Cannes सिर्फ फ्रांस के खूबसूरत समुद्री इलाके French Riviera मशहूर नहीं बना, बल्कि इसलिए बड़ा और प्रतिष्ठित बना क्योंकि वहां क्रिएटिविटी, यानी नए और बेहतरीन आइडियाज को बहुत गंभीरता से लिया जाता है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन,
पिछले कुछ वर्षों में मैंने कई बार Cannes Lions, Cannes Film Festival और MIPTV जैसे बड़े इंटरनेशनल इवेंट्स में हिस्सा लिया है। Cannes सिर्फ इसलिए मशहूर नहीं बना क्योंकि वह फ्रांस के खूबसूरत समुद्री इलाके French Riviera में होता है। Cannes इसलिए बड़ा और प्रतिष्ठित बना क्योंकि वहां क्रिएटिविटी, यानी नए और बेहतरीन आइडियाज को बहुत गंभीरता से लिया जाता है। वहां इसे एक बड़े ग्लोबल और प्रोफेशनल मुकाबले की तरह देखा जाता है, जहां क्वालिटी और स्टैंडर्ड सबसे ज्यादा मायने रखते हैं।
Goafest के पास भी बीच और अच्छी लोकेशन है, लेकिन सिर्फ इतनी चीजों से कोई इवेंट बड़ा नहीं बनता। Goafest में अभी कई चीजों की कमी है और अब, जब यह अपने 20वें साल में पहुंच गया है, तो इसे नए तरीके और नई सोच के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है।
यहां बताया गया है कि क्या कॉपी किया जा सकता है, भारतीय बजट और लोगों की पसंद के हिसाब से:
कैटेगरी और जूरी में सख्ती
कान्स क्या करता है:
यहां सिर्फ 30 बड़ी अवॉर्ड कैटेगरीज होती हैं और हर कैटेगरी के इंटरनेशनल स्तर के स्टैंडर्ड तय होते हैं। जूरी में आधे से ज्यादा लोग विदेशों से होते हैं और 40% से ज्यादा महिलाएं होती हैं। कौन जज होगा और क्या नियम होंगे, यह पहले से सार्वजनिक कर दिया जाता है। वहां “uncle quota” यानी सिर्फ पुराने रिश्तों या जान-पहचान के आधार पर लोगों को जगह नहीं मिलती। बार-बार वही लोग नहीं दिखते और बड़े नेटवर्क्स का दबदबा भी सीमित रहता है।
Goafest को क्या करना चाहिए:
Lanyard नहीं, सीख सबसे जरूरी
कान्स क्या करता है:
असल प्रोडक्ट वहां का कंटेंट है। 4 दिन, 8 स्टेज और 400 से ज्यादा सेशंस। लोग वहां सिर्फ घूमने नहीं, सीखने जाते हैं।
Goafest को क्या करना चाहिए:
युवा टैलेंट को मुख्य मंच मिले
कान्स क्या करता है:
Young Lions competitions, Roger Hatchuel Academy और See It Be It जैसे प्रोग्राम्स के जरिए नई पीढ़ी को आगे लाता है।
Goafest को क्या करना चाहिए:
Effectiveness को भी महत्व मिले
कान्स क्या करता है:
Creative Effectiveness Lions को CMOs, CFOs और consultancies जज करते हैं। वहां third-party data जरूरी होता है।
Goafest को क्या करना चाहिए:
FOMO पैदा करें
कान्स क्या करता है:
छोटे venues, लंबी queues, secret parties और limited-access talks। कमी ही उसकी खासियत बनाती है।
Goafest को क्या करना चाहिए:
Global बनें, लेकिन भारतीय भी रहें
कान्स क्या करता है:
90 देशों की entries आती हैं। जज Tokyo से São Paulo तक से आते हैं।
Goafest को क्या करना चाहिए:
Data को उतनी ही गंभीरता से लें जितनी Cannes Champagne को लेता है
कान्स क्या करता है:
“Lions Creativity Report” जारी करता है जिसमें trends, themes और country rankings होती हैं।
Goafest को क्या करना चाहिए:
आज जरूरत एक बड़े mindset shift की है:
Cannes curate करता है। GoaFest accommodate करता है।
Cannes 95% समय “ना” कहता है — entries को, speakers को, sponsors को। इसलिए वहां Lion जीतना मायने रखता है।
अगर GoaFest को भारत का Cannes बनना है, तो उसे “everyone-gets-a-trophy” festival होना बंद करना होगा।
2027 के लिए शुरुआत सिर्फ 3 चीजों से हो सकती है:
अगर यह हो गया, तो 2029 तक सवाल यह नहीं होगा कि “Goafest कितना Cannes जैसा है?” सवाल होगा, “Cannes, Goafest जैसा क्यों नहीं है?”
यह हो सकता है और होना चाहिए।
(डॉ. संदीप गोयल Rediffusion और Everest के Chairman हैं। वह Dentsu India & Middle East के पूर्व India JV Partner और Chairman रह चुके हैं, साथ ही Zee के पूर्व CEO भी हैं।)
औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो. संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।
कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं, उनका देश वैसा ही है। इसी तरह इजरायल, चीन, ईरान या किसी भी देश के बारे में कहा जा सकता है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं। ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं, कभी मैकाले और कभी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर राष्ट्रीय मानस और राष्ट्रीय भाव का निर्माण करते हैं।
लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा कि हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और संस्कृति हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए।
स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय और रवीन्द्रनाथ टैगोर के गहरे भारतबोध ने हमें संभाला, वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था।
औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने अपने जीवन मूल्यों का सनातन सिद्ध राजमार्ग छोड़कर अंग्रेजियत की पगडंडियों पर चलना प्रारंभ कर दिया। जाहिर है, इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे।
हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर समझा जा सकता है। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास चले। हमें बताया गया कि हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी हुए। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चलने वालों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रूप में प्रस्तुत करना फैशन बन गया।
राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है और अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। इसे 'विचारों की घर वापसी' कहा गया है। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना के लिए अध्यवसाय में जुटे। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों और कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का प्रयास करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य और प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकूल व्याख्या कर सकते हैं।
इसके लिए लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा, जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयास ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। यहां साझापन सौंदर्य की तरह है और विविधता तथा बहुलता का उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने के कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है।
इसलिए "एक किताब, एक विचार, एक देवता" को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। भारत वह भूमि है, जहां दुनिया के हर पंथ के लोग सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतान हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है।
'स्वत्व' ही मार्ग है। इस मार्ग पर चलने के लिए महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा और विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में सहायता मिलती है। इसी आधार पर गलत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो सकते हैं।
भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। इसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में 'स्वबोध' का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' की नजर से देखना प्रारंभ करे, 'इंडिया' की नजर से नहीं।
वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के कारण अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र और पंथ की लड़ाइयों से आगे भी विभाजनकारी बातें हर दिन खोजी जाती हैं और फिर आख्यान गढ़े जाते हैं।
भारत को कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, लेकिन उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण, शिव, बुद्ध, महावीर और गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने "सर्वे भवन्तु सुखिन:" में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल को अपना मूलमंत्र बनाया।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
करीब 25 साल पहले वाजपेयी सरकार ने इसके शेयर Sterlite ग्रुप (अब वेदांता) को करीब ₹800 करोड़ में बेच दिए थे। सरकार ने करीब 30% शेयर अपने पास रखे थे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
IDBI बैंक के शेयर बेचने का फ़ैसला सरकार ने किया तो विरोध में प्रतिक्रिया थी कि घर के गहने क्यों बेच रहे हैं? सवाल सिर्फ IDBI बैंक का नहीं है, बल्कि यह है कि सरकार हर धंधे में क्यों पड़े?
