देश की वैश्विक पहचान बनाने में मिली है कामयाबी: प्रो.संजय द्विवेदी

पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।

Last Modified:
Friday, 22 May, 2026
sanjaydwivedi


प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

इन दिनों भारत की मीडिया में बंदिशों और लोकतंत्र के सिकुड़ते जाने की कथाएं हवा में तैर रही हैं। लोकतंत्र बचाने में वे सब आगे हैं जिनके शासन की कथाएं उन्हें खुद मुंह चिढ़ा रही हैं। मीडिया को दबाने, नियंत्रित करने की कहानियां आज की नहीं हैं। लेकिन मीडिया की हिम्मत भी आज की नहीं है। हमारे देश में पत्रकारिता की शुरुआत ही जेम्स आगस्टस हिकी की क्रांतिकारी लेखनी से प्रारंभ होती है, जिसने अंग्रेज लाट साहबों की बैंड बजा दी।

अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध फूंककर उसने अंग्रेज होकर भी जेलें झेलीं, जुर्माने चुकाए और खामोश मौत पाई। किंतु हिकी यह बता गया कि पत्रकारिता क्यों और कैसे करनी है। इसके बाद आजादी के आंदोलन में यही पत्रकारिता ‘खबर’ की जगह ‘पैगाम’ देने वाली बन गयी। जिसके कारण शायर को कहना पड़ा कि जब तोप मुकाबिल तो अखबार निकालो।

हमारे देश के हर क्रांतिकारी और आजादी के नायकों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पत्रकारिता को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया। लोकमान्य तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी सबने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र को जागृत किया। पत्रकारिता की भावभूमि आजादी के आंदोलन ने तय कर दी। वह थी जनपक्षधरता, न्याय के लिए संघर्ष और सत्यान्वेषण। आजादी के बाद देश के नवनिर्माण का काम हो या आपातकाल विरोधी संघर्ष हमारे पत्रकारों ने हर जगह अपने उजले पदचिन्ह छोड़े।

आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है। वह अनेक मंचों से की जा रही है। प्रिंट, टीवी, रेडियो से अलग मोबाइल पर हो रही पत्रकारिता गजब कर रही है। कहा जा रहा कि डिजिटल का सूरज कभी नहीं डूबता। इसलिए आप देखें तो पाएंगे मीडिया की पहुंच मोबाइल के माध्यम से ज्यादातर लोगों तक हो रही है। मीडिया कन्वर्जेंस का माध्यम मोबाइल बने हैं। ऐसे में ज्यादातर चीजें सुनी और देखी जा रही हैं।

पठनीयता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। फिर भी इतना बड़ा देश अगर कुछ प्रतिशत में भी पढ़ता है तो भी संख्या आसानी से करोड़ों में होती है। दुनिया के तमाम देश एक भाषा में सोचते, पढ़ते और बोलते हैं। हिंदुस्तान 22 बड़ी भाषाओं और तमाम बोलियों में सुनता, पढ़ता और देखता है। इसलिए भारत के मीडिया का आकार बहुत व्यापक है।

डिजिटल मीडिया ने हमारे माध्यमों को वैश्विक किया है। भारतीय भाषाओं को वैश्विक किया है। कभी फिल्में हमारे भारतीय समाज का वैश्विक चेहरा बनाती थीं। अब मीडिया इसके केंद्र में है। यू-ट्यूब,सोशल मीडिया, वेब माध्यमों , ई-पेपर और ई-बुक्स से एक नई दुनिया बन रही है, जिसने भारत की वैश्विक छवि बनाने का काम किया है। आज भारत और उसकी भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा में भी भारतीयों की खास उपस्थिति है। वे जो लिख, कह और कर रहे हैं उसने देश को दुनिया में व्यक्त किया है। हिंदुस्तानी जहां-जहां गए अपनी भाषा और संस्कृति के साथ गए और वहां एक लघु भारत खड़ा किया।

यह लघु भारत आज मीडिया और संचार माध्यमों से शक्ति पाता है। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करता है। एक समय में अपनी भाषा के प्रकाशनों, पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और मनोरंजन को प्राप्त करना मुश्किल था, किंतु डिजिटल माध्यमों ने इसे संभव किया है। दूरियां, भूगोल और भाषा सबके अंतर को पाटकर भारत आपके घर पहुंच जाता है। इससे भारत की शक्ति बन रही है। साफ्टपावर क्या कर सकती है, इसे हम सब महसूस कर रहे हैं।

एक नया भारत बनाने और उसके एकीकरण में भारतीय मीडिया की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। अपने प्रारंभ से ही उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम भारतीय पत्रकारिता और साहित्य का स्वर एक रहा है। सबने भारत बोध को स्वर दिया है। एकत्व को स्थापित किया है। जगदगुरु शंकराचार्य के बाद भारत के एकीकरण का काम पत्रकारिता और साहित्य ने ही किया है। अपने राष्ट्रीय विचारों के समाचार पत्र से तमिलनाडु के सुब्रम्यण्यम भारती जो कर रहे थे, वही काम हिंदी में माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे। उनके साहित्य और पत्रकारिता दोनों में भारत बोलता है।

इस तरह हम देखते हैं कि समाचार माध्यमों ने न सिर्फ सूचनाओं का आदान प्रदान किया बल्कि एक देश में एक भाव भी भरा। यही हमारी पत्रकारिता की मूल शक्ति है। पत्रकारिता के नायक लोकमान्य तिलक का वाक्य स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, देश की वाणी बन गया। देश ने आजादी के सपने देखने प्रारंभ किए। उनकी प्रेरणा से अनेक लोग पत्रकारिता में आए और उसी भाव को लेकर आगे बढ़े।

इनमें हिंदी के माधवराव सप्रे का उदाहरण सबसे खास है, जिन्होंने तिलक जी के मराठी अखबार ‘केसरी’ से प्रेरणा लेकर ‘हिंदी केसरी’ प्रारंभ किया। ऐसे अनेक नायक देश को जोड़ने के सूत्र खोजकर पत्रकारिता के माध्यम से सामने आते रहे। समस्त भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ संपादकों ने इस दौर में जो भाव जागरण किया है, वह अप्रतिम है।

इतनी सारी भाषाओं, बोलियों, खानपान, स्थानीय प्रतीकों को लेकर चलता हुआ देश अगर एक है तो इसका कारण है, उसके सांस्कृतिक प्रवाह का एक होना। लंबी गुलामी, वैचारिक दासता से घिरे बुद्धिजीवियों द्वारा किए लंबे अनर्थ चिंतन के बाद भी इस देश की प्रज्ञा अगर सो नहीं गयी तो इसका कारण इस देश की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। समय-समय पर नायक आते रहे हैं।

जो हमें याद दिलाते हैं कि सब कुछ कभी खत्म नहीं हो सकता। भारतेंदु हरिश्चंद्र उनमें एक हैं, गांधी हैं, बाद के दिनों में दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी हैं। इनमें से सब पत्रकारिता को अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से समाज को उसके बोध से जोड़ते हैं।

भारतीय पत्रकारिता कमोबेश अपनी इस भूमिका पर आज भी कायम है। अपनी इस भूमिका को और प्रखर करते हुए पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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नग़मा सहर के NDTV छोड़ने पर संजय किशोर बोले-कुछ आवाजें एक दौर की पहचान बन जाती हैं

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं।

Last Modified:
Monday, 31 August, 2026
Sanjay Kishore Ji

वरिष्ठ टीवी पत्रकार और लोकप्रिय न्यूज एंकर नग़मा सहर के एनडीटीवी से विदा लेने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर ने उनके साथ करीब 20 साल तक काम करने के अनुभव साझा किए हैं। संजय किशोर ने सोशल मीडिया पर लिखी अपनी पोस्ट में नग़मा सहर की पत्रकारिता, एंकरिंग के अंदाज़ और उनके शांत एवं गरिमापूर्ण व्यक्तित्व को याद किया है। उन्होंने नग़मा के साथ अपने लंबे जुड़ाव के कई अनुभव साझा करते हुए उनके आगे के सफर के लिए शुभकामनाएं भी दी हैं।

संजय किशोर ने अपनी पोस्ट में लिखा है-

नग़मा ने भी उस ‘सहर’ को छोड़ दिया

नग़मा सहर। तक़रीबन बीस साल साथ काम किया। इतने लंबे साथ में किसी इंसान को सिर्फ़ सहकर्मी की तरह नहीं, उसकी शख़्सियत की कई परतों के साथ जानने का मौक़ा मिलता है। नग़मा को भी कुछ ऐसा ही जाना।

एक ऐसी शख़्सियत, जिसे न कभी आपा खोते देखा, न खुलकर ठहाके लगाते हुए। ग़म में ग़मगीन नहीं और ख़ुशी के मौक़े पर भी जश्न में अपनी गरिमा खोते हुए नहीं। शांत आवाज़, संयमित भाषा, बातों में ठहराव, चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान और वह ट्रेडमार्क डिंपल।

और फिर उनका एंकरिंग का अपना एक अलग अंदाज़ था।

जब भी स्पोर्ट्स की कोई बड़ी ख़बर होती, स्टूडियो जाने के ठीक पहले हमसे ब्रीफ़ लेना वह कभी नहीं भूलती थीं। हम अपनी तरफ़ से उन्हें जितना बताते, उतना ही लगता कि अब शायद उन्हें विषय की पूरी जानकारी हो गई होगी। लेकिन ऑन एयर होते ही जब वह डिबेट शुरू करतीं, तो कई बार मन में यही आता था, “हमने तो इन्हें थोड़ा-सा ही बताया था, इन्हें तो पहले से ही सब पता था!”

असल बात यह थी कि वह सिर्फ़ ब्रीफ़ नहीं लेती थीं, उसे आत्मसात करती थीं। सवाल पूछने से पहले विषय को समझती थीं। और यही एक अच्छे एंकर और सिर्फ़ सवाल पूछने वाले एंकर के बीच का फ़र्क़ था।

उनकी एक और बात मुझे हमेशा याद रहेगी। रिपोर्टर हो या कोई सहकर्मी, वह उसे बोलने का पूरा और पर्याप्त मौक़ा देती थीं। अपनी बात मनवाने या अपनी आवाज़ सुनाने की बेचैनी नहीं होती थी। आज के दौर के कई एंकरों की तरह लंबे-लंबे सवालों में ही आधा जवाब ठूँस देने की आदत नहीं थी। वह सवाल करती थीं, फिर सामने वाले को सुनती थीं। सचमुच सुनती थीं।

शायद इसलिए उनकी डिबेट में शोर कम और संवाद ज़्यादा होता था।

और शायद यही वजह थी कि उनकी आवाज़ सिर्फ़ सुनाई नहीं देती थी, ठहरती थी। न्यूज़रूम के शोर में भी उनकी आवाज़ का अपना एक सुकून था। ऊँची आवाज़ के बिना अपनी बात कह देना और बिना हावी हुए अपनी मौजूदगी दर्ज करा देना, यह हुनर हर किसी के पास नहीं होता।

आपने ऐसे समय में पत्रकारिता की अपनी पहचान बनाई, जब टेलीविज़न न्यूज़ धीरे-धीरे आवाज़ की ऊँचाई को पत्रकारिता की ताक़त समझने लगा था। लेकिन आपकी ताक़त हमेशा आपकी आवाज़ की ऊँचाई नहीं, उसका ठहराव और उसकी विश्वसनीयता रही।

