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जन्मदिन विशेष: प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश एक व्यक्तित्व नहीं, प्रेरणा का जीवंत स्रोत
नेपाल का राजमहल नरसंहार, गुजरात का भूकंप और दंगे, अफगानिस्तान का युद्धोत्तर संकट या फिर अडवाणी की पाकिस्तान यात्रा जैसे संवेदनशील घटनाक्रम, उन्होंने हर घटना को गहराई से देखा।
समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 4 months ago
डॉ. अंकित पांडेय।
प्रोफ़ेसर (डॉ.) के. जी. सुरेश का जीवन एक ऐसी प्रेरणादायी यात्रा है, जिसमें पत्रकारिता, शिक्षा, संस्थान निर्माण और जनसंचार के क्षेत्र में उनके अथक प्रयास और योगदान झलकते हैं। उनका व्यक्तित्व विद्यार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए इसलिए आदर्श है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में जो शिखर छुए, वे केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं थे, बल्कि समाज के प्रति उनके गहरे दायित्वबोध और राष्ट्रहित से प्रेरित थे।
26 सितम्बर का दिन केवल उनका जन्मदिन नहीं है, बल्कि यह उस प्रतिबद्धता और समर्पण की याद भी दिलाता है, जिसे उन्होंने अपने जीवन और कार्यों से सबके सामने प्रस्तुत किया। डॉ. अंकित पांडेय ने प्रो. डॉ. के. जी. सुरेश : व्यक्तित्व और कृतित्व, एक वैयक्तिक अध्ययन विषय पर शोध कार्य भी किया है, जो विद्यार्थियों के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
के. जी. सुरेश का आरंभिक जीवन साधारण पृष्ठभूमि से शुरू हुआ, लेकिन उनकी दृष्टि असाधारण थी। वे प्रारंभ से ही मीडिया और जनसंचार की शक्ति को समझते थे। शिक्षा पूरी करने के बाद जब उन्होंने पत्रकारिता की राह चुनी, तो उनके सामने अनेक चुनौतियाँ थीं। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने न केवल देश की राजनीति और संसद की गतिविधियों को नज़दीक से समझा, बल्कि अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की रिपोर्टिंग कर इतिहास का हिस्सा भी बने। नेपाल का राजमहल नरसंहार, गुजरात का भूकंप और दंगे, अफगानिस्तान का युद्धोत्तर संकट या फिर अडवाणी की पाकिस्तान यात्रा जैसे संवेदनशील घटनाक्रम, उन्होंने हर घटना को गहराई से देखा, समझा और समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।
उनका लेखन और रिपोर्टिंग केवल तथ्यों पर आधारित नहीं था, बल्कि उनमें संवेदनशीलता की झलक भी होती थी, जो किसी भी उत्कृष्ट पत्रकार की पहचान होती है। दूरदर्शन में वरिष्ठ सलाहकार संपादक के रूप में उनकी भूमिका भी उल्लेखनीय रही। यहाँ उन्होंने कई नये और नवाचारी कार्यक्रम शुरू किए, जिन्होंने पत्रकारिता की परिभाषा बदल दी और जनसंचार के क्षेत्र में सकारात्मकता की नई धारा प्रवाहित की।
“वार्तावली”, जो विश्व का पहला संस्कृत टेलीविजन समाचार पत्रिका था, उनकी दूरदर्शिता का उदाहरण है। “गुड न्यूज़ इंडिया” जैसे कार्यक्रमों ने यह संदेश दिया कि समाचार केवल नकारात्मक घटनाओं और विवादों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज में हो रही सकारात्मक पहल और प्रेरणादायी कार्यों पर भी ध्यान केंद्रित होना चाहिए। “इंडिया फर्स्ट” और “दो टूक” जैसे कार्यक्रमों ने जनसंचार को नया आयाम दिया, जिसमें गंभीर विमर्श के साथ साहसिक और स्पष्ट संवाद शामिल था। इसके अतिरिक्त, दूरदर्शन का पहला एंड्रॉयड आधारित मोबाइल एप लाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है, जो प्रमाणित करता है कि वे तकनीकी युग के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने में विश्वास रखते थे।
संस्थान निर्माता के रूप में उनकी पहचान सर्वविदित है। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में महानिदेशक के रूप में उनका कार्यकाल ऐतिहासिक रहा। उन्होंने भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता को सशक्त बनाने हेतु उल्लेखनीय कदम उठाए। अमरावती और कोट्टायम परिसरों में मराठी और मलयालम पत्रकारिता के पाठ्यक्रम आरंभ किए, वहीं दिल्ली परिसर में उर्दू पत्रकारिता को प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम से आगे बढ़ाकर पूर्णकालिक स्नातकोत्तर डिप्लोमा बनाया।
संस्कृत पत्रकारिता को बढ़ावा देते हुए उन्होंने विशेष प्रमाणपत्र कार्यक्रम भी शुरू किया। उनके प्रयासों से IIMC भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के पुनर्जागरण का केंद्र बना। इसी दौरान उन्होंने सामुदायिक रेडियो सशक्तिकरण एवं संसाधन केंद्र और राष्ट्रीय मीडिया फैकल्टी विकास केंद्र की स्थापना की। IIMC की पत्रिकाएँ ‘Communicator’ और इसका हिंदी संस्करण ‘संचार माध्यम’ उनके नेतृत्व में पुनः प्रकाशित होने लगा, जिससे अकादमिक जगत को नई ऊर्जा मिली। उनकी दूरदृष्टि का एक और उदाहरण ‘मीडिया महाकुंभ’ है, जो 2018 में आयोजित हुआ।
