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पाकिस्तानी फौज की फ्रस्ट्रेशन अब चरम पर है : नीरज बधवार

मतलब एक ऐसी वारदात को अंजाम दे दिया गया जिसे न तो कोई आज़ादी की लड़ाई बता सकता है, जिसे न अपनी बहादुरी बताकर उसका क्रेडिट लिया जा सकता है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 9 months ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

इतना तो साफ है कि पहलगाम का हमला बिना पाकिस्तानी फौज की ट्रेनिंग के संभव नहीं था। मगर समझ ये नहीं आ रहा कि 27 टूरिस्टों की हत्या करवाकर वो हासिल क्या करना चाहती है। क्योंकि वो तो हर वक्त खुद को कश्मीरियों का हमदर्द बताती है लेकिन इस हमले से तो सबसे ज़्यादा बदनामी कश्मीरियों की हुई है। रातों-रात उनके काम-धंधे बंद हो गए हैं।

जिस तरह धार्मिक पहचान कर हिंदुओं की हत्या की गई, इससे उसने मुसलमानों के लिए भी मुश्किलें पैदा की हैं। अगर ये हमला सोची-समझी साजिश भी था तो उसे अच्छे से पता होगा ही कि इस पर भारत का रिएक्शन क्या होगा। उस रिएक्शन में भारत की तरफ से सैन्य कार्रवाई तक होना शामिल है।

मगर वो पाकिस्तान, जिसकी हालत आज इतनी खराब है कि वो एक-एक बिलियन डॉलर की मदद के लिए दर-दर भटक रहा है, अगर युद्ध हुआ तो वो उसका बोझ कैसे उठा पाएगा? पाकिस्तान पहले ही अफगानिस्तान बॉर्डर पर हर दिन तालिबान से उलझ रहा है। बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी ने भी बुरा हाल कर रखा है। ट्रेन हाईजैकिंग कांड ने पूरे मुल्क में उसकी किरकिरी करवा दी।

ऐसे में उसको अच्छे से पता होगा कि अगर भारत ने हमला कर दिया तो पाकिस्तान अपने पूर्वी और पश्चिमी दोनों बॉर्डर पर घिर जाएगा। ऊपर से अफगानिस्तान से अमेरिका के चले जाने के बाद अमेरिका को भी उसकी ज़रूरत नहीं रही, जो उसे ब्लैकमेल करके भारत पर दबाव डलवा सके।

मतलब एक ऐसा हमला जिसके बाद उसने कश्मीरियों की नज़र में भी बुरा बनना था, मुसलमानों को भी बुरा बनाना था, जिसके बाद उसे भारत की तरफ से भी हमले का खतरा था और उसे अच्छे से पता था कि भारत के साथ बलूच लिबरेशन आर्मी और तहरीक-ए-तालिबान भी उस पर टूट पड़े तो वो टूट भी सकता है। ऊपर से देश इमरान की गिरफ्तार के बाद से देश में पोलिटिकल अनरेस्ट तो है ही। इस सबके बावजूद उसने सिर्फ कश्मीर के मुद्दे को हाईलाइट करने के लिए इतनी सारी मुसीबतें मोल क्यों ले लीं?

और इसका सिवाय इस बात के कोई और जवाब नहीं हो सकता कि फिलहाल पाकिस्तानी फौज की पकड़ वहां की सियासत से, वहां की आवाम से ढीली पड़ रही थी। देश की माली हालत ठीक नहीं है। बलूचियों ने उनका जीना मुहाल कर रखा है। अमेरिका के अफगानिस्तान से जाने के बाद पाक फौज को बड़ी उम्मीद थी कि वो तालिबानियों को अपना पालतू बना लेंगे, मगर उलटा तहरीक तालिबान ने ही उसका सबसे ज़्यादा जीना हराम कर रखा है।

ऊपर से पिछले 3 सालों में अज्ञात हत्यारे ने 20 से ज़्यादा हाई-प्रोफाइल आतंकियों को टारगेट किया है। इस सबसे पाकिस्तानी फौज की काफी लानत-मलानत हो रही थी। दूसरी तरह वो कश्मीर का झुनझुना बजाकर भारत का डर दिखाकर सालों से अपनी आवाम को काबू में रख रही थी। लेकिन 370 हटने के बाद कश्मीर भी पूरी तरह से नॉर्मल ज़िंदगी की तरफ लौट रहा था। पिछले पांच साल में वहां आने वाले टूरिस्ट की संख्या 30 लाख से बढ़कर दो करोड़ पैंतीस लाख हो गई थी। ऐसे में पाकिस्तानी फौज को लगा कि सब कुछ उसके हाथ से निकल रहा है। अपने ही मुल्क में वो पहली बात इतनी irrelavant हो रही थी। इससे पहले इमरान खान तो पाक फौज की पोल खोल ही चुके थे।