पटना वीमेंस कॉलेज से शुरुआत, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और फिर ‘हम लोग’ तथा ‘इंटरनेशनल एजेंडा’ जैसे यादगार कार्यक्रमों तक का सफ़र अपने आप में प्रेरणादायक है। लेकिन मेरे लिए आपकी सबसे बड़ी पहचान उन उपलब्धियों से कहीं आगे है।

आप उस दौर की याद हैं, जब न्यूज़ एंकर होना सिर्फ़ स्क्रीन पर दिखाई देना नहीं था। उसमें पढ़ना था, समझना था, सुनना था और सबसे बढ़कर, गरिमा के साथ अपनी बात रखना था।

टेलीविज़न न्यूज़ के उस सुनहरे दौर में आपके साथ इतने वर्षों तक काम करना और आपको इतने क़रीब से देखना मेरे लिए हमेशा एक विशेष अनुभव रहेगा।

और एक साथी पटना वाले के तौर पर, आपके सफ़र पर हमेशा एक अलग तरह का गर्व रहेगा।

नग़मा, आप सचमुच उस शांत, संयमित और गरिमापूर्ण आवाज़ की आख़िरी मज़बूत कड़ी थीं, जो आज के शोर में कहीं खोती जा रही है।

बहुत कुछ बदला, बहुत लोग आए और चले गए। लेकिन कुछ आवाज़ें सिर्फ़ याद नहीं रहतीं, एक दौर की पहचान बन जाती हैं।

आप भी ऐसी ही एक आवाज़ हैं।

आगे का सफ़र और भी ख़ूबसूरत हो, नग़मा।

उसी ठहराव, उसी गरिमा और उसी ट्रेडमार्क डिंपल के साथ।

(वरिष्ठ पत्रकार संजय किशोर की फेसबुक वॉल से साभार)

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सुभाष चन्द्रा सस्ते में कैसे छूटें? पढ़िए इस सप्ताह का 'हिसाब किताब'

हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी।

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Monday, 31 August, 2026
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मिलिंद खांडेकर, वरिष्ठ पत्रकार।

अरुण शौरी का करीब दस साल पुराना वीडियो वायरल हो रहा है। वो IBC के बारे में बात कर रहे हैं। तब IBC यानी Insolvency and Bankruptcy Code लागू ही हो रहा था। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि किसी कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित किया और फिर कंपनी के भाई की पत्नी ने आने-पौने दाम पर कंपनी खरीद ली। नए नियमों के तहत भाई की पत्नी को देनदार का रिश्तेदार नहीं माना जाता है। अब आइए Z टीवी के संस्थापक सुभाष चंद्रा के केस पर।

सुभाष चंद्रा पर करीब 22 हजार करोड़ रुपये का दावा NCLT में किया गया था। अगर कोई कंपनी लोन नहीं चुका रही है या गारंटी देने वाले से वसूली करनी है तो IBC के तहत केस NCLT (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) में चलता है। सुभाष चंद्रा का केस 6.5 करोड़ रुपये में निपट गया। ₹100 की देनदारी थी तो 3 पैसे देकर वो छूट गए। इसे फाइनेंस की भाषा में हेयर कट कहते हैं। 99.97% हेयर कट हो गया। हिसाब-किताब में समझेंगे कि ये खेल कैसे हुआ?

NCLT के सामने अगर किसी प्रस्ताव पर 75% से ज्यादा लेनदारों के वोट पड़ जाते हैं तो प्रस्ताव पास हो जाता है। सेटलमेंट के पक्ष में 80% वोट पड़े। जिन्होंने पक्ष में वोट दिया, उनमें से 35% सुभाष चंद्रा के भाई जवाहर गोयल की पत्नी की कंपनियों ने दिए, जबकि 27% वोट जिन कंपनियों ने दिया, उनके डायरेक्टर का Essel ग्रुप की कंपनियों से नाता रहा है। 62% वोट घर से ही मिलने का आरोप है, लेकिन NCLT ने यह आपत्ति नहीं मानी कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा की Associate हैं। LIC Housing, HDFC Bank समेत कई बैंकों के करीब 4 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं, लेकिन उनके पास सिर्फ 20% ही वोट थे।

एक बात यह जान लीजिए कि सुभाष चंद्रा ने खुद 22 हजार करोड़ रुपये का लोन नहीं लिया था। लोन उनके Essel ग्रुप की कंपनियों ने लिया था। ये कंपनियां मुख्य तौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर का काम करती थीं। यह Z टीवी से अलग बिजनेस है। इस लोन की गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। कंपनियां लोन नहीं चुका पाईं तो लेनदारों ने NCLT में केस कर दिया।

लेनदारों में LIC Housing, Indiabulls, HDFC Bank, Union Bank, Axis Bank, RBL Bank जैसी बड़ी कंपनियां शामिल थीं। इनका बकाया करीब 4 हजार करोड़ रुपये था। लेनदारों में वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियां (करीब 35%), Lemonade Capital और Corpcall Capital (27%) भी शामिल हो गए। इन कंपनियों का दावा था कि सुभाष चंद्रा ने जो गारंटी दी थी, उसमें उनका भी इस्तेमाल किया गया था।

मोटे तौर पर उनके शेयर गिरवी रखे थे। उन्होंने करीब 14 हजार करोड़ रुपये का दावा किया। बैंक कहते रहे कि ये कंपनियां सुभाष चंद्रा से जुड़ी हुई हैं। इनको लेनदार नहीं मानना चाहिए। वीणा इन्वेस्टमेंट ग्रुप कंपनियों की मालकिन सुशीला गोयल हैं। वो सुभाष के छोटे भाई जवाहर की पत्नी हैं। बाकी दोनों कंपनियों Lemonade Capital और Corpcall Capital के डायरेक्टर पहले Essel ग्रुप की कंपनियों में डायरेक्टर रह चुके हैं। ट्रिब्यूनल ने बैंकों की आपत्ति को खारिज कर दिया। कानूनन सुभाष चंद्रा की जीत हुई।

हल्ला मचने के बाद अब बैंक इस फैसले के खिलाफ अपील करने जा रहे हैं। बैंक Essel ग्रुप की कंपनियों से भी अलग से वसूली में लगे हैं, जिनकी गारंटी सुभाष चंद्रा ने ली थी। सरकारी सूत्रों का दावा है कि उनसे करीब 1400 करोड़ की वसूली हो सकती है, जबकि कुल लोन 4 हजार करोड़ रुपये का है। यह लंबी प्रक्रिया है।

अब अरुण शौरी के बयान पर लौटिए। लोन डूबाने के बाद आपके रिश्तेदार या जान-पहचान के लोग ही आपको सस्ते में छुड़वा सकते हैं, जैसा सुभाष चंद्रा के भाई की पत्नी ने दावा ठोककर किया। सवाल IBC पर भी उठ रहे हैं, जिसे सरकार बड़ा रिफॉर्म बताती रही है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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जेन जी और सत्ता के समीकरणों में संघ के बदलते रूप: आलोक मेहता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है।

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Monday, 31 August, 2026
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आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय 'केशव कुंज' में एक पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में जेन जी और जेन अल्फा के हंगामी प्रचार पर बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने इन दोनों श्रेणियों को पूरी तरह से "पश्चिमी और यूरोपीय अवधारणा" बताते हुए खारिज कर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा, "हमारे देश में जेन जी या जेन अल्फा जैसा कोई कॉन्सेप्ट नहीं है। ये शब्द अमेरिका और यूरोप से आते हैं, उस संस्कृति से हमारा कोई लेना-देना नहीं है।" उन्होंने जोर देकर कहा, "मेरे लिए हमारे देश और असम के युवा कोई 'जेन जी' या 'जेन अल्फा' नहीं हैं, बल्कि वे हमारे अपने बेटे और बेटियां हैं। हम अपने बच्चों को किसी भी श्रेणी में नहीं बांटेंगे।"

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज पारंपरिक रूप से पीढ़ियों को पारिवारिक रिश्तों (जैसे माता-पिता, दादा-दादी, बेटे-बेटी) के माध्यम से समझता है। इसलिए बच्चों को ऐसे पश्चिमी लेबलों में कैद करने के बजाय, हमें एक परिवार की तरह मिलकर रहना चाहिए और बच्चों के कल्याण व देश को आगे बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए। पुस्तक विमोचन के बाद उन्होंने यह टिप्पणी गुजरात (सोमनाथ) और मीडिया के अन्य पत्रकारों के साथ बातचीत के दौरान भी साझा की।

हाल के वर्षों में हिमंत बिस्वा सरमा भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री के रूप में ही नहीं, भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कारों, हिंदुत्व की संस्कृति पर प्रभावी ढंग से राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। वह संभवतः कभी संघ के स्वयंसेवक नहीं रहे होंगे, लेकिन कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता से शीर्ष नेता बनते हुए असम और संपूर्ण भारत के लिए विदेशी ताकतों-संगठनों से हुए नुकसान को गहराई से समझे हुए हैं। पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भी उन्होंने अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक विनम्रता और दृढ़ता से अपनी बातें रखीं। जबकि संघ से जुड़े वक्ता जेन जी, जेन अल्फा का उल्लेख करते हुए औपचारिक भाषण देते रहे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप संगठन के डिजिटल विस्तार की जरूरत स्वीकार की है। एक रिपोर्ट के अनुसार संघ जेन जी और डिजिटल संपर्क तंत्र पर ध्यान दे रहा है तथा स्वयंसेवकों को तकनीक के उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। वहीं श्री भागवत ने चेतावनी दी कि संगठन को केवल प्रचारोन्मुख नहीं बनना चाहिए। यह बहुत दिलचस्प विरोधाभास है।

हाल के वर्षों में संघ-भाजपा में यह अंतर्विरोध चुनौतियों के साथ खतरा भी बन रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि संघ प्रमुख और उनके सहयोगी दत्तात्रेय होसबोले के साथ कई प्रचारक मूल संस्कारों और विचारधारा पर जोर दे रहे हैं। दोनों संगठनों में जहां समर्पित लोग हैं, वहीं सत्ता से पद और स्वार्थों की पूर्ति में लगे हैं। इससे छवि पर असर पड़ रहा है। हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच पार्टी के आंदोलन और उसके पीछे रही बाहरी ताकतों-संगठनों के दबाव से सरकार के कुछ नेताओं को जेन जी का राग गाना पड़ा है।

लेकिन सत्ता से लाभान्वित संघ-भाजपा के युवा संगठनों ने छात्रों की समस्याओं पर संघर्ष और सहयोग के लिए क्या कोई योगदान दिया? सही बात तो यह है कि भाजपा के कई नेताओं की तरह दूसरी-तीसरी पंक्ति के नेता-कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर प्रचार तक सीमित रहने लगे। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अधिकांश बैठकों में सांसदों, विधायकों और अन्य नेताओं को जनता के बीच घर-घर तक जाने की आवश्यकता बता रहे हैं। आखिरकार जनता से जुड़े होने के कारण उत्तर-पश्चिम भारत के साथ पूर्वोत्तर में संघ-भाजपा शक्तिशाली होकर सत्ता में आई।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी 'ग्रिट एंड ग्लोरी' नामक जिस पुस्तक का लोकार्पण किया, वह असम और पूर्वोत्तर भारत के उन लोगों के योगदान को रेखांकित करती है, जिन्होंने बहुत ही निष्ठा और निस्वार्थ भाव से संघ के साथ मिलकर काम किया और क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन लाने में अपना योगदान दिया। यह पुस्तक पूर्वोत्तर भारत के इतिहास, उसकी चुनौतियों और वहां हुए सामाजिक बदलावों पर केंद्रित है। इसमें विशेष रूप से आरएसएस के प्रचारकों और उससे जुड़े संगठनों के उन कार्यकर्ताओं के अनुभवों को संकलित किया गया है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में काम किया।

