता क्यों ? इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए अगर पहला खंड परिचयात्मक और इस प्रोजेक्ट की आवश्यकता बताने वाला है तो ग्यारह सौ पृष्ठों का भारी भरकम खंड क्यों? क्या ये खंड दो-ढाई सौ पृष्ठों का नहीं होना चाहिए जो पहले तय किया गया था। तय तो ये भी किया जाना चाहिए कि ये प्रोजेक्ट कब तक पूरा होगा? क्या अनंत काल तक इस प्रोजेक्ट को चलाया जाना उचित रहेगा?
क्या आईसीएचआर इसको निश्चित समय सीमा में पूरा नहीं कर सकता है। बहुत संभव है कि आईसीएचआर में अब भी वामपंथियों के स्लीपर सेल सक्रिय हों और इस प्रोजेक्ट को अपने आकाओं के कहने पर लटकाने का उपक्रम कर रहे हों। ये देखना तो अध्यक्ष का काम है कि ये प्रोजेक्ट समय पर पूरा हो। आईसीएचआर में गड़बड़ियों का समाचार भी आता रहता है. चाहे वो मदर आफ डेमोक्रेसी पुस्तक का प्रकाशन हो या सुभाषचंद्र बोस नाम की पुस्तक का गलत शीर्षक प्रकाशन का मसला हो। दरअसल आईसीएचआर की समस्या बौद्धिक कम प्रशासनिक अधिक प्रतीत होती है।
2022 में उमेश कदम के पद छोड़ने के बाद से वहां स्थायी सदस्य सचिव नहीं हैं। पिछले वर्ष मई में अल्केश चतुर्वेदी को मंत्रालय ने सदस्य सचिव नियुक्त किया लेकिन वो इस पद पर अपना योगदान नहीं दे सके। कारण मंत्रालय और आईसीएचआर बेहतर बता सकते हैं। कुछ दिनों पूर्व फिर से सदस्य सचिव पद के लिए इंटरव्यू हुआ। पैनल तय करके नाम मंत्रालय भेज दिए गया लेकिन अबतक किसी की नियुक्ति नहीं हो सकी। अब तो ये भी संदेह होता है कि आईसीएचआर के उच्च पदों पर बैठे लोग ही नहीं चाहते हैं कि वहां सदस्य सचिव के पद पर कोई स्थायी नियुक्ति हो।
अगर सदस्य सचिव आ जाते हैं तो वो संस्था को चलाएंगे, इससे यथास्थितिवादियों को परेशानी हो सकती है। लेकिन चार वर्षों से इतनी महत्वपूर्ण संस्था में सदस्य सचिव का नहीं होना शिक्षा मंत्रालय के निर्णय लेने की क्षमता पर भी प्रश्न खड़े करता है। आईसीएचआर ऐसी संस्था है जिसकी सक्रियता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों को उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है। बशर्ते कि सक्रिय हो।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) साभार - दैनिक जागरण।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ईरान युद्ध शुरू होने से पहले $730 बिलियन था। पिछले दो महीने में यह करीब $31 बिलियन घट गया। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दोहरी मार पड़ी है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
केंद्र सरकार ने पिछले हफ़्ते ताबड़तोड़ फ़ैसले किए हैं। सोने-चाँदी पर कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी गई है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें ₹3 प्रति लीटर बढ़ा दी गई हैं। विदेशी मुद्रा की बचत इन फ़ैसलों के पीछे बड़ा कारण है। हमारे पास साल भर का सामान ख़रीदने के बराबर विदेशी मुद्रा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक 3 महीने का है। फिर ऐसे क़दमों की ज़रूरत क्यों पड़ गई?