IDBI बैंक से पहले हिंदुस्तान जिंक की बात कर लेते हैं। यह कहानी कोटक महिंद्रा AMC के MD निलेश शाह ने सुनाई है। करीब 25 साल पहले वाजपेयी सरकार ने इसके शेयर Sterlite ग्रुप (अब वेदांता) को करीब ₹800 करोड़ में बेच दिए थे। सरकार ने करीब 30% शेयर अपने पास रखे थे। आज उन शेयरों की क़ीमत ₹60 हज़ार करोड़ है। साल दर साल डिवीडेंड अलग मिलता है। जितने में बेचा था, उससे ज़्यादा तो डिवीडेंड मिल चुका है।
बात मुनाफ़े की नहीं है, बल्कि सरकार के बिज़नेस करने की है। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने हर तरह के सामान बनाने के लिए कारख़ाने लगाए थे। तब तर्क यह था कि प्राइवेट सेक्टर के पास पूंजी नहीं है। हम कहने को तो मिश्रित अर्थव्यवस्था थे, लेकिन असल में हर धंधे में सरकार का बोलबाला था। 1991 में आर्थिक संकट में फँसने के बाद समझ में आया कि समाजवादी नीतियों का फ़ायदा नहीं हो रहा है।
सरकार ने धीरे-धीरे ग़ैर ज़रूरी बिज़नेस से निकलने का फ़ैसला किया। आपको आश्चर्य होगा कि 30-35 साल पहले तक भारत सरकार ब्रेड, नमक बनाती थी, कपड़े, घड़ी, टायर, कार और स्कूटर का कारख़ाना चलाती थी। फ़ोन कनेक्शन देती थी, हवाई जहाज़ सरकारी ही थे। बैंकों में अपने ही पैसे निकालने के लिए लोग काम से छुट्टी लेते थे। बैंक काउंटर पर लंबी लाइन लगी रहती थी।
तब ATM नहीं होता था। धीरे-धीरे सरकार ने 1991 के बाद से बाज़ार खोल दिया, अपने धंधे बेचना शुरू किए। आज ग्राहकों के पास बेहतर विकल्प है और कई चीजें सस्ती भी हुई हैं।
बात सिर्फ IDBI बैंक की नहीं है, सरकार को और बैंकों से भी निकलना चाहिए। सरकार के पास अब भी 12 बैंक हैं, जबकि नीति आयोग सलाह दे चुका है कि SBI के अलावा चार बड़े बैंक सरकार को अपने पास रखना चाहिए। यह 2047 विकसित भारत रोडमैप का हिस्सा है। सरकार ने 2021 में कहा था कि वो दो सरकारी बैंक और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी बेच देगी।
अभी तो IDBI बैंक पर ही इतना बवाल हो रहा है कि सरकार पता नहीं अगला कदम कब उठाएगी? सरकार की ज़िम्मेदारी शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देना है, धंधा चलाना नहीं, लेकिन विडंबना देखिए, हम शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा भी प्राइवेट सेक्टर को देकर बैठे हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत में पहले भी एक प्रमुख राजनीतिक नेता को चुनावी आचरण के मामले में छह साल के लिए अयोग्य ठहराया गया था। वह नेता थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं को सरकार की आलोचना करने, धार्मिक-सामाजिक विचारों पर बहस करने और चुनाव आयोग से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है। लेकिन क्या इस अधिकार की कोई सीमा नहीं है? क्या चुनाव जीतने के लिए धर्म और जाति की भावनाओं को उभारना, विरोधी समुदाय के प्रति शत्रुता पैदा करना या संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध आक्रामक राजनीतिक अभियान चलाना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उचित ठहराया जा सकता है?
ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत में पहले भी एक प्रमुख राजनीतिक नेता को चुनावी आचरण के मामले में छह साल के लिए अयोग्य ठहराया गया था। वह नेता थे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे। आज कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के भाषणों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), हिंदुत्व, जातिगत टिप्पणियों, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत तथा चुनाव आयोग को लेकर उनके राजनीतिक अभियान के संदर्भ में भी यही सवाल उठाया जा सकता है कि कानून की कसौटी सभी नेताओं के लिए समान है या नहीं?
बाल ठाकरे की मिसाल वर्तमान विवादों और आंदोलनों में दिलचस्प तथा महत्वपूर्ण है। शायद राहुल गांधी और उनकी सलाहकार सहयोगी मंडली उसे भूल रहे हैं। 11 दिसंबर 1995 को सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. रमेश यशवंत प्रभू बनाम प्रभाकर काशीनाथ कुंटे मामले में अपना फैसला सुनाया। यह मामला महाराष्ट्र विधानसभा के 1987 के विले पार्ले उपचुनाव से जुड़ा था।
शिवसेना के उम्मीदवार डॉ. रमेश प्रभू की ओर से प्रचार करते हुए बाल ठाकरे ने 29 नवंबर, 9 दिसंबर और 10 दिसंबर 1987 को भाषण दिए थे। इन भाषणों में हिंदू धर्म के आधार पर समर्थन जुटाने और धार्मिक समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप चुनाव याचिका में लगाए गए थे। बॉम्बे हाई कोर्ट ने संबंधित आरोपों को सिद्ध माना था और सर्वोच्च न्यायालय ने उस निर्णय के विरुद्ध अपीलों पर सुनवाई करते हुए उसे बरकरार रखा।
इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) और 123(3A) निर्णायक थीं। पहली धारा चुनाव में धर्म, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वोट माँगने से संबंधित है। दूसरी धारा चुनावी लाभ के लिए इन आधारों पर नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा बढ़ाने अथवा उसका प्रयास करने को भ्रष्ट आचरण मानती है।
इस मामले की एक विशेष बात यह है कि ठाकरे स्वयं उस चुनाव में उम्मीदवार नहीं थे। फिर भी चुनाव अभियान में उनकी भूमिका और उम्मीदवार की सहमति से किए गए प्रचार के आधार पर उन्हें भ्रष्ट आचरण के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। न्यायालय ने उन्हें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 99 के अंतर्गत नामित किया। बाद में धारा 8A की प्रक्रिया के तहत उनकी छह वर्ष की अयोग्यता का मामला चला।
इस ऐतिहासिक मामले से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है: चुनावी राजनीति में किसी नेता की जिम्मेदारी केवल उसके अपने चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं रहती। कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर किसी उम्मीदवार के समर्थन में काम करने वाला व्यक्ति भी जवाबदेह हो सकता है।
राहुल गांधी और कुछ कांग्रेसी पिछले कई वर्षों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व की राजनीतिक व्याख्या की आलोचना करते रहे हैं। साथ ही वे जातिगत भेदभाव बढ़ाने वाली बातें अपने राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाते हैं।
संसद में जुलाई 2024 के उनके भाषण के दौरान हिंदू धर्म, भाजपा और कथित हिंसा के संबंध में दिए गए वक्तव्यों पर विवाद हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ने भाषण के कुछ अंश सदन की कार्यवाही से हटाए। राहुल गांधी ने अपनी टिप्पणियों का बचाव किया, जबकि सत्ता पक्ष ने उन पर आपत्ति जताई।
यह विवाद राजनीतिक विमर्श की प्रकृति पर सवाल अवश्य उठाता है, लेकिन संसद की कार्यवाही से किसी टिप्पणी को हटाया जाना अपने आप में चुनावी भ्रष्ट आचरण सिद्ध नहीं करता। इसके लिए संबंधित कानून के तहत अलग से आवश्यक तथ्य और साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।
यहाँ मूल अंतर समझना आवश्यक है। हिंदुत्व की विचारधारा, आरएसएस की नीतियों, प्रधानमंत्री के निर्णयों या किसी धार्मिक-राजनीतिक संगठन के प्रभाव की आलोचना करना अपने आप में अपराध नहीं है। इसी तरह जातिगत असमानता पर चर्चा, आरक्षण की माँग या सामाजिक न्याय के लिए राजनीतिक अभियान चलाना भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हो सकता है। लेकिन नेताओं, अधिकारियों, पत्रकारों आदि की जातियों पर सवाल उठाकर एक तरह से नफरत पैदा कर रहे हैं।
लेकिन यदि किसी विशेष भाषण में किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा या शत्रुता बढ़ाने का प्रयास किया गया हो, अथवा चुनाव में किसी उम्मीदवार को जिताने या हराने के लिए कानून द्वारा निषिद्ध धार्मिक या जातीय बयानबाजी करने पर मामला दर्ज किया जा सकता है।
इसलिए राहुल गांधी के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई के लिए किसी व्यक्ति या संगठन को भाषणों की पूरी रिकॉर्डिंग, सटीक शब्द, तारीख, स्थान, चुनाव से उसका संबंध और लागू कानून के आवश्यक तत्वों को प्रमाणित करना होगा।
यह सप्ताह यानी विजय दशमी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्थापना दिवस है। संघ ने 2025 में अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे किए। इस अवसर पर संगठन ने अपनी विचारधारा, सामाजिक गतिविधियों और भविष्य की योजनाएं बनाई। संघ का भारतीय राजनीति और सामाजिक जीवन पर प्रभाव लंबे समय से सार्वजनिक बहस का विषय रहा है। राहुल गांधी आरएसएस की विचारधारा, उसके सामाजिक दृष्टिकोण और भाजपा के साथ उसके संबंधों की आलोचना करते हैं। दूसरी ओर, आरएसएस और भाजपा के समर्थक इसे अपनी सांस्कृतिक तथा राजनीतिक मान्यताओं पर हमला मान सकते हैं।
संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर भी इसी प्रकार तीखी राजनीतिक बहस होती है। राहुल गांधी कहते हैं कि आरएसएस की विचारधारा संविधान की उनकी समझ से मेल नहीं खाती, या वे मोदी सरकार की नीतियों को गलत बताते हैं, तो ऐसी राजनीतिक आलोचना को केवल अप्रिय या कठोर भाषा के आधार पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