वे लोग बिना किसी स्थापित नेटवर्क या संसाधनों के बेहद सुदूर और अपरिचित क्षेत्रों में गए। उन्होंने कठिन जीवन परिस्थितियों, उग्रवादी समूहों की धमकियों, शारीरिक हमलों और अन्य कठिनाइयों का सामना करते हुए भी समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का अपना काम जारी रखा। अक्सर इस क्षेत्र को केवल संघर्ष, अलगाववाद या उग्रवाद के चश्मे से देखा जाता रहा है। लेकिन यह पुस्तक दर्शाती है कि समाज केवल सरकारी नीतियों या संस्थाओं से नहीं बदलता, बल्कि जमीन पर चुपचाप काम करने वाले लोगों के साहस, दृढ़ता और सेवा भाव से बदलता है।

संघ में प्रचारक का अर्थ ही था—व्यक्तिगत सुविधा छोड़कर संगठन को पूरा समय देना। प्रचारक अक्सर साधारण जीवन जीता था, एक जगह से दूसरी जगह जाता था, कार्यकर्ताओं के घर रुकता था, साइकिल/बस/रेल से यात्रा करता था और स्थानीय समाज में लगातार व्यक्तिगत संपर्क बनाता था। उसकी सबसे बड़ी ताकत मोबाइल फोन, सोशल मीडिया या बड़ा कार्यालय नहीं, बल्कि व्यक्ति से व्यक्ति का संपर्क थी। इसीलिए पुराने प्रचारक किसी शहर में पहुंचते थे तो पत्रकार, शिक्षक, व्यापारी, किसान, विद्यार्थी, डॉक्टर, वकील और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं के घर जाकर घंटों बातचीत करते थे। शाखा और छोटी बैठकों के माध्यम से धीरे-धीरे नेटवर्क बनता था।

दिल्ली के झंडेवाला स्थित पुराने संघ कार्यालय में पदों से प्रचारक अलग नहीं पहचाने जाते थे। एक पत्रकार के नाते 1972 से मुझे कई बार इस कार्यालय में जाने के अवसर मिले। वरिष्ठ प्रचारक चमनलालजी के माध्यम से सरसंघचालक तक से भेंट करना कठिन नहीं था। प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जु भैया) और के.सी. सुदर्शनजी के लंबे इंटरव्यू छोटे से कमरे में सामान्य कुर्सियों पर बैठकर हो जाते थे। नई बिल्डिंग्स के टावर बनने से पहले प्रचारक अपने कमरों या हॉल में सामान्य ढंग से खाट पर सोते और जमीन पर बैठकर भोजन किया करते थे। पिछले सप्ताह पूर्वोत्तर पर पुस्तक लोकार्पण के कार्यक्रम के लिए पहली बार संघ के भव्यतम भवनों वाला कार्यालय देखने का अवसर मिला। बाहर सुरक्षा व्यवस्था किसी सरकारी मंत्रालय और कॉरपोरेट कंपनी से भी अधिक दिखी। पांच सितारा रंग-ढंग देखकर पता चला कि संघ कितना बदल गया है।

अपनी शताब्दी वर्ष की योजना में संघ ने हर गांव और हर घर तक पहुंचने तथा लगभग 58,964 मंडलों और 44,055 बस्तियों में हिंदू सम्मेलन आयोजित करने का लक्ष्य बताया था। लेकिन काम करने का तरीका निश्चित रूप से बदल रहा है। पहले प्रचारक का प्रभाव मुख्यतः स्थानीय संगठन और व्यक्तिगत संबंधों से बनता था। आज एक वरिष्ठ प्रचारक के पास बड़ा संगठनात्मक कार्यालय, यात्रा की बेहतर सुविधा, डिजिटल संचार, व्हाट्सऐप समूह, वीडियो कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया टीम, मीडिया संपर्क, विभिन्न संगठनों के साथ समन्वय जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

आधुनिक भवन भी इसी बदलाव का प्रतीक है। ‘केशव कुंज’ को केवल कार्यालय भवन के रूप में नहीं, बल्कि संगठनात्मक गतिविधियों, प्रशिक्षण, आवास, प्रकाशन, अध्ययन और बड़े कार्यक्रमों के लिए एक बहुउद्देश्यीय परिसर के रूप में विकसित किया गया है। इसका पुनर्निर्माण लगभग 150 करोड़ रुपये की लागत से हुआ बताया जाता है। केशव कुंज परिसर में तीन टावर—‘साधना’, ‘प्रेरणा’ और ‘अर्चना’ हैं।

प्रत्येक टावर ग्राउंड फ्लोर के अलावा 12 मंजिल का है। कुल मिलाकर लगभग 300 कमरे और कार्यालय स्थान हैं। यहां तीन बड़े सभागारों की कुल क्षमता 1,300 से अधिक बताई गई है। इसी तरह हाल ही में नागपुर में भी संघ मुख्यालय के स्मृति मंदिर परिसर के लगभग ₹300 करोड़ के पुनर्विकास की प्रक्रिया शुरू की है। इसका प्रमुख उद्देश्य पुराने ढांचे को आधुनिक बनाना और 2027 में नागपुर में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के लिए बड़ी एवं आधुनिक सुविधाएं तैयार करना है। इस दृष्टि से नए रूप में संघ-भाजपा को पुराने संस्कारों, आधुनिक विचारों में समन्वय और जनता से जीवंत संपर्क की चुनौती सबसे अधिक रहने वाली है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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तकनीक के जंगल में खो सकती है भाषाई विरासत : प्रो.संजय द्विवेदी

बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी?

Last Modified:
Saturday, 29 August, 2026
sanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

अब जब वह जमाना बीत रहा है जिसमें हम अपने पसंदीदा लेखकों को मुग्ध होकर पढ़ते थे, उनकी भाषा, उनकी शैली की दीवानगी हमें उनसे जोड़कर रखती थी। यह ऐसा रिश्ता था जो हमें किसी खास लेखक का पाठक बना देता था। क्या डिजिटल क्रांति के इस दौर में मशीनें जिस तरह लिख-पढ़ रही हैं, लेखकों का वजूद रह जाएगा? जनरेटिव एआई अब केवल तकनीकी टूल न रहकर भाषा, विचार और अभिव्यक्ति का माध्यम बन रही हैं, उससे चिंता की लकीरें गहरी हो गयी हैं। हमें आश्वासन दिए जा रहे हैं कि वे एक मशीनी भाषा लिखेंगीं, पर दिल कहां से लाएंगी? संवेदनाएं कहां से लाएंगीं? लेकिन दिमाग इस तरह से भी सोचता है कि अगर वे दिल और भावनाएं भी ला सकीं, हमारे आपके जैसा ही सोचने और लिखने लगीं तो क्या होगा?

हमारे लिए क्या छोड़ेंगी मशीनें?

बहुत कुछ तो एआई कर ही रहा है। सीखते हुए बड़ी और समझदार हो रही मशीनें क्या हमें लिखने लायक भी छोंडेंगी? मशीनों पर बढ़ती निर्भरता क्या हमें मौलिक चिंतन के लायक छोड़ेगी? ये बड़े सवाल हैं। एआई के अनेक टूल्स हिंदी और भारतीय भाषाओं में धाराप्रवाह लिख रहे हैं, कंटेट क्रिएट कर रहे हैं। यह हमारी भाषाई विविधता के लिए बड़ा अवसर है या भाषाई पहचान और भाषा से जुड़े व्यवसाय के लिए संकट के दिन, कहना कठिन है। माना जा रहा है कि ये प्रयोग डिजिटल खाइयों (डिजिटल डिवाइड) को कम करेंगें। अंग्रेजी न लिखने, बोलने और समझने वाले बड़े समाज के लिए बहुत कुछ पहुंच में आ जाएगा।

वे सरकारी योजनाओं, सेवाओं, सूचनाओं को अपनी भाषा में ग्रहण कर सकेंगें। भारतीय भाषाओं का ‘रीयल टाइम अनुवाद’ हमारी भाषाई सद्भावना को बढ़ाने का काम करेगा। हमारा संपूर्ण भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा सब भाषा भाषियों तक पहुंच सकेगा। इसी के साथ लुप्त हो रही बोलियां, संवाद और लोक परंपराएं और प्रदर्शन कलाएं संरक्षित किए जाने की पहल भी हो सकती है। डिजिटल आकार्इव हमें यह सुविधा देगा कि हम अपना बहुत कुछ बचा सकें और अपनी-अपनी भाषाओं में उसे सुन सकें, पढ़ सकें।

क्या रूप, रस, गंध खो बैठेंगीं भाषाएं?

सबसे बड़ा संकट है भाषाओं की आत्मा का। उसकी चिति का। उसके मुहावरों- लोकोक्तियों का। उसके नाद का। मशीनी अनुवाद,मशीनी लेखन से भाषाएं क्या अपना मूल रस,स्वाद,गंध और भाव खो बैठेंगी। क्या उन्हें संवेदना के तल पर रिक्त छोड़ दिया जाएगा। क्या भाषाएं अब सूचना की वाहक तो होंगीं किंतु भावों का निर्वहन करने लायक नहीं बचेंगीं? हमारे एआई माडल्स मूलतः पश्चिमी या अंग्रेजी डेटासेट पर प्रशिक्षित हैं। वे भारतीय भाषाओं का सुंदर अनुवाद कर रहे हैं। लेकिन उसमें प्रयुक्त मुहावरों, लोकोक्तियों, मानवीय संस्पर्श की कोमल भावनाओं, व्यंग्य और भावनात्मक गहराई को छू नहीं पा रहे हैं। संभावना है कि वे भविष्य में इन्हें छूने और पकड़ने का प्रयास करें।

भाषाई समरूपता कई बार भाषा प्रवाह में ही बाधा बनती है। मशीनी अनुवाद की सीमाएं भी जाहिर ही हैं। इनके कारण लेखन में मशीनीपन और भाषा में भाव की कमी साफ दिखती है। भारतीय भाषाओं की डेटा आज भी बहुत कम है। वे समाज में गहरी पैठी हुई भाषाएं तो हैं किंतु डिजिटल दुनिया में उनकी उपस्थिति अभी सीमित है। ऐसे में स्थानीय डेटासेट बड़ी संभावनाओं के द्वार खोलता है। भारतीय भाषाओं के लिए स्वदेशी टूल्स (एलएलएम्स) का विकास जरुरी है, जिससे हमारी भाषाएं भी अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन यहां कर सकें।

इससे हमारी संस्कृति, हमारी वाक् परंपरा और व्याकरण का संरक्षण भी होगा। सभी कहते हैं कि एआई को सहायक के रुप में देखें न कि लेखक के रूप में। लेकिन एआई पर बढ़ती निर्भरता क्या लेखक के विचारों और उसकी चिंतन प्रक्रिया को अनुकूलित नहीं करेगी? वह उन्हीं विषयों, विचारों और दायरों में कैद होकर रह जाएगा जहां एआई उसे ले जाएगी। स्वतंत्र चिंतन के लिए एआई का प्रयोग कितना उपयोगी है, यह सोचने की जरुरत है। आज हमारे पास कोई नीतिगत ढांचा और नैतिक निर्देश नहीं हैं। ऐसे में हम अपनी हदों और सरहदों को कैसे तय करें?