हम विदेशी मुद्रा में surplus नहीं हैं, जैसे चीन है। हम जितने डॉलर कमाते हैं, उससे ज़्यादा डॉलर खर्च करते हैं। सामान और सर्विस ख़रीदने के लिए हमारा खर्च मान लेते हैं कि $100 है, तो कमाई $88 है। इसे current account deficit कहते हैं। $12 का गैप हम भरते हैं विदेशी निवेश से, जैसे FDI यानी Foreign Direct Investment, FPI यानी Foreign Portfolio Investment। इसे capital account में रखा जाता है। इस रास्ते से $12-13 आते थे। बचे हुए एक-दो डॉलर रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार में जमा कर देता था।
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार ईरान युद्ध शुरू होने से पहले $730 बिलियन था। पिछले दो महीने में यह करीब $31 बिलियन घट गया। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से दोहरी मार पड़ी है। कच्चे तेल की क़ीमतें बढ़ गई हैं, तो डॉलर ज़्यादा ख़र्च करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ़ शेयर बाज़ार से विदेशी निवेशक $22 बिलियन की बिकवाली कर चुके हैं।
युद्ध से पहले एक डॉलर की क़ीमत करीब ₹90 थी और अब ₹96। जब रुपया गिरता है, तो रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाज़ार में बेचता है। यह बिक्री इस उम्मीद में की जाती है कि डॉलर की सप्लाई बढ़ेगी, तो उसका दाम नहीं बढ़ेगा। यह कोशिश पूरी तरह सफल नहीं रही है।
नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक लाहिड़ी ने इंडिया टुडे से कहा कि भारत के पास नौ महीने का सामान ख़रीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा है। अंतरराष्ट्रीय मानक है कि कम से कम तीन महीने का विदेशी मुद्रा भंडार होना चाहिए। अभी तो हमारी स्थिति ठीक है, लेकिन युद्ध लंबा खिंचा तो दिक़्क़त आ सकती है। पेट्रोल-डीज़ल और सोने-चाँदी पर हमारी विदेशी मुद्रा का एक-तिहाई हिस्सा ख़र्च होता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अपील की है कि पेट्रोल-डीज़ल और सोने-चाँदी की खपत फ़िलहाल कम की जाए।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
असल में मैंने नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में 1985 में सीआईए से जुड़े एक जासूसी कांड पर चल रही जाँच पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लिखी थी।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के खर्च का विवाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रहा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी ने पिछले 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएँ की हैं। इन यात्राओं पर अनुमानित खर्च लगभग 60 करोड़ रुपये आया है, जबकि उनकी घोषित आय केवल 11 करोड़ रुपये के आसपास है। कांग्रेस पार्टी इसे गैर-महत्वपूर्ण कहकर कोई विस्तृत सफाई नहीं दे रही।
सवाल केवल यात्राओं और खर्च का नहीं, विदेशों के मेजबान लोगों, संगठनों और फिर वहाँ भारत के लोकतंत्र को लेकर दिए बयानों, गतिविधियों, गुप्त यात्राओं के भी महत्वपूर्ण हैं। शायद राहुल गांधी और कांग्रेस के उनके करीबी नेताओं को उनके सत्ता काल में ही ऐसी विदेश यात्राओं से आए राजनीतिक संकट का ध्यान नहीं है। सबसे बड़ा संकट 1985 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री और पार्टी प्रमुख रहते आया था, जब कांग्रेस के नेताओं की विदेश यात्राओं के तार जासूसी के प्रकरण से जुड़े और मंत्रियों के इस्तीफे करवाने पड़े।
मेरे जैसे पत्रकार उन तथ्यों की ओर ध्यान दिला सकते हैं। असल में मैंने नवभारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में 1985 में सीआईए से जुड़े एक जासूसी कांड पर चल रही जाँच पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लिखी थी।
10 अक्टूबर 1985 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में मैंने बताया था कि “सरकारी एजेंसियाँ एक विवादास्पद व्यापारी राम स्वरूप और उससे जुड़े लोगों के संबंधों तथा सीआईए के लिए जासूसी के प्रकरण की जाँच कर रही हैं और इससे राजीव गांधी सरकार के मंत्रियों के नाम भी होने से कांग्रेस तथा पीएम के लिए राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है।” खबर पर हंगामा और राम स्वरूप की तरफ से मानहानि का कानूनी नोटिस आना स्वाभाविक था। लेकिन नोटिस के जवाब के बजाय मैंने कुछ फॉलो-अप खबरें करके जासूसी से जुड़े और तथ्यों को छाप दिया।
असल में राम स्वरूप जासूसी प्रकरण 1985-86 के भारत के सबसे रहस्यमय और राजनीतिक रूप से विस्फोटक मामलों में गिना जाता है। इसमें खुफिया एजेंसियों, विदेशी लॉबिंग और राजनीति का मिश्रण दिखाई दे रहा था। 1985 की शुरुआत में भारत में एक अन्य बड़े जासूसी नेटवर्क — कुमार नारायण जासूसी कांड — का खुलासा हुआ। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय और अन्य विभागों से दस्तावेज लीक होने के आरोप लगे।