लेकिन वह या उनके सहयोगी का विशिष्ट वक्तव्य कानून के तहत निषिद्ध घृणा, हिंसा के उकसावे या चुनावी भ्रष्ट आचरण की आवश्यक शर्तें पूरी करता है, तो कानूनी कार्रवाई हो सकती है। वैसे यही नियम भाजपा अथवा किसी कट्टरपंथी नेता पर भी लागू हो सकता है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8A के अनुसार, चुनावी भ्रष्ट आचरण के लिए सक्षम न्यायिक प्रक्रिया में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अयोग्यता का प्रश्न निर्धारित प्रक्रिया से राष्ट्रपति के समक्ष जाता है, जहाँ चुनाव आयोग की राय भी ली जाती है। कानून के अंतर्गत अधिकतम छह वर्ष की अयोग्यता का प्रावधान है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय में याचिका देकर किसी नेता पर छह साल की पाबंदी लगवा सकता है। याचिका दायर करना, आरोपों की जाँच होना, भ्रष्ट आचरण सिद्ध होना और वैधानिक अयोग्यता लागू होना अलग-अलग चरण हैं।
बाल ठाकरे के मामले में भी एक स्थापित चुनावी मुकदमे, विशिष्ट भाषणों, न्यायिक निष्कर्षों और उसके बाद की वैधानिक प्रक्रिया का महत्व था। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी नेता के भाषण से समाज में तनाव पैदा हुआ, इसलिए उसे उसी तरह दंडित कर दिया जाए। राहुल गांधी के मामले में भी यदि कोई व्यक्ति ऐसा कदम उठाना चाहता है, तो उसे पहले यह पहचानना होगा कि संबंधित भाषण किस कानून का उल्लंघन करता है और किस सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उचित कार्यवाही उपलब्ध है। यदि आरोप किसी चुनाव में धर्म या जाति के आधार पर वोट माँगने अथवा समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने का है, तो धारा 123 के प्रावधानों की कसौटी लागू हो सकती है।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग, न्यायपालिका और सरकार की आलोचना करना नागरिकों तथा राजनीतिक दलों का अधिकार है। चुनावी अनियमितताओं के आरोप उठाना, मतदाता सूची की पारदर्शिता की माँग करना और अदालत से राहत माँगना संवैधानिक व्यवस्था के भीतर उपलब्ध रास्ते हैं। लेकिन आलोचना के अधिकार का अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने, अदालत पर अनुचित दबाव डालने या न्याय प्रशासन में बाधा डालने के लिए स्वतंत्र है।
किसी विशेष आचरण को अवमानना या अन्य अपराध मानने के लिए संबंधित कानून की शर्तें पूरी होना आवश्यक है। अक्टूबर में चुनाव आयोग से संबंधित मुद्दों को लेकर विपक्षी नेताओं के सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च के बाद राहुल गांधी के आचरण पर न्यायालय ने आपत्ति जताई और स्पष्टीकरण माँगा है। साथ ही, चुनावी प्रक्रिया से संबंधित याचिकाओं पर न्यायालय ने संबंधित पक्षों से जवाब भी माँगा। यदि किसी नेता के आचरण से न्यायिक प्रक्रिया में वास्तविक बाधा उत्पन्न होने का आरोप है, तो उसका मूल्यांकन उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत होगा।
जाति और धर्म से जुड़े प्रश्न वास्तविक सामाजिक तथा ऐतिहासिक मुद्दे हैं। जातिगत जनगणना की माँग हो, आरक्षण का प्रश्न हो, धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हो या बहुसंख्यक समुदाय की सांस्कृतिक आकांक्षाएँ—इन सभी विषयों पर राजनीतिक दल अपनी नीतियाँ प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन सामाजिक न्याय की चर्चा और जातियों के बीच वैमनस्य फैलाने में अंतर है। इसी तरह धार्मिक परंपराओं का सम्मान करना और धर्म के आधार पर नागरिकों को एक-दूसरे का शत्रु बताना दो अलग बातें हैं। कानून को यह देखना होगा कि कोई वक्तव्य सामाजिक समस्या पर बहस कर रहा है या किसी समुदाय के प्रति शत्रुता बढ़ा रहा है।
राजनीतिक नेताओं को अपने शब्दों के प्रभाव के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के भाषण व्यापक जनसमूह तक पहुँचते हैं और उनका राजनीतिक प्रभाव भी बड़ा होता है। निश्चित रूप से, यदि कोई नागरिक मानता है कि किसी नेता ने कानून का उल्लंघन किया है, तो वह उपलब्ध कानूनी उपायों का सहारा ले सकता है। वह संबंधित भाषणों के प्रमाण जुटाकर चुनाव आयोग या सक्षम प्राधिकारी के सामने शिकायत रख सकता है। जहाँ कानून के अनुसार न्यायालय का हस्तक्षेप उपलब्ध हो, वहाँ उचित याचिका भी दायर की जा सकती है।
बाल ठाकरे के मामले से यह सीख मिलती है कि चुनावी प्रचार में धर्म के इस्तेमाल पर कानून लागू हो सकता है और किसी उम्मीदवार के समर्थन में भाषण देने वाला नेता भी निर्धारित शर्तों के अंतर्गत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह सिद्धांत किसी एक दल, विचारधारा या धार्मिक समुदाय के लिए नहीं है। न्याय का अर्थ सभी नेताओं को समान परिणाम देना नहीं, बल्कि समान कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के तहत प्रत्येक मामले का निर्णय करना है।
बाल ठाकरे की छह वर्ष की चुनावी अयोग्यता भारतीय चुनावी इतिहास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह दिखाती है कि चुनाव प्रचार में धार्मिक अपील और समुदायों के बीच शत्रुता बढ़ाने से संबंधित आरोप, जब कानून के अनुसार सिद्ध हों, तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
राहुल गांधी के भाषणों, आरएसएस और भाजपा की आलोचना, जातिगत राजनीति तथा चुनाव आयोग और न्यायपालिका से संबंधित उनके सार्वजनिक आचरण पर बहस हो सकती है। यदि किसी विशिष्ट वक्तव्य या गतिविधि में कानून के उल्लंघन का पर्याप्त आधार हो, तो उचित कानूनी कार्यवाही भी हो सकती है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि सत्तारूढ़ या विपक्ष के नेता तक, सभी कानून के प्रति जवाबदेह हों।
धार्मिक भावनाओं के नाम पर चुनावी नियमों से छूट नहीं मिलनी चाहिए। प्रश्न यह नहीं कि राहुल गांधी को बाल ठाकरे की तरह दंडित किया जाना चाहिए या नहीं। असली बात यह है कि किसी भी नेता के विरुद्ध, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का, कानून के उल्लंघन के पर्याप्त प्रमाण मिलने पर निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई होगी। यदि भारतीय लोकतंत्र इस कसौटी पर खरा उतरता है, तभी चुनावी राजनीति में धर्म, जाति और संस्थागत टकराव के बीच कानून की सर्वोच्चता कायम रह सकती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
उन्होंने इस मामले में चैनल की विश्वसनीयता, पत्रकारिता में तथ्यों की पड़ताल और खबर प्रसारित करने वाले पत्रकारों की जवाबदेही को लेकर अपनी बात रखी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
लोक गायिका नेहा सिंह राठौर से जुड़े मामले में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखकर ABP News की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस मामले में चैनल की विश्वसनीयता, पत्रकारिता में तथ्यों की पड़ताल और खबर प्रसारित करने वाले पत्रकारों की जवाबदेही को लेकर अपनी बात रखी है।
ओम थानवी ने अपनी फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा है, पढ़िए उन्हीं के शब्दों में:
एबीपी न्यूज़ को मैं दूसरे चैनलों से कुछ अलग समझता आया हूँ। शाज़ी ज़माँ और मिलिंद खांडेकर का ज़माना भले चला गया, दिबांग भी अब वहाँ नहीं, फिर भी बुलंद ऐंकर संदीप चौधरी या रोमाना इसरार ख़ान, प्रतिमा मिश्रा जैसी आवाज़ों ने चैनल की ठसक बनाए रखी है।
लेकिन एबीपी नैटवर्क में जुझारू गायिका नेहा सिंह राठौर को बदनाम करने वाली झूठी ख़बर — जो उनके पोर्टल यानी डिज़िटल माध्यम पर चली — ने एबीपी न्यूज़ नैटवर्क की विश्वसनीयता को कटघरे में ला खड़ा किया है। एबीपी ने माफ़ी माँग ली। नेहा ने माफ़ी नहीं दी है। देनी भी नहीं चाहिए। यह कोई चूक नहीं थी। सरासर आपराधिक कृत्य था।
माफ़ी की याचना के साथ एबीपी वालों को ख़बर लिखने और चलाने वाले पत्रकारों पर कठोर कार्रवाई भी करनी चाहिए थी। मैं कभी किसी का रोज़गार छीनने के पक्ष में नहीं रहा। लेकिन चंडीगढ़ में एक उप-संपादक को (उन दिनों वेजबोर्ड की पक्की नौकरी हुआ करती थी) पहले मुअत्तल किया, फिर बाहरी लम्बी इंक्वायरी के बाद बर्ख़ास्त कर दिया था। मामला भ्रष्ट आचरण का था।
नेहा प्रतिभावान हैं, प्रसिद्ध हैं, बहादुर हैं। उनकी हिम्मत तोड़ने को दूर-दूर मुक़दमे हुए। राजद्रोह तक का मुक़दमा दायर किया गया। इस सिलसिले को देखते हुए मुमकिन है कि निडर गायिका को बदनाम करने के लिए कोई क्षुद्र चाल चली गई हो।
लेकिन मीडिया उसका हथियार क्यों बने। ख़बर का पहला क़ायदा है, तथ्यों की पड़ताल। दूसरे पक्ष से बात करते ही कल्पित बातें खुल जाती हैं। सचाई हो तब भी दूसरे पक्ष का कथन ख़बर का हिस्सा होता है। नेहा से बात ही नहीं की गई, इसी से साफ़ है कि ख़बर लिखने-प्रसारित करने वाले पत्रकारों की नीयत में खोट थी — या वे ज़िम्मेदारी के निर्वाह को सर्वथा अयोग्य हैं।
नेहा अदालत में जा रही हैं। वे समझौते वाली शख़्सियत नहीं। उम्मीद है उन्हें न्याय मिलेगा और कीचड़उछाल मीडियाकर्मियों को सबक़ भी।
(वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की फेसबुक पोस्ट से साभार)
कई स्थानों से यह विमर्श सुनने में आता है कि शिक्षा परिसरों को राजनीति मुक्त कर देना चाहिए और विद्यार्थी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दें। उन्हें राजनीति से क्या मतलब?