संस्कृति की वाहक है भाषा-

इसमें दो राय नहीं कि एआई के पास भाषा आ चुकी है। वह उसे लिखना, बोलना और व्यक्त करना जानता है। कई बार उसकी भाषा परिशुद्ध भी होती है, गलतियों के बिना और व्याकरणपरक भी। बावजूद इसके उसके मशीनीकृत रूप के भी कई रूप रचे जा सकते हैं। वह अनेक शैलियों में पारंगत हो रहा है। अनुवाद कुशल तो वह है ही। ऐसे में भाषा की आत्मा का क्या होगा, यह प्रश्न ज्यों का त्यों सामने खड़ा है। भाषा अकेली नहीं आती, वह किसी संस्कृति की वाहक होती है। स्थानीयता की भी वाहक होती है। संवेदना, विचार, संस्कृति और स्थानीय तत्वों से मिलकर भाषा अपने मुहावरे में ही मुक्ति पाती है। इससे उसकी दुनिया बड़ी होती है। उसका पाठक संसार खड़ा होता है। भारतीय भाषाओं के सामने सबसे बड़ा संकट यही है क्या वे अपनी मूल चेतना और रस-गंध को खो बैठेंगीं? वे सूचनाएं देंगी पर पर कुछ कहेंगीं नहीं। बतियाएंगी नहीं। उनमें बातें कहने की क्षमता हो सकती है पर वे संवाद नहीं कर पाएंगी।

सूचना का सुपर हाइवे मौलिकता की बलि न ले-

तकनीक की तेज रफ्तार के बीच में हमें भाषाई मौलिकता,मानवीय संस्पर्श को बचाए और बनाए रखने के सचेतन प्रयास करने होगें। डिजिटल क्रांति से भाषाओं का विस्तार तो हो किंतु उनकी मूल संवेदना, मुहावरे, लोकोक्तियां और संस्कृति न छूटें इसका प्रयास हम भाषाप्रेमियों को ही करना होगा। भाषाई दीवारें गिराने पर आमादा एआई हमारे लिए एक अवसर है, किंतु यह अवसर आत्मसमर्पण का कारण नहीं बने, इसके लिए हमें सोचना होगा। शब्द इंसान के हों किंतु भाषा मशीनी हो ऐसा तो हममें से कोई नहीं चाहेगा। सूचना का यह सुपर हाइवे हमारी मौलिकता की बलि न ले ले, इसकी जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है जो अपनी भाषा से प्यार करता है।

यह लेखक के निजी विचार हैं।

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हैप्पी बर्थडे डॉ. अनुराग बत्रा: आस्था, जुनून और भविष्य पर टिकी नजर की कहानी

'एक्सचेंज4मीडिया' के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन व एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा के जन्मदिन पर कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके व्यक्तित्व को शब्दों में पिरोया है

Last Modified:
Thursday, 27 August, 2026
Dr Annurag Batra...

गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।

कुछ लोग बिजनेस खड़ा करते हैं, कुछ ब्रैंड बनाते हैं और कुछ खास लोग ऐसे होते हैं, जो संस्थान तैयार करते हैं। 'एक्सचेंज4मीडिया' (exchange4media) ग्रुप के फाउंडर और 'BW बिजनेसवर्ल्ड' के चेयरमैन एवं एडिटर-इन-चीफ डॉ. अनुराग बत्रा ऐसे ही लोगों में शामिल हैं।

आज, जब डॉ. अनुराग बत्रा 54 साल के हो गए हैं, तो कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक गणपति विश्वनाथन ने उनके अब तक के सफर को शब्दों में पिरोया है। गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की कहानी केवल उनकी उपलब्धियों की कहानी नहीं है, बल्कि उस तरीके की भी कहानी है, जिससे उन्होंने यह सब खड़ा किया—आस्था, जुनून, निरंतरता और सबसे बढ़कर भविष्य पर लगातार नजर रखते हुए।

गणपति विश्वनाथन लिखते हैं कि डॉ. अनुराग बत्रा एक बेहद आस्थावान व्यक्ति हैं, जिनके लिए काम ही पूजा है। उनकी आस्था उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा है, लेकिन काम के प्रति उनकी असाधारण ऊर्जा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। वह ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके मन में हमेशा कुछ न कुछ चलता रहता है। एक नया विचार, नया अवसर, नई संभावना या किसी चीज को और बेहतर बनाने का नया तरीका।

डॉ. अनुराग बत्रा ने अपने पार्टनर नवल आहूजा के साथ एक-एक ईंट जोड़ते हुए ‘एक्सचेंज4मीडिया’ (exchange4media) को खड़ा किया। एक केंद्रित प्लेटफॉर्म के तौर पर शुरू हुआ यह सफर वर्षों में भारतीय मीडिया, मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली उपस्थिति के रूप में विकसित हुआ।

हालांकि, उनका सफर यहीं नहीं रुका। डॉ. अनुराग बत्रा ने लगातार अपने मीडिया विस्तार को आगे बढ़ाया और ‘बिजनेसवर्ल्ड’ (BusinessWorld) तथा ‘इम्पैक्ट’ (IMPACT) को समूह में शामिल किया। इसके साथ ही पब्लिकेशंस और प्लेटफॉर्म्स का एक बड़ा इकोसिस्टम तैयार हुआ। इस यात्रा की खास बात मीडिया के प्रति उनका 360 डिग्री दृष्टिकोण है। समूह ने बिजनेस, मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, मीडिया और इन इंडस्ट्रीज को आकार देने वाले लोगों, विचारों और चर्चाओं के बीच अपनी उपस्थिति बनाई है।

गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा की सबसे बड़ी ताकतों में से एक यही है कि वह पब्लिशिंग को केवल कंटेंट तैयार करने का बिजनेस नहीं मानते, बल्कि इसे बातचीत और संवाद तैयार करने का माध्यम समझते हैं। यही बातचीत किसी भी इंडस्ट्री को जीवंत बनाए रखती है।

डॉ. अनुराग बत्रा हमेशा अपनी सोच में साहसी रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनका दृष्टिकोण हमेशा भविष्य की ओर रहा है। उन्होंने यह समझा कि मीडिया बिजनेस केवल कल क्या हुआ, इसे देखकर नहीं चल सकता। उसे यह भी समझना होगा कि आने वाले समय में दर्शक और पाठक क्या चाहेंगे।

परिवर्तन को पहले से भांपने की इसी क्षमता ने उनके पब्लिकेशंस को समसामयिक, प्रासंगिक और अपने दर्शकों के लिए उपयोगी बनाए रखने में मदद की है। दिल से इनोवेटर डॉ. अनुराग बत्रा लगातार इस बात पर विचार करते रहते हैं कि उनके प्लेटफॉर्म्स को और अधिक जानकारीपूर्ण, समकालीन और दर्शकों के लिए उपयोगी कैसे बनाया जाए। वह केवल वही करते रहने में सहज नहीं हैं, जो हमेशा से होता आया है। उनके मन में हमेशा एक सवाल रहता है—‘अब आगे क्या?’

शायद यही सवाल उनके पूरे सफर की प्रमुख प्रेरक शक्तियों में से एक रहा है। आज भारत के मार्केटिंग और एडवरटाइजिंग इकोसिस्टम में किसी प्रमुख प्लेटफॉर्म का नाम आता है तो ‘एक्सचेंज4मीडिया’ का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है। इस तरह की ब्रैंड पहचान रातोंरात नहीं बनती। इसके पीछे वर्षों की लगातार मेहनत, इंडस्ट्री से रिश्ते, विश्वसनीयता और यह समझ शामिल होती है कि लोग क्या जानना और किस बारे में बात करना चाहते हैं।

हालांकि, डॉ. अनुराग बत्रा की एक और खासियत है, जो गणपति विश्वनाथन को विशेष रूप से प्रभावित करती है। उन्होंने इतना कुछ बनाया है, लेकिन आज भी वह ऐसे व्यक्ति की तरह काम करते हैं, जैसे अभी भी कुछ बनाने की शुरुआत कर रहे हों।

उनमें मंजिल पर पहुंच जाने का कोई भाव नहीं है। इसके बजाय, आगे क्या है, इसे जानने की एक निरंतर जिज्ञासा है। शायद यही वजह है कि 54 की उम्र उन्हें केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक ऐसे पड़ाव के रूप में दिखाती है, जहां पीछे के अनुभव भी हैं और भविष्य की संभावनियां भी साफ दिखाई देती हैं।

गणपति विश्वनाथन के शब्दों में, यही वह अनुराग हैं, जिन्हें वह जानते हैं एक ऐसा व्यक्ति, जो आस्था से प्रेरित है, काम से ऊर्जा पाता है और जिसकी नजर लगातार आने वाले कल पर रहती है। 54 साल की उम्र में डॉ. अनुराग बत्रा एक महत्वपूर्ण विरासत बना चुके हैं। लेकिन गणपति विश्वनाथन का मानना है कि अनुराग बत्रा शायद पीछे मुड़कर अपनी विरासत को देखने में उतनी रुचि नहीं रखते। वह इससे ज्यादा इस बारे में सोचना पसंद करेंगे कि अगला क्या बनाया जा सकता है।

गणपति विश्वनाथन के अनुसार, डॉ. अनुराग बत्रा शायद अपने सफर को आगे मौजूद संभावनाओं से मापते रहेंगे। डॉ. अनुराग बत्रा के 54वें जन्मदिन पर गणपति विश्वनाथन ने उन्हें निरंतर सफलता, खुशी, अच्छे स्वास्थ्य और सबसे बढ़कर उसी जुनून और बेचैन ऊर्जा के लिए शुभकामनाएं दी हैं, जिसने उनके सफर को परिभाषित किया है। 54 साल की उम्र। पीछे एक लंबा और महत्वपूर्ण सफर। और आगे शायद उससे भी ज्यादा रोमांचक यात्रा इंतजार कर रही है। जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं, डॉ. अनुराग बत्रा।

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भारतीय क्या और क्यों करते हैं खरीदारी? सुब्रमण्यम कृष्णन की ‘Guilty As Bought’ देगी जवाब

Subramanian Krishnan की किताब ‘Guilty As Bought’ बताएगी आखिर भारतीय वही क्यों खरीदते हैं जो वे खरीदते हैं

Last Modified:
Wednesday, 26 August, 2026
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गणपति विश्वनाथन, कम्युनिकेशन कंसल्टेंट और लेखक।

“Helping. Challengers. Grow. At the intersection of business, brand and culture.” यानी ऐसे बिजनेस और ब्रैंड्स को आगे बढ़ने में मदद करना, जो कुछ नया करने की चुनौती लेते हैं और बिजनेस, ब्रैंड व कल्चर के बीच बेहतर तालमेल बनाते हैं। सुब्रमण्यम कृष्णन खुद को LinkedIn पर कुछ इसी तरह पेश करते हैं। उन्हें आमतौर पर 'सुबू' (Subu) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने तीन दशक से ज्यादा समय रणनीति, प्लानिंग, ऐडवर्टाइजिंग और ब्रैंड बिल्डिंग की दुनिया में काम करते हुए बिताया है।

सुबू ने अपने करियर की शुरुआत सेल्स से की थी। इसके बाद उन्होंने ऐडवर्टाइजिंग की दुनिया में कदम रखा, जहां रणनीति और प्लानिंग उनकी खासियत बन गई। वर्षों के दौरान उन्होंने भारत के साथ-साथ इंटरनेशनल मार्केट्स में भी काम किया और एक थिंकर के तौर पर खुद के लिए लगातार नए मानक तय किए। साथ ही उन्होंने यह समझ विकसित की कि किसी ब्रैंड को मजबूत बनाने के लिए किन चीजों की जरूरत होती है।

अब तीन दशक से ज्यादा समय तक बिजनेस, ब्रैंड्स और कंज्यूमर्स को करीब से देखने के बाद उन्होंने अपने अनुभव और सोच को एक किताब का रूप दिया है। इस किताब का नाम है Guilty As Bought: The Hidden Forces Shaping Why Indians Buy.