तब गुप्तचर एजेंसियों और दिल्ली पुलिस ने गहरी जाँच-पड़ताल शुरू की। इसी व्यापक निगरानी के दौरान राम स्वरूप नेटवर्क पर भी ध्यान गया। सितंबर में राम स्वरूप के घर, दफ्तर और कुछ अन्य ठिकानों पर छापे मारे गए। सरकारी सूत्रों के अनुसार वहाँ से विदेशी मुद्रा, राजनीतिक दस्तावेज, संसद चर्चाओं के नोट्स, रक्षा और विदेश नीति से जुड़ी फाइलें तथा विदेशी संपर्कों के रिकॉर्ड मिले। हमने प्रमुख तथ्य प्रकाशित कर दिए। तब एक-दो अन्य अखबारों में भी उनका उल्लेख हुआ।
जाँच एजेंसियों ने बताया कि राम स्वरूप विदेशी एजेंसियों के लिए सूचनाएँ इकट्ठा करता है। भारत की विदेश और रक्षा नीति पर सूचनाएँ इकट्ठी की गईं तथा प्रभावशाली नेताओं/अधिकारियों को प्रलोभनों से जोड़ रहा था। इसलिए उसके फोन की निगरानी, विदेशी संपर्कों, दूतावासों से संपर्कों और उसके तथा उससे जुड़े लोगों की विदेश यात्राओं के विवरण इकट्ठे किए गए। इसमें ताइवान, इज़राइल जैसे देशों के रास्ते सीआईए के लिए भारत संबंधी जानकारियाँ पहुँचाने की बातें सामने आने लगीं। 29 अक्टूबर 1985 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
दिल्ली हाई कोर्ट में उसने बचाव में कहा कि वह केवल व्यापार प्रोत्साहन का काम करता था। सरकार ने उस पर आरोप लगाया कि वह कुछ देशों के लिए संवेदनशील जानकारी जुटाता रहा था। उसके पास ऐसे दस्तावेज मिले जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे। विदेशी संपर्कों को संवेदनशील सुरक्षा संबंधी जानकारियाँ भेजी जा रही थीं। मामले की संवेदनशीलता देखते हुए कोर्ट की कुछ कार्यवाही इन-कैमरा यानी सार्वजनिक रूप से नहीं हुई। एजेंसियों के वकील ने आरोपपत्र दाखिल किया कि कुछ नेताओं और अधिकारियों ने राम स्वरूप से सुविधाएँ लीं, ताइवान तथा कुछ देशों की राम स्वरूप द्वारा प्रायोजित यात्राएँ कीं। राम स्वरूप ने राजनीतिक प्रभावशाली नेटवर्क बनाया।
इस मामले के गंभीर रूप लेने पर, जैसा हमने लिखा था, राजनीतिक संकट हो गया। तब टीवी, निजी न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया नहीं था। दूसरी तरफ राजीव गांधी सरकार अमेरिका से रिश्ते सुधार रही थी। पार्टी में सोवियत समर्थक लॉबी मजबूत थी। इसलिए 29 जनवरी 1986 को मंत्रिमंडल के दो सदस्यों चंदूलाल चंद्राकर और के. पी. सिंह देव के मंत्री पद से इस्तीफे ले लिए गए। एक अन्य नेता एम. एस. संजीव राव के इलेक्ट्रॉनिक कमीशन के अध्यक्ष पद (कैबिनेट स्तर का) से इस्तीफा हुआ। इन सबके राम स्वरूप के लिए विदेश यात्राओं के प्रमाण मिले थे।
उन पर सीधे जासूसी का औपचारिक आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक दबाव और विवाद के कारण इस्तीफा लिया गया। भारत से अधिक अमेरिका में इन इस्तीफों को जासूसी कांड से जोड़कर प्रकाशित किया गया। चंद्राकर पहले हिंदी अखबार के संपादक भी रहे थे। इस जासूसी कांड में दो-तीन अन्य पत्रकारों के नाम भी आए। उनसे लंबी पूछताछ हुई। एक तो बाद में अमेरिका जाकर बस गया। बाद में सरकार ने प्रकरण को धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में डाल दिया।
इस तरह की पृष्ठभूमि में भाजपा का यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब राहुल गांधी की कुल संपत्ति और देनदारियाँ लगभग 21 करोड़ रुपये हैं, तो इन विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 60 करोड़ रुपये का हिसाब कैसे बैठता है? यह कानूनी सवाल पैदा करता है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के प्रावधानों के तहत किसी भी सांसद, न्यायाधीश या सरकारी अधिकारी को किसी भी एजेंसी द्वारा प्रायोजित यात्रा के लिए गृह मंत्रालय से पूर्व अनुमति लेनी होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत खर्च पर विदेश यात्रा करता है, तो उसे इसका विवरण आयकर रिटर्न में देना होता है।
यदि विदेश में आपको कोई उपहार मिलता है या आप पर अज्ञात तरीके से पैसा खर्च किया जाता है, तो यह ‘काला धन अधिनियम 2015’ के प्रावधानों के दायरे में आता है। अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी की यात्राओं से अधिक आश्चर्य राहुल की कोलंबिया, वियतनाम, थाईलैंड, कतर, ओमान और मलेशिया की गुपचुप यात्राओं पर होता रहा है। भाजपा ने सवाल किया, “क्या उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं के लिए गृह मंत्रालय से अनिवार्य पूर्व अनुमति प्राप्त की थी? दस्तावेज़ कहाँ हैं? क्या उन्होंने आयकर रिटर्न में इसका खुलासा किया है?”
