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मीडिया के मैदान में भी खतरों का सामना जरूरी: आलोक मेहता

इसमें कोई शक नहीं कि पहले या अब पत्रकारों पर दबाव बनाना या अनुचित ढंग से उन पर कानूनी प्रकरण दर्ज करना या मीडिया संस्थानों पर हमला न केवल निंदनीय है।

समाचार4मीडिया ब्यूरो ।। 6 months ago

आलोक मेहता, पद्मश्री, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक।

पुरानी फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का प्रसिद्ध गीत है- ‘प्यार किया तो डरना क्या। ’ इसलिए समाज में यही कहा जाता है कि मुहब्बत हो या जंग का मैदान, भय की कोई गुंजाइश नहीं है। यही बात मेडिकल प्रोफेशन के डॉक्टर हों या मीडिया के पत्रकार, किसी भी सही ऑपरेशन या सही समाचारों और विचारों के लिए डरकर काम नहीं कर सकते। सेना का सिपाही कारगिल की ऊंचाई हो या राजस्थान का रेगिस्तान, जब अपना कर्तव्य निभाता है तो खुद की सुरक्षा के लिए किसी इंतजाम की मांग नहीं करता है।

मेरी राय में मीडिया से जुड़े व्यक्तियों के लिए भी भयमुक्त रहने और खतरा मोल लेने की स्थिति आदर्श होती है। हाल ही में कुछ राज्यों में मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकारों, कार्टूनिस्ट अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर सक्रिय स्वतंत्र लेखकों या आंदोलनकारियों पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा कानूनी कार्रवाई को लेकर विवाद उठ रहे हैं। इसके लिए प्रादेशिक अथवा केंद्र की सरकार के प्रमुख नेताओं पर आरोप लगाए जा रहे हैं। विदेश में बैठे कुछ संगठन इस मुद्दे पर अतिरंजित रिपोर्ट जारी करते रहते हैं।

ऐसा वातावरण बनाया जा रहा है जैसे भारत में इस तरह के दबाव पहली बार हो रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि पिछले दशकों में भी प्रिन्ट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कानूनी कार्रवाई के अलावा राजनीतिक संगठनों और नेताओं द्वारा आतंकित करने के प्रयास किए जाते रहे हैं। भारतीय प्रेस परिषद, एडिटर्स गिल्ड, पत्रकारों की यूनियन और अदालतों के रिकार्ड में ऐसे अनेक मामले देखे-पढ़े जा सकते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि पहले या अब पत्रकारों पर दबाव बनाना या अनुचित ढंग से उन पर कानूनी प्रकरण दर्ज करना या मीडिया संस्थानों पर हमला न केवल निंदनीय है, ऐसे तत्वों पर अंकुश भी आवश्यक है। दूसरी तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग सुप्रीम कोर्ट तक अनुचित मानती है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में पुलिस की कार्रवाई को गलत भी ठहराया। इसलिए यह धारणा गलत है कि देश में असहमतियों, आलोचनाओं और प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर काम नहीं किया जा सकता है।

इस संदर्भ में पत्रकारिता के अपने कुछ अनुभवों का उल्लेख करना उचित लगता है। इन दिनों बिहार में मीडिया को डराने के प्रयास की बड़ी चर्चा है। कुछ ऐसा संयोग रहा है कि मैं स्वयं 1988 से 1991 तक बिहार में नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अखबार में स्थानीय संपादक रहा और बाद में भी अन्य राष्ट्रीय दैनिकों तथा साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाओं में संपादक रहा, जिनकी प्रसार संख्या बिहार में अच्छी-खासी रही है। बिहार में रहते हुए तीन वर्षों के दौरान कांग्रेस के तीन मुख्यमंत्रियों और फिर जनता दल (बाद में राष्ट्रीय जनता दल) के मुख्यमंत्री के कार्यकाल में मीडिया पर दबाव और हमलों की घटनाओं का साक्षी ही नहीं भुक्तभोगी भी रहा हूँ।

