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रवीश कुमार, क्या आपको पता है कि खबर पर बाइलाइन देने की जागरण की पॉलिसी क्या है?
वैसे रवीश में क्यों इतना हीनता का भाव है कि अपने चैनल को भी देखने से मना करते हैं
समाचार4मीडिया ब्यूरो 6 years ago
डॉ. अनिल दीक्षित
कई बार सोचा जवाब दे दूं, परंतु सोचा छोड़िए। मेरा पूर्व संस्थान जो मेरे अंदर गर्व पैदा करता है, उस पर निशाना बनाया था इसलिए आज मन नहीं मान रहा, इसलिए आज जवाब लिख ही रहा हूं।
प्राइम टाइम रहता है लेकिन इसका प्राइम उद्देश्य न जाने क्या हो गया है। मुझे तो लगता है कि लोगों के टाइम को खराब करना है। जब सुबह से व्यस्तता के दौर के बाद लोग देश-दुनिया की जानकारी चाहते हैं, तो रवीश कुमार को झेलिए। यह वही कुमार हैं, जो अपने को सर्वज्ञानी समझते हैं। ऐसी आत्ममुग्धता तो ज्ञान प्राप्ति से पहले कालिदास में भी नहीं थी। वह तो बिना किसी आत्ममुग्धता के ही डाल काट रहे थे। खैर आगे बढ़ें हिंदी की खाते हैं लेकिन लोगों को सलाह देते हैं कि हिंदी अखबार मत पढ़िये। न्यूज चैनल पर आते हैं लेकिन सलाह होती है कि टीवी न्यूज देखना छोड़ दीजिए। यह आपका समय खराब करेगी। यानी जिस थाली में खाते हैं, उसमें ही छेद करना इनकी आदत है।
किसी भी सभ्य समाज में ऐसे लोगों को किस नजर से देखा जाता है, बताने की जरूरत नहीं। आखिर इनका चैनल इनसे न जाने ये सवाल क्यों नहीं करता कि आप हमारे चैनल को देखने से भी मना क्यों कर रहे हैं। खैर, यह उनका आंतरिक मामला होगा। शायद दिखा रहे हों, कि हम सत्ता के विरोध में कितने प्रखरता से पत्रकारिता को ऊंचाई दे रहे हैं।
वैसे रवीश में क्यों इतना हीनता का भाव है कि अपने चैनल को भी देखने से मना करते हैं। यदि कोई अपने संस्थान (एनडीटीवी जैसा कभी जाना-माना नाम) पर गर्व नहीं कर सकता, तो उसको बहुत बेचारा ही कह सकते हैं। आगे बढ़ता हूं, पिछले दिनों एक दोस्त का फोन आया कि जिन्होंने बताया कि रवीश ने दैनिक जागरण पर बहुत सवाल उठाए हैं। बात सवाल उठाने की नहीं है, सवाल हैं तो उठने चाहिए। बात यह है कि यह है कि यह तार्किक तो हैं कहीं ऊलजुलूल तो नहीं। उन्होंने जागरण को एक तरह मोदीभक्त बता दिया है। संयोग से एक खबर ऐसी भी थी जिसमें कहा था कि रिपोर्टर को खबर पर बाइलाइन देनी चाहिए थी। क्या देश के नंबर वन अखबार जागरण की पत्रकारिता की रीति-नीति ऐसे पत्रकार तय करेंगे, जो अपने चैनल की रेटिंग गर्त में पहुंचाए हुए हैं। क्या उनको पता है कि खबर पर बाइलाइन देने की जागरण की पॉलिसी क्या है।
खैर यहां से भी आगे उनके मोदी सरकार को लेकर शिकवे हैं। उनकी हाहा-कारी को देखकर लगता है, जैसे सरकार ने मीडिया का टेंटुआ दबा दिया। जरा पीछे की ओर क्यों नहीं बढ़ते हैं, आपातकाल में क्या हुआ था। आपने खूब पढ़ा होगा, तब क्या मोदी सरकार थी। बेहतर होता कि उसकी ज्यादतियों पर कोई रिसर्च करते। मैं तो कहता हूं कि मोदी की ज्यादतियां मानते हैं तो आपातकाल से तुलना कर देते, जनता आखिरी खुद फैसला कर देती। राजीव गांधी के समय में दूरदर्शन की खबरों के राजनीतिकरण से तुलना कर देते, तो भी जनता समझ जाती। अब चुनाव के समय में मोदी के इंटरव्यू पर सवाल उठा रहे हैं, फकीरी पर सवाल उठा रहे हैं। संन्यासी होने पर सवाल उठा रहे हैं। चुनावी समय में गैर राजनीतिक इंटरव्यू की बात उठा रहे हैं। आखिर दिक्कत क्या है।
क्या चुनावी समय में गैर राजनीतिक बात करना कोई गुनाह है। क्या लोगों को हक नहीं ये जानने का कि जो नेता दोबारा प्रधानमंत्री बनने के लिए चुनावी झंडा उठाकर चल रहा है, उसका पिछला और सत्ता के गलियारों से अलग जीवन कैसा है।
अब कहते हैं कि मोदी उनसे आमना-सामना नहीं करते। क्यों करें। अब उनका सबसे बड़ा दर्द है कि सत्ता उनको भाव नहीं देती। आखिर भाव क्यों मिलना चाहिए? कौन नहीं जानता किस तरह पत्रकारिता में पक्षता भरी रिपोर्टिंग को लेकर उनकी छवि है। अरे, जरा सोचें कि क्यों आपकी टीआरपी इतनी डाउन है। लोग क्यों चैनल बदल देते हैं। ऐसा तो नहीं है कि सारे टीवी न्यूज देखने वाले मोदी भक्त हैं। वह भक्त न होते हुए भी आपको देखना पसंद इसलिए नहीं करते, क्योंकि उनको पता है कि आपकी कुंठा, आपकी हीनभावना, आपके दरक चुकी विचारों की हीनता ही देखने को मिलेगी।
रवीश जी, अपने गिरेबां में झांकिए। अपने पतन का जिम्मेदार व्यक्ति स्वयं होता है। अन्यथा सूरज तो सुबह सबको बराबर रोशनी देता है। बाकी, अनगिनत गाली मिलें तो समझना चाहिए कि गलती हो रही है।
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