यही नहीं, पिछले साल सितंबर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर दिसंबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच राहुल गांधी की छह ‘अघोषित विदेश यात्राओं’ पर चिंता जताई थी। अभी 3 मई 2026 की रात गांधी की मस्कट (ओमान) की निजी यात्रा का एक वीडियो फुटेज सामने आया। उन्होंने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं की थी।
न तो मेजबान का खुलासा किया गया और न ही कोई यात्रा कार्यक्रम बताया गया। उन्हें किसने आमंत्रित किया था? इसके लिए एफसीआरए की धारा 6 के तहत अनिवार्य अनुमति भी नहीं दिखाई गई है। यदि ओमान से जुड़ी इस जानकारी की पुष्टि हो जाती है, तो यह ‘येलो बुक’ सुरक्षा प्रोटोकॉल (नियमों) के उल्लंघन और अघोषित विदेश यात्राओं के उस क्रम में सातवीं यात्रा होगी। गांधी द्वारा की जा रही ये विदेश यात्राएँ और विशेष रूप से उनकी ‘रहस्यमयी यात्राएँ’ गंभीर सवाल खड़े करती हैं, खासकर तब जब वह भविष्य में देश का प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं।
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
भारत में गवर्नेंस की समस्या केवल सरकार या व्यवस्था तक सीमित नहीं है। नागरिक अनुशासन, सार्वजनिक व्यवहार और जिम्मेदारी की कमी भी देश के विकास और संस्थागत सुधारों में बड़ी बाधा बनती जा रही है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
राजीव बुद्धिराजा, मार्केटिंग विशेषज्ञ
भारत में गवर्नेंस यानी सुशासन पर चर्चा कोई नई बात नहीं है। हम नेताओं की आलोचना करते हैं, अफसरशाही पर सवाल उठाते हैं, नीतियों का विश्लेषण करते हैं और हर विफलता के लिए व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराते हैं। टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह सिस्टम पर चर्चा होती है। लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल अक्सर गायब रहता है — क्या भारत की गवर्नेंस समस्या की शुरुआत हम नागरिकों से भी होती है?
गवर्नेंस केवल संसद, मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है। यह ट्रैफिक सिग्नल पर हमारे व्यवहार, सार्वजनिक स्थानों पर हमारी आदतों, कतार में खड़े रहने की हमारी संस्कृति और दूसरों के अधिकारों के प्रति हमारे सम्मान से भी तय होता है। किसी भी देश का सार्वजनिक जीवन उसके नागरिकों के व्यवहार का प्रतिबिंब होता है।
भारत में एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। भारतीय दुनिया भर में अपनी प्रतिभा, मेहनत और नवाचार के लिए पहचाने जाते हैं। भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करती हैं और भारतीय पेशेवर दुनिया की बड़ी संस्थाओं का नेतृत्व करते हैं। लेकिन सार्वजनिक जीवन में अक्सर वही समाज नियमों को बोझ की तरह देखने लगता है।
हम विश्वस्तरीय सड़कें चाहते हैं, लेकिन ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करते। साफ शहरों की मांग करते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते। भ्रष्टाचार की आलोचना करते हैं, लेकिन सुविधा मिलने पर “जुगाड़” और “सिफारिश” का रास्ता अपनाने से भी नहीं हिचकते।
यही वह जगह है जहां भारत का असली गवर्नेंस संकट दिखाई देता है। क्योंकि शासन केवल सरकार और नागरिक के बीच एकतरफा संबंध नहीं है, बल्कि यह सामाजिक अनुबंध है। सरकार व्यवस्था बनाती है, लेकिन समाज उसे सफल या विफल बनाता है।
जिन देशों को बेहतर गवर्नेंस के उदाहरण के रूप में देखा जाता है — जैसे जापान, सिंगापुर या संयुक्त अरब अमीरात — वहां केवल कानून सख्त नहीं हैं, बल्कि नागरिक अनुशासन सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। लोग सार्वजनिक स्थानों का सम्मान करते हैं, नियमों का पालन बिना डर के करते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी को समझते हैं।
भारत में समस्या क्षमता की नहीं, निरंतरता की है। प्राकृतिक आपदाओं, धार्मिक आयोजनों या राष्ट्रीय संकट के समय भारतीय समाज असाधारण सहयोग और जिम्मेदारी का परिचय देता है। लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में वही अनुशासन अक्सर गायब हो जाता है।
इसका असर केवल सामाजिक नहीं, आर्थिक और संस्थागत भी है। जब नागरिक अनुशासन कमजोर होता है, तो कानून लागू करने की लागत बढ़ जाती है। पुलिस गंभीर अपराधों की जगह अव्यवस्था संभालने में व्यस्त हो जाती है। नगर निगम बार-बार गंदगी साफ करने में संसाधन खर्च करते हैं। अदालतों पर मामलों का बोझ बढ़ता है क्योंकि नियमों का पालन सामाजिक आदत नहीं बन पाता।
बेशक, इसका अर्थ यह नहीं कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती हैं। व्यवस्था को पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल बनाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि नागरिक जिम्मेदारी के बिना कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सकती।
भारत को आज केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि “सिविक मैच्योरिटी” यानी नागरिक परिपक्वता की जरूरत है। अगर हर नागरिक पांच छोटी आदतें बदल ले — ट्रैफिक नियमों का पालन करे, सार्वजनिक स्थानों को साफ रखे, कतारों का सम्मान करे, छोटी रिश्वत और प्रभाव संस्कृति को नकारे और बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा दे तो यह किसी बड़े कानून से कम बदलाव नहीं होगा।
एक विकसित राष्ट्र केवल ऊंची जीडीपी, बड़ी इमारतों या आधुनिक तकनीक से नहीं बनता। वह जिम्मेदार नागरिकों से बनता है, जो समझते हैं कि स्वतंत्रता और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं। भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि देश विकसित बन सकता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम भारतीय विकसित समाज की तरह व्यवहार करने के लिए तैयार हैं?