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
प्रो.संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
हमारे कुछ शिक्षा परिसर इन दिनों विवादों में हैं। ये विवाद कुछ प्रायोजित भी हैं, तो कुछ वास्तविक भी। विचारधाराएं परिसरों को आक्रांत कर रही हैं और राजनीति भयभीत है। जैसी राजनीति हो रही है, उससे लगता है कि ये परिसर देश का प्रतिपक्ष हैं। जबकि यह पूरा सच नहीं है। कुछ मुट्ठी भर लोग भारतीय युवा और उसकी समझ को चुनौती नहीं दे सकते।
देश का औसतन युवा देशभक्त और अपने विवेक पर भरोसा करने वाला है। उसे अपने देश की शक्ति और कमजोरियों का पता है। वह भावुक है, पर भावनात्मक आधार पर फैसले नहीं लेता। दुनिया की चमकीली प्रगति से चमत्कृत भी है, पर इसके पीछे छिपे अंधेरों को भी पहचानता है।
कई स्थानों से यह विमर्श सुनने में आता है कि शिक्षा परिसरों को राजनीति मुक्त कर देना चाहिए और विद्यार्थी सिर्फ पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दें। उन्हें राजनीति से क्या मतलब? जबकि यह सोच एकांगी है। देश के महत्वपूर्ण छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का मानना है कि “छात्र कल का नहीं, आज का नागरिक है।” अतएव छात्र शक्ति को सही मार्गदर्शन देते हुए राष्ट्रहित में उसका योगदान सुनिश्चित करना जरूरी है।
हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं, हमारे परिसर भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। राजनीति, छात्रों का इस्तेमाल कर अपने वोट बैंक को मजबूत तो करना चाहती है, किंतु छात्रसंघों के चुनाव अनेक राज्यों में प्रतिबंधित हैं। छात्रसंघों से राजनीति और सत्ता को घबराहट होती है। यहां तक कि जो राजनेता छात्रसंघों के माध्यम से राजनीति में आए, वे भी छात्रसंघों के प्रति उदार नहीं हैं।
होना यह चाहिए कि छात्रसंघ विद्यार्थियों के सांस्कृतिक, वैचारिक और राजनीतिक रुझानों के विकास में सहायक बनें, ताकि छात्र नेतृत्व और उसकी गंभीरता को समझकर अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। छात्रसंघ और छात्र राजनीति कहीं न कहीं इस भूमिका से विरत हुई है, इसलिए देश के राजनेताओं व अन्य प्रशासकों को इनका गला दबाने का अवसर मिला। कहा जाता है कि इसके चलते परिसर में तनाव और हिंसाचार भी बढ़ता है।
हम देखते हैं कि जब अनेक बुराइयों के बावजूद भी हम संसदीय राजनीति के खिलाफ नहीं हो जाते, बल्कि उसमें सुधार का ही प्रयास करते हैं। इसी तरह छात्रसंघों के रचनात्मक इस्तेमाल की भूमिका बनाने के बजाए, उनका गला दबा देने का विचार लोकतांत्रिक नहीं है। हमें देखना होगा कि छात्र संगठन क्यों राजनीतिक दलों के हस्तक बन रहे हैं। सभी प्रकार के आंदोलनों की तरह छात्र आंदोलन भी मर रहे हैं। विचारधारा के आधार पर विभाजित राजनीति कब पंथ और जाति की गलियों में भटक जाती है, कहा नहीं जा सकता।
ऐसे समय में शिक्षकों, शिक्षाविदों और परिसरों को जीवंत देखने की आकांक्षा रखने वाले लोगों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। सत्ता-राजनीति तो चाहती ही है कि परिसरों में फेयरवेल पार्टियां हों, फ्रेशर्स पार्टियां हों, मनोरंजन प्रधान आयोजन हों। किंतु ऐसे आयोजन, जिससे बहस का प्रारंभ हो, नए विचार सृजित हों—उन्हें किए जाने से परिसरों के अधिपति घबराते हैं।
एक लोकतंत्र में होते हुए हमें असहमतियों के लिए स्थान बनाना होगा। विमर्शों को जगह देनी होगी और असुविधाजनक सवालों के लिए भी तैयार रहना होगा। एक लोकतंत्र का यही सौंदर्य है और यही उसकी ताकत भी है। विद्यार्थियों को इस तरह से तैयार करना कि वे भावी चुनौतियों से टकराने का साहस अर्जित कर सकें, जरूरी है।
यहां यह कहना आवश्यक है कि यह सारा कुछ अपने तिरंगे और देश को मजबूत करने के लिए होगा। देश को तोड़ने और खंडित करने वाले विचारों के लिए यहां जगह नहीं होनी चाहिए। अगर ऐसा होगा तो परिसर आतंक की जगह बनेंगे। राज्य की ताकत को हम जानते हैं, इसलिए परिसर विमर्शों का केंद्र तो बनें, किंतु देशतोड़कों की पनाहगाह नहीं।
अपने शोध-अनुसंधान और शिक्षण-प्रशिक्षण से हमें इस देश को बनाना है, बर्बाद नहीं करना है, यह सोच हमेशा केंद्र में रहनी चाहिए। कोई भी विश्वविद्यालय अपने अध्यापकों और विद्यार्थियों के अवदान से ही बड़ा बनता है। हमें हमारे परिसरों को जीवंत बनाने के लिए इन्हीं दो पर ध्यान देना होगा। ऊर्जावान, नए विचारों से भरे हुए अध्यापक ही अपने विद्यार्थियों को नई रोशनी दे सकते हैं। वे ही नवाचारों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
कोई विद्यार्थी जब किसी भी परिसर में आता है तो एक उम्मीद के साथ आता है। उसे अपने दल का कैडर बनाने के बजाए, एक विचारवान नागरिक बनाना शिक्षकों का पहला कर्तव्य है। वे उसे आंखें दें, पर उधार की आंखें न दें। शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि वे चाणक्य बनें और उनके विद्यार्थी चंद्रगुप्त।
अध्यापकों के सामने सर्वश्री डा. राधाकृष्णन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डा. एपीजे अबुल कलाम, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, श्यामाचरण दुबे, विद्यानिवास मिश्र जैसे अनेक उदाहरण हैं, जिनके सानिध्य में जाकर कोई भी साधारण बालक एक असाधारण प्रतिभा में बदल जाता है। विद्यार्थी के इस रूपांतरण के लिए ऐसे शिक्षकों का राष्ट्र भी आदर करता है। गुरु-शिष्य परंपरा ऐसी हो, जिससे राष्ट्र के लिए हर क्षेत्र में नायक गढ़े जाएं।
सही बात तो यह है कि कुछ शिक्षकों को यह खबर ही नहीं कि उनके विद्यार्थी क्या कर रहे हैं। वे एक वेतनभोगी कर्मचारी की तरह अपनी कक्षा को बहुत निरपेक्ष तरीके से करते हुए बस जिए जा रहे हैं, तो कुछ ऐसे हैं, जिन्हें अपनी कक्षा से ही अपनी विचारधारा के लिए वैचारिक योद्धा और अपने राजनीतिक दल के लिए कैडर गढ़ने हैं। ऐसी दोनों प्रकार की अतियां गलत हैं।
हमारी शिक्षा और उकसावे से हमारे किसी विद्यार्थी का जीवन बदल जाए तो ठीक है, पर बिगड़ जाए तो...। हमारे क्रांतिकारी विचार उसे जेल की यात्राएं करवा दें, तो विचार करना होगा कि हमने शिक्षा में क्या गड़बड़ की है। हमारे विद्यार्थी हमारी अपनी संतानों की तरह हैं। हम उनसे वही अपेक्षा करें, वही मार्ग दिखाएं, जिस पर हमारी अपनी संतानों के चलने पर हमें आपत्ति न हो। यही एक सूत्र है, जो हमारी खुद की परीक्षा के लिए काफी है।
हमारे विद्यार्थी बहुत सी उम्मीदों, आशाओं, आकांक्षाओं और सपनों के साथ परिसर में आते हैं। उनके सपनों में रंग भरने की उन्हें ताकत देना हम शिक्षकों की जिम्मेदारी है। दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि क्या हम उनके साथ ऐसा कर पा रहे हैं।
परिसरों को राजनीति मुक्त नहीं, संस्कार युक्त बनाकर ही हम देश की प्रतिभाओं को उचित मंच दे पाएंगे। हम शिक्षकों ने आज ही यह शुरुआत नहीं की, तो कल बहुत देर हो जाएगी।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