ऐसे में जनरल आसिफ मुनीर को लगा कि खोया हुआ रूतबा पाने का एक ही तरीका है — फिर से कश्मीर में कुछ बड़ा कांड कर दिया जाए। अब चूंकि कश्मीर में उनके पास लोकल सपोर्ट वैसा नहीं रह गया था। सेना की गाड़ी पर हमला करवाने से वैसी हेडलाइन बननी नहीं थी, तो फ्रस्ट्रेशन में कुछ न समझ आने पर उन्होंने हिंदू टूरिस्टों की ही हत्या करवा दी।

मतलब एक ऐसी वारदात को अंजाम दे दिया गया जिसे न तो कोई आज़ादी की लड़ाई बता सकता है, जिसे न अपनी बहादुरी बताकर उसका क्रेडिट लिया जा सकता है। उसने ये कांड सिर्फ इसलिए कर दिया क्योंकि सब कुछ उसके हाथ से निकल रहा था। वो बुरी तरह हताश हो चुकी थी और आखिरकार उसने सबका ध्यान खींचने के लिए आम टूरिस्टों को ही मरवा दिया बिना ये सोचे कि इसका अंजाम क्या होगा। क्योंकि जब बात सर्वाइवल की आती है तो आदमी पहले वो काम करता है जिससे पहले वो खुद को बचा सके।

इन सारी बातों का प्वाइंट ये है कि पाकिस्तानी फौज की फ्रस्ट्रेशन का लेवल, उसकी हताशा का लेवल अपने अंतिम बिंदु तक पहुंच चुका है। जहां से वो जैसे-तैसे खुद को relevant बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो गई।

वरना आप सोचकर देखिए — एक बर्बाद मुल्क जिसके लिए सर्वाइव करना तक मुश्किल हो रखा है, वो ऐसा कांड क्यों करेगा जिसके बाद उसका वजूद ही खतरे में पड़ जाए? लेकिन बावजूद इसके उन्होंने किया क्योंकि जैसा कि खलील जिब्रान ने कहा था कि Hatred is the gnawing pain that eats the container that holds it, नफरत एक ऐसी निरंतर पीड़ा है जो उस प्याले को ही खा जाती है जिसमें वो भरी होती है। और पाकिस्तानी फौज से बड़ा इसका कोई उदाहरण ही नहीं।

भारत और हिंदुओं से नफरत में इन्होंने हम पर चार युद्ध थोपे। और हर बार ये युद्ध उन्हें ही खा गए। एक युद्ध ने तो उसके टुकड़े ही कर दिए। 65 की हार के बाद अयूब खान ने कहा था कि हम चंद कश्मीरियों की खातिर अपने सैकड़ों फौजी नहीं मरवा सकते। मगर 71 में जनरल याह्या खान ने फिर वही गलती की। 71 की हार के बाद जब उन्हें समझ आ गया कि भारत को सीधे युद्ध में नहीं हरा सकते तो जिया उल हक ने कसम खाई कि We will bleed India with thousand cuts, मतलब भारत को हज़ार ज़ख्म देकर उसे ज़ख्मी करेंगे। यानी प्रॉक्सी वॉर के ज़रिए आतंकी हमले करवाकर भारत में दहशत फैलाएंगे। 90 और 2000 के दशक में देश में हुए हमले पाकिस्तान की हज़ार ज़ख्म देने वाली इसी रणनीति का हिस्सा थे।

फिर मुशर्रफ ने भी भारत को बर्बाद करने की कसमें खाईं। भारत का तो कुछ नहीं बिगड़ा। उन्हें ही देश छोड़कर भागना पड़ा और बाद में गुमनामी में उनकी मौत हो गई। सालों साल की इस नफरत हासिल क्या हुआ? पाकिस्तान कमज़ोर से कमज़ोर होता गया। और आज एक मुल्क के तौर पर वो मज़ाक बनकर रह गया है।
अब जनरल मुनीर फिर से टू नेशन की थ्योरी का ढोल पीटकर अपनी हताश कौम में जोश भरने का काम कर रहे हैं।

निहत्थे लोगों को गोली मारकर उनकी छाती पर इस्लाम का झंडा बुलंद करना चाह रहे हैं। हिंदुओं के खून से अपनी आवाम की प्यास बुझाने की कोशिश कर रहे हैं। मगर ये तमाशा अब इतनी बार दिखाया जा चुका है कि वहां की जनता के लिए भी इसमें कोई सरप्राइज़ एलिमेंट नहीं बचा। और इसी सरप्राइज़ एलिमेंट की तरह अगर ये मुल्क भी न बचे तो हैरानी नहीं होगी।

शहीद फौजी ही नहीं होता। आतंकी की गोली से मारा गया शख्स भी देश के लिए शहीद ही होता है। अगर 28 लोगों की शहादत इस समस्या को किसी अंजाम तक ले जा सकी, तो भी ये देश उन 28 लोगों का कर्ज़दार रहेगा। प्याला आखिर कब तक अपने ही ज़हर से बचा रहेगा? एक दिन वो भी उस ज़हर की भेंट चढ़ ही जाएगा।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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