( यह लेखक के निजी विचार हैं )
दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (Public Relations Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. सुरेश गौर, पीआर गुरु ।।
दोस्तों, हर साल 21 अप्रैल को भारत में नेशनल PR डे मनाया जाता है। यह दिन 1958 में 'पब्लिक रिलेशंस सोसायटी ऑफ इंडिया' (पब्लिक रिलेशंस Society of India) की स्थापना की याद में मनाया जाता है। लेकिन यह सिर्फ एक सालगिरह नहीं है। यह उस पेशे को सम्मान देने का दिन है, जो अक्सर खुद सुर्खियों में नहीं रहता, लेकिन तय करता है कि सुर्खियां किस दिशा में जाएंगी।
अक्सर लोग पब्लिक रिलेशंस यानी PR को सिर्फ प्रेस रिलीज भेजने या मीडिया मैनेजमेंट तक सीमित मान लेते हैं। लेकिन असल में यह सिर्फ काम का एक छोटा हिस्सा है। PR की असली कला किसी संगठन और जनता के बीच भरोसा बनाने में होती है। यही वजह है कि एक PR प्रोफेशनल को एक ही दिन में कई अलग-अलग भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। नेशनल PR डे पर इन्हीं भूमिकाओं और उनके पीछे की कला को समझना जरूरी है।
स्ट्रैटेजिस्ट की भूमिका
किसी खबर के सार्वजनिक होने से पहले PR की शुरुआत एक शांत कमरे और व्हाइटबोर्ड से होती है। यहां सबसे बड़ा सवाल होता है कि लोगों को क्या जानना चाहिए और वे अभी इसकी परवाह क्यों करें। यहीं से कहानी की शुरुआत होती है।
अच्छी PR रणनीति सिर्फ दिखावा नहीं होती, बल्कि बिजनेस के लक्ष्यों और जनता की जरूरतों के बीच संतुलन बनाती है। चाहे नया प्रोडक्ट लॉन्च हो, कोई संकट हो या नई पॉलिसी, PR स्ट्रैटेजिस्ट देर रात तक सोशल मीडिया का माहौल समझता है, सुबह-सुबह नियमों के ड्राफ्ट पढ़ता है और कंपनी को बताता है कि लोगों की प्रतिक्रिया कैसी हो सकती है।
इस भूमिका की असली कला दूरदृष्टि में है। एक अच्छा स्ट्रैटेजिस्ट सिर्फ खबरों पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि पहले से अंदाजा लगा लेता है कि आगे क्या हो सकता है।
स्टोरीटेलर की भूमिका
डेटा जानकारी देता है, लेकिन कहानियां लोगों को जोड़ती हैं। PR इन दोनों के बीच पुल का काम करता है। उदाहरण के तौर पर, बायोमेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट को “20 लाख मरीजों के लिए नई उम्मीद” के रूप में लोगों तक पहुंचाया जाता है। इसी तरह CSR पहल को “गांव की पहली लाइब्रेरी” की कहानी बनाकर पेश किया जाता है।
इस भूमिका में संवेदनशीलता और संतुलन बहुत जरूरी है। जरूरत से ज्यादा प्रचार भरोसा तोड़ देता है और मुश्किल भाषा लोगों की दिलचस्पी खत्म कर देती है। PR प्रोफेशनल कठिन बातों को आसान और इंसानी भाषा में समझाता है, बिना सच्चाई से समझौता किए।
आज के 3 सेकंड वाले अटेंशन स्पैन के दौर में यह किसी कला से कम नहीं है। एक अच्छा स्टोरीटेलर जानता है कि दर्शक अपना समय मुफ्त में नहीं देते, उसे कमाना पड़ता है।
डिप्लोमैट की भूमिका
मीडिया, सरकार, निवेशक, कर्मचारी, एक्टिविस्ट और ग्राहक- हर किसी का नजरिया अलग होता है। PR वह कड़ी है जो इन सभी को जोड़ती है।
जब कोई पत्रकार मुश्किल सवाल पूछता है, तो PR प्रोफेशनल उससे बचने की कोशिश नहीं करता। वह जवाब देता है, संदर्भ समझाता है और रिश्तों को भी संभालता है। जब कर्मचारी बदलाव के दौरान खुद को अनसुना महसूस करते हैं, तो PR सिर्फ नोटिस जारी नहीं करता, बल्कि बातचीत के मंच तैयार करता है।