उस समय झारखंड बिहार का ही हिस्सा था और धनबाद में हमारे एक संवाददाता अशोक वर्मा को सही खबरें लिखने के लिए पुलिस द्वारा बर्बरतापूर्वक पीटे जाने की घटना हुई। यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चित हुआ और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के वरिष्ठ संपादकों की एक टीम ने आकर पूरी स्थिति पर एक रिपोर्ट भी जारी की। वहीं उस संवाददाता या अखबार ने प्रदेश या केंद्र की सरकार को दोषी नहीं ठहराया। अपेक्षा यह की गई कि सरकार और अदालत स्वयं दोषी अधिकारी पर कार्रवाई करें।

कांग्रेस राज में ही आरा, बक्सर के एक अच्छे संवाददाता रामेश्वर उपाध्याय को हटाने के लिए एक कांग्रेसी विधायक ने ही मुझे फोन किया। मेरा उनसे कोई परिचय भी नहीं था। मेरा उत्तर यही था कि तथ्यों पर आधारित खबरें लिखने वाले किसी रिपोर्टर को उनके या किसी के दबाव से नहीं हटाया जा सकता। वह संवाददाता अपना काम करता रहा। कुछ सप्ताह बाद पता चला कि विधायक महोदय ने अपने इलाके के एक थाने में यह रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसके गाँव के घर में डकैती की घटना हुई और डकैती की योजना इस अखबार के संपादक आलोक मेहता ने बनाई थी। यही नहीं उस विधायक ने विधानसभा में भी इसी तरह का बेबुनियाद हास्यास्पद आरोप लगाया।

हमारे अखबार से निकाले गए एक व्यक्ति ने अपने पर्चेनुमा अखबार में इस आरोप को छाप दिया। लेकिन हमने इस मामले में कोई हंगामा नहीं किया। पुलिस में एफआईआर भले ही दर्ज हुई लेकिन किसी तरह की कार्रवाई पुलिस नहीं कर पाई। उस संवाददाता के साथ हम अपना काम पहले की तरह करते रहे और उस विधायक या क्षेत्र की गड़बड़ी की खबरें छपती रहीं।

इसी तरह कांग्रेस के एक प्रमुख नेता और सहकारी संगठन के प्रमुख तपेश्वर सिंह की आर्थिक अनियमितताओं पर प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ एक रिपोर्ट हमने लिखी। अगले दिन उनके परिवार के एक सदस्य देर शाम अखबार के दफ्तर पहुंचे। जब उन्हें पता चला कि संपादक दफ्तर में नहीं हैं तो उन्होंने हमारा पता पूछा। हमारे एक सहयोगी ने फोन पर हमें बताया कि तपेश्वर सिंह की खबर को लेकर एक सज्जन बहुत उत्तेजित हैं और घर का पता पूछ रहे हैं और सहयोगी ने यह आशंका भी व्यक्त की कि इस व्यक्ति की जेब में रिवाल्वर भी रखा हुआ है।

मैंने अपने साथी से कहा कि आप उन्हें पता बता दीजिए क्योंकि आप नहीं बताएंगे तो भी वह पता लगा ही सकते हैं। वह व्यक्ति थोड़ी देर में ही मेरे फ्लैट पर पहुंचे। रात में खाने का वक्त था इसलिए मैंने उनसे पूछा कि क्या आप खाना खाएंगे। लेकिन वह बहुत गुस्से में थे और अखबार में तपेश्वर सिंह के संबंध में सभी खबरों पर आपत्ति जता रहे थे, साथ ही नतीजा भुगतने को तैयार रहने की धमकी भी दे रहे थे। मैंने उत्तेजित हुए बिना उनसे इतना ही कहा कि तथ्य और प्रमाण की फोटोकॉपी भी अखबार में छपी है।