मस्क की संपत्ति 1 लाख करोड़ डॉलर से थोड़ी ज़्यादा है यानी करीब 99 लाख करोड़ रुपए। यह आँकड़ा भारत के दूसरे सबसे अमीर मुकेश अंबानी से 10 गुना ज़्यादा है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।
एलन मस्क दो-तीन दिन से भारत की पॉलिटिक्स पर पोस्ट कर रहे हैं। उनके पोस्ट पर राजनीतिक गरमा-गरमी हो रही है, लेकिन इस बहस में कहीं यह बात छूट रही है कि मस्क की पॉलिटिक्स राइट विंग रही है। हिसाब-किताब मस्क की पॉलिटिक्स का।
मस्क दुनिया के सबसे अमीर आदमी हैं। उनकी संपत्ति 1 लाख करोड़ डॉलर से थोड़ी ज़्यादा है, यानी करीब 99 लाख करोड़ रुपए। यह आंकड़ा भारत के दूसरे सबसे अमीर मुकेश अंबानी से 10 गुना ज़्यादा है। मस्क के निशाने पर अंबानी हैं। दोनों टेलीकॉम बिज़नेस में हैं। मस्क को लगता है कि अंबानी के कारण उनकी सेटेलाइट इंटरनेट सर्विस शुरू नहीं हो पा रही है।
अंबानी की Jio और सुनील भारती मित्तल की Airtel अभी ब्रॉडबैंड और मोबाइल टॉवर से इंटरनेट बेचती हैं। इन दोनों कंपनियों ने भी सेटेलाइट इंटरनेट के लिए अप्लाई किया है। सरकार का कहना है कि तीनों कंपनियों की अर्ज़ी एक ही स्टेज पर है। कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है।
एलन मस्क ने जब पोस्ट किया कि अंबानी भारत के असली बॉस हैं तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लिखा कि आपको अभी तो एक का पता चला है, दूसरा भी है। मस्क ने लिखा कि यह तो चिंताजनक है। वो यहीं नहीं रुके, उन्होंने तंज कसते हुए अंबानी को भारत का प्रधानमंत्री तक कह डाला।
भारत में कांग्रेस के साथ मस्क की जुगलबंदी चौंकाने वाली है। वो अमेरिका में राइट विंग की सबसे मजबूत आवाज़ बनकर उभरे हैं। पहले उनकी पॉलिटिक्स का झुकाव डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ़ होता था, लेकिन दो साल पहले वो डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में खुलकर आए। उन्होंने अपने प्लेटफ़ॉर्म X का चुनाव में खुलकर इस्तेमाल किया। ट्रंप को सबसे ज़्यादा चंदा दिया। वो ‘Woke पॉलिटिक्स’ का विरोध करते हैं।
चाहे सामाजिक मुद्दे हों या आर्थिक, उनका रुझान राइट विंग की तरफ़ है। वो यूरोप की पॉलिटिक्स में भी दख़ल दे रहे हैं। ब्रिटेन में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी Reform UK का समर्थन कर रहे हैं, जो Immigration के विरोध में है। मस्क ने तो यहां तक कहा है कि Immigration के कारण ब्रिटेन में सिविल वॉर होगा।
भारत में मस्क के पोस्ट का कारण वैचारिक नहीं है, बल्कि व्यावसायिक लगता है। मस्क की कंपनी Starlink भारत में करीब 5 साल से अपना बिज़नेस शुरू करना चाहती है। इसमें देरी के कारण वो शोर मचा रहे हैं। मस्क की कंपनी ने पिछले साल अंबानी की कंपनी के साथ करार किया था कि रिलायंस जियो Starlink की सर्विस भारत में बेचेगी। करार तो Airtel के साथ भी हुआ था, लेकिन अभी तक सिक्योरिटी क्लीयरेंस नहीं मिला है, ना ही स्पैक्ट्रम आवंटन हुआ है।
दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने बिना नीलामी के सेटेलाइट स्पैक्ट्रम आवंटित करने के लिए कानून में बदलाव किया था तो कांग्रेस ने उसका विरोध किया था। कानून में इस बदलाव के कारण ही मस्क की एंट्री का रास्ता खुला। अब मस्क कांग्रेस के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं, जबकि अंबानी पर हमलावर हैं। यह धंधे की लड़ाई है, जिसमें पॉलिटिक्स घुस गई है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
राहुल गांधी पहले पुलिस बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी भवन के प्रवेश की ओर गए। बाहर खड़े प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।
राहुल गांधी और उनके समर्थकों द्वारा आकाशवाणी भवन परिसर में 'गुरिल्ला' शैली से घुसकर किए गए धरने ने क्या सुरक्षा तंत्र के लिए नए खतरों की घंटियाँ नहीं बजाई? यह राहुल दस्ते का पूर्व नियोजित धरना था या केवल सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी निचले स्तर की असावधानी या उनसे किसी तरह की मिली-जुली कोशिश? इससे पहले भी राहुल गांधी समर्थक भीड़ चकमा देकर प्रधानमंत्री निवास के दरवाजे पर धरना देकर गंभीर खतरे पैदा कर चुकी थी।
इस तरह के छापामार प्रयासों के दौरान किसी भी आतंकी अथवा माओवादी नक्सल की घुसपैठ होने पर कोई भयानक घटना भी हो सकती है। दुनिया के कई देशों में उनके प्रमुख रेडियो स्टेशनों पर कब्जा कर 'सत्ता' से विद्रोह के ऐलान तक की घटनाएं होती रही हैं।
दिल्ली पुलिस ने आकाशवाणी भवन में बिना अनुमति प्रवेश करने और परिसर में धरना देने के मामले में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा तथा अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। राहुल गांधी ने इसे राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ पहले से 45 एफआईआर हैं और उनका लक्ष्य 100 एफआईआर का है। उनके शब्दों में प्रत्येक एफआईआर उनके लिए “मेडल” है।
भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और असहमति लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी भी सरकारी परिसर में बिना अनुमति प्रवेश किया जा सकता है। आकाशवाणी भवन कोई सामान्य सार्वजनिक प्रदर्शन स्थल नहीं है। वहां प्रसारण-संबंधी संवेदनशील गतिविधियां और सुरक्षा व्यवस्थाएं होती हैं। राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि वे ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं।
लोकतंत्र में धरने आदि से विरोध करने का अधिकार है, लेकिन सरकारी परिसर की सुरक्षा और कानून का उल्लंघन करने का अधिकार किसी को नहीं है। प्रश्न यह है कि विरोध का स्थान कौन-सा चुना गया, वहां प्रवेश कैसे हुआ और यदि यही तरीका किसी अधिक गंभीर उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाता तो क्या होता?
आकाशवाणी, अर्थात ऑल इंडिया रेडियो, भारत की राष्ट्रीय सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था का संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा है। उसके परिसर में प्रसारण से जुड़े स्टूडियो, तकनीकी सुविधाएं, संचार व्यवस्था और कर्मचारी काम करते हैं। वहां से करोड़ों लोगों को एकसाथ संबोधित किया जा सकता है।
राहुल गांधी पहले पुलिस बैरिकेड पर चढ़े और फिर आकाशवाणी भवन के प्रवेश की ओर गए। बाहर खड़े प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी के कर्मचारियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन जबरन वे अंदर चले गए। यह घटना सुरक्षा एजेंसियों के लिए कई सवाल छोड़ती है। यदि किसी संवेदनशील सरकारी प्रसारण परिसर में राजनीतिक नेता और उनके समर्थक बिना पूर्व अनुमति के प्रवेश कर सकते हैं, तो क्या प्रवेश नियंत्रण पर्याप्त है? यदि पुलिस बाहर आंदोलन को नियंत्रित कर रही थी, तो परिसर के अंदर जाने का रास्ता कैसे खुला?