इस भूमिका की असली ताकत संतुलन में है। PR प्रोफेशनल कंपनी का पक्ष भी रखता है और जनता की चिंता भी समझता है। भरोसा इसी बीच के रास्ते में बनता है।
क्राइसिस मैनेजर की भूमिका
कोई भी PR टीम को अच्छे दिनों में फोन नहीं करता। फोन तब आता है जब कोई ट्वीट गलत वजह से वायरल हो जाए, फैक्ट्री में हादसा हो जाए या CEO का बयान गलत तरीके से पेश हो जाए।
क्राइसिस मैनेजर की भूमिका बहुत कठिन होती है। इसमें नींद छोड़कर स्थिति को संभालना पड़ता है। “नो कमेंट” कहने की बजाय यह कहना पड़ता है कि “अभी हमारे पास पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन हम कार्रवाई कर रहे हैं।”
इस भूमिका की कला है- संयम, तेजी और जिम्मेदारी। तेजी से काम करना जरूरी है, लेकिन बिना लापरवाही के। पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन बिना नुकसान पहुंचाए। सबसे पहले लोगों की सुरक्षा और फिर ब्रांड की छवि।
रिसर्चर की भूमिका
जिस बात को खुद नहीं समझते, उसे लोगों तक सही तरीके से पहुंचाया नहीं जा सकता। हर साफ-सुथरे मैसेज के पीछे लंबी रिसर्च, डेटा, मीडिया ऑडिट, प्रतिस्पर्धियों की रणनीति और नियमों की समझ होती है।
PR रिसर्चर 80 पन्नों की रिपोर्ट पढ़ता है ताकि प्रवक्ता 80 सेकंड में सही जवाब दे सके। उसे पता होता है कि कौन-सा शब्द किस समुदाय को प्रभावित करेगा और कौन-सा डेटा पत्रकार इस्तेमाल करेगा।
गलत जानकारी के इस दौर में यह भूमिका बेहद जरूरी है। PR की विश्वसनीयता एक गलत तथ्य से खत्म हो सकती है।
डिजिटल एक्सपर्ट की भूमिका
अब खबरें सिर्फ टीवी या अखबारों तक सीमित नहीं हैं। सुबह का Reddit पोस्ट रात तक टीवी डिबेट बन सकता है। इसलिए PR को सोशल मीडिया, सेंटिमेंट डैशबोर्ड, इन्फ्लुएंसर और कमेंट सेक्शन पर लगातार नजर रखनी पड़ती है।
लेकिन असली कला सिर्फ टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने में नहीं, बल्कि सही फैसला लेने में है। हर ट्वीट का जवाब जरूरी नहीं और हर ट्रेंड पर ब्रांड की राय देना भी जरूरी नहीं।
एक अच्छा डिजिटल PR प्रोफेशनल जानता है कि कब बोलना है, कब समझाना है और कब चुप रहना है।
काउंसलर की भूमिका
PR का सबसे मुश्किल काम बयान लिखना नहीं, बल्कि कभी-कभी यह कहना होता है कि “हमें बयान जारी नहीं करना चाहिए” या “माफी आपको खुद मांगनी होगी।”
PR प्रोफेशनल कंपनी के बड़े अधिकारियों को सलाह देता है। इसके लिए हिम्मत, भरोसा और वर्षों की मेहनत से बनाई गई साख चाहिए।
यह भूमिका शॉर्ट टर्म फायदे की जगह लॉन्ग टर्म प्रतिष्ठा को प्राथमिकता देती है। कभी-कभी यह चेतावनी भी देती है कि कोई कैंपेन लोगों को नाराज कर सकता है।
एजुकेटर की भूमिका
दुनिया तेजी से जटिल होती जा रही है- चाहे बायोमेडिसिन हो, फिनटेक हो या क्लाइमेट टेक। PR आम लोगों और विशेषज्ञों के बीच अनुवादक का काम करता है।
यह “CRISPR” जैसी तकनीक को आसान भाषा में समझाता है और यह भी बताता है कि कोई नीति किसान के लिए क्यों जरूरी है।
लोकतंत्र में समझ से सहमति बनती है और बाजार में समझ से अपनापन बढ़ता है। इसलिए PR सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि जागरूकता का भी काम करता है।
एथिक्स की भूमिका
ऊपर बताई गई सारी भूमिकाएं बेकार हैं अगर उनमें नैतिकता नहीं है। नैतिकता के बिना PR सिर्फ प्रचार बनकर रह जाता है।
एक ईमानदार PR प्रोफेशनल हमेशा खुद से पूछता है- क्या यह सच है? क्या यह सही है? क्या हम कल भी इसका बचाव कर पाएंगे?
