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पहलगाम हादसा व सम्पन्न वर्ग की निर्लज्जता: नीरज बधवार

तारेक साहब की बात में मैं बस ये एड करना चाहूंगा कि भारत का मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग गरीब ही नहीं, ऐसे हर वर्ग या घटना के प्रति उदासीन है जिससे उसका कोई लेना-देना नहीं।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 9 months ago

नीरज बधवार, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

तारेक फतेह साहब ने बहुत साल पहले कहा था, मुझे भारत से जुड़ी बहुत सारी चीज़ें बहुत पसंद हैं। बस एक चीज़ मुझे दुख देती है। वो ये कि भारत का मध्यम वर्ग, भारत का संपन्न वर्ग वहाँ के गरीब लोगों के प्रति बहुत उदासीन है। जैसे उसे उनके होने या न होने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वो अपनी ज़िंदगी में मगन है।

तारेक साहब की बात में मैं बस ये एड करना चाहूंगा कि भारत का मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग गरीब ही नहीं, ऐसे हर वर्ग या घटना के प्रति उदासीन है जिससे उसका कोई लेना-देना नहीं।

आज पहलगाम हादसे के फ़ौरन बाद जिस तरह कश्मीर में सब घूमते पर्यटकों की तस्वीरें सामने आ रही हैं, उससे तारेक साहब की बात एक बार फिर सही साबित हो गई। आप एक सेकेंड के लिए कल्पना करके देखिए, अगर Pakistan, Bangladesh या दुनिया के किसी भी और देश में उस देश की majority के लोगों को उसी के एक राज्य में उनके धर्म की वजह से क़त्ल कर दिया जाता, तो उस देश में उसका क्या reaction होता?

मगर इस देश के संस्कार ऐसे हैं, हमारी फ़ितरत ऐसी है कि धर्म के आधार पर हुई इतनी बड़ी घटना के बावजूद पूरे देश में इस पर कोई बड़ा reaction नहीं हुआ। Reaction इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हम अंदर से किसी के लिए नफ़रत से नहीं भरे हुए हैं। नफ़रत से भरे होते, किसी के लिए अंदर ज़हर लेकर बैठे होते, तो पूरा देश बदले की आग में जल उठता।

लोगों में ग़ुस्सा है तो हमले में मारे गए बेगुनाह लोगों को लेकर है लेकिन ये ग़ुस्सा किसी बदले की मुहिम में translate हो जाए, ऐसा नहीं है। एक धर्म के तौर पर हमारे अंदर कोई श्रेष्ठता बोध नहीं है, इसलिए हम मोटे तौर पर इतने सयंत हैं। इसलिए उतने नफरती नहीं है।

लेकिन संयत होने और लुंजपुंज होने में फ़र्क होता है। और ये कहने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं है कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा अभी भी संयंत नहीं, लुंजपुंज है।

वो अपने खाने-पीने में, अपनी मस्ती में इतना मस्त है कि उसे दूसरे के दुखों की कोई परवाह नहीं। उसके पास इतनी फ़ुर्सत ही नहीं है कि वो एक पल के लिए अपने समाज, अपने राष्ट्र, अपनी पहचान पर विचार कर सके।

ये वर्ग इतना संवेदनहीन है कि बजाय पहलगाम में हुई घटना पर विचार करने, वहाँ जो हुआ क्यों हुआ, कैसे हुआ, किसने किया, किस मकसद से किया — ये सोचने के, वो इस आपदा को अवसर की तरह देख रहा है। वहाँ जाकर दावे कर रहा है कि यहाँ तो सब normal है, यहाँ तो कुछ ग़लत नहीं हुआ, यहाँ के लोग तो बहुत welcoming हैं। देखो, ये तो मारे गए लोगों के इंसाफ़ के लिए सड़कों पर भी आए, उन्हें भरोसा भी दिला रहे हैं कि आप लोग आ जाओ, कुछ नहीं होगा।

ऐसा बोलने वाले tourist या journalist में किसी एक की हिम्मत नहीं कि वो प्रदर्शन कर रहे इन्हीं लोगों से पूछ सकें कि हम tourists को भरोसा दिलाने वाली आपकी इस भावना से बहुत ख़ुश हुए। हम इस भावना का सम्मान भी करते है। लेकिन किन सर, क्या आप हमें बता पाएँगे कि पिछले 36 सालों में कश्मीरी ऐसा भरोसा कश्मीरी पंडितों को क्यों नहीं दिला पाए?

क्या किसी tourist ने पूछा कि सर, हम तो फिर भी tourist हैं, साल में चार दिन घूमने आए हैं, घूमकर चले जाएँगे। लेकिन जो कश्मीरी पंडित यहाँ से भगाए गए हैं, ये कश्मीर तो उनका अपना घर है। हमसे ज़्यादा आपके भरोसे की ज़रूरत तो उनको है। पिछले सालों मेें आपने उनको भरोसा दिलाने के लिए ऐसी कितनी रैलियां निकालीं?

क्यों नहीं ये सवाल किया गया कि Tourist तो फिर भी कहीं और चला जाएगा, लेकिन जिस आदमी से अपना घर छीना गया है, वो कब तक दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विस्थापित बनकर पड़ा रहेगा? जिस तरह रैलियां निकालकर आप टूरिस्टों को भरोसा दिला रहे हैं कि कुछ नहीं होगा वापिस आ जाओ..वापिस आने की ऐसी अपील कितनी बार उनसे की गई?

क्यों उनसे नहीं पूछा जाता कि ये किस तरह की संवेदनशीलता है, ये किस तरह का दिल है जो tourist के लिए तो धड़कता है मगर अपने ही कश्मीरी पंडितों के लिए नहीं?

क्यों नहीं ये सवाल किया जाता कि जो उमर अब्दुल्ला आज हादसे पर बड़ा अफसोस ज़ाहिर कर रहे हैं। आखिर क्या वजह थी कि इनके वालिद फारूख अब्दुल्ला को धारा 370 के मुद्दे पर ये कहना पड़ा था कि अगर ऐसा हुआ तो अल्लाह ये चाहेगा कि हम भारत से अलग हो जाएँ। मतलब तब तो बाकी भारतीय राज्यों के बराबर दर्जा करने पर कश्मीर को भारत से अलग करने की धमकी दे रहे थे और आज भारतीय टूरिस्टों के मुंह मोड़ लेने के डर से विधानसभा में माफियां मांग रहे हो।

सिर्फ एक बार इनमें से एक भी सवाल पर विचार कर लिया होता, तो इस निर्लज्जता के फूहड़ प्रदर्शन से बचा जा सकता था, कि 'यहाँ सब तो ठीक है...सब मज़े में है...छोटी मोटी घटनाएं तो होती रहती हैं।

पूरी दुनिया में आपको संवेदनहीनता की ऐसी दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी, जहां एक तरफ बूढ़ा बाप आतंकी हमले में मारे गए अपने बेटे की अस्थियां बहाते हुए रो रहा है और ठीक उसी वक्त उस मौत से बेपरवाह उसका समाज उसी जगह सामान्यीकरण का जश्न मना रहा है! अफसोस है, बहुत अफसोस।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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