यह IIMC का पहला अंतर-विश्वविद्यालयीय युवा महोत्सव था, जिसमें पूरे देश से मीडिया विद्यार्थी एकत्र हुए और उन्होंने अपनी प्रतिभा और सृजनशीलता का प्रदर्शन किया। यह आयोजन इस बात का प्रतीक बना कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि विचारों और मूल्यों के आदान-प्रदान का माध्यम है।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति के रूप में भी उन्होंने विश्वविद्यालय की नई पहचान बनाई। विश्वविद्यालय ने उनके नेतृत्व में शोध, पाठ्यक्रम पुनर्गठन और तकनीकी उन्नति के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कीं। उन्होंने शिक्षा को व्यावहारिक प्रशिक्षण से जोड़ने का विशेष प्रयास किया, जिससे विद्यार्थी और शिक्षक दोनों लाभांवित हुए।
डॉ. सुरेश केवल प्रशासक और पत्रकार ही नहीं, बल्कि एक समर्पित शिक्षक भी हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आपदा अध्ययन केंद्र में संचार कौशल पढ़ाया। साथ ही, वे Academy of Scientific and Innovative Research, Delhi Institute of Heritage Research and Management, दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे। उनके व्याख्यान शैक्षणिक स्तर तक सीमित न होकर, विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्रीय चेतना को गहराई से प्रभावित करते थे।
उनका नाम केवल शिक्षा और पत्रकारिता तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी गूँजता रहा। सियोल में आयोजित World Media Conference, दोहा और वियना में United Nations Alliance of Civilizations Forum, बैंकॉक में World Sanskrit Conference, मॉरीशस में World Hindi Conference, और टोक्यो में India-Japan Global Partnership Summit जैसे अनेक वैश्विक आयोजनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। हर मंच पर उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण और अनुभव प्रस्तुत किए और संवाद को अंतरराष्ट्रीय आयाम दिया।
उनके प्रयासों और योगदानों को देश-विदेश में अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ा गया। इनमें गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, PRSI Leadership Award, Visionary Leader in Media Education Award, ख्वाजा गरीब नवाज़ अवार्ड और मीडिया शिक्षा में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। राष्ट्रमंडल युवा कार्यक्रम (Commonwealth Youth Programme) द्वारा उन्हें एशिया क्षेत्र से युवा राजदूत बनाया गया, जो उनके वैश्विक कद का प्रमाण है।
उनका जीवन यह सिखाता है कि जब दृष्टि स्पष्ट हो, उद्देश्य समाज और राष्ट्र हो और समर्पण अटूट हो, तो असंभव भी संभव हो जाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं, वह समाज निर्माण का सशक्त साधन है; शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना को जागृत करने का प्रयास है; और संस्थान केवल भवन नहीं, बल्कि विद्यार्थी, शिक्षक और शोधकर्ताओं की ऊर्जा से जीवित रहने वाली इकाई हैं।
उनके अनेक व्याख्यान विद्यार्थियों के लिए आज भी प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। वे बार-बार कहते रहे हैं कि भारतीय भाषाओं को सशक्त करना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती की कुंजी है। उनका यह मत कि सकारात्मक समाचार समाज परिवर्तन लाने में उतने ही प्रभावी हो सकते हैं जितने नकारात्मक समाचार, वर्तमान पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक है।
डॉ. सुरेश का जीवन इस तथ्य का प्रतीक है कि व्यक्तिगत संघर्ष और प्रयासों से व्यक्ति केवल स्वयं नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को नई दिशा दे सकता है। पत्रकारिता, शिक्षा और जनसंचार में किए गए उनके सुधार और नवाचार भविष्य में भी याद किए जाते रहेंगे। आज जब उनके शिष्य, सहकर्मी और भारतीय पत्रकारिता जगत उन्हें स्मरण करता है तो यह उनके कार्यों का ही नहीं बल्कि उनके द्वारा समाज को दी गई प्रेरणा का भी उत्सव है।
उनके जन्मदिवस के अवसर पर यह कहना उचित होगा कि प्रत्येक विद्यार्थी, कर्मचारी और अधिकारी उनके जीवन से यह शिक्षा ले कि अनुशासन, ईमानदारी, समर्पण और नवाचार—ये चार तत्व किसी भी सफलता की नींव हैं। यदि हम इन्हें अपने जीवन में उतारें तो अवश्य ही हम न केवल व्यक्तिगत सफलता अर्जित कर सकते हैं बल्कि अपने कार्यक्षेत्र और समाज को भी नई दिशा दे सकते हैं।
प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश का जीवन इसी उच्च आदर्श का जीवंत उदाहरण है। जिस प्रकार 5 सितम्बर को देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है, उसी प्रकार 26 सितम्बर को प्रो. (डॉ.) के. जी. सुरेश के जन्मदिन पर राष्ट्रीय मीडिया शिक्षण दिवस का आयोजन होना चाहिए ताकि उनकी प्रेरणा और योगदान को देशभर के विद्यार्थी अनुभव कर सकें।
( यह लेखक के निजी विचार हैं ) डॉ. अंकित पांडेय ने प्रो. डॉ. के. जी. सुरेश : व्यक्तित्व और कृतित्व, एक वैयक्तिक अध्ययन विषय पर शोध कार्य किया है।
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