वह सच छिपाने की बजाय सही जानकारी देने की कोशिश करता है। क्योंकि जनता का भरोसा उधार की तरह होता है, जिसे सम्मान के साथ लौटाना पड़ता है।
इतने सारे रोल क्यों जरूरी हैं?
दोस्तों, कंपनियां सिर्फ खराब प्रोडक्ट की वजह से नहीं टूटतीं। वे तब कमजोर पड़ती हैं जब लोगों का भरोसा खत्म होने लगता है। और भरोसा तब टूटता है जब संवाद खत्म हो जाए, भ्रम बढ़ जाए या अहंकार दिखने लगे।
PR का सबसे बड़ा काम इसी भरोसे को बनाए रखना है। यह शुरुआती चेतावनी देने वाली प्रणाली है, स्पष्ट जानकारी देने वाला माध्यम है और रिश्तों को मजबूत रखने वाला जरिया है।
PR में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह आसान पेशा नहीं है। इसमें जिज्ञासा, धैर्य और मजबूत नैतिक सोच चाहिए। कई बार उन गलतियों के लिए भी आलोचना झेलनी पड़ती है जो आपकी नहीं होतीं और कई बार उन संकटों का श्रेय भी नहीं मिलता जिन्हें आपने टाल दिया।
कंपनियों के नेताओं के लिए भी संदेश साफ है- PR टीम को सिर्फ संकट आने पर मत बुलाइए। उन्हें शुरुआत से शामिल कीजिए। जितनी जल्दी सही जानकारी मिलेगी, उतना बेहतर वे आपकी साख की रक्षा कर पाएंगे।
पत्रकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए भी यह याद रखना जरूरी है कि PR और मीडिया दोनों का मकसद एक ही है- जनता तक भरोसेमंद जानकारी पहुंचाना।
नेशनल PR डे पर सलाम
आज का दिन उन PR प्रोफेशनल्स के नाम है, जो खुद पीछे रहकर दूसरों की आवाज को आगे बढ़ाते हैं। उन लोगों के नाम, जो गलत समय पर भी फोन उठाते हैं, सही शब्द चुनते हैं और जानते हैं कि शब्द बाजार, समाज और लोगों की सोच बदल सकते हैं।
दोस्तों, पब्लिक रिलेशंस सिर्फ कला नहीं, बल्कि कला, विज्ञान और जिम्मेदारी का मेल है। इसका मकसद एक ही है- भरोसा कमाना, उसे बनाए रखना और टूट जाए तो फिर से जोड़ना।
यही इस पेशे की सबसे बड़ी ताकत है। और यही वजह है कि यह सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी देने लायक करियर है।
सभी PR प्रोफेशनल्स को नेशनल PR डे की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
अपने एक लेख में सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने कहा, गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
शुभ्रांशु सिंह, सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ।।
देश की ऐडवर्टाइजिंग और क्रिएटिव इंडस्ट्री में ‘गोवा फेस्ट 2026’ को लेकर जारी बहस के बीच सीनियर मार्केटिंग विशेषज्ञ शुभ्रांशु सिंह ने इस प्रतिष्ठित आयोजन का समर्थन करते हुए कहा है कि किसी भी संस्था को उसकी कमियों की वजह से खत्म करने की बजाय उसे बेहतर बनाने की कोशिश होनी चाहिए।
एक विस्तृत लेख में शुभ्रांशु सिंह ने गोवा फेस्ट पर उठ रही आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि भारत में इंडस्ट्री द्वारा बनाई और लगातार चलाए जाने वाली संस्थाएं बहुत कम हैं। ऐसे में गोवा फेस्ट केवल एक फेस्टिवल नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री की सामूहिक पहचान और विरासत है।
उन्होंने लिखा कि गोवा फेस्ट की शुरुआत किसी सरकारी आदेश, कानून या किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की पहल से नहीं हुई थी। इसे ‘एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ और ‘द एडवरटाइजिंग क्लब’ ने मिलकर बनाया और पिछले 19 वर्षों से लगातार आगे बढ़ाया है।