इस किताब को कुछ हफ्ते पहले लॉन्च किया गया था और अब यह Amazon पर उपलब्ध है। व्यस्त प्रोफेशनल जिंदगी के बीच किसी किताब को पूरा करके उसे पाठकों तक पहुंचाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। हालांकि, रणनीति और प्लानिंग के क्षेत्र में सुबू के लंबे अनुभव ने उन्हें इस तरह की किताब लिखने के लिए जरूरी नजरिया और कई अहम ऑब्जर्वेशन दिए हैं।

आखिर भारतीय वही क्यों खरीदते हैं जो वे खरीदते हैं?

इस किताब के केंद्र में एक आसान लेकिन दिलचस्प सवाल है: भारतीय वही चीजें क्यों खरीदते हैं, जो वे खरीदते हैं? 

सुबू के मुताबिक, इसका जवाब सिर्फ आज के ट्रेंड्स को देखकर नहीं मिल सकता। कंज्यूमर बिहेवियर कई दशकों में हुए छोटे-छोटे बदलावों से बनता है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और पीढ़ियों से जुड़े कई ऐसे बदलाव हैं, जो अक्सर सतह के नीचे काम करते रहते हैं और हमारे खरीदारी के फैसलों को प्रभावित करते हैं।

हमें लग सकता है कि हम अपनी पसंद से स्वतंत्र रूप से फैसले लेते हैं। लेकिन हम क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, क्या देखते हैं, कौन सी गाड़ी चलाते हैं और क्या खरीदते हैं- इन सभी चीजों पर कई बड़े फैक्टर्स का असर होता है।हमारी परवरिश, हमारी महत्वाकांक्षाएं, बदलती लाइफस्टाइल, सामाजिक माहौल, संस्कृति और हमारे आसपास की दुनिया, सभी हमारी पसंद को प्रभावित करते हैं। यही बात Guilty As Bought को खास तौर पर दिलचस्प बनाती है।

यह किताब कंजम्पशन के 12 छिपे हुए ड्राइवर्स को समझने की कोशिश करती है। इसमें देखा गया है कि इन ड्राइवर्स ने अतीत और वर्तमान में भारतीय कंज्यूमर्स को किस तरह प्रभावित किया है और भविष्य में इनका क्या असर हो सकता है।

पिछले कुछ दशकों में काफी बदल गई भारतीय कंज्यूमर स्टोरी

पिछले कुछ दशकों में भारत की कंज्यूमर स्टोरी में बड़ा बदलाव आया है। जिस भारत में सुबू ने अपने प्रोफेशनल करियर की शुरुआत की थी, वह आज के भारत से काफी अलग है। लोगों की आकांक्षाएं बदली हैं। परिवारों का स्वरूप बदला है। मीडिया बदल गया है। टेक्नोलॉजी ने लोगों के प्रोडक्ट्स खोजने और खरीदारी से जुड़े फैसले लेने के तरीके को बदल दिया है।

हालांकि, इसके बावजूद कंजम्पशन को प्रभावित करने वाले कुछ गहरे कारण आज भी काफी हद तक वैसे ही बने हुए हैं। ब्रैंड्स के बारे में दशकों तक सोचने और काम करने वाले व्यक्ति के लिए ये बदलाव भारतीय कंज्यूमर को समझने का एक दिलचस्प नजरिया देते हैं।

Guilty As Bought सिर्फ इस पारंपरिक सवाल से आगे जाने की कोशिश करती है कि कंज्यूमर्स क्या खरीदते हैं, और इसके बजाय ज्यादा दिलचस्प सवाल पूछती है कि वे आखिर इसे खरीदते क्यों हैं।

मार्केटर्स के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सवाल?

यह अंतर काफी मायने रखता है। मार्केटर्स और ब्रैंड बिल्डर्स के लिए कंज्यूमर को समझना सिर्फ सेल्स नंबर देखने या किसी नए ट्रेंड को पहचानने तक सीमित नहीं है। इसके लिए उन मोटिवेशन और सांस्कृतिक ताकतों को समझना भी जरूरी है, जो इन आंकड़ों के पीछे काम कर रही होती हैं।

कंज्यूमर बिहेवियर में जो बदलाव अचानक नजर आता है, वह वास्तव में कई वर्षों से धीरे-धीरे बन रहे किसी बदलाव का नतीजा हो सकता है। यहीं पर सुबू का प्रोफेशनल सफर इस किताब के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो जाता है।

सेल्स से ऐडवर्टाइजिंग तक, प्लानिंग से स्ट्रैटेजी तक और भारत के साथ-साथ विदेशी बाजारों में ब्रैंड्स पर काम करने से लेकर कंज्यूमर्स में हो रहे बदलावों को देखने तक, उनके करियर ने उन्हें बिजनेस, ब्रैंड और कल्चर के रिश्ते को कई अलग-अलग नजरियों से समझने का मौका दिया है।

उनका LinkedIn पर लिखा विवरण- “Helping. Challengers. Grow.”, शायद उनके इस सफर को काफी अच्छी तरह बताता है। लेकिन Guilty As Bought के साथ अब वह अपना फोकस एक और बुनियादी सवाल की ओर ले जा रहे हैं- वे कौन सी ताकतें हैं, जो कंज्यूमर की पसंद और खरीदारी के फैसले को प्रभावित करती हैं।

असली चुनौती यह समझना है कि कल कंज्यूमर क्या खरीदेगा

इस किताब का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद भविष्य की ओर देखने की इसकी कोशिश है। यह बताना अपेक्षाकृत आसान है कि कंज्यूमर्स ने कल क्या खरीदा। असली चुनौती यह समझने में है कि वे कल क्या खरीदना चाहेंगे। जैसे-जैसे भारत की महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं, लोग ज्यादा कनेक्टेड हो रहे हैं और देश पहले से ज्यादा विविध हो रहा है, वैसे-वैसे कंजम्पशन को प्रभावित करने वाली ताकतें भी और जटिल होने की संभावना है।

इन ताकतों को समझना सिर्फ मार्केटर्स और ब्रैंड मैनेजर्स के लिए ही उपयोगी नहीं हो सकता, बल्कि उन सभी लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो तेजी से बदलते भारतीय कंज्यूमर को समझना चाहते हैं। तीन दशक से ज्यादा समय तक भारतीय कंज्यूमर्स, ब्रैंड्स और बिजनेस को बदलते हुए देखने के बाद सुबू ने अपने अनुभवों और इनसाइट्स को किताब के रूप में सामने रखा है।

Guilty As Bought: The Hidden Forces Shaping Why Indians Buy रोजमर्रा की खरीदारी की एक ऐसी तस्वीर सामने रखने की कोशिश करती है, जिसे हम शायद सामान्य नजर से नहीं देखते, क्योंकि शायद हम जो चीजें खरीदते हैं, वे हमारे बारे में और उस भारत के बारे में, जिसमें हम रहते हैं, हमारी सोच से कहीं ज्यादा कुछ बता रही होती हैं।

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‘सोचना पड़ेगा’ से KBC ने दिया नया संकेत, क्या बदलने वाला है शो का अंदाज?

26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है।

Last Modified:
Monday, 24 August, 2026
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डॉ. संदीप गोयल, फाउंडर व चेयरमैन, Mogae Group ।।

26 साल से ‘कौन बनेगा करोड़पति’ (KBC) ने भारत को एक बात बताई है- ज्ञान ही दौलत है। लेकिन इस साल 10 अगस्त को सीजन-18 के साथ KBC हमें कुछ अलग बता रहा है- सिर्फ ज्ञान काफी नहीं है। ऊपर से देखने पर नई थीम लाइन ‘सोचना पड़ेगा’ एक और प्रमोशनल लाइन जैसी लगती है। लेकिन ऐसा नहीं है। अमिताभ बच्चन ने साल 2000 में पहली बार “लॉक किया जाए” कहा था, उसके बाद KBC में यह सबसे बड़ा बदलाव है।

यह सिर्फ कोई विज्ञापन संदेश नहीं है। यह प्रोडक्ट की री-पोजिशनिंग है।

  1. अभी क्यों? क्योंकि Google ने KBC के पुराने तरीके को बदल दिया है

सोनी ने आखिरकार एक कड़वी लेकिन अहम बात स्वीकार की है। अब सिर्फ ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को नहीं, बल्कि मुश्किल समय में सही तरीके से सोचने और फैसला लेने वाले व्यक्ति को भी गेम में आगे बढ़ना चाहिए।

अमिताभ बच्चन के साथ बनाए गए तीन नए प्रोमो को देखें। पहले प्रोमो में वह कहते हैं:

“आजकल जवाब जो है ना, वो हर जगह मिलने लगा गया है, आपके जेब में भी। मतलब आपके फोन पे। इसलिए इस बार KBC में जवाब याद रखने से काम नहीं चलेगा।”

सोनी ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि शो को ऐसे दौर के लिए दोबारा तैयार किया जा रहा है, जहां जानकारी बहुत ज्यादा उपलब्ध है, लेकिन उस जानकारी को सही तरीके से इस्तेमाल करने की क्षमता असली अंतर पैदा करती है।

साल 2000 में अगर आपको पेरू की राजधानी पता थी तो आप 1 करोड़ रुपये जीत सकते थे। लेकिन 2026 में मेरी 12 साल की भांजी ChatGPT से 0.4 सेकंड में इसका जवाब हासिल कर सकती है। अगर KBC सिर्फ याददाश्त का टेस्ट बना रहा तो वह हर जेब में मौजूद हर फोन से हार जाएगा।

इसलिए KBC वही कर रहा है जो आज AI के दौर में हर ब्रैंड को करना चाहिए- Knowledge से Applied Knowledge की तरफ बढ़ना।

सोनी ने भी कहा है, “KBC has become a cultural phenomenon... This season, with 'सोचना पड़ेगा', the conversation evolves to celebrate the power of applied knowledge and decision making.” यानी KBC अब Attention Marketing यानी “इस तथ्य को याद रखो” से Intention Marketing यानी “इस तथ्य का इस्तेमाल करो” की तरफ बढ़ रहा है।

  1. शो के फॉर्मेट में वास्तव में क्या बदला है? हां, बदलाव हुआ है

यह KBC के लिए सिर्फ नई टैगलाइन नहीं है। गेम के काम करने के तरीके में भी बदलाव किया गया है।

  1. a) सवाल: Recall से Reasoning तक

पहले सवाल होते थे- “Discovery of India किसने लिखी?” अब सवाल इस तरह तैयार किए जा रहे हैं कि कंटेस्टेंट को अपनी जानकारी के साथ-साथ सिद्धांतों को लागू करने और क्रिटिकल थिंकिंग यानी तार्किक तरीके से सोचने की जरूरत पड़े।

फॉर्मेट अब सिर्फ याददाश्त और रटकर याद करने की क्षमता का टेस्ट नहीं रहेगा, बल्कि इसमें क्रिटिकल थिंकिंग को भी परखा जाएगा।

उदाहरण के लिए सवाल ऐसा हो सकता है:

“अगर Discovery of India आज लिखी जाती और सिर्फ क्विक-कॉमर्स के जरिए बेची जाती, तो इसकी सबसे अच्छी लॉन्च स्ट्रैटेजी क्या होती?” यानी सिर्फ यह जानना काफी नहीं होगा कि किताब किसने लिखी। अब यह भी सोचना होगा कि आप उस जानकारी का इस्तेमाल कैसे करेंगे।