जब कानूनी रूप से उस परिसर को संबंधित कानूनों के तहत “प्रतिबंधित क्षेत्र” माना जाता है, भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 329 (3 और 4) के तहत तीन महीने से एक साल तक की सजा का प्रावधान है।
यदि राहुल के साथ भीड़ के असामाजिक तत्व या हिंसक समूह इसी तरह अंदर पहुंच जाता तो? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर कोई व्यक्ति स्टूडियो या तकनीकी प्रसारण क्षेत्र तक पहुंच जाता तो क्या वह राष्ट्रीय प्रसारण व्यवस्था को प्रभावित कर सकता था? लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से किसी संवेदनशील प्रसारण केंद्र की सुरक्षा इसी आधार पर नहीं की जा सकती कि अंदर आने वाला व्यक्ति ऐसा नहीं करेगा।
इतिहास बताता है कि रेडियो और टेलीविजन स्टेशन केवल मीडिया संस्थान नहीं रहे हैं; अनेक राजनीतिक संकटों, सैनिक तख्तापलटों और क्रांतियों में वे सत्ता और जनमत पर नियंत्रण का रणनीतिक केंद्र बन चुके हैं। यही कारण है कि आकाशवाणी जैसी संस्था में प्रवेश की घटना को केवल “धरना” कहकर समाप्त कर देना सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त नहीं होगा।
1979 की ईरानी क्रांति इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। 11 फरवरी 1979 को क्रांतिकारी समूहों ने रेडियो मुख्यालय पर नियंत्रण किया। इससे तेहरान की रेडियो और टेलीविजन प्रसारण व्यवस्था पर उनका नियंत्रण स्थापित हुआ। इतिहासकारों ने इसे ईरानी क्रांति की निर्णायक घटनाओं में माना है।
इससे पहले भी ईरान में रेडियो को सत्ता संघर्ष के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा चुका था। 19 अगस्त 1953 को प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्देक के खिलाफ तख्तापलट के दौरान रेडियो तेहरान पर नियंत्रण हासिल किया गया और प्रसारण के माध्यम से सरकार के गिरने की घोषणा की गई। रेडियो स्टेशन पर कब्जा केवल समाचार प्रसारण रोकना नहीं था—यह जनता को यह विश्वास दिलाने का माध्यम था कि सत्ता बदल चुकी है।
इसी तरह मिस्र में 1952 के फ्री ऑफिसर्स आंदोलन ने राजशाही के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की। आंदोलन की सफलता के बाद रेडियो के माध्यम से जनता को बताया गया कि सेना ने सत्ता अपने हाथ में ले ली है। 23 जुलाई 1952 की क्रांति का पहला महत्वपूर्ण सार्वजनिक संदेश रेडियो के माध्यम से प्रसारित हुआ।
अनवर सादात ने रेडियो स्टूडियो से पहला संदेश पढ़ा था। मिस्र के आधिकारिक ऐतिहासिक स्रोतों में भी इस प्रसारण का उल्लेख मिलता है। इस उदाहरण से एक मूलभूत बात सामने आती है: जिसके पास संचार माध्यम है, वह केवल सूचना नहीं देता—वह संकट की राजनीतिक व्याख्या भी जनता तक पहुंचाता है।
रोमानिया की 1989 की क्रांति में भी राष्ट्रीय प्रसारण संस्थानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब निकोलस का शासन गिर रहा था, प्रदर्शनकारी रेडियो-टीवी के परिसरों में पहुंच गए। रेडियो और टेलीविजन के भवन प्रदर्शनकारियों के नियंत्रण में आ गए और रेडियो ने घटनाओं का सीधा प्रसारण शुरू किया। सेना को राजधानी के महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थानों के साथ रेडियो टेलीविजन की सुरक्षा के लिए भी तैनात किया गया था।
टेलीविजन भवन विशेष रूप से संघर्ष का केंद्र बन गया था। उस समय की रिपोर्टों में बताया गया कि टेलीविजन परिसर को सुरक्षा कारणों से लगभग किले में बदल दिया गया था और वहां प्रवेश करने वालों की पहचान तथा तलाशी की जाती थी। यह इतिहास बताता है कि जब किसी देश में सत्ता-संघर्ष गंभीर हो जाए तो प्रसारण केंद्र स्वयं राजनीतिक युद्धभूमि बन सकते हैं। यह समस्या केवल तानाशाही देशों की नहीं है।
फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देश में भी 1961 के संकटों के दौरान रेडियो प्रसारण का महत्व सामने आया। सत्ता के विरुद्ध विद्रोही सैनिकों के लिए रेडियो जनता और सैनिकों को संदेश देने का महत्वपूर्ण माध्यम था। स्पेन में 1981 के असफल सैन्य तख्तापलट के दौरान भी संसद भवन और राष्ट्रीय संचार व्यवस्था का महत्व स्पष्ट हुआ। राजा का टेलीविजन संदेश लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा में निर्णायक साबित हुआ। लोकतंत्र में भी संचार व्यवस्था की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है।
भारत ने स्वयं आपातकाल, युद्ध, आतंकवाद, अलगाववाद और अनेक राजनीतिक संकट देखे हैं। ऐसे समय में सरकारी प्रसारण व्यवस्था की भूमिका सामान्य दिनों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है।
कल्पना कीजिए कि किसी राजनीतिक आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी केवल परिसर में धरना देने तक सीमित न रहें, बल्कि किसी स्टूडियो, नियंत्रण कक्ष या प्रसारण क्षेत्र तक पहुंच जाएं। वे वहां से कोई असत्यापित संदेश प्रसारित कर दें। वे प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, संसद, सेना या सरकार के बारे में कोई आपातकालीन घोषणा कर दें। या वे जनता से सरकारी आदेश न मानने, सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने अथवा सड़कों पर उतरने का आह्वान कर दें। कुछ मिनट का प्रसारण भी हजारों-लाखों लोगों में भ्रम और अफरातफरी पैदा कर सकता है।
राहुल गांधी देश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य स्तंभ है। लेकिन जितना बड़ा राजनीतिक नेता, उतनी बड़ी जिम्मेदारी। यदि कोई सामान्य कार्यकर्ता सुरक्षा बैरिकेड पार करता है तो एक स्तर का प्रश्न है। लेकिन जब लोकसभा का नेता प्रतिपक्ष स्वयं सुरक्षा अवरोध पार करता है और राष्ट्रीय प्रसारण संस्थान के परिसर में बैठ जाता है, तो उसका राजनीतिक संदेश बहुत बड़ा होता है।
युवा कार्यकर्ता उसी व्यवहार को अनुकरणीय समझ सकते हैं। कल कोई दूसरा दल कह सकता है, “जब विपक्ष के बड़े नेता ने किया तो हम क्यों नहीं?” और धीरे-धीरे संवेदनशील सरकारी संस्थानों में राजनीतिक घुसपैठ सामान्य व्यवहार बन सकती है।
इसलिए सवाल राहुल गांधी के राजनीतिक विचारों का नहीं, संस्थागत सुरक्षा की सीमा का है। लोकतंत्र में सरकार बदली जा सकती है। नीतियों का विरोध किया जा सकता है। चुनाव आयोग की आलोचना की जा सकती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के खिलाफ आंदोलन किया जा सकता है। लेकिन राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा से समझौता नहीं होना चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र केवल विरोध करने की स्वतंत्रता का नाम नहीं है; लोकतंत्र उन संस्थाओं की सुरक्षा का नाम भी है जिनके कारण विरोध, चुनाव, सूचना और सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण संभव होता है।
आकाशवाणी के भीतर हुआ यह धरना इसलिए केवल एक दिन की राजनीतिक घटना नहीं माना जाना चाहिए। यह पुलिस, इंटेलिजेंस, प्रसारण संस्थान और सभी राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी है—संवेदनशील राष्ट्रीय संस्थानों की सुरक्षा में “एक बार की चूक” को सामान्य राजनीतिक तमाशा मानकर छोड़ देना भविष्य में बहुत महंगा पड़ सकता है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन 84 साल के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बड़े और छोटे पर्दे पर सक्रिय हैं। फिल्मों में अपने लंबे सफर के साथ-साथ टीवी पर भी उन्होंने खास पहचान बनाए रखी है।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. अनुराग बत्रा।।
हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन 84 साल के हो गए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बड़े और छोटे पर्दे पर सक्रिय हैं। फिल्मों में अपने लंबे सफर के साथ-साथ टेलीविजन पर भी उन्होंने अपनी खास पहचान बनाए रखी है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जो लगातार बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित कर रहा है।
हर मुश्किल से उबरकर आगे बढ़े अमिताभ: अमिताभ बच्चन का फिल्मी सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा है, लेकिन उन्होंने मुश्किलों के सामने हार नहीं मानी। अपने करियर में आने वाली चुनौतियों से निकलकर उन्होंने बार-बार वापसी की है। फिल्म इंडस्ट्री और दर्शकों की पसंद में बदलाव के बावजूद वह लगातार काम करते रहे हैं और अलग-अलग भूमिकाएं निभाते रहे हैं। उनकी सोच और काम करने के तरीके में सकारात्मकता उनके लंबे सफर का अहम हिस्सा रही है। मुश्किल दौर में भी आगे बढ़ते रहने की उनकी क्षमता ने उन्हें मनोरंजन जगत में प्रासंगिक बनाए रखा है।
‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भी कायम है उनका आकर्षण: अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। टेलीविजन पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के होस्ट के रूप में भी वह दर्शकों को जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रतियोगियों से बातचीत करने का उनका अंदाज और कार्यक्रम को रोचक बनाए रखने की उनकी शैली दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखती है। इस कार्यक्रम के साथ उनका जुड़ाव इसकी पहचान का अहम हिस्सा बन गया है। बदलते समय और दर्शकों की पसंद के बीच भी वह टेलीविजन पर सक्रिय हैं।
ब्रैंड्स के लिए इसलिए खास हैं अमिताभ बच्चन: अमिताभ बच्चन की पहचान एक अभिनेता के साथ-साथ एक प्रभावशाली ब्रैंड पर्सनैलिटी के रूप में भी है। कई ब्रैंड्स ने उन्हें अपना ब्रैंड एंबेसडर बनाया है। इसकी बड़ी वजह उनकी लोकप्रियता के साथ लोगों का उन पर भरोसा और उनकी विश्वसनीयता है। अमिताभ बच्चन की आवाज में एक खास प्रभाव है। जब वह किसी ब्रैंड के बारे में बात करते हैं, तो लोग उनकी बात सुनते हैं। ब्रैंड्स उनकी इसी खासियत और लोगों के बीच उनकी विश्वसनीयता का महत्व समझते हैं।
किसी ब्रैंड एंबेसडर की भूमिका सिर्फ विज्ञापन में दिखाई देने तक सीमित नहीं होती। उसे लोगों से जुड़ना और ब्रैंड के प्रति भरोसा पैदा करना भी जरूरी होता है। अमिताभ बच्चन ने वर्षों के दौरान यह भरोसा बनाया है। उनकी लोकप्रियता के साथ उनकी विश्वसनीयता उन्हें दूसरे लोगों से अलग बनाती है।
हालांकि, अमिताभ बच्चन को ब्रैंड एंबेसडर बनाने के लिए बड़ा बजट जरूरी होता है और हर ब्रैंड इसे वहन नहीं कर सकता। लेकिन जो ब्रैंड उनके साथ जुड़ सकते हैं, उन्हें सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा ही नहीं, बल्कि लोगों के बीच पहचान और भरोसा रखने वाली शख्सियत का साथ मिलता है। यही वजह है कि विज्ञापन जगत में उनका महत्व आज भी बना हुआ है।
भारतीय सिनेमा में अनुभव और प्रभाव की खास पहचान: अमिताभ बच्चन ने कई दशकों में भारतीय सिनेमा को बदलते हुए देखा है और खुद भी इस बदलाव का हिस्सा रहे हैं। उनके लंबे अनुभव ने उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में एक खास स्थान दिलाया है। वह भारतीय सिनेमा में प्रभावशाली आवाज और विचार रखने वाली शख्सियत के रूप में भी पहचाने जाते हैं।
84 साल की उम्र में भी अमिताभ बच्चन सक्रिय हैं। उनके करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने मुश्किल समय को अपने सफर का अंत नहीं बनने दिया। फिल्मों और टेलीविजन पर दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ ब्रैंड्स के लिए भरोसेमंद चेहरा बने रहना उनकी खास पहचान है।
उनका जन्मदिन सिर्फ एक अभिनेता के लंबे सफर का उत्सव नहीं है, बल्कि उस शख्सियत की लोकप्रियता और विश्वसनीयता को भी रेखांकित करता जिसने दशकों बाद भी मनोरंजन और विज्ञापन जगत में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखी है।
(डॉ. अनुराग बत्रा BW Businessworld के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ और एक्सचेंज4मीडिया के फाउंडर हैं।)
दुनिया के बेहतरीन फिक्शन लेखकों में शुमार जेफ्री आर्चर का 86 साल की उम्र में पांच अक्टूबर को निधन हो गया। वह अपने अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ पर काम कर रहे थे और छह अक्टूबर को यह प्रकाशित होना था।
by
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
डॉ. संदीप गोयल।।
दुनिया के बेहतरीन फिक्शन लेखकों में शुमार जेफ्री आर्चर का 86 साल की उम्र में निधन हो गया। जेफ्री हॉवर्ड आर्चर (1940-2026), बैरन आर्चर ऑफ वेस्टन-सुपर-मेयर ने 5 अक्टूबर 2026 को अपने घर पर आखिरी सांस ली। वह इन दिनों अपने अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ पर काम कर रहे थे और छह अक्टूबर को यह प्रकाशित होना था। इसके प्रकाशन से एक दिन पहले ही उनका निधन हो गया।
‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ से लेकर ‘केन एंड एबेल’ तक अपनी कहानियों से दुनिया भर के पाठकों के बीच खास पहचान बनाने वाले जेफ्री आर्चर ने 119 देशों में 300 मिलियन से ज्यादा किताबें बेचीं। वह ‘द संडे टाइम्स’ की बेस्टसेलर सूची में 14 साल और ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की सूची में पांच साल से ज्यादा समय तक रहे। वह खुद कहते थे कि वह ‘लेखक नहीं, कहानीकार’ हैं।
डॉ. संदीप गोयल ने जेफ्री आर्चर को श्रद्धांजलि देते हुए उनके लेखन और जीवन को याद किया है। डॉ. गोयल बताते हैं कि आर्चर की पहली किताब ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ 1976 में प्रकाशित हुई थी और वह भारत में इसके शुरुआती पाठकों में शामिल रहे होंगे। उन्होंने इस किताब को शानदार और बेहद मनोरंजक बताया और कहा कि इसी किताब के बाद वह जीवनभर जेफ्री आर्चर के प्रशंसक बने रहे।
कर्ज ने बनाया लेखक: जेफ्री आर्चर ऑक्सफोर्ड ब्लू रहे थे और उन्होंने 100 गज की दौड़ 9.6 सेकंड में पूरी की थी। 1969 में 29 साल की उम्र में वह लाउथ से ब्रिटेन के सबसे कम उम्र के सांसद बने। लेकिन 34 साल की उम्र में कनाडा की एक सफाई कंपनी ‘एक्वाब्लास्ट’ में खराब निवेश के बाद वह लगभग दिवालिया हो गए। उन्होंने दिवालियापन से बाहर निकलने के लिए लिखना शुरू किया और इसी दौरान ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ लिखी, जो 1976 में प्रकाशित हुई।
यह उपन्यास चार ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्हें एक धोखेबाज फाइनेंसर ठग लेता है। इनमें हार्ले स्ट्रीट का एक डॉक्टर, ऑक्सफोर्ड का एक शिक्षक, मेफेयर का एक कला कारोबारी और एक कुलीन प्लेबॉय शामिल हैं। पैसे गंवाने के बाद चारों बदला लेने का फैसला करते हैं, लेकिन उनकी एक नैतिक शर्त होती है कि वे जितना पैसा गंवा चुके हैं, उससे न एक पैसा ज्यादा लेंगे और न एक पैसा कम।
डॉ. गोयल के मुताबिक, इस किताब की खासियत केवल इसकी कहानी नहीं बल्कि इसके विचारों की सहजता है। आर्चर ने यह समझ लिया था कि एक बेहतरीन कहानी छोटे-छोटे सटीक जालों की एक श्रृंखला होती है। उनके हर अध्याय का अंत एक रोमांचक मोड़ पर होता था। आलोचकों ने इस किताब को पसंद नहीं किया, लेकिन पाठकों ने इसे खूब खरीदा। यही पैटर्न अगले 50 वर्षों तक देखने को मिला। इस किताब की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर पैरामाउंट इसका नया रूपांतरण भी तैयार कर रहा है।
‘केन एंड एबेल’ बना उनकी पहचान: अगर ‘नॉट अ पेनी मोर, नॉट अ पेनी लेस’ ने जेफ्री आर्चर को आर्थिक रूप से संभाला, तो ‘केन एंड एबेल’ ने उन्हें अमर बना दिया। इस किताब की 34 मिलियन प्रतियां बिकीं और यह दुनिया के सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासों में शामिल रही। ‘केन एंड एबेल’ पर 1985 में सीबीएस ने मिनी-सीरीज भी बनाई थी, जिसमें विलियम लोवेल केन की भूमिका सैम नील और एबेल रोस्नोव्स्की की भूमिका पीटर स्ट्रॉस ने निभाई थी। कहानी 18 अप्रैल 1906 को एक ही दिन जन्मे दो लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है। विलियम केन का जन्म बोस्टन में एक संपन्न परिवार में होता है, जबकि व्लाडेक कोसकीविच का जन्म पोलैंड के एक जंगल में होता है। अनाथ और प्रवासी व्लाडेक आगे चलकर एबेल रोस्नोव्स्की बनता है।
दोनों एक-दूसरे को खत्म करना चाहते हैं और करीब 60 वर्षों तक उनके बीच यह संघर्ष चलता रहता है। डॉ. गोयल के अनुसार, आर्चर ने दोनों की जिंदगी को समानांतर तरीके से रचा। शोध बहुत गहरा था, लेकिन पाठक को उसका बोझ महसूस नहीं होता था। ‘द प्रोडिगल डॉटर’ 1982 में प्रकाशित हुआ। यह एबेल की बेटी फ्लोरेंटिना की कहानी को आगे बढ़ाता है और यह दिखाता है कि आर्चर सिर्फ किरदार नहीं बल्कि पूरे परिवारों और पीढ़ियों की कहानियां लिखते थे।
पांच दशक में 50 किताबें: जेफ्री आर्चर ने कभी लिखना बंद नहीं किया। पांच दशकों में उन्होंने 50 किताबें लिखीं। इनमें ‘शैल वी टेल द प्रेसिडेंट?’, ‘द फोर्थ एस्टेट’, ‘ए मैटर ऑफ ऑनर’, ‘ऑनर अमंग थीव्स’ और ‘ऐज़ द क्रो फ्लाइज’ शामिल हैं। उनकी शॉर्ट स्टोरी कलेक्शन ‘अ क्विवर फुल ऑफ एरोज’, ‘अ ट्विस्ट इन द टेल’ और ‘देयरबाय हैंग्स अ टेल’ भी चर्चित रहीं। डॉ. गोयल ने बताया कि उन्होंने आर्चर की इन किताबों को लंबे समय तक पढ़ा है।