यदि तथ्य गलत हैं तो आप उसका खंडन भेज सकते हैं या कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। बहरहाल, जब उन्हें समझ में आ गया कि हमारा कोई निजी या राजनीतिक पूर्वाग्रह नहीं है और खबर के प्रमाण हमारे पास हैं तब वे चले गए। इसके बाद भी समय-समय पर नेता और उनके संगठन के गड़बड़ियों की खबरें और संपादकीय छपते रहे। 1990 में लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री हुए और कुछ समय बाद एक ईमानदार अधिकारी पशुपालन विभाग में गरीबों को पशु बांटने के नाम पर करोड़ों के घोटाले से जुड़ी लगभग एक फाइल ही हमारे पास ले आए।

उसमें मुख्यमंत्री लालू यादव के दस्तखत वाले दस्तावेज भी थे | मैंने स्वयं उस दस्तावेज सहित विस्तृत खबर छाप दी। अगले दिन उसके फॉलोअप में भी सहयोगियों ने खबर लिखी। नतीजा यह हुआ कि तीसरे दिन मुख्यमंत्री लालू यादव और उनकी पार्टी के समर्थकों ने संपादकीय कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन आदि किए और चार-पाँच किलोमीटर दूर संस्थान की प्रिंटिंग यूनिट पर हमला किया तथा आग लगाने की कोशिश भी की। दिन का समय था और बहुत अधिक नुकसान तो नहीं हुआ लेकिन यह हमला पटना से लेकर दिल्ली तक चर्चा में आ गया।

हमने इस हमले पर कोई बड़ी रिपोर्ट नहीं छापी, एक संपादकीय अवश्य लिखा। लालू यादव अपने एक-दो वरिष्ठ अधिकारियों के साथ दफ्तर आए और यह बताने की कोशिश की कि इस हमले में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है। हमने उत्तेजित हुए बिना यही कहा कि आपका प्रशासन जानता है कि हमला किन लोगों ने किया। प्रमाण होने के कारण मुख्यमंत्री कोई कार्रवाई तो नहीं कर सकते थे। इसके बाद भी अखबार में इस घोटाले से संबंधित खबरें छपती रहीं। वह मुख्यमंत्री पद पर बने रहे और चर्चित चारा घोटाले में उनको और काई अन्य साथियों को जेल भुगतना पड़ी।

इस तरह के अनेक मामले बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे विभिन्न राज्यों में आते रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित हल्लाबोल आंदोलन मीडिया के विरुद्ध ही था। प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का शासन था। उनके समर्थकों ने अखबारों के विरुद्ध हमलों में अखबार बांटने वाले हाकर्स तक को नहीं छोड़ा। तब एडिटर्स गिल्ड ने भी इस घटना की जांच के लिए तीन संपादकों की टीम भेजी। इस टीम में इंदर मल्होत्रा, अजीत भट्टाचार्जी जैसे वरिष्ठ संपादकों के साथ मैं भी शामिल था।

सभी पक्षों से प्रमाण लेने, गवाहों को सुनने के बाद टीम ने मुख्यमंत्री का पक्ष भी सुना। मुख्यमंत्री ने कुछ खबरें पूरी तरह गलत और भड़काने वाली तथा एक प्रकाशन संस्थान द्वारा सरकार से लाभ लेने यानी अप्रत्यक्ष रूप से ब्लैकमेल करने संबंधी पत्र व्यवहार की प्रतियां भी सौंप दी। इसलिए गिल्ड की रिपोर्ट में हमले की तीखी आलोचनाओं के साथ ब्लैकमेल संबंधी तथ्य भी प्रस्तुत किए। पत्रकारिता का यही मानदंड है कि राजनैतिक पूर्वाग्रह और निजी स्वार्थ से हटकर प्रमाणों और तथ्यों पर काम किया जाए। इसके बाद कानूनी संरक्षण तो मिल ही जाता है। लेकिन यह सच है कि मीडिया को हर युग में चुनौतियों और खतरों का सामना करना ही पड़ता है।

( यह लेखक के निजी विचार हैं )


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