  1. b) Fastest Finger First खत्म

यह बड़ा बदलाव है। ‘Fastest Finger’ शब्द को अब नाम से हटा दिया गया है। अब कंटेस्टेंट्स को चार विकल्पों को सही क्रम में लगाने की बजाय चार राउंड खेलने होंगे, जिसके जरिए वे Hot Seat तक पहुंचेंगे।

17 सीजन तक Hot Seat पर पहुंचने का रास्ता स्पीड पर निर्भर था। जो सबसे तेज था, वही ‘Fastest Finger’ जीतता था। इससे एक तरह की ट्यूशन और रटने वाली संस्कृति को बढ़ावा मिलता था- रट्टा मारो।

अब Hot Seat तक पहुंचने के लिए चार राउंड होंगे। इसका मतलब है कि रणनीति, निरंतरता और निर्णय लेने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होगी। अब यह सिर्फ एक तेज रेस नहीं है। यह एक तरह की क्वालिफायर लीग है। और यह जिंदगी से भी ज्यादा मेल खाती है।

  1. c) गेम की सोच: Speed से Pause तक

हाल के गोल्फ-कोर्स प्रोमो में अमिताभ बच्चन कहते हैं: “बचपन में हमें सिखाया गया था कि जो पहले जवाब दे, सबसे सही वही है। लेकिन जिंदगी में कई बार, पहला जवाब ही सही नहीं होता। तो इस बार KBC में, जवाब देने से पहले खुद को जरा रोकना पड़ेगा।”

क्या यह भारत की परीक्षा प्रणाली पर सीधा हमला है? हो सकता है।

  1. क्या यह वाकई बड़ा बदलाव है?

हां। तीन वजहों से। पहली वजह यह है कि 26 साल बाद KBC उस एक चीज को बदल रहा है, जिसे उसने कभी नहीं बदला था- ‘Smart’ यानी होशियार होने की परिभाषा। 26 साल तक Smart का मतलब था G.K., यानी General Knowledge। अब Smart का मतलब Presence of Mind यानी मौके पर सही सोच और समझ है।

दूसरी वजह यह है कि इससे यह भी बदल सकता है कि आखिर कौन जीत सकता है। पहले Kota का 19 साल का कोई ऐसा क्विजर, जिसने 10 हजार तथ्य रट रखे हों, जीत सकता था। अब 45 साल का कोई किसान, जिसने अपनी जिंदगी में अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया है, उसके पास भी बराबर का मौका हो सकता है। इससे कंटेस्टेंट का आधार ‘Students’ से बढ़कर ‘Thinkers’ तक हो जाता है।

तीसरी और शायद सबसे महत्वपूर्ण वजह है कि इससे शो के अप्रासंगिक होने का खतरा कम हो सकता है। Season 17 में Hot Seat पर आने वाले कंटेस्टेंट की औसत उम्र 34 साल थी। दर्शकों की उम्र भी बढ़ रही है। ऐसे Gen Z दर्शकों को जोड़ने के लिए, जो Google के साथ बड़े हुए हैं, आपको वही चीज टेस्ट करनी होगी जो Google नहीं कर सकता- सोचने की क्षमता।

  1. क्या इससे कार्यक्रम ज्यादा engaging होगा?

कम समय में देखें तो यह जोखिम भरा है। लंबे समय के लिए देखें तो यह जरूरी है। 

जोखिम क्या है?

KBC की खूबसूरती उसकी सरलता थी। घर पर बैठा कोई भी दर्शक सवाल का जवाब चिल्लाकर दे सकता था। अगर सवाल ज्यादा Analytical यानी विश्लेषणात्मक पहेली जैसे हो गए तो क्या इंदौर में बैठी आंटी अब भी साथ-साथ खेलेंगी?

अगर Fastest Finger की जगह चार राउंड आ गए तो क्या शुरुआती 10 मिनट का रोमांच कम हो जाएगा? ये सवाल महत्वपूर्ण हैं। लेकिन फायदा भी बड़ा है सही दर्शकों के लिए यह शो को और ज्यादा engaging बना सकता है।

  1. Second-screen engagement:

विश्लेषणात्मक सवाल घर पर चर्चा पैदा करेंगे। अब चर्चा सिर्फ “जवाब क्या है?” तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह भी हो सकती है- “क्या उसे जोखिम लेना चाहिए था?” यही वह चीज है जो IPL को भी दर्शकों के लिए ज्यादा engaging बनाती है।

  1. Brand fit:

“सोचना पड़ेगा” सोनी Liv, Fintech Sponsors और Ed-tech Sponsors के लिए एकदम सही लाइन है। यह KBC को सिर्फ एक गेम शो की तरह नहीं, बल्कि Life-skills Show के रूप में पेश करती है।

  1. Bachchan factor:

समय के साथ अमिताभ बच्चन शो की भावनात्मक भाषा का हिस्सा बन चुके हैं। कंटेस्टेंट सवालों के जवाब देने की तैयारी करके आते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों में वे अपने सपनों और संघर्षों के बारे में बात करने लगते हैं। जब गेम में टेक्स्टबुक के ज्ञान से ज्यादा जीवन के अनुभव को महत्व मिलेगा तो अमिताभ बच्चन की एक संवेदनशील श्रोता के तौर पर भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।

‘सोचना पड़ेगा’ मार्केटर्स को असल में क्या संकेत देता है? KBC वही कर रहा है जो आज हर भारतीय ब्रैंड को करना चाहिए। Memory को पुरस्कृत करना बंद करें। Mindset को पुरस्कृत करना शुरू करें।

20 साल तक हमने जिंगल के जरिए चीजें बेचीं। अब हमें Logic के जरिए बेचना होगा। 20 साल तक हमने डिग्री देखकर लोगों को नौकरी दी। अब हमें Decision-making यानी फैसला लेने की क्षमता देखकर लोगों को चुनना होगा। 20 साल तक हमने Toppers का जश्न मनाया। अब हमें Thinkers का जश्न मनाना होगा।

KBC की नई लाइन सिर्फ किसी क्विज शो के बारे में नहीं है। यह भारत के बारे में है। ऐसे दौर में जब जवाब हर जगह मौजूद हैं, Hot Seat पर या जिंदगी में वही लोग जीतेंगे, जो जवाब लॉक करने से पहले थोड़ा रुककर सोचेंगे। और यही वजह है कि ‘सोचना पड़ेगा’ सिर्फ एक विज्ञापन लाइन नहीं है। यह एक चेतावनी, पोजिशनिंग और सर्वाइवल स्ट्रैटेजी है- सिर्फ दो शब्दों में। बहुत बढ़िया काम, गौरव बनर्जी और सोनी की पूरी टीम।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Disclaimer: इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी तरह से exchange4media.com के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

 

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संसद में सांसदों की संख्या के साथ चुनाव सुधार का सवाल: आलोक मेहता

सबसे बड़ी समस्या यह है कि केवल आरोप लगने से किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने की व्यवस्था नहीं है। मौजूदा कानून में मुख्यतः दोषसिद्धि के बाद अयोग्यता होती है।

Last Modified:
Monday, 24 August, 2026
alokmehta

आलोक मेहता, वरिष्ठ पत्रकार, पद्मश्री, लेखक।

अब इस बात के पूरे आसार दिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार संसद में महिलाओं के 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व और सदस्य संख्या लगभग 816 से अधिक रखने के संवैधानिक प्रावधान वाले विधेयक आने वाले किसी भी सत्र में पारित करवा लेंगे। कांग्रेस और उसके सहयोगियों के विरोध के बावजूद क्षेत्रीय दलों के सांसदों का समर्थन मिलना तय है।

लेकिन क्या इससे अधिकाधिक योग्य, समाज से जुड़ी, ईमानदार महिलाएं और स्वच्छ छवि तथा गंभीर आपराधिक आरोपों से मुक्त सदस्य चुनावों के बल पर संसद में आ सकेंगे? इस तरह का एक सवाल राजनीति में सक्रिय एक सुसंस्कृत परिवार की शिक्षित प्रवक्ता ने पिछले दिनों एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान मुझसे किया। सचमुच तत्काल इसका उत्तर मेरे पास नहीं है। इसलिए मैंने इस बार अपने कॉलम में इस मुद्दे से जुड़ी बातें रखना उचित समझा।

यदि संसद लोकसभा की सीटों का परिसीमन करके संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करती है और महिलाओं के लिए लगभग 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करती है, तो भारतीय लोकतंत्र की चुनावी तस्वीर काफी बदल जाएगी। 816 सीटों के मॉडल में लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसका मतलब है कि नई लोकसभा में कम-से-कम 273 महिलाएं आरक्षित सीटों के माध्यम से पहुंचेंगी। नई व्यवस्था में लोकसभा का बहुमत भी बदल जाएगा। 543 सदस्यीय वर्तमान लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 है, जबकि 816 सदस्य होने पर बहुमत के लिए 409 सांसदों का समर्थन आवश्यक होगा।

परिसीमन का दूसरा बड़ा असर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आरक्षित सीटों पर पड़ेगा। अभी लोकसभा में 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। नई जनसंख्या-आधारित परिसीमन व्यवस्था में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सीटें लगभग 126 से 136 और करीब 70 तक पहुंचने का अनुमान है। अंतिम संख्या परिसीमन आयोग ही तय करेगा।

महिला आरक्षण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आरक्षित सीटों में भी लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। करीब 45 और करीब 23 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। इस प्रकार 273 महिला आरक्षित सीटों में अनुसूचित जाति-जनजाति महिलाओं का भी संवैधानिक प्रतिनिधित्व रहेगा।

परिसीमन का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रभाव राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के पुनर्वितरण पर पड़ेगा। आबादी के आधार पर सीटें बढ़ने से उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे बड़े और अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर प्रस्तावित मॉडल में उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर लगभग 120 और बिहार की 40 से लगभग 60 हो सकती हैं।

महाराष्ट्र लगभग 72, पश्चिम बंगाल 63, तमिलनाडु 59, मध्य प्रदेश लगभग 44 और कर्नाटक लगभग 42 सीटों तक जा सकते हैं। ये अभी संभावित आंकड़े हैं, अंतिम परिसीमन में बदलाव संभव है। वास्तविक संख्या अंतिम रूप से सरकार द्वारा रखे गए प्रस्ताव और परिसीमन आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तय होगी।

दक्षिण भारत की चिंता भी महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है। उनका तर्क है कि यदि केवल वर्तमान आबादी को आधार बनाकर सीटें बांटी गईं तो जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित की, उनका लोकसभा में सापेक्ष राजनीतिक वजन घट सकता है। दूसरी ओर 816 सीटों का प्रस्तावित मॉडल इस नुकसान को कम करने के लिए कुल सीटों को ही काफी बढ़ाने का रास्ता अपनाता है।

इसलिए 816 सीटों का मॉडल केवल महिला आरक्षण का मामला नहीं, बल्कि भारत के संघीय राजनीतिक संतुलन का भी बड़ा प्रश्न है। एक तरफ उत्तर भारत के बड़े राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, दूसरी तरफ दक्षिणी राज्यों को भी मौजूदा सीटों की तुलना में अधिक सीटें मिलेंगी। अंतिम संख्या संसद के कानून और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया से तय होगी।