शुभ्रांशु सिंह के मुताबिक, ‘किसी भी संस्था को खड़ा करना आसान नहीं होता। संस्थाएं अपने आप नहीं बनतीं, बल्कि लगातार प्रयास, भागीदारी और समय के साथ मजबूत होती हैं। उन्होंने कहा कि आज लोग गोवा फेस्ट की मौजूदगी को सामान्य मानने लगे हैं, लेकिन यही किसी सफल संस्था की सबसे बड़ी पहचान होती है।’
उन्होंने दुनिया की कई बड़ी संस्थाओं और आयोजनों का उदाहरण देते हुए कहा कि ‘कान्स लायंस’, ‘ऑस्कर’, ‘ओलंपिक’ और ‘दावोस’ जैसे मंच भी विवादों, पक्षपात और आलोचनाओं से गुजरे हैं। बावजूद इसके, लोगों ने इन संस्थाओं को खत्म करने की जगह सुधारने की कोशिश की।
शुभ्रांशु सिंह ने माना कि गोवा फेस्ट को लेकर उठ रहे कई सवाल पूरी तरह जायज हैं। उन्होंने नेटवर्क एजेंसियों के वर्चस्व, जूरी में सीमित प्रतिनिधित्व, ब्रैंड साइड क्लाइंट्स की कम भागीदारी, बढ़ती लागत और सीखने की बजाय एंटरटेनमेंट पर अधिक फोकस जैसे मुद्दों को वास्तविक चिंताएं बताया।
हालांकि उन्होंने सवाल उठाया कि यदि गोवा फेस्ट नहीं होगा, तो भारतीय विज्ञापन और मीडिया इंडस्ट्री के पास ऐसा कौन-सा साझा मंच है, जहां बड़े स्तर पर लोग एकत्र हों, नए विचारों पर चर्चा करें, बेहतरीन काम को पहचान मिले और इंडस्ट्री के लिए साझा मानक तय किए जा सकें।
उन्होंने कहा कि फिलहाल इसका कोई विकल्प मौजूद नहीं है। गोवा फेस्ट भले ही परफेक्ट न हो, लेकिन यह वही मंच है जिसे इंडस्ट्री ने खुद बनाया और वर्षों तक जिंदा रखा।
अपने लेख में शुभ्रांशु सिंह ने भारत में ‘इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग’ यानी संस्थाएं खड़ी करने की कमजोर संस्कृति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत में लोग संस्थाओं की आलोचना तो खूब करते हैं, लेकिन उन्हें मजबूत बनाने के लिए उतनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते।
उन्होंने लिखा कि अक्सर एक पीढ़ी बेहद मेहनत से कोई संस्था खड़ी करती है, जबकि अगली पीढ़ी उसकी कमियां गिनाने लगती है। यही स्थिति अब गोवा फेस्ट के साथ भी दिखाई दे रही है।
शुभ्रांशु सिंह ने ‘मोमेंटम’ यानी निरंतरता की अहमियत समझाते हुए कहा कि 19 वर्षों में गोवा फेस्ट ने इंडस्ट्री के भीतर रिश्ते, संवाद, पहचान और साझा संस्कृति तैयार की है। यदि ऐसी संस्थाएं कमजोर पड़ती हैं, तो उनकी जगह तुरंत कोई बेहतर विकल्प तैयार नहीं हो जाता। इसके बजाय इंडस्ट्री छोटे-छोटे बिखरे मंचों में टूट जाती है और सामूहिक पहचान कमजोर होने लगती है।
उन्होंने सुझाव दिया कि गोवा फेस्ट को बेहतर बनाने के लिए जूरी सिस्टम में सुधार, स्वतंत्र एजेंसियों के लिए अलग श्रेणी, क्लाइंट्स की ज्यादा भागीदारी और युवा प्रोफेशनल्स व क्षेत्रीय एजेंसियों के लिए कम लागत वाले विकल्प जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।
लेख के अंत में शुभ्रांशु सिंह ने इंडस्ट्री से अपील करते हुए कहा कि केवल आलोचना करने की बजाय लोगों को आगे आकर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए। उनके मुताबिक, किसी भी संस्था को मजबूत बनाने का रास्ता उसे छोड़ देना नहीं, बल्कि उसके भीतर रहकर सुधार करना होता है।
उन्होंने कहा, ‘गोवा फेस्ट परफेक्ट नहीं है, लेकिन यह हमारा अपना मंच है। इसकी आलोचना हो सकती है, लेकिन इससे दूरी बनाने की नहीं, इसे बेहतर बनाने की जरूरत है।’
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)