उनकी किताब ‘द प्रिजन डायरीज- हेल, पर्गेटरी, हेवन’ भी खास रही। यह किताब 2001 में झूठी गवाही और न्याय की प्रक्रिया को बिगाड़ने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में बिताए गए दो वर्षों के अनुभवों पर आधारित थी। डॉ. गोयल के अनुसार, यह उनकी सबसे प्रभावशाली गैर-फिक्शन किताबों में से एक है। इसके बाद आर्चर ने ‘क्लिफ्टन क्रॉनिकल्स’ के सात खंड लिखे, जो 2011 से 2016 के बीच आए। इसकी शुरुआत ‘ओनली टाइम विल टेल’ से हुई। उन्होंने ‘विलियम वारविक’ सीरीज की आठ किताबें भी लिखीं।
2011 में ‘ओनली टाइम विल टेल’ के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया था। उनका वर्ल्ड टूर लंदन से नहीं बल्कि बेंगलुरु से शुरू हुआ था। डॉ. गोयल भी उस कार्यक्रम में मौजूद थे और उनके पास आज भी आर्चर द्वारा हस्ताक्षर की गई किताब है। भारत में उन्हें सुनने के लिए 2,000 से 3,000 लोग पहुंचे थे, जबकि अमेरिका में यह संख्या 200 से 300 थी। डॉ. गोयल के मुताबिक, आर्चर इसे कभी नहीं भूले।
आखिरी उपन्यास ‘एडम एंड ईव’: जेफ्री आर्चर का अंतिम उपन्यास ‘एडम एंड ईव’ 6 अक्टूबर को प्रकाशित होना था। यह किताब भी अलग सामाजिक वर्गों से आने वाले एक ही दिन जन्मे दो लोगों की कहानी पर आधारित है और इसे ‘केन एंड एबेल’ के साथ एक तरह से जोड़कर देखा गया है।
लेखन की अलग शैली: डॉ. गोयल के मुताबिक, जेफ्री आर्चर की सबसे बड़ी ताकत उनका गद्य नहीं बल्कि कहानी कहने का तरीका था। वह खुद भी यह मानते थे कि वह ग्राहम ग्रीन या जॉन ले कैरे नहीं हैं। फ्रेडरिक फोर्साइथ के मुकाबले आर्चर लोगों और उनके रिश्तों पर ज्यादा ध्यान देते थे। फोर्साइथ तथ्यों और प्रक्रियाओं पर जोर देते थे, जबकि आर्चर लोगों की भावनाओं और बदले की कहानी को केंद्र में रखते थे। सिडनी शेल्डन से तुलना करते हुए डॉ. गोयल कहते हैं कि दोनों की किताबें पाठकों को बांधे रखती थीं, लेकिन शेल्डन की दुनिया हॉलीवुड, सेक्स और ग्लैमर से जुड़ी थी, जबकि आर्चर की दुनिया सत्ता और बदले की थी।
केन फोलेट और जॉन ग्रिशम से अलग आर्चर अध्यायों को बेहद सटीक तरीके से गढ़ते थे। वह अपनी हर किताब को 14 से 17 बार तक दोबारा लिखते थे। हर ड्राफ्ट में वह उन वाक्यों को हटाते थे, जो कहानी को आगे नहीं बढ़ाते थे। उनकी संपादक केट एल्टन ने उन्हें बेहद मेहनती और हर शब्द को बेहतर बनाने के लिए लगातार ड्राफ्ट तैयार करने वाला लेखक बताया था।
डॉ. गोयल के अनुसार, आर्चर का हास्य भी उनकी कहानी की संरचना का हिस्सा था। वह सीधे चुटकुला नहीं सुनाते थे, बल्कि कहानी के जरिए हास्य पैदा करते थे। किसी ऐसे किरदार को, जिसे पाठक ने शुरुआत में नजरअंदाज कर दिया हो, कहानी के बाद के हिस्से में महत्वपूर्ण भूमिका दे देना उनकी खास शैली थी।
उनका लेखन ऐसा लगता था, जैसे वह पाठक के सामने बैठकर कहानी सुना रहे हों और उसका ध्यान एक पल के लिए भी भटकने न दें। डॉ. गोयल कहते हैं कि वह अपने लेखन में आर्चर की इस शैली को अपनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन खुद को उनके सामने बहुत छोटा मानते हैं। अब जब वह फिक्शन लिखने की कोशिश कर रहे हैं, तो जेफ्री आर्चर उनके लिए प्रेरणा हैं। भारत में जेफ्री आर्चर की लोकप्रियता खास तौर पर रही। डॉ. गोयल के मुताबिक, भारत कहानी सुनाने वालों का देश है और यहां के पाठकों को कहानी में आने वाला रोमांचक मोड़ पसंद है। जेफ्री आर्चर की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। एक ऐसी कहानी, जिसमें हर मोड़ पर पाठक के लिए कुछ नया था।
(डॉ. संदीप गोयल अंग्रेजी साहित्य में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है।)
डॉ. संदीप गोयल को बधाई और उन्हें शुभकामनाएं कि वह भारत में विज्ञापन एजेंसियों की शीर्ष संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा को आगे भी बनाए रखें।
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समाचार4मीडिया ब्यूरो ।।
भारतीय विज्ञापन जगत के इतिहास में यह एक सही समय है, जब डॉ. संदीप गोयल को ऐडवर्टाइजिंग एजेंसिज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAAI) का नया अध्यक्ष चुना गया है। डॉ. संदीप गोयल को बधाई और उन्हें शुभकामनाएं कि वह भारत में विज्ञापन एजेंसियों की शीर्ष संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा को आगे भी बनाए रखें।
यह दिलचस्प बात है कि नए अध्यक्ष को उद्योग के दोनों पक्षों यानी क्लाइंट और एजेंसी, दोनों तरफ काम करने का लंबा अनुभव है। क्लाइंट साइड और विज्ञापन एजेंसी, दोनों क्षेत्रों में अपने वर्षों के अनुभव के कारण मुझे पूरा भरोसा है कि वह आज की तकनीक आधारित विज्ञापन की दुनिया में स्वतंत्र एजेंसियों पर पड़ने वाले भारी दबाव को समझते होंगे।
अगर वह भारत सरकार के सामने विज्ञापन में AI से तैयार कंटेंट के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट कानून बनाने की जरूरत का मुद्दा उठाने की पहल कर सकें, तो इससे पूरे उद्योग को, चाहे क्लाइंट हों या एजेंसियां, काफी मदद मिल सकती है। अगर AI से तैयार कंटेंट के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट कानून हों और यह साफ हो कि क्लाइंट और एजेंसियां इसके इस्तेमाल के दौरान क्या कर सकती हैं और क्या नहीं, तो इस मुद्दे को लेकर काफी भ्रम दूर किया जा सकता है।
एक और क्षेत्र है, जहां मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि AAAI अपनी भूमिका निभा सकता है। वह है भविष्य के विज्ञापन जगत के लिए नई प्रतिभाओं को तैयार करना और उन्हें आगे बढ़ाना।
विज्ञापन उद्योग में काम कर चुके लोग इस बात से सहमत होंगे कि अगर आपको इस क्षेत्र में काम करना है तो सिर्फ मार्केटिंग की थ्योरी सीखना पर्याप्त नहीं है। आपको पढ़ना होगा, फिल्में देखनी होंगी, अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों को समझना होगा और आपके आसपास जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में लगभग हर चीज की जानकारी रखनी होगी।
मैनेजमेंट या विज्ञापन संस्थानों से पढ़ाई पूरी करके निकलने वाले छात्रों के लिए एक ऐसी फिनिशिंग स्कूल की व्यवस्था, जहां उन्हें इंडस्ट्री का अनुभव भी मिले, इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है। AAAI की ओर से एक ऐसा टैलेंट पूल भी तैयार किया जा सकता है, जिसे ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाए और कोई भी विज्ञापन एजेंसी वहां से इंडस्ट्री के लिए तैयार प्रतिभाओं को नियुक्त कर सके।
आज विज्ञापन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक प्रतिभाओं की कमी है। हालांकि पूरे भारत में कई कॉलेज विज्ञापन और मार्केटिंग से जुड़े कई कोर्स कराते हैं, लेकिन यह सच है कि इन कोर्स से निकलने वाले छात्र सीधे इंडस्ट्री में काम करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होते।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि दूसरी इंडस्ट्रीज के मुकाबले विज्ञापन में हमारे पास इंटर्न के साथ ट्रायल और एरर करने का समय नहीं होता। इसकी वजह यह है कि क्लाइंट की ओर से हमारी गलतियों को लेकर सहनशीलता लगभग शून्य होती है।
अंत में, अगर नए अध्यक्ष विज्ञापन कानूनों के बारे में क्लाइंट और विज्ञापन एजेंसियों के बीच जानकारी बढ़ाने के लिए कदम उठा सकें, तो इससे एक संस्था के रूप में AAAI की प्रतिष्ठा और मजबूत होगी। कई क्लाइंट को तो यह भी पता नहीं होता कि ऐडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) की एक वेबसाइट है, जहां उपभोक्ता विज्ञापनों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं।
इसके लिए AAAI, विज्ञापन एजेंसियों और क्लाइंट के बीच संवाद को बेहतर बनाने की जरूरत है। हर विज्ञापन एजेंसी, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, उत्तर भारत की हो या दक्षिण भारत की, उसे यह महसूस होना चाहिए कि वह AAAI का हिस्सा है और उसे यह भरोसा होना चाहिए कि AAAI उनके समर्थन के लिए मौजूद है।
जैसा कि मैंने इस लेख की शुरुआत में कहा है, मुझे पूरा विश्वास है कि डॉ. संदीप गोयल, एजेंसी और क्लाइंट दोनों पक्षों में अलग-अलग भूमिकाओं में काम करने के अपने व्यापक अनुभव के साथ, विज्ञापन जगत की शीर्ष संस्था AAAI में एक नई और सकारात्मक ऊर्जा लेकर आएंगे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)