इसी तरह चुनाव लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन चुनावी राजनीति के सामने दो गंभीर चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं—राजनीति का अपराधीकरण और चुनाव में बढ़ता धनबल। पिछले कई दशकों में निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट, विधि आयोग और विभिन्न सरकारी समितियों ने इन समस्याओं को नियंत्रित करने के लिए अनेक सुझाव दिए हैं। कुछ सुझाव कानून बने, कुछ पर न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसले दिए और कई आज भी संसद तथा सरकार के सामने लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने एक फैसले में कुछ महत्वपूर्ण अनिवार्य कही जा सकने वाली सिफारिशें भी की हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि केवल आरोप लगने से किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने की व्यवस्था नहीं है। मौजूदा कानून में मुख्यतः दोषसिद्धि के बाद अयोग्यता होती है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड को मतदाताओं के सामने अनिवार्य रूप से रखने की दिशा में बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। निर्वाचन आयोग ने भी गंभीर आपराधिक मामलों में आरोप तय हो चुके उम्मीदवारों को चुनाव से बाहर रखने का प्रस्ताव दिया है। लेकिन इस प्रस्ताव को लागू करने के लिए संसद को कानून बनाना होगा।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। इसके बाद किसी सांसद या विधायक को ऐसे अपराध में दोषी ठहराया जाता है जिसमें कानून के अनुसार दो वर्ष या उससे अधिक की सजा होती है, तो दोषसिद्धि के प्रभाव से सदस्यता समाप्त हो सकती है। निर्वाचन आयोग ने भी इसे राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण सुधार माना गया।

लेकिन यहां एक बड़ी सीमा है—दोषसिद्धि होने तक मुकदमा चलता रहता है। यदि मामला वर्षों तक लंबित रहे तो केवल आरोप या आरोपपत्र के आधार पर उम्मीदवार स्वतः अयोग्य नहीं होता। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और प्रावधान किया। न्यायालय ने राजनीतिक दलों को निर्देश दिया कि वे ऐसे उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि सार्वजनिक करें जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।

केवल रिकॉर्ड प्रकाशित करना ही पर्याप्त नहीं माना गया; राजनीतिक दल को यह भी बताना होगा कि उसने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति को टिकट क्यों दिया और किसी साफ-सुथरे उम्मीदवार को क्यों नहीं चुना।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण पर भी चुनाव लड़ने पर स्वतः प्रतिबंध नहीं लगाया। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के निर्देशों को और मजबूत किया। राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन के 48 घंटे के भीतर, अथवा नामांकन की पहली तारीख से कम-से-कम दो सप्ताह पहले, आपराधिक मामलों की जानकारी और उम्मीदवार को चुनने का कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया।

अभी निर्वाचन आयोग का यह प्रस्ताव विचाराधीन है कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ ऐसे गंभीर अपराध में अदालत द्वारा चार्ज फ्रेम किए जा चुके हों, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है, तो उसे चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की व्यवस्था हो।

इसलिए भविष्य का चुनाव सुधार तीन सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए—न्यायिक निष्पक्षता, मतदाता की पूर्ण जानकारी और गंभीर अपराधों के प्रति शून्य राजनीतिक सहनशीलता। धनबल के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। चुनावी चंदे और खर्च की पूर्ण पारदर्शिता, पार्टी और उम्मीदवार दोनों के खर्च की निगरानी, डिजिटल वित्तीय रिकॉर्ड और सीमित रूप में सरकार द्वारा चुनाव प्रचार अभियान की वित्तीय व्यवस्था मिलकर चुनाव को अधिक समान बना सकते हैं।

इस महीने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय में कहा गया है कि चुनावों की आवर्ती प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय उम्मीदवारों, मौजूदा सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की शीघ्र सुनवाई और निपटान के लिए न्यायालयों को नामित कर सकते हैं।

किसी विशेष चुनाव चक्र में उम्मीदवारों के खिलाफ मुकदमों की वापसी के लिए संबंधित उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है, जो केरल राज्य बनाम के. अजित और अश्विनी कुमार उपाध्याय मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप है। संबंधित न्यायालयों को चुनाव संबंधी लंबित मुकदमों को शीघ्रता से उनके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। निर्वाचन आयोग और संबंधित राज्य सरकारों को 18 नवंबर 2026 को या उससे पहले अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

अंततः चुनाव सुधार का उद्देश्य केवल अपराधियों को रोकना या खर्च कम करना नहीं है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत की संसद और विधानसभाएं ऐसे प्रतिनिधियों से बनी हों, जिनकी राजनीतिक शक्ति का आधार जनता का विश्वास हो-अपराध, भय और बेहिसाब पैसा नहीं। निर्वाचन आयोग ने अनेक बार सुधारों का रास्ता दिखाया है और सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक सीमाओं के भीतर महत्वपूर्ण रास्ते खोले हैं। अगला निर्णायक कदम संसद और राजनीतिक दलों को उठाना होगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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खबरों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चुनौती : प्रो.संजय द्विवेदी

सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है।

Last Modified:
Saturday, 22 August, 2026
deepfakesanjaydwivedi

प्रो.संजय द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष।

मीडिया की दुनिया के लिए यह सबसे कठिन समय है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने सब कुछ हिलाकर रख दिया है। अगले पांच वर्षों में न्यूज रुम का चेहरा बदलने के संकल्प के साथ इस नए ज्ञान क्षेत्र ने जितने कम समय में अपनी उपयोगिता बनाई है, वह चकित करने वाली है। जिस दौर में समूचा मीडिया विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट से जूझ रहा है, ऐसे समय में एआई के लिए मीडिया समूहों का उत्साह और उसकी स्वीकार्यता वास्तव में आश्चर्य में डालने वाली है।

सही मायनों में यह वह समय है जब आंखों देखी तथा कानों सुनी बातें भी छलावा और धोखा साबित हो रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने सूचनाओं का ऐसा धुंधला समंदर रच दिया है, जहाँ कुछ क्षणों में फर्जी खबरें सच का लिबास पहनकर तैरने लगती हैं।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि खबर कितनी तेजी से आप तक पहुँच रही है, बल्कि असली चुनौती यह है कि उस पर भरोसा कितना किया जाए। मशीनी एल्गोरिदम शब्दों को सजा सकता है, आंकड़े जोड़ सकता है, लेकिन सच को तलाशने की नैतिक हिम्मत और मानवीय संवेदना केवल एक निष्पक्ष पत्रकार के पास ही होती है।

डीपफेक से मुकाबला -

युद्ध और राजनीतिक भाषणों के फर्जी वीडियो और आडियो वायरल हो जाना अब नई बात नहीं रही। पिछले चुनाव में भी कई दिवंगत नेताओं के वीडियो चले जिसमें वे अपनी पार्टी के वोट की अपीलें कर रहे हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए ऐसे प्रयास चरम पर हैं, जिनकी विश्वसनीयता शून्य है। 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' की एक रिर्पोट में एआई जनित गलत सूचनाओं को दुनिया के बड़े खतरों में बताया गया है।

आज दुनिया और देश के अनेक बड़े मीडिया हाउस आधिकारिक तौर पर एआई का उपयोग डेटा विश्लेषण और अनुवाद के लिए कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि कई हजार पेज के डेटा का आंकलन -विश्लेषण सामान्य मनुष्य के लिए कई महीनों का काम है जिसे एआई के टूल्स मिनटों में संभव कर रहे हैं। बावजूद इसके अनेक मीडिया आउटलेट्स एआई से खबरें या विश्लेषण लिखवाकर हंसी के पात्र बन रहे हैं।

ऐसे में संशोधन, सुधार और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त सामग्री से कचरा तो बढ़ ही रहा है, विश्वनीयता के नए संकट सामने हैं। बड़े भाषा माडल (एलएलएम) कभी पूरी तरह से काल्पनिक आंकड़े, अदालत के फैसला और ऐतिहासिक घटनाएं गढ़ते हुए दिखते हैं। जिसे सामान्य पाठक सच समझ बैठता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे हैलुसिनेशन कह रहे हैं। जिसका सीधा आशय यह है कि जिन चीजों के सटीक जवाब एआई के पास नहीं होते वह उनके मनगढंत उत्तर प्रस्तुत कर देता है। सजग संपादक और संपादकीय दृष्टि के अभाव में यह सामग्री कई तरह से संकट पैदा कर सकती है।

खबरों में सच की तलाश -

सच और झूठ का फासला बहुत कम हो गया है। खबरों का सत्यापन पत्रकारिता की पहली शर्त है। लेकिन होड़ और दौड़ में वह धूमिल हो रही है। सामान्य से लगते कामों में एआई का उपयोग तो किया जा रहा है किया भी जाना चाहिए। किंतु किसी खोजी रिपोर्ट के लिए जमीनी स्तर पर जाकर काम करना, कागजात की जांच करना पत्रकारों की ही जिम्मेदारी है। तकनीक पर अति निर्भरता के समय में हमें उसके गंभीर खतरों का भी भान होना चाहिए। मैदानी पत्रकारिता में मिट्टी की जो खुशबू है वह मैदान में उतरे बिना प्रामणिक और भरोसेमंद नहीं हो सकती।

मानवीय संस्पर्श और संवेदना किसी खबर का वितान बड़ा कर सकती है। जाहिर तौर पर पत्रकारिता की निर्भरता पूरी तरह एआई टूल्स पर संभव नहीं है। पत्रकारिता जहां निष्पक्षता, समाज के हित-सद्भाव, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चिंतन को प्राथमिकता देती है, वहीं एल्गोरिदम का पूर्वाग्रह संभव है। अतः इसे समझने की जरुरत है। एआई माडल उसी डेटा से सीखते हैं जो उपलब्ध है। ऐसे में उपलब्ध डेटा अगर किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो एआई भी उसी प्रकार के परिणाम देगा। कई शोध बताते हैं कि पश्चिमी मानकों पर ट्रेंड एआई माडल अक्सर विकासशील देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गलत संदर्भ प्रस्तुत करते हैं।

आसानी से अर्जित नहीं होता भरोसा -

भरोसा या विश्वास वह शब्द है जिसे प्राप्त करना आसान नहीं है। आप भले एआई का उपयोग करें किंतु जैसे ही आप यह लिखते हैं कि –“खबर एआई द्वारा बनी है और इसे मानव संपादक के द्वारा देख लिया गया है।” पाठक का भरोसा एआई जनित खबर पर तुरंत कम हो जाता है। पाठक वास्तविक पत्रकारों और लेखकों द्वारा लिखी गई सामग्री को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं। कोई भी अखबार या मीडिया हाउस सालों-साल में यह प्रतिष्ठा अर्जित करता है।

उसे एआई के नए माध्यम तुरंत समाप्त कर सकते हैं। दूसरी ओर कापीराइट और बौद्धिक संपदा से जुड़े संकट भी सामने खड़े हैं। कई प्रमुख मीडिया संगठन इस बात पर आपत्ति कर रहे हैं तो कई ने बिना अनुमति और बिना भुगतान उनकी सामग्री के उपयोग के लिए एआई कंपनियों पर मुकदमे भी किए थे। ऐसे में तमाम ऐसे विवाद अभी भी एआई के साथ जुड़े हुए हैं। बताया जाता है कि इंटरनेट पर हजारों की संख्या में ऐसी वेबसाइट्स तैर रही हैं जो केवल विज्ञापन से पैसे कमाने के लिए झूठ का व्यापार कर रही हैं।

वे हर पल एआई से झूठी खबरें गढ़ते हुए पोस्ट करती रहती हैं। मीडिया वाचडाग न्यूज गार्ड ने ऐसे तमाम अविश्वसनीय वेबसाइटों की पहचान की है। ऐसे में सच और झूठ के बीच मीडिया के सत्यान्वेषण का धर्म सहम कर रह जाता है। हम सब मानते हैं संपादकीय विवेक का कभी कोई विकल्प नहीं हो सकता। इस दौर में भी यह एक सच्चाई है। नैतिक विवेक और समाज की गहरी समझ के बिना किया गया कोई भी संवाद या संचार संकट ही खड़ा करेगा।

मुख्यधारा के मीडिया की ओर लौटना होगा -

सारी तकनीकी क्रांति के बाद भी मुख्यधारा के मीडिया का वजूद बचा रहेगा क्योंकि एआई जनित भ्रमों, फर्जी खबरों की बाढ़ के बीच हमें सत्यापित जानकारी की ओर लौटना ही है। ऐसे में ‘प्रिंट इज डेड’ जैसी अवधारणाओं के बीच भी मुख्यधारा का मीडिया अपनी विशेषताओं के कारण, संपादकीय गुणवत्ता के कारण बना और बचा रहेगा। सत्य आसानी से नहीं मिलता, इसे समाज भी स्वीकारेगा।

इसके साथ ही प्रामणिक और भरोसेमंद मंचों की ओर लौटना ही होगा। क्योंकि यहां प्रामणिक मंच केवल खबरों का व्यापार नहीं कर रहे होगें बल्कि वे अपनी खबरों के सच होने के गारंटी भी देगें। जाहिर है पारंपरिक मीडिया के लिए वह दिन बहुत खास होगा। डीपफेक और एल्गोरिदम के समय में अब चुनौती ही असली और सही खबर पाना है। क्या वो आपके पास है?

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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न्याय पालिका पर आंसू बहाने से पहले आईना देखने की जरुरत : आलोक मेहता

रामास्वामी की संसद में रक्षा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सिब्बल को कांग्रेस का टिकट दिया।1996 का लोकसभा चुनाव सिब्बल के राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा चुनाव था।

Last Modified:
Monday, 17 August, 2026
alokmehta

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने पिछले दिनों प्रेम भाटिया मेमोरियल लेक्चर में "लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका दोनों हमें क्यों निराश कर चुके हैं" जैसे विषय पर कई गंभीर सवाल उठाए। कपिल सिब्बल कांग्रेस पार्टी का फायदा उठाकर सांसद और कानून, मानव संसाधन (शिक्षा), संचार, आईटी के साथ 'अर्थ साइंस' जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के केंद्रीय मंत्री रहे हैं। 'जमीनी साइंस' गड़बड़ होने से दिल्ली में पहले कभी सुषमा स्वराज और फिर डॉक्टर हर्षवर्धन से चुनाव हार गए। लेकिन कानूनवेत्ता होने से कानून और राजनीति के दांव-पेंच के जरिए कांग्रेस ही नहीं, लालू यादव, झारखंड मुक्ति मोर्चा, समाजवादी पार्टी आदि के समर्थन से राज्यसभा के सदस्य बने हुए हैं।

वकील होने के कारण भ्रष्टाचार या और कोई गंभीर अपराध होने पर नरसिंह राव से लेकर लालू यादव सहित नेताओं के लिए अपने नाम और काम से अदालतों को प्रभावित करते रहे हैं। मीडिया के लिए भी उन्होंने एक न्यूज चैनल शुरू किया या करवाया, लेकिन पता नहीं किस दबाव में कुछ ही महीनों में सबको निकाल बंद कर दिया। इस दृष्टि से उन्हें राजनीतिक ताकत, मीडिया और न्यायपालिका पर आधिकारिक बोलने का हक है।

सिब्बल साहब ने इस भाषण में कहा कि 'प्रेस का मुख्य काम सत्ता से कड़े सवाल पूछना और उसे जवाबदेह बनाना है। लेकिन आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी इस जिम्मेदारी से पीछे हट चुका है। मीडिया घरानों के व्यावसायिक हित और सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता ने उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। जब वित्तीय लाभ मुख्य उद्देश्य बन जाता है, तो निष्पक्ष पत्रकारिता की बलि चढ़ जाती है।

इसी तरह न्यायपालिका आज इस संस्था पर भी जनता का भरोसा कम हो रहा है।' उन्होंने इन दोनों संस्थाओं के पतन के पीछे आपस में जुड़े कारकों को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि 'पद, प्रतिष्ठा या सुरक्षा के प्रलोभन में आकर लोग अपने पेशेवर सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं।' मेरे जैसे पत्रकार इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के सत्ता काल से सत्ता, न्याय व्यवस्था, मीडिया और फिर सिब्बल साहब के उतार-चढ़ाव को लगभग तीन देखते रहे हैं। इसलिए उनकी भाषण कला की तारीफ के साथ स्वतंत्रता के अधिकार का उपयोग करते हुए यह सवाल भी उठाना चाहेंगे कि पहले भी सत्ता से मीडिया और न्यायपालिका पर दबाव के ऐतिहासिक तथ्यों की फाइलों को कैसे दबा या भुला सकते हैं?

इन दिनों जस्टिस यशवंत वर्मा के बंगले में लाखों नोटों की बोरियों के जलने के गंभीर आरोपों के सही ठहराए जाने के बाद भी उनको हटाने का मुद्दा चर्चा में है। इसलिए ध्यान आता है कि भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही के इतिहास में जस्टिस वी. रामास्वामी का मामला एक ऐसा अध्याय है, जिसमें न्यायाधीश पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप साबित होने के बावजूद संसद उन्हें पद से नहीं हटा सकी।

रामास्वामी पर सरकारी धन और सरकारी सुविधाओं के कथित दुरुपयोग से जुड़े 14 आरोपों की जांच हुई थी। तीन सदस्यीय जांच समिति ने अधिकांश गंभीर आरोपों को सिद्ध माना। इस भ्रष्ट जज के बचाव में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की लगभग छह घंटे की कानूनी दलील, कांग्रेस सांसदों का मतदान से अलग रहना और तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की राजनीतिक भूमिका आज भी संसद, न्यायपालिका और मीडिया के पुराने पन्नों में दर्ज है। संसद की प्रेस गैलरी में बैठकर 1993 में मैंने भी जज को बचाने के लिए उनकी दलीलें सुनी थीं। कपिल सिब्बल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत तभी हुई थी।

रामास्वामी की संसद में रक्षा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने सिब्बल को कांग्रेस का टिकट दिया। 1996 का लोकसभा चुनाव सिब्बल के राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा चुनाव था। उन्हें कांग्रेस ने दक्षिण दिल्ली से उम्मीदवार बनाया। उनके सामने भाजपा की तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज थीं। सिब्बल चुनाव हार गए। लेकिन इस हार का अर्थ यह नहीं था कि उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो गया।

इसके उलट, कांग्रेस ने उन्हें राजनीतिक व्यवस्था में बनाए रखा। दो वर्ष बाद सिब्बल को संसद में प्रवेश का दूसरा रास्ता मिला। 1997 में सिब्बल ने तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का चारा घोटाले में बचाव किया और अगले वर्ष लालू प्रसाद ने बिहार से राज्यसभा के लिए सिब्बल की उम्मीदवारी का समर्थन किया। उसी रिपोर्ट के अनुसार लालू ने कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को भी सिब्बल का समर्थन करने के लिए राजी किया।

8 जुलाई 1998 को वे बिहार से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य बन गए। राज्यसभा पहुंचने के बाद भी सिब्बल लालू का अदालत में और संसद में बचाव करते रहे। उन्होंने राज्यसभा में भी लालू के खिलाफ आरोपों को निराधार बताया। देर से सही, मीडिया की रिपोर्ट्स और प्रमाणों से अदालतों में भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने से लालू यादव को न केवल जेल जाना पड़ा, बल्कि सांसदी भी चली गई।

1993 के बाद सिब्बल केवल रामास्वामी मामले में चर्चित वकील नहीं रहे। बाद में वे पी.वी. नरसिंह राव के कानूनी बचाव दल में भी शामिल हुए। झारखंड मुक्ति मोर्चा सांसद रिश्वत कांड में आरोप था कि 1993 में नरसिंह राव सरकार को बचाने के लिए कुछ सांसदों को कथित रूप से रिश्वत दी गई थी। मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ तक गया। उपलब्ध कानूनी स्रोत में पी.पी. राव, डी.डी. ठाकुर और कपिल सिब्बल को अपीलकर्ताओं के वकीलों में दर्ज किया गया है। वैसे इस मामले में उनके प्रमुख वकील के रूप में आर.के. आनंद का नाम है।

आर.के. आनंद बाद में 2000 में झामुमो के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे। यही नहीं, कपिल सिब्बल ने नरसिंह राव और चंद्रास्वामी दोनों का बचाव किया था। यह लखूभाई पाठक पर धोखाधड़ी का प्रकरण था। आरोप था कि 1983 में तत्कालीन विदेश मंत्री पी.वी. नरसिंह राव, चंद्रास्वामी और उनके सहयोगी "मामाजी" ने ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के व्यवसायी लखूभाई पाठक से कथित रूप से 100,000 डॉलर की धोखाधड़ी की।

सीबीआई का आरोप था कि भारत में न्यूजप्रिंट पेपर पल्प का ठेका दिलाने का वादा किया गया था। जब अदालत ने राव को बरी करने का फैसला सुनाया, तब राव ने सिब्बल को गले लगाया था। राजनीतिक गलियारों में कहा यही जाता रहा कि इस तरह के मामलों में सिब्बल साहब के रिश्तों का असर न्यायपालिका पर रहा।

सिब्बल साहब ने अपने भाषण में मीडिया मालिकों और पत्रकारों पर इस समय भारी दबाव और विदेशी पूर्वाग्रही रिपोर्ट्स का हवाला दिया है। यहाँ भी वे काले पन्ने भूल गए या भुलाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं भाजपा या उनके समर्थकों की तरह केवल आपातकाल की बात भी नहीं कर रहा हूँ। स्वतंत्र भारत में प्रेस की आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा सरकार द्वारा 1960 में जारी आदेश से अखबार के कीमत और पृष्ठों की संख्या के बीच संबंध नियंत्रित किया जाना था।

1962 में एक आदेश के तहत सरकार कागज आयात, कोटा, पृष्ठ संख्या और उपयोग को नियंत्रित करती थी। फिर 1972–73 में तो कठोर न्यूजप्रिंट नीति में कठोर प्रतिबंध लगाए गए, तो बड़े प्रकाशक अदालत गए। इंडियन एक्सप्रेस ही नहीं, प्रादेशिक अखबारों पर कांग्रेस सरकारों, नेताओं का दबाव, विज्ञापन रोकने, आर्थिक आरोपों के मामले दर्ज करने के रिकॉर्ड हैं।

बिहार में जगन्नाथ मिश्रा द्वारा लाया गया प्रेस कानून, राजीव गांधी सरकार में लाया गया मानहानि कानून प्रेस पर खतरों की तरह माने गए। लालू यादव ने चारा कांड छापने पर 1990 में पटना में प्रेस पर सीधा हमला करवा दिया, तब मैं उसी अखबार का संपादक था और पहली खबर भी लिखी थी। खैर, हमले के बाद भी हमने लिखना बंद नहीं किया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी सीएम मुलायम सिंह यादव के राज में अखबारों पर 'हल्ला बोल' के तहत हमले के तथ्य कैसे न भुलाए जा सकते हैं? अब ऐसे हमले तो कहीं नहीं हो रहे हैं।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )

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